‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

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स्त्री कथालेखन : चुनिंदा कहानियाँ

>> रविवार, 2 मई 2010


स्त्री कथालेखन : चुनिंदा कहानियाँ(2)

डॉ. दलीप कौर टिवाणा(जन्म : 4 मई 1935)
डॉ. दलीप कौर टिवाणा पंजाबी की एक प्रतिष्ठित, बहु-चर्चित अग्रज लेखिका हैं। इन्होंने अपनी माँ-बोली पंजाबी भाषा की झोली में दो दर्जन से अधिक उपन्यास, अनेक कहानी संग्रह, कई आलोचनात्मक पुस्तकें, एक आत्मकथा ‘नंगे पैरों का सफ़र’ तथा एक साहित्यिक स्व-जीवनी ‘पूछ्ते हो तो सुनो’ डाली हैं। इनकी अनेक रचनाएं कई भाषाओं में अनूदित होकर लोकप्रिय हो चुकी हैं। डॉ. टिवाणा पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला में प्रोफ़ेसर हैं और अपने पंजाबी साहित्य लेखन के लिए अनेक प्रांतीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अवार्डों से विभूषित हो चुकी हैं। उनकी बहुचर्चित कहानी ‘मेरा कमरा, तेरा कमरा’ उनकी पंजाबी पुस्तक ‘मेरी सारियां कहाणियाँ’ में से साभार ली गई है।

कहानी
मेरा कमरा, तेरा कमरा
दलीप कौर टिवाणा
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

