‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

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पंजाबी कहानी : आज तक

>> रविवार, 12 फ़रवरी 2012




पंजाबी कहानी : आज तक(6)

सन् 1917 में धमियान में जन्में, एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त, कर्तार सिंह दुग्गल पंजाबी कहानी की प्रथम पीढ़ी के एक ऐसे प्रख्यात कथाकार जिन्हें पंजाबी और हिंदी में समान रूप से पढ़े जाने गर्व हासिल रहा। नियमबद्ध होकर निरंतर लेखन करना इनकी हॉबी रही। 21 कहानी संग्रहों, 8 उपन्यासों के साथ-साथ कविता, नाटक, आत्मकथा, आलोचना की अनेकानेक पुस्तकों के रचियता। साहित्य अकादमी, गालिब अवार्ड, भारती पुरस्कार, सोवियत लैंड पुरस्कार तथा भारत सरकार के पद्मभूषण से सम्मानित हैं। निधन : 26 जनवरी 2012। 'चाँदनी रात का दु:खान्त' इनकी बहुचर्चित एक यादगार कहानी है।


चाँदनी रात का दु:खान्त
कर्तार सिंह दुग्गल

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

कोई नहीं कहता था कि मालिन और मिन्नी माँ-बेटी हैं। जहाँ से गुज़रती, लोग यही समझते कि दोनों बहनें हैं। मिन्नी बालिश्त भर ऊँची थी अपने माँ से। ''अरी मालिन, क्या खूब यौवन उतरा है तेरी बेटी पर!'' अड़ोसिनों-पड़ोसिनों की उसकी ओर देख देखकर भूख न मिटती। और लड़की तो जैसे सच्चा मोती हो! जितनी सुन्दर, उतनी सुशील। मालिन अपनी बेटी के मुँह की ओर देखती और उसे लगता जैसे हू-ब-हू वो खुद हो। अभी कल की ही बात थी, वह खुद वैसी की वैसी थी। और वह सोचती, अब भी उसका क्या बिगड़ा था! अब भी... अब भी कोई पहाड़ काटकर उसके लिए नहर निकालने के लिए बेताब था। अब भी, अब भी कोई सात समुन्दर तैरकर उस तक पहुँचने के लिए बेकरार था।
यह कौन उसे याद आ रहा था ? मोतियों का व्यापारी।
ये क्यों उसकी पलकें आज भीग-भीग जा रही थीं। उसकी बेटी अब जवान हो गई थी। अब उसे यह कुछ शोभा नहीं देता था। सारी उम्र संभल-संभलकर चली, आज ये कैसे ख़यालों में वह खोयी चली जा रही थी ? नहीं-नहीं, अगले हफ्ते मिन्नी... अपनी बेटी का उसको काज रचाना था। नहीं, नहीं, नहीं !
''पास मेरी परम प्यारी, एक पल न बिसारी...''
कल उसने चिट्ठी लिखी थी। हर बार वो आता, यह उसे वैसे का वैसा लौटा देती। आँखें मूँदकर अपना द्वार बन्द कर लेती। लेकिन वो था कि एक पल भी उसने इसे नहीं बिसरा था। मालिन उसकी जान थी। एक क्षण उसे चैन नहीं था इसके बिना और सारी उम्र उसने काट ली थी किसी की प्रतीक्षा में, फफक-फफक कर, सिसक-सिसक कर, तड़प-तड़प कर सारी उमर। और अब परछाइयाँ ढल रही थीं। जब कभी पंछी उड़ जाए।
मालिन सोचती, आज रात वह ज़रूर आएगा। शरद् पूनम की रात वो ज़रूर इसका द्वार खटखटाता था। वर्षों से खटखटाता आ रहा था। कभी भी तो उसने अपना पट उसके लिए नहीं खोला था।
और फिर मालिन को कई वर्ष पहले की शरद् पूनम की वो रात याद आने लगी, जब अमराई के तले नाचती इसकी चुनरी उसकी बाहों के साथ लिपट गई थी और सर से नंगी वह उसके सामने दुहरी हो-हो गई थी, और फिर उसने उसकी चुनरी इसके कन्धों पर ला रखी थी।
अरे ! उस बिन वैसे ही अपना दुपट्टा आज उसने अपने कन्धे पर रखा हुआ था ! और मालिन सर से लेकर पाँव तक लरज गई।
सामने गली में मिन्नी आ रही थी, जैसे सरो का पेड़ हो। ऊँची, लम्बी और गोरी। हाथ लगाने से मैली होती। मुँह-सिर लपेटे, आँखें नीची किए। मजाल है कि किसी ने उसका ऊँचा बोल भी सुना हो! मन्दिर से लौट रही थी। भगवान के आगे हाथ जोड़-जोड़कर कि उसके मन की मुराद पूरी हो। भगवान सबके मन की मुराद पूरी करे! और मालिन आप ही आप मुस्कराने लगी, जैसे किसी के गुदगुदी हो रही हो। उसके मन की क्या मुराद थी ?
