‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

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संपादकीय

>> रविवार, 12 फ़रवरी 2012





पंजाबी कथा साहित्य का एक और मजबूत स्तम्भ नहीं रहा।

पंजाबी कथा साहित्य का एक और मजबूत स्तम्भ नहीं रहा। गत माह 26 जनवरी 2012 को जब पूरा देश गणतंत्र दिवस मना रहा था, दिल्ली में शाम को पंजाबी के जाने-माने कथाकार –उपन्यासकार कर्तार सिंह दुग्गल जी का निधन हो गया। वह 94 वर्ष के थे। पंजाबी की पहली कथा पीढ़ी के इस कथाकार की कलम को उनकी बढ़ती उम्र भी नहीं रोक पाई थी। दुग्गल जी अन्तिम दिनों तक निरंतर लेखनरत थे। उन्होंने खूब लिखा और जम कर लिखा। जिस बढ़ी उम्र में लोग थककर बैठ जाते हैं, दुग्गल जी बाकायदा नियमित लेखन करते रहे… पंजाबी और हिन्दी दोनों में वह बराबर पढ़े जाने वाले लेखकों में से थे। ऐसे महान साहित्यकार के निधन पर मेरी विनम्र श्रद्धांजलि ! उनकी बहुत ही प्रसिद्ध कहानी ‘चाँदनी रात का दु:खान्त” हम यहाँ पाठकों से साझा कर रहे हैं।
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इस अंक में ‘स्त्री कथा लेखन : चुनिंदा कहानियाँ’ के अन्तर्गत हम पंजाबी की प्रख्यात लेखिका अजीत कौर जी की बहुचर्चित कहानी ‘गुलबानो’ प्रकाशित कर रहे हैं। ‘पंजाबी लघुकथा : आज तक’ के तहत पंजाबी के जाने-माने और सशक्त कथाकार हरभजन सिंह खेमकरनी जी की पाँच चुनिंदा लघुकथाएँ आपके समक्ष रख रहे हैं। इसके साथ ही आप पढ़ेंगे- धारावाहिक रूप से शुरू किए गए बलबीर मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की अगली किस्त…
आप के सुझावों, आपकी प्रतिक्रियाओं की हमें प्रतीक्षा रहेगी…
सुभाष नीरव
संपादक - कथा पंजाब

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पंजाबी कहानी : आज तक




पंजाबी कहानी : आज तक(6)

सन् 1917 में धमियान में जन्में, एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त, कर्तार सिंह दुग्गल पंजाबी कहानी की प्रथम पीढ़ी के एक ऐसे प्रख्यात कथाकार जिन्हें पंजाबी और हिंदी में समान रूप से पढ़े जाने गर्व हासिल रहा। नियमबद्ध होकर निरंतर लेखन करना इनकी हॉबी रही। 21 कहानी संग्रहों, 8 उपन्यासों के साथ-साथ कविता, नाटक, आत्मकथा, आलोचना की अनेकानेक पुस्तकों के रचियता। साहित्य अकादमी, गालिब अवार्ड, भारती पुरस्कार, सोवियत लैंड पुरस्कार तथा भारत सरकार के पद्मभूषण से सम्मानित हैं। निधन : 26 जनवरी 2012। 'चाँदनी रात का दु:खान्त' इनकी बहुचर्चित एक यादगार कहानी है।


चाँदनी रात का दु:खान्त
कर्तार सिंह दुग्गल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