दफ्तर में मेरा कमरा और तेरा कमरा साथ-साथ है। फिर भी, न यह कमरा उस तरफ जा सकता है और न वह कमरा इस तरफ आ सकता है। दोनों की अपनी-अपनी सीमा है। दोनों के बीच एक दीवार है। दीवार बहुत पतली सी है। भूले-भटके भी अगर उधर तेरा हाथ दीवार से लगता है तो आवाज़ मेरे कमरे में पहुँच जाती है। एक दिन शायद कोई इस दीवार में तेरी तरफ से कील ठोक रहा था, मेरे कमरे की सारी दीवारें धमक रही थीं। मैं उठकर बाहर गई कि देखूँ, पर तेरे कमरे के दरवाजे पर भारी पर्दा लटक रहा था। मैं लौट आई। आजकल लोग आम तौर पर दरवाजों-खिड़कियों पर भारी पर्दे लटकाये रखते हैं, ताकि बाहर से किसी को कुछ दिखाई न दे। फिर मुझे ख्याल आया कि पर्दा तो मेरे दरवाजे पर भी लटक रहा है।
कभी-कभी जब तू किसी बात पर चपरासी से ऊँची आवाज़ में बोलता है, मैं काम करती-करती कलम रखकर बैठ जाती हूँ। मेरा मन करता है, तुझसे पूछूँ, 'क्या बात हो गई ?' पर फिर ख्याल आता है, तुझे शायद यह अच्छा न लगे कि जब तू अपने चपरासी से ऊँचा बोल रहा था तो मैं सुन रही थी। तुझे तो इस बात का ख्याल भी नहीं रहता कि तू गहरा साँस भी ले तो साथ के कमरे में सुनाई दे जाता है।
एक दिन मेरे कमरे में चलते-चलते पंखा बन्द हो गया। शायद, बिजली चली गई थी। कुछ मिनट मैं प्रतीक्षा करती रही। फिर गरमी से घबराकर मैं बाहर बरामदे में आ गई जो दोनों कमरों के आगे साझा है। मैं जानती थी कि तेरे कमरे का पंखा भी बन्द हो गया होगा। फिर भी मैंने तेरे कमरे में थोड़ा-सा झांक कर पूछा, ''आपका पंखा चलता है?'' मेरे कहने का भाव था कि अगर नहीं चलता तो तू भी साझे बरामदे में आ जाए। अगर अन्दर उमस हो तो पल दो पल के लिए बाहर आ जाने में कोई डर नहीं होता।
''नहीं, पंखा तो नहीं चलता, पर मैंने पिछली खिड़की खोल ली है।'' तुमने कहा। परन्तु मुझे शायद पिछली खिड़की का ख्याल ही नहीं आया था इसीलिए मैं कमरे से बाहर आ गई थी।
एक दिन काम करते-करते मेरे हाथ से कलम गिर पड़ा। निब टेढ़ी हो गई। उस दिन मुझे ख्याल आया था कि तेरे कमरे में से कोई कलम मंगवा लूँ। लेकिन इस डर से कि कहीं तू यह न कहला भेजे कि मेरे पास फालतू कलम नहीं, मैं यह हौसला न कर सकी। बहुत बार ऐसा ही होता है कि हम स्वयं ही सवाल करते हैं और स्वयं ही उसका जवाब दे लेते हैं।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर कहीं इन दोनों कमरों के बीच की दीवार टूट जाए… पर ऐसा होने पर तेरा कमरा साबुत नहीं रह जाएगा, और मेरा भी। फिर तो ऐसा ही लगेगा मानो खुला-सा, बड़ा-सा एक ही कमरा हो। पर ऐसा करना शायद ठीक न हो। बनाने वाले ने कुछ सोच कर ही ये अलग-अलग कमरे बनाये होंगे।
कभी-कभी मुझे यूँ लगता है मानो मैं इस पक्की सीमेंट की दीवार के आर-पार देख सकती हूँ। तभी तो मुझे पता चल जाता है कि आज तू काम नहीं कर रहा। कभी छत की ओर देखने लग जाता है और कभी हाथ की लकीरों को। कभी फाइलें खोल लेता है। कभी बन्द कर देता है। कभी बूट उतार लेता है और कभी पहन लेता है।