''माँ, तहेजी आज नहीं आए ?'' मिन्नी माँ से पूछ रही थी।
''तेरे तहेजी आज नहीं आएँगे। वो तो कहीं कल भी आ जाएँ तो लाख शुक्र मनाना। कितनी सारी बजाजी और कितना सारा अनाज उसे खरीदना है। ब्याह-शादी में चीज बच जाए तो अच्छी, कम पड़ जाए तो बड़ा झंझट होता है।'' मालिन बेटी को समझा रही थी। मिन्नी चूल्हे-चौके में व्यस्त होने से पहले धीरे से आई और अपनी मुक्कैश वाली चुनरी माँ के कन्धों पर रख उसका दुपट्टा उतारकर ले गई। कहीं उसकी रेशमी चुनरी मैली न हा जाए!
कितनी महीन मुक्कैश उसने टाँकी थी अपनी चुनरी पर!
धुँधलका हो रहा था। अकेली आँगन में बैठी मालिन कल्पनाओं में खो गई थी। कई चक्कियाँ बड़ा महीन आटा पीसती हैं। मालिन सोचती, वो भी तो एक चक्की की तरह थी जो सारी उमर अपनी धुरी पर चलती रही। कभी भी तो उसकी चाल नहीं डगमगाई थी। अपने-आपको उसने मलीदा कर लिया था। रोक-रोककर, भींच-भींचकर खत्म कर दिया था अपने आपको।
पूरे चाँद की चाँदनी अमराई में से छन-छनकर उसके ऊपर पड़ रही थी। ये कैसे विचारों में वो बहती जा रही थी आज ? मालिन को लगता था जैसे एक नशा-सा उसको चढ़ रहा हो। पूरे चाँद की चाँदनी हमेशा उस पर एक जादू-सा कर दिया करती थी।
चार दिन और। और फिर इस आँगन में गीत बैठेंगे, मालिन सोच रही थी - और फिर मेंहदी रचाई जाएगी। और फिर मिन्नी दुल्हन बनेगी। सिर से लेकर पाँव तक गहनों से सजी हुई। लाल जोड़े में कैसी लगेगी मिन्नी ? और फिर कोई घोड़े पर चढ़कर आएगा और डोले में डालकर उसे ले जाएगा अपने घर, अपनी अटारी में, और उसकी हथेलियों को चूम-चूमकर उसकी मेंहदी का सारा रंग पी जाएगा।
मालिन सोचती, अभी तो कल की बात थी, उसने भी मेंहदी लगाई थी, पर मिन्नी के तहेजी ने तो एक बार भी उसकी हथेलियों को उठाकर अपने होंठों से नहीं लगाया था, एक बार भी उसने कभी इसके हाथों को उठाकर अपनी आँखों से नहीं छुआया था। थका-हारा वो काम से लौटता, खाना खाता और खाकर सो जाता। एक बेटे की लालसा में कभी-कभी आधी रात को उसकी आँखें खुल जातीं। तब, जब मुश्किल से कहीं तारे गिन-गिनकर मालिन को नींद आई होती। और फिर हर वर्ष, हर दूसरे वर्ष इनके एक न एक बेटी आ जाती। बिन बुलाईं लड़कियाँ। आप ही आप आतीं, आप ही आप जाती रहीं। बस, एक मिन्नी बची थी, इकलौती। मोटी-मोटी, काली-काली आँखें। गोरे-गोरे गालों के नीचे तिल - मालिन का तिल। गज-गज लम्बे बाल -मालिन के बाल। मालिन सोचती, जैसे इस जीवन की उसकी सारी भूख ने उसकी बेटी में पुनर्जन्म ले लिया हो, अपनी पूर्ति करने के लिए। मालिन सोचती, उसका हुस्न जैसे फिर साकार हो गया था, अपनी कोखजाई में अपना मूल्य चुकवाने के लिए। मालिन को हमेशा महसूस होता जैसे उसके अंग-अंग, पोर-पोर में एक भूख बसी हुई है। एक प्यास में उसके होंठ बेकरार हो रहे थे।