कोई नहीं कहता था कि मालिन और मिन्नी माँ-बेटी हैं। जहाँ से गुज़रती, लोग यही समझते कि दोनों बहनें हैं। मिन्नी बालिश्त भर ऊँची थी अपने माँ से। ''अरी मालिन, क्या खूब यौवन उतरा है तेरी बेटी पर!'' अड़ोसिनों-पड़ोसिनों की उसकी ओर देख देखकर भूख न मिटती। और लड़की तो जैसे सच्चा मोती हो! जितनी सुन्दर, उतनी सुशील। मालिन अपनी बेटी के मुँह की ओर देखती और उसे लगता जैसे हू-ब-हू वो खुद हो। अभी कल की ही बात थी, वह खुद वैसी की वैसी थी। और वह सोचती, अब भी उसका क्या बिगड़ा था! अब भी... अब भी कोई पहाड़ काटकर उसके लिए नहर निकालने के लिए बेताब था। अब भी, अब भी कोई सात समुन्दर तैरकर उस तक पहुँचने के लिए बेकरार था।
यह कौन उसे याद आ रहा था ? मोतियों का व्यापारी।
ये क्यों उसकी पलकें आज भीग-भीग जा रही थीं। उसकी बेटी अब जवान हो गई थी। अब उसे यह कुछ शोभा नहीं देता था। सारी उम्र संभल-संभलकर चली, आज ये कैसे ख़यालों में वह खोयी चली जा रही थी ? नहीं-नहीं, अगले हफ्ते मिन्नी... अपनी बेटी का उसको काज रचाना था। नहीं, नहीं, नहीं !
''पास मेरी परम प्यारी, एक पल न बिसारी...''
कल उसने चिट्ठी लिखी थी। हर बार वो आता, यह उसे वैसे का वैसा लौटा देती। आँखें मूँदकर अपना द्वार बन्द कर लेती। लेकिन वो था कि एक पल भी उसने इसे नहीं बिसरा था। मालिन उसकी जान थी। एक क्षण उसे चैन नहीं था इसके बिना और सारी उम्र उसने काट ली थी किसी की प्रतीक्षा में, फफक-फफक कर, सिसक-सिसक कर, तड़प-तड़प कर सारी उमर। और अब परछाइयाँ ढल रही थीं। जब कभी पंछी उड़ जाए।
मालिन सोचती, आज रात वह ज़रूर आएगा। शरद् पूनम की रात वो ज़रूर इसका द्वार खटखटाता था। वर्षों से खटखटाता आ रहा था। कभी भी तो उसने अपना पट उसके लिए नहीं खोला था।
और फिर मालिन को कई वर्ष पहले की शरद् पूनम की वो रात याद आने लगी, जब अमराई के तले नाचती इसकी चुनरी उसकी बाहों के साथ लिपट गई थी और सर से नंगी वह उसके सामने दुहरी हो-हो गई थी, और फिर उसने उसकी चुनरी इसके कन्धों पर ला रखी थी।
अरे ! उस बिन वैसे ही अपना दुपट्टा आज उसने अपने कन्धे पर रखा हुआ था ! और मालिन सर से लेकर पाँव तक लरज गई।
सामने गली में मिन्नी आ रही थी, जैसे सरो का पेड़ हो। ऊँची, लम्बी और गोरी। हाथ लगाने से मैली होती। मुँह-सिर लपेटे, आँखें नीची किए। मजाल है कि किसी ने उसका ऊँचा बोल भी सुना हो! मन्दिर से लौट रही थी। भगवान के आगे हाथ जोड़-जोड़कर कि उसके मन की मुराद पूरी हो। भगवान सबके मन की मुराद पूरी करे! और मालिन आप ही आप मुस्कराने लगी, जैसे किसी के गुदगुदी हो रही हो। उसके मन की क्या मुराद थी ?
''माँ, तहेजी आज नहीं आए ?'' मिन्नी माँ से पूछ रही थी।
''तेरे तहेजी आज नहीं आएँगे। वो तो कहीं कल भी आ जाएँ तो लाख शुक्र मनाना। कितनी सारी बजाजी और कितना सारा अनाज उसे खरीदना है। ब्याह-शादी में चीज बच जाए तो अच्छी, कम पड़ जाए तो बड़ा झंझट होता है।'' मालिन बेटी को समझा रही थी। मिन्नी चूल्हे-चौके में व्यस्त होने से पहले धीरे से आई और अपनी मुक्कैश वाली चुनरी माँ के कन्धों पर रख उसका दुपट्टा उतारकर ले गई। कहीं उसकी रेशमी चुनरी मैली न हा जाए!
कितनी महीन मुक्कैश उसने टाँकी थी अपनी चुनरी पर!
धुँधलका हो रहा था। अकेली आँगन में बैठी मालिन कल्पनाओं में खो गई थी। कई चक्कियाँ बड़ा महीन आटा पीसती हैं। मालिन सोचती, वो भी तो एक चक्की की तरह थी जो सारी उमर अपनी धुरी पर चलती रही। कभी भी तो उसकी चाल नहीं डगमगाई थी। अपने-आपको उसने मलीदा कर लिया था। रोक-रोककर, भींच-भींचकर खत्म कर दिया था अपने आपको।
पूरे चाँद की चाँदनी अमराई में से छन-छनकर उसके ऊपर पड़ रही थी। ये कैसे विचारों में वो बहती जा रही थी आज ? मालिन को लगता था जैसे एक नशा-सा उसको चढ़ रहा हो। पूरे चाँद की चाँदनी हमेशा उस पर एक जादू-सा कर दिया करती थी।
चार दिन और। और फिर इस आँगन में गीत बैठेंगे, मालिन सोच रही थी - और फिर मेंहदी रचाई जाएगी। और फिर मिन्नी दुल्हन बनेगी। सिर से लेकर पाँव तक गहनों से सजी हुई। लाल जोड़े में कैसी लगेगी मिन्नी ? और फिर कोई घोड़े पर चढ़कर आएगा और डोले में डालकर उसे ले जाएगा अपने घर, अपनी अटारी में, और उसकी हथेलियों को चूम-चूमकर उसकी मेंहदी का सारा रंग पी जाएगा।
मालिन सोचती, अभी तो कल की बात थी, उसने भी मेंहदी लगाई थी, पर मिन्नी के तहेजी ने तो एक बार भी उसकी हथेलियों को उठाकर अपने होंठों से नहीं लगाया था, एक बार भी उसने कभी इसके हाथों को उठाकर अपनी आँखों से नहीं छुआया था। थका-हारा वो काम से लौटता, खाना खाता और खाकर सो जाता। एक बेटे की लालसा में कभी-कभी आधी रात को उसकी आँखें खुल जातीं। तब, जब मुश्किल से कहीं तारे गिन-गिनकर मालिन को नींद आई होती। और फिर हर वर्ष, हर दूसरे वर्ष इनके एक न एक बेटी आ जाती। बिन बुलाईं लड़कियाँ। आप ही आप आतीं, आप ही आप जाती रहीं। बस, एक मिन्नी बची थी, इकलौती। मोटी-मोटी, काली-काली आँखें। गोरे-गोरे गालों के नीचे तिल - मालिन का तिल। गज-गज लम्बे बाल -मालिन के बाल। मालिन सोचती, जैसे इस जीवन की उसकी सारी भूख ने उसकी बेटी में पुनर्जन्म ले लिया हो, अपनी पूर्ति करने के लिए। मालिन सोचती, उसका हुस्न जैसे फिर साकार हो गया था, अपनी कोखजाई में अपना मूल्य चुकवाने के लिए। मालिन को हमेशा महसूस होता जैसे उसके अंग-अंग, पोर-पोर में एक भूख बसी हुई है। एक प्यास में उसके होंठ बेकरार हो रहे थे।
पूरे चाँद की रात मालिन से कुछ खाया नहीं जाता था। और मिन्नी कब की चूल्हा-चौका सम्हाले, सामने ड़्यौढ़ी के दरवाजे को कुंडी लगा अन्दर कमरे में सो गई थी।
रात भी कितनी हो रही थी। चाँद जैसे सारे का सारा उसके आँगन में आन उतरा हो। रात ठंडी थी। अभी ठंड कहाँ ! यों ही हल्का-हल्का जाड़ा था। पूरे चाँद की रात, अकेला आँगन, मालिन सोचती- वो क्यूँ यूँ बैठी थी ? किसके इन्तज़ार में ? मिन्नी अन्दर सो चुकी थी। मिन्नी के तहेजी को आज ही क्यों शहर जाना था ? पूनम की रात तो वो अपने आपको बाँध-बाँधकर रखती थी। और मालिन ने मुक्कैश वाली मिन्नी की चुनरी के साथ अपना मुँह-सिर लपेट लिया। चाँद की चाँदनी में दमक-दमक पड़ते मुक्कैश के दाने। उसे लगा जैसे आसमान के तारे उसके बालों में उतर आए हों, उसके गालों पर, उसके कन्धों पर आकर खेलने लग गए हों। सामने अमराई पर फिर कोई पंछी आकर बोल रहा था- हुक, हुक, हुक ! सारी रात पुकारता रहेगा - पूनम की रात। सारी उम्र यूँ ही पुकारता रहा था और जिसने आना था, वह नहीं आया था।
ये किन विचारों में वो आज बहती जा रही थी ? मालिन सोचती, शायद इसलिए कि वो अकेली थी। अकेली क्यों थी ? अन्दर मिन्नी, उसकी जवान-जहान बेटी सोयी थी। अगले हफ्ते जिसका उसने काज रचाना था। सात दिन और, और वो चली जाएगी। और फिर मालिन अकेली रह जाएगी। इतना बड़ा आँगन और वो अकेली। मालिन का अंग-अंग लरज गया। यह आँगन से काटने को दौड़ा करेगा। मिन्नी क्यों उसके यहाँ आएगी ? वो तो अपना घर बसाएगी। गाँव के चौधरी की बहू, वह तो अपने सहन का सिंगार बनेगी। और मालिन सोचती, वो अकेली रह जाएगी। बिल्कुल अकेली। मिन्नी के तहेजी की तो सारी उम्र सूद-सौदे में कट गई थी - एक अटूट दौड़। घर का मर्द, शाम को हर रोज हारकर जैसे वो आता था और निढाल अपनी चारपाई पर ढेरी हो जाता था। कई बार उसे यह कहती - आखिर, इतने झमेले किसलिए ? काहे को उसने इतने झंझट पाल लिए थे ? लेकिन उसे कोई बात नहीं समझ आती थी।
मालिन घड़ी की घड़ी के लिए अन्दर कोठे में गई। मिन्नी सचमुच सो गई थी। अल्हड़ जवानी की नींद में बेसुध सोयी पड़ी थी। लाल चूड़ियों को उतार, सिरहाने रख, सो गई थी। कहाँ चूड़ियाँ रखी थी उसने ? ज्यों ही करवट लेगी, कच-कच टूट जाएँगी। और मालिन ने सोचा, वो उठाकर चूड़ियों को सामने ताखे में रख दे। लेकिन उसने तो चूड़ियाँ पहन ली थीं। ताखे में सम्हालने के बदले उसने तो चूड़ियाँ अपनी कलाइयों में सजा ली थीं। छह एक ओर और छह दूसरी ओर। चमक-चमक पड़ती चूड़ियाँ, अभी कल ही तो मिन्नी ने गली में बैठकर चूड़ीवाले से चढ़वाई थीं।
फिर, मालिन बाहर आँगन में लौट आई। सिर पर रेशमी मुक्कैश वाली चुनरी, बाहों में लाल चूड़ियाँ... पूरे चाँद की रात। मालिन को लगा, जैसे एक ऐंठन-सी उसके अंग-अंग में फैलती जा रही हो।
और फिर उसकी ड्यौढ़ी का दरवाजा किसी ने खटखटाया। वही था, वही ! धीरे से, सहमा हुआ, झिझकता हुआ - वही था! जैसे उसने चिट्ठी में लिखा था, अपने वक्त पर आन पहुँचा था, ''शरद् पूनम की रात में तुम्हारा किवाड़ खटखटाऊँगा। तुम्हारी मर्जी हो खोल देना, तुम्हारी मर्जी हो न खोलना। तुम्हारा किवाड़ खटखटाने का मेरा हक वैसे का वैसा बना हुआ है।'' ठक ! ठक !! ठक!!! बेहद कोमल, बेहद मधुर, प्यारी-सी यह दस्तक उसी की थी। वही था। चाँदनी रात का चोर। और सहसा चाँद घने काले बादलों के पीछे हो गया। अँधेरा-सा छा गया चारों ओर। जैसे किसी ने एकदम बत्ती बुझा दी हो। घोर काले बादलों का एक पहाड़-सा चाँद के सामने आ गया था। बादलों पर बादल चढ़े आ रहे थे।
और रात के उस अँधेरे में मालिन के कदम ड्यौढ़ी की ओर चल दिए। अँधेरा-अँधेरा, चक्कर-चक्कर, ठंड-ठंड, पसीना-पसीना, काँपते हुए हाथ से धीरे से उसने कुंडी खोली और अपने आप को तड़प रही बाहों में ढेरी कर दिया। और फिर होंठों पर होंठ, दाँतों में दाँत - बीस वर्षों का रुका हुआ एक बाँध जैसे फूटकर टूट पड़ा हो। जैसे कोई फूल की पत्ती किसी बवंडर की लपेट में आ गई हो।
मालिन को नहीं पता था, कब चलते-चलते वो दोनों गाँव के बाहर बरगद के नीचे जा खड़े हुए, कितने देर वहाँ खड़े रहे। मालिन को नहीं पता था, कब वो बरगद के साथ लगते खेत में जा बैठे, कितनी देर वहाँ छिपे रहे। तड़के मुँह-अँधेरे की गाड़ी दूर सड़क के पार चीखती-चिल्लाती गुजर रही थी कि उसकी आँख खुली और मालिन धीरे से उसकी बाहों में से निकल कर मुँह-सिर लपेट तेज-तेज कदम अपने घर लौट आई।
चूड़ियों को उतारकर उसने वैसा-का-वैसा मिन्नी के सिरहाने रख दिया। उसकी रेशमी चुनरी उसकी चारपाई पर रखी और अपना दुपट्टा लेकर सामने बिस्तर में जा लेटी।
मालिन अपने पलंग पर आकर पड़ी और उसकी आँख लग गई। यूँ तो उसे कभी भी नींद नहीं आई थी। जैसे सारी उमर का किसी का रतजगा हो।