कभी-कभी तू बहुत खुश हो रहा होता है। उस वक्त मेज़ पर पड़े पेपरवेट को घुमाने लग जाता है, धीरे-धीरे सीटी बजाने लगता है। फिर दीवार पर हाथ लगाकर कुर्सी पर बैठा धरती पर से पैर उठा लेता है। उस वक्त मैं इधर हल्का-सा भी खटका नहीं होने देती कि कहीं तू चौंक न पड़े।
कभी-कभी आते-जाते समय तू मुझे कमरे से बाहर मिल जाता है। ''सुनाओ, क्या हाल है ?'' तू पूछता है।
''ठीक है,'' मैं हल्का-सा मुस्करा कर कहती हूँ। तू अपने कमरे में चला जाता है और मैं अपने कमरे में। न वह कमरा इधर आ सकता है, न यह कमरा उधर जा सकता है। दोनों की अपनी-अपनी सीमा है। दोनों के मध्य एक दीवार है।
बीच में हालांकि दीवार है, फिर भी जिस दिन तू दफ्तर नहीं आता, अपने कमरे में बैठा नहीं होता, मुझे कुछ अजीब-अजीब सा लगता है। उस दिन मैं कई बार घड़ी देखती हूँ। कई बार पानी पीती हूँ। लोगों को टेलीफोन करती रहती हूँ। इकट्ठा हुआ पिछला काम भी खत्म कर देती हूँ। ''आज साहब नहीं आए ?'' उधर से गुजरते तेरे चपरासी से पूछती हूँ। फिर वह खुद ही बता देता है कि साहब बाहर गए हुए हैं, कि साहब के रिश्तेदार आए हुए हैं, कि साहब की तबीयत ठीक नहीं, कि साहब ने कितने दिन की छुट्टी ली है।
इन दिनों में मुझे बहुत ऊल-जलूल सी बातें सूझती रहती हैं कि आज से सौ साल पहले इस कमरे में कौन बैठता होगा ? साथ वाले कमरे में भी कोई बैठता होगा ? आज से सौ साल बाद इस कमरे में कौन बैठा होगा ? लोग मर क्यों जाते हैं ? फिर सोचती हूँ, लोग पैदा ही क्यों होते हैं ? और फिर इन बातों से घबरा कर मैं दफ्तर में काम करने वालों को मिलने के लिए घूमती रहती हूँ।
''आए नहीं इतने दिन ?'' मालूम होने के बावजूद मैं तुझसे पूछती हूँ।
''बीमार था।'' तू कहता है।
''अब तो ठीक हो ?''
''हाँ, ठीक हूँ। मेहरबानी।'' कहकर तू अपने कमरे में चला जाता है और मैं अपने कमरे में । तू अपना काम करने लग जाता है और मैं अपना।
एक बार मैं कई दिन छुट्टी पर रही।
''मैडम, आ नहीं रहीं ?'' तूने मेरे चपरासी से पूछा।
''जी, वह बीमार हैं।'' उसने बताया।
''अच्छा... अच्छा।'' कहकर तू अपने कमरे में चला गया।
घर डाक देने आए चपरासी ने मुझे यह बताया। अगले दिन जब बुखार थोड़ा कम था, मैं दफ्तर आ गई। तुझे शायद पता नहीं था। उस दिन तूने दो-तीन बार चपरासी को डांटा। कई बार कागज़ फाड़े, जैसे गलत लिख गया हो। मिलने आए एक दो लोगों को भी कहला भेजा कि किसी दूसरे दिन आना।
किसी काम से तू कमरे से बाहर निकला। मैं भी किसी काम से बाहर निकली।
''आए नहीं कई दिन ?'' तूने जानते हुए भी पूछा।
''बीमार थी।''
''अब तो ठीक हो ?''
''हाँ, ठीक हूँ। शुक्रिया।'' कहकर मैं अपने कमरे में चली गई और तू अपने कमरे में चला गया। न यह कमरा उधर जा सकता है, न वह कमरा इधर आ सकता है। दोनों की अपनी-अपनी सीमा है। दोनों के मध्य एक दीवार है। एक कमरा तेरा है, एक कमरा मेरा है। फिर भी मैं सोचती हूँ कि इतना भी क्या कम है कि दोनों कमरे साथ-साथ हैं, बीच में सिर्फ़ एक दीवार ही तो है।
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सम्पर्क : बी-13, पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला(पंजाब)