पूरे चाँद की रात मालिन से कुछ खाया नहीं जाता था। और मिन्नी कब की चूल्हा-चौका सम्हाले, सामने ड़्यौढ़ी के दरवाजे को कुंडी लगा अन्दर कमरे में सो गई थी।
रात भी कितनी हो रही थी। चाँद जैसे सारे का सारा उसके आँगन में आन उतरा हो। रात ठंडी थी। अभी ठंड कहाँ ! यों ही हल्का-हल्का जाड़ा था। पूरे चाँद की रात, अकेला आँगन, मालिन सोचती- वो क्यूँ यूँ बैठी थी ? किसके इन्तज़ार में ? मिन्नी अन्दर सो चुकी थी। मिन्नी के तहेजी को आज ही क्यों शहर जाना था ? पूनम की रात तो वो अपने आपको बाँध-बाँधकर रखती थी। और मालिन ने मुक्कैश वाली मिन्नी की चुनरी के साथ अपना मुँह-सिर लपेट लिया। चाँद की चाँदनी में दमक-दमक पड़ते मुक्कैश के दाने। उसे लगा जैसे आसमान के तारे उसके बालों में उतर आए हों, उसके गालों पर, उसके कन्धों पर आकर खेलने लग गए हों। सामने अमराई पर फिर कोई पंछी आकर बोल रहा था- हुक, हुक, हुक ! सारी रात पुकारता रहेगा - पूनम की रात। सारी उम्र यूँ ही पुकारता रहा था और जिसने आना था, वह नहीं आया था।
ये किन विचारों में वो आज बहती जा रही थी ? मालिन सोचती, शायद इसलिए कि वो अकेली थी। अकेली क्यों थी ? अन्दर मिन्नी, उसकी जवान-जहान बेटी सोयी थी। अगले हफ्ते जिसका उसने काज रचाना था। सात दिन और, और वो चली जाएगी। और फिर मालिन अकेली रह जाएगी। इतना बड़ा आँगन और वो अकेली। मालिन का अंग-अंग लरज गया। यह आँगन से काटने को दौड़ा करेगा। मिन्नी क्यों उसके यहाँ आएगी ? वो तो अपना घर बसाएगी। गाँव के चौधरी की बहू, वह तो अपने सहन का सिंगार बनेगी। और मालिन सोचती, वो अकेली रह जाएगी। बिल्कुल अकेली। मिन्नी के तहेजी की तो सारी उम्र सूद-सौदे में कट गई थी - एक अटूट दौड़। घर का मर्द, शाम को हर रोज हारकर जैसे वो आता था और निढाल अपनी चारपाई पर ढेरी हो जाता था। कई बार उसे यह कहती - आखिर, इतने झमेले किसलिए ? काहे को उसने इतने झंझट पाल लिए थे ? लेकिन उसे कोई बात नहीं समझ आती थी।
मालिन घड़ी की घड़ी के लिए अन्दर कोठे में गई। मिन्नी सचमुच सो गई थी। अल्हड़ जवानी की नींद में बेसुध सोयी पड़ी थी। लाल चूड़ियों को उतार, सिरहाने रख, सो गई थी। कहाँ चूड़ियाँ रखी थी उसने ? ज्यों ही करवट लेगी, कच-कच टूट जाएँगी। और मालिन ने सोचा, वो उठाकर चूड़ियों को सामने ताखे में रख दे। लेकिन उसने तो चूड़ियाँ पहन ली थीं। ताखे में सम्हालने के बदले उसने तो चूड़ियाँ अपनी कलाइयों में सजा ली थीं। छह एक ओर और छह दूसरी ओर। चमक-चमक पड़ती चूड़ियाँ, अभी कल ही तो मिन्नी ने गली में बैठकर चूड़ीवाले से चढ़वाई थीं।
फिर, मालिन बाहर आँगन में लौट आई। सिर पर रेशमी मुक्कैश वाली चुनरी, बाहों में लाल चूड़ियाँ... पूरे चाँद की रात। मालिन को लगा, जैसे एक ऐंठन-सी उसके अंग-अंग में फैलती जा रही हो।