धूप निकल आई थी और तब कहीं उसकी आँख खुली।
''कैसे अल्हड़ लड़कियों की तरह तो आज सोयी है माँ।'' मिन्नी ने उसे छेड़ा।
जवान-जहान लड़की। उसने घर की झाड़-पौंछ देख ली थी। चूल्हा-चौका खत्म कर लिया था और नहा-धोकर अब मन्दिर जा रही थी - मोतिये की कलियाँ अपनी चुनरी के साथ बाँधे, अपने इष्ट की भेंट चढ़ाने के लिए।
मिन्नी आँख से ओझल हुई और मालिन अलसायी हुई लाखों-लाख सपने अपने पलकों में लिए सामने आँगन में जा बैठी। मीठी-मीठी पुरवैया चल रही थी। हल्की-हल्की धूप सामने मुंडेर से नीचे उतर आई थी। एक खुमार-सा था आसपास। मालिन को लगा जैसे वो दूध की लबरेज कटोरी हो। दूध और उस पर तैर रही चमेली की कलियाँ। एक उन्माद में उसकी पलकें जुड़-जुड़ जातीं, खुल-खुल जातीं...
''अरी मालिन, कहाँ है तुम्हारी काइयाँ बेटी ?'' जैसे उसको किसी ने आकर चाँटा दे मारा हो। मालिन की ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की साँस नीचे रह गई।
''यह अनर्थ कभी नहीं किसी ने सुना। चार दिन इसके डोले को रह गए हैं और यह लड़की यूँ उथल पड़ी।'' लाजो पड़ोसिन हथेलियाँ मलती मालिन के पास आकर बैठ गई।
''क्या हुआ है मेरी बेटी को ? वो तो निरी गऊ है।'' मालिन भभककर उसे काटने को पड़ी।
''तेरी गऊ सारी रात कल मुँह काला करती रही है।''
मालिन ने सुना और उसके जैसे सोते सूख गए। काटो तो लहू नहीं। नीली-पीली - उसका अंग-अंग जैसे मुड़ रहा हो।
''उधर रात हुई, इधर यह किसी गुंडे के साथ बाहर निकल गई। सारी रात तेरी ड्यौढ़ी खुली रही है। मैंने खुद इन आँखों से देखा, ड्यौढ़ी के बाहर किसी की बाहों में यह ढेरी हुई पड़ी थी। मैं बाहर चोटी करने निकली थी और मैंने वैसे का वैसा किवाड़ भिड़ा लिया। और फिर ये हौले-हौले कदम, बाँह में बाँह डाले बाहर खेतों की ओर निकल गए। सारी रात मेरी तो आँख नहीं लगी। बेटियाँ सबकी सांझी होती हैं। यूँ पहले कभी किसी ने अपने माँ-बाप का मुँह काला नहीं किया। यूँ कभी किसी ने अपने बड़े-बूढ़ों की पत(इज्ज़त) नहीं उतारी। हम तो कहीं मुँह दिखाने के लिए नहीं रहे।'' और लाजो छल-छल रो रही थी, रोये जाती और हथेलियों को मले जाती।
मालिन जैसे कोई पत्थर हो, उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
और फिर यूँ बिलखती-बिलखती लाजो चली गई।
लाजो अभी गई ही थी कि गाँव का चौकीदार पिछवाड़े की ओर से उतर आया।
''भाभी ! अरी भाभी मालिन !'' कब का वो उसके पास खड़ा हो उसे बुला रहा था।
''क्या हुआ जुमा ?'' जैसे कुएँ में से निकली आवाज़ हो। मालिन चौकीदार को आँगन में खड़ा देखकर खुद को सम्हालने लगी।
''भाभी ! बात कहने वाली तो नहीं, पर कल रात बड़ा जुल्म हुआ है इस गाँव में। मैंने तो बाल सफेद कर लिए चौकीदारी करते हुए। ऐसा अन्धेर मैंने कभी नहीं देखा। तेरी बेटी मिन्नी किसी के साथ बरगद के तले मुँह काला करती रही। रात चाँदनी थी लेकिन आकाश बादलों से अटा हुआ था। दो बार मैं दस कदम की दूरी पर इनके पास से गुजर गया। होंठों पर होंठ जमाए, एक-दूसरे से चिपटे, इनको कुछ पता नहीं लगा। बरगद के तले खड़े खड़े थक गए तो फिर खेत में जा छिपे। मैं तो सारी रात तेरे घर की रखवाली में बैठा रहा हूँ। खुली ड्यौढ़ी, चार दिन इसके ब्याह हो रह गए हैं। ब्याह वाला घर गहनों-कपड़ों से भरा होता है। सवेर हुई तो मैं यहाँ से हिला। पता नहीं कब यह झक मार-मारकर लौटी, कमजात। मैंने तो इसे गोद में खिला-खिलाकर पाला है। मेरी बेटी होती तो मैं इसका गला घोंट देता। मैं तो पिछली दीवार फांदकर आया हूँ। मैंने सोचा, कोई पूछेगा कि तुम सुबह-सुबह किधर चल दिए, तो मैं क्या जवाब दूँगा ?''
मलिन के मुँह में जबान नहीं थी, फटी आँखों से जुमा चौकीदार को देख रही थी।
और जुमा जिस राह आया था, उसी राह दीवार को लाँघकर लौट गया।
जुमा गया और सामने गली में रतना जमींदार दहाड़ता-फुँकारता सिर जितना ऊँचा लट्ठ उठाए उसके आँगन में आ धमका। वह क्रोध में उबल रहा था।
''कहाँ है तुम्हारी लड़की ?'' ड्यौढ़ी में घुसते ही वह गरजा, ''कहाँ है वो बदजात छिनाल ? मेरा ही खेत रह गया था इसे खराब करने को...?'' रतना उछल-उछल पड़ रहा था। मन मन की गालियाँ सुनाता, सारा मुहल्ला उसने इकट्ठा कर लिया। अड़ोसी-पड़ोसी मुंडेरों पर आ खड़े हुए।
''मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है। तड़के मैं कुएँ की ओर जा रहा था, मैंने खुद अपनी आँखों से देखा - पहले यह निकली मेरी खेत में से मुक्कैश वाली चुनरी ओढ़े हुए, मैंने सोचा, लड़की शायद बाहर बैठने आई है। और फिर एक पल गुजरा तो इसका यार किसी दूसरी ओर से नीचे उतर गया।''
''क्यों झूठ बोलते हो चाचा ?'' बिजली की तरह कड़ककर मिन्नी भीड़ को हटाती हुई आगे बढ़ी। देर से वो मन्दिर से लौटी हुजूम के पीछे खड़ी सब-कुछ सुन रही थी।
''मैं झूठ बोलता हूँ बदजात ? मैं झूठ बोलता हूँ कुलच्छनी ? यह लाल चूड़ी किसकी टूटी हुई थी मेरे खेत में ?'' और अपनी चादर के पल्लू में बँधी लाल चूड़ी उसने मिन्नी की हथेली पर जा रखी। एक आँख झपकने में मिन्नी ने अपनी कलाइयों पर चूड़ियों को गिना - ग्यारह थीं। और वो ठिठककर रह गई। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
और फिर मुहल्लेवालियाँ आँखों ही आँखों में एक-दूसरी को कहने लगीं। उन्होंने स्वयं मिन्नी को पिछले दिन चूड़ियाँ चढ़वाते देखा था, दस के ऊपर दो चूड़ियाँ। लाल रंग चुनकर उसने निकलवाया था।
लोगों से आँगन भर गया था। और मालिन का समधी आया भीड़ को चीरता हुआ। उसके पीछे मिन्नी की होने वाली सास थी। और उन्होंने सारे वो थाल, सारे वो कपड़े, सारे वो नोट, सब वो मुँदरियाँ मालिन के सामने ला पटकीं। हक्के-बक्के लोग एक-दूसरे के मुँह की ओर देख रहे थे। औरतें बार-बार कानों को हाथ लगातीं। जवान-जहान लड़कियाँ मुँह में उंगलियाँ लिए काट रही थीं।
और फिर, धड़ाम से पड़ोस के कुएँ में किसी के गिरने की आवाज़ आई। सबकी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की साँस नीचे रह गई। लोगों ने आगे-पीछे देखा, मालिन की गऊ जैसी सुशील बेटी कहीं भी नहीं थी। वो बेटी जिसका ऊँचा बोल किसी ने नहीं सुना था, सच्चा मोती। जो सुबह-शाम भगवान के सामने हाथ जोड़-जोड़ नहीं थकती थी, वो बेटी कहीं भी नहीं थी। और लोग एक साँस कुएँ की ओर दौड़ पड़े।
मालिन तख्ते का तख्ता, वैसी की वैसी पड़ी थी। उसका आँगन भाँय-भाँय कर रहा था। अड़ोसी-पड़ोसी अल्ले-मुहल्लेवाले सारे कुएँ की ओर दौड़ पड़े थे - किसी तरह लड़की बच सके।

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स्त्री कथालेखन : चुनिंदा कहानियाँ




स्त्री कथालेखन : चुनिंदा कहानियाँ(3)


अजीत कौर
पंजाबी की प्रख्यात लेखिका अजीत कौर का जन्म 16 नवंबर 1934, लाहौर हुआ। इन्होंने अर्थशास्त्र में एम.ए. की। अब तक उन्नींस कहानी संग्रह, तीन उपन्यास, एक रेखा चित्र, एक यात्रा संस्मरण और आत्मकथा की दो पुस्तकें 'खानाबदाश' और 'कूड़ा-कबाड़ा'। अनेक कहानियों का भारतीय एवं विदशी भाषाओं में अनुवाद। पाँच कहानियों पर टेली फिल्मों का निर्माण। वर्ष 1985 में आत्म कथा 'खानाबदोश' पर साहित्य अकादमी, दिल्ली की ओर से सम्मानित। 'गुलबानो'(1063), 'महिक दी मौत'(1966), 'बुत शिकन'(1966), 'फालतू औरत'(1974), 'सावियाँ चिड़ियाँ'(1981), 'मौत अलीबाबा दी'(1985), 'ना मारो'(1990) और 'नवम्बर चौरासी'(1996) इनके प्रमुख कहानी संग्रह है।

फाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिटरेचर की प्रेजीडेंट। नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान में सार्क दशों के लेखकों की कांफ्रेंस का सफल आयोजन।