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पंजाबी लघुकथा : आज तक



पंजाबी लघुकथा : आज तक(5)

'पंजाबी लघुकथा : आज तक' के अन्तर्गत पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के कथाकार भूपिंदर सिंह, हमदर्दवीर नौशहरवी, दर्शन मितवा और शरन मक्कड़ की चुनिंदा लघुकथाएं आप पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत हैं- पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के सशक्त लेखक सुलक्खन मीत (जन्म : 15 मई 1938) की पाँच चुनिंदा लघुकथाएं... सुलक्खन मीत ने कहानी, लघुकथा, कविता, एकांकी, नाटक और उपन्यास विधा में लेखन किया। पंजाबी में 'सुलगती बर्फ़' उनका बहु-चर्चित लघुकथा संग्रह है। इनकी लघुकथाओं की विशेषता यह है कि इनमें मानवीय रिश्तों को बहुत खूबसूरती से स्पर्श किया गया है।
सुभाष नीरव
संपादक : कथा पंजाब

सुलक्खन मीत की पाँच लघुकथाएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

(1) रिश्ता

भेदी ने चोर को बताया, ''आज, रूपाले में चोरी हो सकती है।''
''कैसे ?'' जगीरे चोर की आँखें खुशी में फैल गईं।
''घरवाला घर में नहीं है।'' भेदी की आँखें भी फैली थीं।
''ठीक है।'' जगीरे चोर ने छांटी हुई मूंछों पर बल दिया।
मुर्गे की बांग से पहले ही जगीरा चोर भेदी द्वारा बताए गए घर में घुसा। अगले कुछ क्षणों में वह बक्सों और पेटी के पास खड़ा था।
तेजो को चोर का शक हुआ। वह आहिस्ता से चारपाई पर से उठी। बिल्ली की भांति दबे पांव वह स्विच के समीप पहुँची। बल्ब जला तो सचमुच ही सामने एक आदमी खड़ा था। 'चोर...' शब्द उसके गले में ही फंसकर रह गया।
तेजो और जगीरे ने एक-दूसरे को पहचान लिया था। जगीरे चोर की नज़रें झुक गई थीं। तेजो ने पूछा, ''ओए जगीरिया ! तुझे बहन का ही घर मिला था चोरी करने को ?''
''मैंने सोचा तो था कि हमारे गाँव की एक लड़की रूपाले गाँव में ब्याही हुई है, पर मुझे क्या पता था कि तू इसी घर में होगी।'' कहकर जगीरा चोर दहलीज़ पार करने लगा।
''अब किधर चला ?'' तेजो ने उसकी बांह पकड़ते हुए कहा।
''गाँव।'' जगीरे चोर ने तेजो की ओर न देखते हुए उत्तर दिया।
''बैठ जा। चाय पीकर जाना अब। मैं चाय रखती हूँ।''
जगीरा चोर तेजो की बात पर हैरान होता हुआ एक बच्चे की चारपाई पर बैठ गया। चाय आने तक जैसे वह पछताता रहा था। चाय पीकर चलते वक्त जगीरे ने अंटी में से दस का नोट निकाला। फिर उसने वही नोट तेजो के हाथ में जबरदस्ती ठूंस दिया।
''ओए कोढ़ी ! यह क्या ?'' तेजो ने मुसे हुए नोट की ओर देखते हुए पूछा।
''यह भाई का फर्ज़ बनता है, बहन।'' कहकर जगीरा एकाएक दहलीज़ फांद गया। गाँव में अभी भी चुप्पी पसरी थी। कहीं से भी किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ नहीं आ रही थी।
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(2) थप्पड़

शहीदे-आज़म भगतसिंह की समाधि देखने के बाद गुरइकबाल सिंह ने मुझे बताया, ''यहाँ से पाकिस्तान की सीमा भी नज़दीक ही है। पाँच-सात मिनट का पैदल का रास्ता है।''
मुझे बेहद खुशी हुई।
पाँच-सात मिनट में हम भारतीय चौकी पर जा खड़े हुए। वहाँ से पाकिस्तानी चौकी पत्थर की मार की दूरी पर थी। भारतीय सैनिक बता रहा था, ''अब तो हम उस लाइन के पार नहीं जा सकते और इस पार वे नहीं आ सकते।''
''फर्र...र...।'' ने हमारी बात काट दी। एक काला तीतर भारतीय चौकी की तरफ से उड़ा और पाकिस्तानी चौकी की तरफ जा बैठा।
मैंने और गुरइकबाल सिंह ने एक-दूजे को देखा और हमारे सैनिक ने अपनी बात फिर शुरू कर दी।
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(3) बिचौलिया