और फिर उसकी ड्यौढ़ी का दरवाजा किसी ने खटखटाया। वही था, वही ! धीरे से, सहमा हुआ, झिझकता हुआ - वही था! जैसे उसने चिट्ठी में लिखा था, अपने वक्त पर आन पहुँचा था, ''शरद् पूनम की रात में तुम्हारा किवाड़ खटखटाऊँगा। तुम्हारी मर्जी हो खोल देना, तुम्हारी मर्जी हो न खोलना। तुम्हारा किवाड़ खटखटाने का मेरा हक वैसे का वैसा बना हुआ है।'' ठक ! ठक !! ठक!!! बेहद कोमल, बेहद मधुर, प्यारी-सी यह दस्तक उसी की थी। वही था। चाँदनी रात का चोर। और सहसा चाँद घने काले बादलों के पीछे हो गया। अँधेरा-सा छा गया चारों ओर। जैसे किसी ने एकदम बत्ती बुझा दी हो। घोर काले बादलों का एक पहाड़-सा चाँद के सामने आ गया था। बादलों पर बादल चढ़े आ रहे थे।
और रात के उस अँधेरे में मालिन के कदम ड्यौढ़ी की ओर चल दिए। अँधेरा-अँधेरा, चक्कर-चक्कर, ठंड-ठंड, पसीना-पसीना, काँपते हुए हाथ से धीरे से उसने कुंडी खोली और अपने आप को तड़प रही बाहों में ढेरी कर दिया। और फिर होंठों पर होंठ, दाँतों में दाँत - बीस वर्षों का रुका हुआ एक बाँध जैसे फूटकर टूट पड़ा हो। जैसे कोई फूल की पत्ती किसी बवंडर की लपेट में आ गई हो।
मालिन को नहीं पता था, कब चलते-चलते वो दोनों गाँव के बाहर बरगद के नीचे जा खड़े हुए, कितने देर वहाँ खड़े रहे। मालिन को नहीं पता था, कब वो बरगद के साथ लगते खेत में जा बैठे, कितनी देर वहाँ छिपे रहे। तड़के मुँह-अँधेरे की गाड़ी दूर सड़क के पार चीखती-चिल्लाती गुजर रही थी कि उसकी आँख खुली और मालिन धीरे से उसकी बाहों में से निकल कर मुँह-सिर लपेट तेज-तेज कदम अपने घर लौट आई।
चूड़ियों को उतारकर उसने वैसा-का-वैसा मिन्नी के सिरहाने रख दिया। उसकी रेशमी चुनरी उसकी चारपाई पर रखी और अपना दुपट्टा लेकर सामने बिस्तर में जा लेटी।
मालिन अपने पलंग पर आकर पड़ी और उसकी आँख लग गई। यूँ तो उसे कभी भी नींद नहीं आई थी। जैसे सारी उमर का किसी का रतजगा हो।

धूप निकल आई थी और तब कहीं उसकी आँख खुली।
''कैसे अल्हड़ लड़कियों की तरह तो आज सोयी है माँ।'' मिन्नी ने उसे छेड़ा।
जवान-जहान लड़की। उसने घर की झाड़-पौंछ देख ली थी। चूल्हा-चौका खत्म कर लिया था और नहा-धोकर अब मन्दिर जा रही थी - मोतिये की कलियाँ अपनी चुनरी के साथ बाँधे, अपने इष्ट की भेंट चढ़ाने के लिए।
मिन्नी आँख से ओझल हुई और मालिन अलसायी हुई लाखों-लाख सपने अपने पलकों में लिए सामने आँगन में जा बैठी। मीठी-मीठी पुरवैया चल रही थी। हल्की-हल्की धूप सामने मुंडेर से नीचे उतर आई थी। एक खुमार-सा था आसपास। मालिन को लगा जैसे वो दूध की लबरेज कटोरी हो। दूध और उस पर तैर रही चमेली की कलियाँ। एक उन्माद में उसकी पलकें जुड़-जुड़ जातीं, खुल-खुल जातीं...