संप्रति- चेयरपर्सन, अकेडमी आफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर एवं स्वतंत्र लेखन ।

संपर्क- अकेडमी आफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर, 4/6, सिरी फोर्ट इंस्टीच्युशनल ऐरिया, नई दिल्ली-110049


गुलबानो
अजीत कौर

खुशदिल ख़ान गार्ड की बीवी गुलबानो बेहद सुंदर थी।
आसपास के बीसियों गाँवों में एक ! सिर्फ़ एक ! दूसरी बनाई ही नहीं थी बनाने वाले ने।
लम्बी ऊँची पठानी। मुँह जैसे कच्चे दूध का कटोरा हो ! अंग जैसे साग के कोमल डंठल ! और सुंदर, मानो परियों की रानी ! चाँद की कतरन !
पर हर परी को जैसे कोई देव अपने पत्थर के किले में कैद करके रखता है, वैसे ही खुशदिल ख़ान गार्ड ने गुलबानो को छिपा रखा था।
यूँ भी सभी पठान अपनी बीवियों को ऐसे छिपाकर रखते हैं मानो ब्याहकर न लाए हों, उन्हें लूटकर लाए हों कहीं से। लेकिन, खुशदिल ख़ान गार्ड की वीवी की तो छाया भी कभी किसी मर्द ने नहीं देखी थी।
खुले मौसम में सभी गाँव की औरतें मिलकर शहर में सौदा खरीदने जातीं। हर औरत उस घड़ी की प्रतीक्षा ऐसे करती, जैसे किसी मेले। सज-धजकर, बुर्के पहन कर घर से निकल पड़तीं। सबसे आगे ढोल बज रहा होता। दूर से ढोल की आवाज़ सुनकर पठान रास्ता छोड़ देते। गाँव के बाहर जब किसी के देख लेने का भय न रहता तो वे सभी बुर्कों के नकाबों को ऊपर उठा लेतीं और उनके मेहंदी रंगे चाँदी की पाजेबों वाले पाँव ढोल की ताल पर नाचते-नाचते बाँवरे हो जाते। काफ़ी समय से ज़बरदस्ती रोककर रखा हुआ नृत्य और उल्लास उनकी एड़ियों से फूट पड़ता।

जैसे जैसे वे आगे बढ़तीं, राह में जो जो गाँव आता, उन सबकी औरतें उनके साथ हो लेतीं। लेकिन जब वे खुशदिल ख़ान गार्ड के गाँव गढ़ी महाज़ ख़ाँ पहुँचती, तो सभी के दिल में एक टीस-सी उठने लग पड़ती। यह दर्द गुलबानों के कलेजे-में एक असहय पीड़ा बनकर रह जाता। गाँव की सब औरतें उनके साथ हो लेतीं, पर बेचारी गुलबानों घर की दीवारों में घिरी रह जाती। खुशदिल ख़ान गार्ड ने कभी जाने की इजाज़त ही नहीं दी।
सारी औरतें खुशदिल ख़ान गार्ड के घर जातीं, पिंजरे में बन्द गुलबानो के घर। फिर सब उसके आँगन में नाचना शुरू कर देतीं। ढोल बजता रहता और सेब, अमरूद, भुट्टे, खुरमानियाँ, चिलगोजे, किशमिश, काजू, गुड़ और मिसरी आदि बांटे जाते। सब मिलकर खातीं और गातीं।
गुलबानो को देखकर सबके दिल पर बादल घटाएँ बनकर बरसने-बरसने को हो आते। नीचे झुक आते और नीम-अँधेरा-सा घिर आता। न बरसते, न रोशनी को और हवा को भीतर आने देते।
ढोल की ढम्म-ढम्म में पीड़ के बोल साकार हो उठते। पठानी औरतें नृत्य करतीं तो उनकी एड़ियों से मानो कोई दर्द विलाप कर उठता।
और गुलबानो ? उसकी पीड़ा उन रातों की तरह थी जिन्हें अँधेरी राहों पर ठोकर लग जाती है और लाखों सितारे जिनके दर्द में कोयले से सुलग उठते हैं।
औरतें अपनी राह लेतीं। गुलबानो को लगता, उसके घर की दीवारों की तपती हुई भट्टी में उसका जीवन जलकर राख हो जाएगा।
खुशदिल ख़ान गार्ड के यार-दोस्त कहा करते कि उसे भी अपनी बीवी को दूसरी औरतों के संग जाने देना चाहिए। लेकिन वह किसी की न सुनता। लोग कहते, ''गाय-भैंसों को भी तो झुंड के साथ बाहर भेजते हैं कि नहीं ?'' वह चुप ही रहता।
जब भी औरतों का झुंड खुशदिल ख़ान गार्ड के घर आता, वह क्रोध से लाल हो उठता और बा-बारी से सबसे झगड़ने लग पड़ता। दफ्तर में मातहतों पर गरम और घर में नौकरों से नाराज़। बच्चों पर बात-बात पर बरसता। बीवी को अहसास कराता कि वो छोटी-सी चींटी से भी गई गुजरी है। हैसियत ही क्या है उसकी ? अगर खुशदिल ख़ान से ब्याह न होता उसका, तो क्या करती वो ?
वह बर्तन फोड़ देता, चीज़ें तोड़ देता। मानो तरह आँधी घर के दरवाजे तोड़कर अन्दर आ गई हो।
फिर जैसे-जैसे दिन व्यतीत होने लगते, आँधी खुद-ब-खुद शांत हो जाती। ज़िन्दगी अपनी राह हो लेती, ऐसी राह पर जहाँ नया कुछ न होता, न ही कुछ नया होने की संभावना होती। गुलबानो के प्राण घर की दीवारों को ऐसे अंगीकार कर लेते, मानो वो उसके जिस्म की ही दूसरी खाल हों।

खुशदिल ख़ान गार्ड के घर में बरसों से चन्दन नाम का एक व्यक्ति दूध देने आया करता था। उसकी निगाह सदा आँगन में कुछ खोजती-सी रहती, लेकिन उसे गुलबानो के दर्शन कभी नहीं हुए।
फिर एक दिन...
चन्दन ने अभी गागर बरामदे में रखी ही थी कि अन्दर आँगन में से गुलबानो गुजरी। उसने चन्दन को नहीं देखा, लेकिन चन्दन को उसकी एक झलक-भर मिल गई। उसे लगा, गुलबानों की खूबसूरती सागर जल से धुली, दूध-सी सफ़ेद, एक चमकदार सीपी के समान है। वह गुलबानो के रूप की एक ही झाँकी पाकर बादशाह हो गया।
चन्दन जहाँ कहीं उठता-बैठता, गुलबानो की बातें करता। उसका चेहरा ऐसा था, उसकी चाल ऐसी, कपड़े फलां रंग के, गहने... उसके हाथ... चलते हुए उसके पाँव...
गुलबानो चन्दन के सामने से आँगन में गुजरी थी - साकार गुलबानो ! गुलबानो खुद ! और चन्दन के मन के अँधेरे आकाश में बिजली-सी कौंध गई।
उनकी आपस में कभी कोई बात नहीं हई। गुलबानों ने चन्दन की तरफ देखा तक नहीं। चन्दन को लगा, जैसे यह सब सपना है, एक ऐसा सपना जो पंख फैलाकर उसके मन में, उसकी आत्मा में, उसकी सोच में, उसके ख़यालों में, उसके समूचे वजूद को ढककर बैठ गया था। इन मुलायम और गरम पंखों के नीचे कई चाहतें, कई सपने, कई कल्पनाएँ, आशाएँ अपनी छोटी, पतली और लम्बी गर्दनें निकालकर निरीह और भयहीन आँखों से संसार का स्तंभित-सी देख रही थीं - उस आकाश, उस धरती को जो लाखों वर्ष पुरानी थी, परन्तु उसके लिए आज ही, अभी, कच्चे दूध सी मीठी और कुनकुनी, सिर्फ़ उसके लिए बनी थी, सिर्फ़ उसी के लिए ही।
एक ओर चन्दन था जिसके दिल की दहलीज गुलबानो की एक ही झलक से खुल गई और धरती-आसमान दोनों उसमें समा गए।
दूसरी तरफ खुशदिल ख़ान था जो गुलबानो की बरसों की निकटता पाकर भी पत्थर बना रहा, एक ऐसा पत्थर जो लावे में जल-भुनकर कंकड़ बन जाता है।
एक गुलबानो थी जो खुशदिल ख़ान के पास रहते हए भी उससे कोसों दूर थी।
और उधर एक गुलबानो थी, जो चन्दन से कोसों दूर रहते हुए भी उसकी साँसों में समाई हुई थी।
गुलबानो को उसकी एक सहेली ने बताया कि उसके घर दूध देने वाला चन्दन झूम-झूमकर उसके हाथों, पाँवों, बालों और होंठों की तारीफ़ में गाता घूमता है।