बलदेव सिंह मेरे पास आया। उसका जिलाधिकारी से कोई काम था। हम इकट्ठे ही जिलाधिकारी से मिले। उसने पूरा भरोसा दिलाया, ''तुम ज़रा भी फिक्र न करो। इनका काम हो जाएगा।'' चाय पीते हुए जिलाधिकारी से स्वयं ही कहा, ''तुमने यूँ ही तकलीफ़ की। तुम तो कौवे के हाथ भी संदेश भेज देते तो तुम्हारा काम हो जाता।''
हम दोनों धीमे-धीमे 'ही-ही' करते रहे। उसने फिर कहा, ''चलो, इसी बहाने तुम्हारे दर्शन तो हो ही गए।''
जब बलदेव सिंह मुझसे विदा लेने लगा तो वह बहुत खुश नहीं था। मैंने उसके हाव-भाव को समझते हुए कहा, ''बलदेव सिंह, तू हौसला रख, तेरा काम बना ही समझ।''
''मुझे संदेह है।'' बलदेव सिंह बुदबुदाया।
''क्यों ?'' मैं चलते-चलते रुक गया।
''अगर हम उसकी चाय-पानी की सेवा कर देते...''
''हाँ, अगर हम चाय-पानी की सेवा कर दें तो फिर पत्थर की लकीर ही समझो।'' मेरा मन डोल गया था।
''यही तो मैं कहता हूँ...'' कहकर बलदेव सिंह ने पिछली जेब में से बटुआ निकाला और सौ-सौ के दस नोट उसने मेरी हथेली पर रख दिए। मैंने भी नोट पकड़ते हुए कह ही दिया, ''वैसे भी आजकल बिना पैसे के काम नहीं होता।''
''मेरा भी यही विचार है।'' बलदेव सिंह ने बटुआ संभालते हुए सयाने बुजुर्ग की तरह कहा।
पैसे जेब में डालते हुए मैंने कहा, ''अच्छा, तू चल। मैं अभी आया, जिलाधिकारी से मिलकर।''
बलदेव सिंह कचहरी की भीड़ में गुम हो गया तो मैं यूँ ही चक्कर-सा काटकर अपने घर की ओर हो लिया।
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(4) जूठा-सुच्चा

मैं और पाली दोनों साथ-साथ पास ही एक गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे। दोपहर को जब हम इकट्ठे रोटी खाते तो वह मुझसे अचार या सूखी सब्ज़ी आदि मांग लेती, पर मैं कभी भी उससे अचार या सब्ज़ी न लेता। वह कभी-कभी मेरे दिल की बात बूझते हुए कहती, ''क्या बात है, मेरा अचार या सब्ज़ी जूठी है ? तू लेता क्यों नहीं ?''
मैं ऊपरी मन से कह देता, ''नहीं, यह बात नहीं। बस यूँ ही...।''
फिर हम दोनों ही साथ के एक दूसरे गाँव में बने हाई स्कूल में पढ़ने जाने लगे। अब वह लड़कियों के संग बैठकर रोटी खाती तो मुझसे सहा न जाता। एक दिन उसकी सहेलियाँ नहीं आईं। हम दोनों एक-दूसरे की ओर बढ़े और एकांत-सी जगह पर बैठकर रोटी खाने लगे। मैंने हिम्मत करके कहा, ''पाली, अचार तो दे थोड़ा-सा !''
''जूठा है।'' पाली ने जैसे शरारत में कहा।
''इस उम्र में जूठा-सुच्चा कैसा, पाली ! हट, मजाक न कर। अब तो मैं तुझे भी खा जाऊँ।''
पाली जैसे पूरी की पूरी शरमा गई। एक ओर मुँह करके अचार पकड़ाते हुए पाली ने मेरी अंगुली दबा दी।
मैं कितनी ही देर उस अंगुली को चूसता रहा।
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(5) टुकड़ा-टुकड़ा धैर्य