अगले दिन चन्दन की दूध की गागर से एक धार जब उसके घर की गागर में गिरी तो गुलबानो ने द्वार की फांक में से पलकभर देखा। उसे लगा, दूध की एक धार चन्दन की गागर से निकलकर उसकी अपनी देह में समा गई है।
अब गुलबानो घर के आँगन में चलती तो उसके पाँव थिरक-थिरक जाते। उसका जीवन संगीतमय हो गया। गीतों की कड़ियाँ खुद-ब-खुद उसके होंठों पर आने लगीं। मस्ती के खुमार में आँखों को बन्द किए वह देर तक अपने अन्दर के गुनगुने पानियों में डूबी रहती।
उसके मानस के खाली पड़े आँगन में एक पौधा उगा - चन्दन के प्यार का पौधा। और उसके जीवन के सभी गंधहीन बरस सुवासित हो उठे, महक महक उठे। उसकी आत्मा की सीपी में एक बूँद प्यार की टपकी, और वह इश्क रूपी असली मोती बन गई।
उस बार जब समीप के गाँवों की औरतें ढोल की ताल पर नृत्य करती उसके घर के आँगन में आईं, तो ढोल भी खुश था और गुलबानो भी खुश ! गुलबानो को खुश देखकर सभी औरतें खुश थीं। और गाँव से दूर, नदी के किनारे भैसों को नहलाता चन्दन भी खुश। इस दिन यदि कोई खुश नहीं था तो वह था - खुशदिल ख़ान गार्ड।

आहिस्ता-आहिस्ता चन्दन की कही हुई बातें लोगों की ज़बानी खुशदिल ख़ान तक पहुँची। उसका सिर घूम गया। आँखों में खून उतर आया। इसी हालत में वह घर पहुँचा।
गुलबानो उस समय कपड़े धो रही थी और कपड़े धोने वाले सोटे की ठप्प-ठप्प पके साथ कोई गीत गुनगुना रही थी। खुशदिल ख़ान ने वही सोटा उससे छीनकर उसके सिर में दे मारा और कहा, ''जानती नहीं, गाना कुफ़्र है ?''
फिर उसकी बाँह पकड़कर घसीटते हुए उसे आँगन में ले आया, ''बता, चन्दन वाली बात सच है ?''
गुलबानो चुप। अपने जीवन में एक अकेले सच का वह कैसे झूठ कह दे ?
खुशदिल ख़ान उसको घसीटते-घसीटते ऊपर छत पर ले गया, ''आ, तुझे चन्दन से मिलवाऊँ...।''
फिर उसने छत से गुलबानो को धक्का दे दिया। वह धड़ाम से नीचे गली में आ गिरी। एक चीख़ गूँजी और बस...
आवाज़ सुनते ही लोग चारों ओर से दौड़ पड़े। खुशदिल ख़ान ने ऊपर छत पर से देखा, उसकी बीवी नंगे मुँह गली में पड़ी है और सब लोग उसे देख रहे हैं। वह दौड़ा-दौड़ा नीचे उतरा। अन्दर से एक मोटी चादर लेकर गली में पहुँचा, और झटपट गुलबानो के मुँह पर डाल दी।

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पंजाबी लघुकथा : आज तक


पंजाबी लघुकथा : आज तक(9)

'पंजाबी लघुकथा : आज तक' के अन्तर्गत अब तक आप पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के कथाकार भूपिंदर सिंह, हमदर्दवीर नौशहरवी, दर्शन मितवा, (स्व.)शरन मक्कड, सुलक्खन मीत, श्याम सुन्दर अग्रवाल, डॉ. श्यामसुन्दर दीप्ति और (स्व.) जगदीश अरमानी की चुनिंदा लघुकथाएं आप पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत हैं- हरभजन सिंह खेमकरनी की पाँच पंजाबी लघुकथाओं का हिंदी अनुवाद। खेमकरनी जी पंजाबी लघुकथा के अग्रणी एवं बहुचर्चित लेखक रहे हैं और सत्तर वर्ष की आयु में अभी भी सृजनरत हैं। पंजाबी लघुकथा में इनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। ‘गली का सफ़र’, ‘वेला-कुवेला’(कहानी संग्रह), ‘थिंदा घड़ा’(लघुकथा संग्रह) और ‘ठंडी-तत्ती रेत’(कविता संग्रह) छप चुके हैं और अनेक पुस्तकों का संपादन किया है। बहुत सी लघुकथाओं का हिंदी, उर्दू और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है। देश और प्रांत के कई सम्मानों से सम्मानित। संपर्क : 4381-ए, रणजीत पुरा, पुतलीघर, अमृतसर-143002(पंजाब)
फोन : 098781-31525
-सुभाष नीरव
संपादक : कथा पंजाब

हरभजन सिंह खेमकरनी की पाँच लघुकथाएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

(1) वर्दी

हवेली के सामने बैठा सरपंच अपने हिमायतियों के संग मामले निपटाने के संबंध में सलाह-मशवरा कर रहा था। उनके समीप ही फौज के छुट्टी पर आया सरपंच का बेटा वर्दी कसे हुए अपनी मित्र-मंडली के बीच बैठकर फौजी किस्से चटखारे ले-लेकर सुना रहा था। तभी गाँव लौटा सूबेदार निशान सिंह आँगन में जाने के लिए हवेली के सामने से गुजरा। उसे देखते ही सरपंच के बेटे ने खड़े होकर ज़ोरदार सैल्यूट मारा। सैल्यूट का उत्तर देकर जब सूबेदार थोड़ा आगे बढ़ गया तो पीछे से किसी ने शब्दबाण छोड़े –
“आज़ादी तो इन्हें मिली है। देखो सूबेदार का रौब ! सरपंच का बेटा भी सैलूट मारता है।”
“भाऊजी, आदमी को कौन पूछता है? यह तो कंधे पर लगे फीतों की इज्जत है।”
“कोई बात नहीं, सूबेदार को संदेश भेज देते हैं कि अब से गाँव में वर्दी पहनकर न आया करे।” सरपंच ने शून्य में घूरते हुए कहा।

(2) रिश्तों का फ़ासला

एक रिश्तेदार के घर हो रहे विवाह समारोह में सम्मिलित होने के लिए वह अपने गाँव के बस-स्टैंड पर बस की प्रतीक्षा कर रहा था। उसके संग उसकी नव-विवाहिता पत्नी, जवान साली और अनब्याही जवान बहन थी। बस जैसे ही उनके पास आकर रूकी, वह फुर्ती से सीटें हथियाने के लिए बस में चढ़ गया। पिछली खिड़की के पास ही तीन सवारियों वाली सीट पर वह बैठ गया। उसके दायीं ओर उसकी पत्नी बैठ गई और बायीं ओर उसकी साली। बहन जब उसके पास आकर खड़ी हुई तो उसने बस के अंदर दृष्टि घुमाई। अगली खिड़की के पास दो सवारियों वाली सीट, जिस पर एक नौजवान बैठा था, पर नज़र पड़ते ही उसने उस सीट की ओर उंगली से इशारा करते हुए बहन के कहा- “वीरो, तू उस सीट पर जाकर बैठ जा।”

(3) चिकना घड़ा

बी.एस. गिल की नेम-प्लेट पढ़ते हुए अमरीक सिंह गिल ने बैल बजाई तो एक बुज़ुर्ग ने गेट खोला।
“गिल साहब से मिलना है, दफ़्तर से आया हूँ।” बुज़ुर्ग ने सत्कार देते हुए उसको कहा –“आ जाओ… आ जाओ…बैठक में बैठे हैं।”
वह बैठक की तरफ़ हो गया तो वह बुर्ज़ग भी आ गया। गिल साहब ने अपने पिता जी के उसका परिचय कराया, “बापू जी, ये अमरीक सिंह गिल, मेरे साथ ही अफ़सर हैं।”
“ये तो फिर अपने ही हुए।” चेहरे पर मुस्कराहट लाते हुए बुज़ुर्ग ने कहा।
दफ़्तरी मामलों से फुरसत पाकर अब वे घूंट-घूंट लगाने लग पड़े तो बुज़ुर्ग भी उनका साथी बन गया। अमरीक सिंह गिल को धर्मपाल द्वारा हवा में छोड़े गए वाक्य ‘गिल साहब का गोती अफ़सर आ गया, अब लग जाएंगे पते भई--- कहते हैं न कि एक एक ग़्यारह’ ने सवेर से ही परेशान किया हुआ था। इस अधूरे वाक्य में कड़वाहट, ईर्ष्या, डर… कितना कुछ अपने आप आ मिला था। शायद गोत भाई समझते हुए ही मुझे घर पर बुलाया हो। तीसरे पैग के खत्म होते ही वह नशे की लोर में बोला, “गिल साहब ! शायद गोत भाई होने के कारण ही आपने यह तकलीफ़ की है, पर जो बात मैं चार दिन बाद किसी ने कहनी है, वो मैं ही बता देना चाहूँगा कि मैं गिल नहीं हूँ। यह तो मेरा गाँव गिल्ल-कलां होने के कारण मेरे नाम के साथ गिल जुड़ गया है।”
“छोड़ यार इन बातों को। पचास साल हो गए हमको आज़ाद हुए, पर इस जात-गोत ने हमें अभी भी उतना जकड़ा हुआ है, जितना पाँच सौ साल पहले। तेरी इस साफ़गोई ने मेरे दिल में और इज्जत बढ़ा दी है। वैसे मुझे पहले ही पता था कि तू मज्हबी (छोटी जात का) गिल है।”
इतनी बात सुनते ही बुज़ुर्ग के माथे पर बल आ गए। अमरीक सिंह पैग खाली करते हुए उठा और इजाज़त लेकर गेट की ओर बढ़ा। अभी वह स्कूटर स्टार्ट करने ही लगा था कि उसने शीशे का गिलास टूटने की आवाज़ इस तरह सुनी जैसे गिलास को जान-बूझकर दीवार पर मारा गया हो।