उसके पहले बेटी पैदा हुई तो उसके घर और ससुराल, दोनों में बड़ी खुशियाँ मनाई गईं।
उसके दूसरी बेटी हुई तो दोनों पक्ष कह रहे थे, ''कोई गम नहीं। रब कभी तो भूलेगा ही।''
उसके तीसरी बेटी ने जन्म लिया तो दोनों पक्षों को जैसे पिस्सू पड़ गए। घरवाले उदास थे। ननिहालवाले सोच में डूब गए। उन्हें बेटी का ससुराल में रहना खतरे में जान पड़ा।
लेकिन, उसने उस दिन जी भरकर दारू पी। उसने अपनी पत्नी को गले लगाकर कहा, ''तू फिकर न करना। इसमें तेरा कोई दोष नहीं। तूने सुना नहीं कि मूर्ख बेटा जनने से तो अंधी बेटी भली। लड़के साले किसी माँ-बाप की कब्र पर मूतने तक नहीं जाते। ये अपनी बेटियाँ नहीं, बेटे हैं। हौसला रखकर उठना- चिल्ले से।''
फिर उन्होंने एक दिन अपनी बड़ी बेटी को गुनगुनाते हुए सुना-
'इक भाई देना हे रब्बा !
कसम खाने को बहुत दिल करता...'
अगले पल वे दोनों बगलगीर होकर एक-दूसरे में समाये बच्चों की तरह रो रहे थे।
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‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश है। कथा-कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, शब्दचित्र आदि से जुड़ी कृतियों का हिंदी अनुवाद हम ‘अनुवाद घर’ पर धारावाहिक प्रकाशित करना चाहते हैं। इच्छुक लेखक, प्रकाशक ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ जानने के लिए हमें मेल करें। हमारा मेल आई डी है- anuvadghar@gmail.com

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव
वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, मूल्य : 300 रुपये

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
शुभम प्रकाशन, एन-10, उलधनपुर, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032, मूल्य : 120 रुपये

रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव

रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव
यूनीस्टार बुक्स प्रायवेट लि0, एस सी ओ, 26-27, सेक्टर 31-ए, चण्डीगढ़-160022, मूल्य : 400 रुपये

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव
नीरज बुक सेंटर, सी-32, आर्या नगर सोसायटी, पटपड़गंज, दिल्ली-110032, मूल्य : 150 रुपये

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह) संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह)  संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव
नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन, 5, इंस्टीट्यूशनल एरिया, वसंत कुंज, फेज-2, नई दिल्ली-110070, मूल्य :60 रुपये।

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष 1998, 2004, मूल्य :35 रुपये

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-1100-6, मूल्य : 125 रुपये

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव
प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

पंजाबी की साहित्यिक कृतियों के हिन्दी प्रकाशन की पहली ब्लॉग पत्रिका - "अनुवाद घर"

"अनुवाद घर" में माह के प्रथम और द्वितीय सप्ताह में मंगलवार को पढ़ें - डॉ एस तरसेम की पुस्तक "धृतराष्ट्र" (एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा) का धारावाहिक प्रकाशन…

समकालीन पंजाबी साहित्य की अन्य श्रेष्ठ कृतियों का भी धारावाहिक प्रकाशन शीघ्र ही आरंभ होगा…

"अनुवाद घर" पर जाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://www.anuvadghar.blogspot.com/

व्यवस्थापक
'अनुवाद घर'

समीक्षा हेतु किताबें आमंत्रित

'कथा पंजाब’ के स्तम्भ ‘नई किताबें’ के अन्तर्गत पंजाबी की पुस्तकों के केवल हिन्दी संस्करण की ही समीक्षा प्रकाशित की जाएगी। लेखकों से अनुरोध है कि वे अपनी हिन्दी में अनूदित पुस्तकों की ही दो प्रतियाँ (कविता संग्रहों को छोड़कर) निम्न पते पर डाक से भिजवाएँ :
सुभाष नीरव
372, टाइप- 4, लक्ष्मीबाई नगर
नई दिल्ली-110023

‘नई किताबें’ के अन्तर्गत केवल हिन्दी में अनूदित हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तकों पर समीक्षा के लिए विचार किया जाएगा।
संपादक – कथा पंजाब

सर्वाधिकार सुरक्षित

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‘कथा पंजाब’ के आगामी अंक में आप पढ़ेंगे –‘पंजाबी कहानी : आज तक’ में पंजाबी के प्रख्यात लेखक गुलजार सिंह संधु की कहानी, ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी और बलबीर मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की अगली किस्त…

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