(4) नज़र और नज़र

राजधानी में हो रही राजनैतिक रैली में हिस्सा लेने के लिए बेटिकट भीड़ ने गाड़ी के रिज़र्व डिब्बों पर भी कब्ज़ा कर लिया था। बड़ी कठिनाई से मीनाक्षी रिज़र्व सीट वाले डिब्बे में चढ़ तो गई, पर सीट मिलना तो क्या, खड़ा होने के लिए भी जगह नहीं थी। छोटे बच्चे के साथ अकेले रात का सफ़र आराम से करने की खातिर रिज़र्व करवाई सीट को मिन्नतें करने पर भी सवारियाँ खाली करने को तैयार न हुईं और न ही किसी को गोद में उठाई, भीड़ से घबराई बच्ची के रोने पर तरस आया। यह सोचकर कि अक्सर पुरुष सवारियाँ बच्चे पर तरस करके सीट छोड़ देती हैं, उसने बैठी हुई सवारियों के चेहरों पर प्रश्नभरी नज़रों से देखा, पर लम्बे सफ़र के कारण कोई भी सवारी सीट छोड़ने के लिए तैयार न हुई। आख़िर एक जनाना सवारी अपने पैरों में रखी गठरी पर बैठते हुए कहा, “आ जा बहन, यहाँ बैठकर बच्चे को दूध पिला ले। देख, कैसे रो-रोकर बेहाल हुए जाता है।”
सीट पर बैठते ही मीनाक्षी ने पर्स में से दूध वाली बोतल निकालने के लिए हाथ मारा तो परेशान हो गई। जल्दबाजी में बोतल घर में ही रह गई थी। सीट की टेक की तरफ़ मुँह करने लायक जगह भी नहीं थी। अब बच्चे को अपना दूध कैसे पिलाये। उसे लग रहा था कि बहुत सारी नज़रें उसी पर टिकी हुई हैं। उसकी दुविधा को भाँपते हुए समीप बैठी जनानी सवारी ने हवा में शब्द छोड़े, “बेटी, कपड़े की ओट करके बच्ची को दूध पिला ले, ये लोग भी तो माँओं के दूध पीकर बड़े हुए हैं।”
आवाज़ सुनते ही नज़रें शर्मसार हो गईं।

(5) महत्वपूर्ण दिन

महीने की पहली तारीख़ को बैंक में से पैसे निकलवाने की मज़बूरीवश मुझे भी लम्बी कतार का हिस्सा बनना पड़ा। काउंटर की तरफ़ धीरे-धीर सरक रही कतार में अधिकतर बुज़ुर्ग ही थे जो शायद पेंशन निकलवाने आए थे। समय बिताने के लिए अनजान व्यक्तियों से भी बातों को साझा किया जा रहा था। कुछ जीवन की, खट्टी-मीठी यादों को सांझा कर रहे थे और कुछ घर के हालात का रोना रो रहे थे। तभी, मुझे करीब तीन आदमियों के बाद खड़े बुज़ुर्ग के शब्द कानों में पड़े कि किस्मत वालों के बच्चे ही अपने माँ-बाप को आखिरी उम्र में पूज्यनीय समझकर सेवा करते हैं। ज्यादातर से तो हर महीने किसी न किसी बहाने पेंशन भी छीन ली जाती है और उन्हें अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए भिखारियों की तरह बेटे-बहुओं के आगे हाथ फैलाने पड़ते हैं।
“भाई साहब, आप ठीक कहते हैं। मेरा बेटा बाहर गेट के पास खड़ा है कि कब मैं बाहर आऊँ और वह मुझसे पैसे छीने।” एक अन्य ने बात आगे बढ़ाई।
“भाई मेरे बच्चे तो पेंशन को हाथ नहीं लगाते। जहाँ मर्जी खर्च कर। पहली तारीख़ को दोस्त-मित्रों से मिल जाया करते हैं और तनख्वाह की तरह पेंशन जेब में डालकर खुशी सी होती है।” एक और आदमी अपनी बात कहते हुए मुस्करा रहा था।
“घर के हालात भई सबके अपने अपने होते हैं। मेरा एक लड़का डॉक्टर है रेलवे में और एक फ़ौज में मेज़र है। खुला खर्च करने को देते हैं। बेटियाँ अपने घरों में हैं। कोई जिम्मेदारी नहीं। मैं पेंशन का एक भी पैसा घर में नहीं ले जाता। चार गरीब परिवारों की मदद हर महीने बाँध रखी है।” एक अन्य आवाज़ ने सभी को चौंकाया। सुनने वालों ने अपने अपने तीर छोड़े।
“बुज़ुर्गों को गप्प मारने की आदत लगती है।”
“दान करने वाले ढिंढ़ोरा नहीं पीटते।”
“पहली तारीख़ को क्या ज़रूरत है फिर लाइन में धक्के खाने की।”
“भाई साहब, अगर तुमने पेंशन निकलवाकर दान ही करनी है तो दस-बारह तारीख़ आया करो। धक्कों से बचाव हो जाएगा।” सोटी के सहारे खड़े बुज़ुर्ग ने कह ही दिया।
“तुम ठीक कहते हो, पर जिन परिवारों की मैं मदद करता हूँ, उनकी ज़रूरतें भी तो पहली तारीख़ से जुड़ी हुई हैं।”
लाइन में कुछ पल के लिए ख़ामोशी छा गई।

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पंजाबी उपन्यास




बलबीर मोमी अक्तूबर 1982 से कैनेडा में प्रवास कर रहे हैं। वह बेहद सज्जन और मिलनसार इंसान ही नहीं, एक सुलझे हुए समर्थ लेखक भी हैं। प्रवास में रहकर पिछले 19-20 वर्षों से वह निरंतर अपनी माँ-बोली पंजाबी की सेवा, साहित्य सृजन और पत्रकारिता के माध्यम से कर रहे हैं। पाँच कहानी संग्रह [मसालेवाला घोड़ा(1959,1973), जे मैं मर जावां(1965), शीशे दा समुंदर(1968), फुल्ल खिड़े हन(1971)(संपादन), सर दा बुझा(1973)],तीन उपन्यास [जीजा जी(1961), पीला गुलाब(1975) और इक फुल्ल मेरा वी(1986)], दो नाटक [नौकरियाँ ही नौकरियाँ(1960), लौढ़ा वेला (1961) तथा कुछ एकांकी नाटक], एक आत्मकथा - किहो जिहा सी जीवन के अलावा अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मौलिक लेखन के साथ-साथ डॉ.मोमी ने पंजाबी में अनेक पुस्तकों का अनुवाद भी किया है जिनमे प्रमुख हैं – सआदत हसन मंटो की उर्दू कहानियाँ- टोभा टेक सिंह(1975), नंगियाँ आवाज़ां(1980), अंग्रेज़ी नावल ‘इमिग्रेंट’ का पंजाबी अनुवाद ‘आवासी’(1986), फ़ख्र जमाल के उपन्यास ‘सत गवाचे लोक’ का लिपियंतर(1975), जयकांतन की तमिल कहानियों का हिन्दी से पंजाबी में अनुवाद।
देश –विदेश के अनेक सम्मानों से सम्मानित डॉ. बलबीर मोमी ब्रैम्पटन (कैनेडा) से प्रकाशित होने वाले पंजाबी अख़बार ‘ख़बरनामा’ (प्रिंट व नेट एडीशन) के संपादक हैं।

आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यह उपन्यास ‘पीला गुलाब’ भारत-पाक विभाजन की कड़वी यादों को
समेटे हुए है। विस्थापितों द्बारा नई धरती पर अपनी जड़ें जमाने का संघर्ष तो है ही, निष्फल प्रेम की कहानी भी कहता है। ‘कथा पंजाब’ में इसका धारावाहिक प्रकाशन करके हम प्रसन्नता अनुभव कर रहे हैं। प्रस्तुत है इस उपन्यास की अगली किस्त…
- सुभाष नीरव


पीला गुलाब

बलबीर सिंह मोमी

हिंदी अनुवाद
सुभाष नीरव

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गुलाब शहर से बहुत दूर आ चुका था। वर्षों बाद वह पैदल चल रहा था। जूते पैरों को काट रहे थे। उसने उतारकर दूर फेंक दिए। उसको याद आया कि बचपन में वह नंगे पैर कोसों तक दौड़ सकता था।
एक बार ताया ने शराब निकालनी थी। घड़े तैयार थे। मुझे पता था कि ताया के घड़े ईंख के खेत में पड़े थे। एक मैं था जो खेत की एक-एक मेंड़ पर घूम आता था और मुझे यहाँ तक पता था कि किस टहनी पर कितने आम लगे थे।
ताया का मेरे संग बहुत प्रेम था। मैं उसका आज्ञाकारी भी बहुत था। ताया ने मुझे लक्कड़-बालण चुगने और आग जलाने के काम पर लगा दिया और खुद नलियाँ जोड़कर उसने गागर को आग पर रख दिया। कुछ देर बाद ताया बाहर भी झांककर आ जाता। ताया कोई इतना बड़ा शराबी तो था नहीं, पर पीता ज़रूर था और पीता भी घर की निकाली हुई ही। निकालता वह खुद ही था। किसी दूसरे की निकाली हुई वह नहीं पीता था। उसका कहना था कि उसने आज तक मोल की नहीं पी थी और न ही बेची थी। उन दिनों में अंगूर बहुत सस्ता हुआ करता था। कुछ बेलें ताया की अपनी भी थीं। घड़ों में शक और गुड़ के अलावा अंगूर, संतरे, माल्टे आदि भी ज़रूर डाले जाते थे। एक बार ताया ने बिन बांग वाले मुर्गे डालकर भी शराब निकाली थी।
शराब से ताया का रंग और ज्यादा चमकने लग पड़ा था। देह से तगड़ा और कदकाठी का भरपूर ताया कुश्ती करने, कबड्डी खेलने, कलाई पकड़ने, डुबकी मारने और दौड़ने में अभी ही अपने हमउम्रों से आगे था। रंग लाल होने के कारण ताये का चेहरा तांबे की तरह चमकता रहता था। ताया में एक गुण और भी था। वह लाल मिर्चें बादामों की तरह चबाकर खा जाता था, मजाल कि उफ्फ भी कर जाए। एक बार ताया शर्त लगाकर पावभर मिर्चें बादामों की तरह चबा गया था और जीते हुए पाँच रुपयों में से एक रुपये का सेर घी छन्ने में डालकर ठंडाई की तरह पी गया था। एक भैंस का दूध ताया धार निकालते समय पी जाता था।
एक और गुण था ताया में। उसको ततैये, बर्र, मधुमक्खी और बिच्छू आदि नहीं काटता था। कई बार ताया चलते-चलते ततैये को उठाकर अपनी हथेली पर रख लेता था और यदि ततैया डंक मारता था तो उस डंक का ताये पर कोई असर नहीं होता था। ताया साँप को भी पूंछ से पकड़कर हवा में घुमाते हुए धरती पर पटक कर मार देता था और इस तरह कई साँप उसने पूंछ से पकड़कर दूर फेंक दिए थे।
ताया को मधुमक्खी का छत्ता उतारने का भी बहुत शौक था और मुझे शहद खाने का। ताया मुझे लेकर खतानों में घुस जाता। इन खतानों में मधुमक्खियों के बहुत छत्ते हुआ करते थे। वह मक्खियों को हटाकर छल्ली तोड़कर बाकी छत्ता वही लगा रहने देता। ऐसा ताज़ा शहद खाकर मैं ताया का और अधिक प्यारा भतीजा बनता गया।
एक बार हमारे गाँव में बंदरों वाले आए। बंदरिया का नाम सुंदरी था और बंदर का सुंदर। उनके तमाशे दिखाकर बंदरवाला घरों से रोटी, कपड़ा, आटा-दाल आदि मांग कर गुजारा करता था।
रात में बंदरवाले का बंदर खुल गया और भाग गया। गाँव भर में शोर मच गया। लोग बंदर को पकड़ने के लिए उसके पीछे भागने लगे पर बंदर छलांग लगाकर अगले कोठे पर जा चढ़ता। बंदरवाला रोने लगा। बड़े कष्टों से तो उसने इस बंदर को पाला था और नाचना-कूदना सिखलाया था। उसके रोजगार का सवाल था। पर आदमी को पकड़ना आसान है, बंदर को नहीं। एक बात याद आ गई। एक बार हमारे गाँव में पुलिस आ गई। बन्दे पकड़े नहीं जा सके। जो एक आदमी पकड़ा गया, उसने थानेदार को धक्का मार कर गिराया और बोला, ''ओए तू तो बिल्ली नहीं पकड़ सकता, मुझे क्या पकड़ेगा।'' और वह तेजी से भागते हुए यह गया और वो गया।
दिन चढ़ते तक बंदर नहीं पकड़ा गया और जब सब लोग घरों में से जाग उठे तो बंदर दौड़ते-दौड़ते हमारे खेत में आ गया। ताया उसको पकड़ने लगा तो वह शहतूत के पेड़ पर चढ़ गया। शहतूत का वृक्ष बहुत सघन और बड़ा था। जैसे-जैसे ताया पेड़ पर चढ़ता, बंदर और ऊँचे चढ़ जाता। बंदर का दुर्भाग्य था कि उसके गले में बंधी संगली उसके गले में ही थी जिसे वह खोल कर निकाल नहीं सकता था। यह संगली एक टहनी के साथ फंस गई। ताया ने संगली का कुंडा अपने हाथ में पकड़ लिया और बंदर को अपनी ओर खींचा। बंदर समझ गया कि अब छुटकारा कठिन है। कभी तो बंदर घुड़कियाँ देकर, दांत दिखाकर ताया को डराये और कभी उसके आगे हाथ जोड़े।
आख़िर ताया ने बंदर को पेड़ पर से नीचे उतार लिया। ताया का पैग गिलास में पड़ा था। उसने बंदर की संगली शहतूत के पेड़ की जड़ों से बांध कर आधा पैग गले से नीचे उतारा और खुद 'मिट्ठे'(एक फल) तोड़ने चला गया। जब ताया लौटकर आया तो बंदर ने बाकी का आधा गिलास पी लिया था और ताया के बार-बार गले लग रहा था।
जब बंदर के मालिक को पता चला तो वह लगा आकर ताया की मिन्नतें करने। पर ताया बंदर देने का नाम नहीं लेता था। उधर, बंदर भी मस्त हुआ पड़ा था और जाने का नाम नहीं लेता था।
बंदरवाले में गाँव में जाकर पंचायत इकट्ठी कर ली, पर पंचायत के कहने पर भी ताया ने बंदर नहीं दिया। बंदर को ताया ने अपने खेत के शहतूत के पेड़ से पकड़ा था। बंदर अब ताया का था। बाजीगर ने बहुत वास्ता डाला और जब कुछ दिन बाद बाजीगर पाँच गाँवों की और पंचायत लेकर आया, जिसमें साथ वाले गाँव का सफेदपोश और जैलदार भी था, तो ताया ने बंदर उसको वापस कर दिया।
ताया अब अपने पीने के लिए शराब निकाल रहा था। मैं आग जला रहा था। अब तक बूँद-बूँद करके बढ़िया पहले तोड़ की बोतलें भर चुकी थीं।
तभी पता चला कि घोड़ियों वाले सिपाही इधर आ रहे थे। ताया ने लात मारकर नलियों को अलग कर दिया। बलटोही आग में उंडेल दी और एक बोतल लेकर भाग गया। मेरी समझ में नहीं आया कि अब क्या करूँ। पुलिस वाले सिर पर आ गए थे। उन्होंने आते ही गालियाँ देनी आरंभ कर दीं और एक घुड़सवार ताया के पीछे लग गया। मैं दूसरी बोतल हाथ में पकड़े उन्हें गचका देकर हवेली के पीछे से होकर शहतूत के पेड़ पर चढ़ गया। पता नहीं, उस समय मेरे अन्दर इतनी फुर्ती और ज़ोर कहाँ से आ गया था। जब तक सिपाही हवेली का चक्कर काटकर शहतूत के नीचे आए तो मैं गिलहरी की तरह बहुत ऊँचे जाकर एक डाली से चिपटकर बैठा था और नीचे चलते-फिरते और गालियाँ बकते पुलिसवालों को देख रहा था। वे इतने सघन शहतूत के पेड़ में से मुझे देख नहीं सकते थे और हैरान थे कि मैं किधर छिप्पन-छू हो गया था।
हार कर पुलिस चली गई। ताया कई दिन गाँव में नहीं घुसा। मैंने ताया की बोतल शहतूत पर ही तीन डालियों की जड़ में छिपा दी और मक्की के तुक्के का डाट कसकर लगा दिया।
बाद में बापू ने थानेदार को पसेरी(पाँच सेर) घी देकर मुखबरी करने वाले के ही जूतियाँ पड़वा दी और जब ताया लौटा तो रंग ही बदल चुके थे। मौसम ही बदल चुके थे। दंगल, सौंचियां, कुश्तियों और कबड्डियों की रुत थी। हमारे गाँव से आधा मील दूर एक जंगल था। एक मील से भी लम्बा और चौड़ा। सघन करीरों, मल्हियों (छोटे बेरों का जंगली वृक्ष), पुराने वनों के इतने घने पेड़ थे कि दिन में भी रात जैसा भ्रम पैदा होता था। इस जंगल में पशुओं को चराने की मनाही थी। इसलिए घास भी बहुत उगा हुआ था। इस जंगल का नाम 'पक्का डल्ला' था। यहाँ हर वर्ष मुसलमानों का बड़ा भारी मेला लगा करता था। इस मेले की सिर्फ मुसलमान ही नहीं, हर कौम के लोग बड़े उत्साह से प्रतीक्षा करते और इसे मनाया करते थे। इस मेले पर जो तीन दिन चलता, दूर दूर से कव्वालों की गाने वाली टोलियाँ ज़ियारत के लिए आतीं। इलाके भर के मशहूर पहलवानो की कुश्तियाँ होतीं। बंसरी बजाने वालों का मुकाबला होता। अलगौजे की जोड़ियाँ मुसलमान नौजवान गाले फुला फुलाकर एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हुए बजाया करते। इस पक्के डल्ले के छोटे-से सघन जंगल में जहाँ छाया, आराम और ठंडक ही ठंडक थी, गरमियों की तपती रुत में मेला देखने आए लोगों को कोई धूप न लगती। इसी मेले पर सिक्खों और मुसलमानों के सियासी लीडर भी अपनी दीवान सजाते। हर वर्ष इस मेले में कम से कम पचीस हज़ार लोगों की भीड़ जुड़ती थी। मैं अपने दोस्तों के साथ यहाँ पीलां खाने और पेझू (पीलां और पेझू दोनों ही जंगली फल) तोड़ने जाया करता था। कब्रें होने के कारण हमें यहाँ डर भी लगता रहता था।
इस जंगल के एक तरफ नहर बहती थी, दूसरी तरफ आधा मील की दूरी पर हमारा गाँव था। बगल में एक अन्य छोटा-सा गाँव चोर कोट था जो हमारे गाँव में से ही निकल कर बना था।
चोर कोट वाली बाही पर छोटी नहर के पुल से एक छोटा-सा बैलगाड़ियों का रास्ता इस जंगल के साथ-साथ जाता था। हमारे गाँव में इस राह से आने पर घुमाव पड़ता था। इसलिए राही जंगल में से ही छोटी-छोटी पगडंडियों के रास्ते आ जाया करते थे, पर रात-बेरात उधर से कोई कम ही गुजरता था।
जिस तरफ चोर कोट वाला राह था, उस तरफ पीरों का डेरा था।
ये पीर असल में मुसलमान थे। क्योंकि हमारा सारा गाँव सिक्खों का था, इसलिए इन पीरों से हमें डर-सा ही लगता रहता था। ये पीर लम्बे काली सूफ़ के या हरे चोगे पहनते और सिर के बाल पीछे की ओर बहाते थे। थोड़ी-थोड़ी कटी हुई दाढ़ी रखते और जी भरकर हुक्के पीते रहते, और मुझे इनसे डर-सा लगता रहता। इनकी आँखें सदा चढ़ी-चढ़ी सी रहती थीं।
मेले के समय इन पीरों की ख़ास मान्यता होती। चढ़ावे चढ़ते और हलवा तैयार होता रहता। इनके डेरों में दूर-दूर से खेलने, नाचने, गाने और कव्वालियों के मुकाबले में हिस्सा लेने के लिए आई पार्टियाँ अपना रंग जमाये रखतीं। इन नाचने-गाने वाली पार्टियों में कुछ स्त्रियाँ भी होतीं। कई कहते, ये कंजरियाँ थी और मुझे यह बात समझ में न आती कि कंजरियाँ क्या होती हैं।
जब मेला खत्म हो जाता तो साथ वाले गाँवों के जट्ट इन टोलियों को नाचने के लिए बुला लेते और रात को मशालें जला कर ये पार्टियाँ नाचने-गाने का प्रोग्राम पेश करतीं।
बाद में मुझे पता चला कि ये कंजरियाँ नहीं थीं, बल्कि ये खुसरे थे जो जनाना कपड़ों में रहते थे। और खुसरे क्या थे ? यह एक और सवाल मेरे सामने पहले से भी बड़ा बनकर खड़ा हो गया। खुसरे हमारे गाँव में किसी घर में लड़का पैदा होने पर मांगने आया करते थे और नखरे करते, आँखें मटका कर, ताने-उलाहने देकर अपनी झोली में खैर डलवाते थे और उनकी आवाज़ न तो स्त्रियों जैसी होती और न ही मर्दों जैसी। कुछ समय बाद फिर मुझे पता चला कि ये रासधारिये थे। रात में भेष बदलकर, गाँव में अखाड़ा बनाकर जो उस समय का रंगमंच था, बहुओं वाले कपड़े पहनकर, चेहरे पर पाउडर मलकर, ये बहुत चमक-दमक जाते थे और गाँव के लड़कों का मोह जीत लेते थे। जब कोई इनके करतब से खुश होकर इन्हें पैसे देता तो ये उसकी 'वेल' करते और फिर नाटक आगे शुरू हो जाता। मुझे यह बात बड़ी बुरी लगती थी। एक तो 'वेल' करते समय वक्त लगता था और कहानी का स्वाद फीका पड़ जाता था। दूसरे लोग जिद्द करके अपनी वेलें रासधारियों से करवाने लग पड़ते थे।
एक दिन रात में इसी तरह रासधारिये आए हुए थे। गाँव वालों ने फैसला किया कि गाँव में रास नहीं होने देंगे। इससे समय खराब होता था, पैसा-धेला भी बर्बाद होता था और स्त्रियों पर बुरा असर पड़ता था और कई बार गाँव में लड़ाई-झगड़े भी हुए थे। गाँव के नौजवानों ने गाँव में रास न होने देने को अपनी हेठी समझा, और वे रासधारियों का तम्बू उठाकर गाँव से बाहर कुम्हारों के घरों के पास ले गए। रसद-पानी भी उन्होंने वहीं पहुँचा दिया। वहीं अच्छी-खासी भीड़ जुट गई। साथ वाले गाँवों के लोग भी देखने के लिए आ जुटे थे।
रासधारिये ने ढोलकी पर थाप मारी और बाजे वाले ने सुरों में उंगलियाँ हिलाईं, और मिनट भर में ही सब रंगीन हो गया। नौजवानों की आँखें गुलाबी होने लगीं।
सोहणी-महीवाल का ड्रामा शुरू हो गया। कैसे सोहणी से बर्तन खरीदने आया महीवाल उस पर मोहित हो गया था। सोहणी की भूमिका करने वाला रासधारिया कोई कच्ची उम्र का लड़का था जो शरमाता भी था, मुस्कराता भी था और उसकी आँखों में हया की लकीरें भी थीं। वह मुझे अब लड़का कम, और लड़की अधिक लगता था। जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ता गया, वह मुझे लड़की और सिर्फ़ लड़की ही लगता रहा। यहाँ तक की दूसरे देखने वाले जवान लड़के जो मेरे से काफी बड़ी उम्र के थे, उसके काम से खुश होकर पहले तो 'ओए, पार्ट सोहणा करता है!'' कहते, फिर ''काम सोहणा करती है !'' ही कहने लग पड़े।
मुझे पर भी उस सोहणी का इतना असर पड़ा कि मेरे मन में एक आग-सी जल उठी। मुझे लगने लगा मानो मेरे ग्यारह-बारह साल के लड़के का खून भी गरम हो गया था। मेरा मन करता था कि मैं इन रासधारियों के साथ ही जा मिलूँ और महीवाल का पार्ट करने लग पड़ूँ। सिर्फ़ इसलिए कि सोहणी मुझे बहुत सोहणी लगी थी।
नाटक चलते-चलते अब पक्के घड़े की जगह कच्चे घड़े बनाने तक पहुँच गया था। रात के बारह बज गए थे। लोगों में रास देखने का चाव मद्धम नहीं हुआ था। जब सोहणी की ननद घड़ा बदलने के लिए आई तो एक जवान लड़के से रहा नहीं गया। वह यह बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि सोहणी पक्के घड़े के भुलावे में कच्चे घड़े पर तैरने लगे और डूब जाए। उसने आगे बढ़कर लाठी हवा में लहराई और घड़े पर दे मारी, पर लाठी घड़े पर बजने से पहले सोहणी की ननद के सिर पर जा बजी। सारे अखाड़े में हड़कंप मच गया। पता तभी चला जब किसी और ने लाठी मारने वाले के सिर में लाठी मारते-मारते मशाल वाले का सिर फोड़ दिया। मशाल गिरकर बुझ गई। चारों ओर अँधेरा हो गया और इस अँधेरे में किसने किसको मारा और किसने किसका सिर फोड़ा, कुछ पता नहीं लगा।
(जारी…)

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‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश है। कथा-कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, शब्दचित्र आदि से जुड़ी कृतियों का हिंदी अनुवाद हम ‘अनुवाद घर’ पर धारावाहिक प्रकाशित करना चाहते हैं। इच्छुक लेखक, प्रकाशक ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ जानने के लिए हमें मेल करें। हमारा मेल आई डी है- anuvadghar@gmail.com

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव
वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, मूल्य : 300 रुपये

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
शुभम प्रकाशन, एन-10, उलधनपुर, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032, मूल्य : 120 रुपये

रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव

रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव
यूनीस्टार बुक्स प्रायवेट लि0, एस सी ओ, 26-27, सेक्टर 31-ए, चण्डीगढ़-160022, मूल्य : 400 रुपये

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव
नीरज बुक सेंटर, सी-32, आर्या नगर सोसायटी, पटपड़गंज, दिल्ली-110032, मूल्य : 150 रुपये

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह) संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह)  संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव
नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन, 5, इंस्टीट्यूशनल एरिया, वसंत कुंज, फेज-2, नई दिल्ली-110070, मूल्य :60 रुपये।

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष 1998, 2004, मूल्य :35 रुपये

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-1100-6, मूल्य : 125 रुपये

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव
प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

पंजाबी की साहित्यिक कृतियों के हिन्दी प्रकाशन की पहली ब्लॉग पत्रिका - "अनुवाद घर"

"अनुवाद घर" में माह के प्रथम और द्वितीय सप्ताह में मंगलवार को पढ़ें - डॉ एस तरसेम की पुस्तक "धृतराष्ट्र" (एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा) का धारावाहिक प्रकाशन…

समकालीन पंजाबी साहित्य की अन्य श्रेष्ठ कृतियों का भी धारावाहिक प्रकाशन शीघ्र ही आरंभ होगा…

"अनुवाद घर" पर जाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://www.anuvadghar.blogspot.com/

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'कथा पंजाब’ के स्तम्भ ‘नई किताबें’ के अन्तर्गत पंजाबी की पुस्तकों के केवल हिन्दी संस्करण की ही समीक्षा प्रकाशित की जाएगी। लेखकों से अनुरोध है कि वे अपनी हिन्दी में अनूदित पुस्तकों की ही दो प्रतियाँ (कविता संग्रहों को छोड़कर) निम्न पते पर डाक से भिजवाएँ :
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