''अरी मालिन, कहाँ है तुम्हारी काइयाँ बेटी ?'' जैसे उसको किसी ने आकर चाँटा दे मारा हो। मालिन की ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की साँस नीचे रह गई।
''यह अनर्थ कभी नहीं किसी ने सुना। चार दिन इसके डोले को रह गए हैं और यह लड़की यूँ उथल पड़ी।'' लाजो पड़ोसिन हथेलियाँ मलती मालिन के पास आकर बैठ गई।
''क्या हुआ है मेरी बेटी को ? वो तो निरी गऊ है।'' मालिन भभककर उसे काटने को पड़ी।
''तेरी गऊ सारी रात कल मुँह काला करती रही है।''
मालिन ने सुना और उसके जैसे सोते सूख गए। काटो तो लहू नहीं। नीली-पीली - उसका अंग-अंग जैसे मुड़ रहा हो।
''उधर रात हुई, इधर यह किसी गुंडे के साथ बाहर निकल गई। सारी रात तेरी ड्यौढ़ी खुली रही है। मैंने खुद इन आँखों से देखा, ड्यौढ़ी के बाहर किसी की बाहों में यह ढेरी हुई पड़ी थी। मैं बाहर चोटी करने निकली थी और मैंने वैसे का वैसा किवाड़ भिड़ा लिया। और फिर ये हौले-हौले कदम, बाँह में बाँह डाले बाहर खेतों की ओर निकल गए। सारी रात मेरी तो आँख नहीं लगी। बेटियाँ सबकी सांझी होती हैं। यूँ पहले कभी किसी ने अपने माँ-बाप का मुँह काला नहीं किया। यूँ कभी किसी ने अपने बड़े-बूढ़ों की पत(इज्ज़त) नहीं उतारी। हम तो कहीं मुँह दिखाने के लिए नहीं रहे।'' और लाजो छल-छल रो रही थी, रोये जाती और हथेलियों को मले जाती।
मालिन जैसे कोई पत्थर हो, उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
और फिर यूँ बिलखती-बिलखती लाजो चली गई।
लाजो अभी गई ही थी कि गाँव का चौकीदार पिछवाड़े की ओर से उतर आया।
''भाभी ! अरी भाभी मालिन !'' कब का वो उसके पास खड़ा हो उसे बुला रहा था।
''क्या हुआ जुमा ?'' जैसे कुएँ में से निकली आवाज़ हो। मालिन चौकीदार को आँगन में खड़ा देखकर खुद को सम्हालने लगी।
''भाभी ! बात कहने वाली तो नहीं, पर कल रात बड़ा जुल्म हुआ है इस गाँव में। मैंने तो बाल सफेद कर लिए चौकीदारी करते हुए। ऐसा अन्धेर मैंने कभी नहीं देखा। तेरी बेटी मिन्नी किसी के साथ बरगद के तले मुँह काला करती रही। रात चाँदनी थी लेकिन आकाश बादलों से अटा हुआ था। दो बार मैं दस कदम की दूरी पर इनके पास से गुजर गया। होंठों पर होंठ जमाए, एक-दूसरे से चिपटे, इनको कुछ पता नहीं लगा। बरगद के तले खड़े खड़े थक गए तो फिर खेत में जा छिपे। मैं तो सारी रात तेरे घर की रखवाली में बैठा रहा हूँ। खुली ड्यौढ़ी, चार दिन इसके ब्याह हो रह गए हैं। ब्याह वाला घर गहनों-कपड़ों से भरा होता है। सवेर हुई तो मैं यहाँ से हिला। पता नहीं कब यह झक मार-मारकर लौटी, कमजात। मैंने तो इसे गोद में खिला-खिलाकर पाला है। मेरी बेटी होती तो मैं इसका गला घोंट देता। मैं तो पिछली दीवार फांदकर आया हूँ। मैंने सोचा, कोई पूछेगा कि तुम सुबह-सुबह किधर चल दिए, तो मैं क्या जवाब दूँगा ?''
मलिन के मुँह में जबान नहीं थी, फटी आँखों से जुमा चौकीदार को देख रही थी।
और जुमा जिस राह आया था, उसी राह दीवार को लाँघकर लौट गया।
जुमा गया और सामने गली में रतना जमींदार दहाड़ता-फुँकारता सिर जितना ऊँचा लट्ठ उठाए उसके आँगन में आ धमका। वह क्रोध में उबल रहा था।
''कहाँ है तुम्हारी लड़की ?'' ड्यौढ़ी में घुसते ही वह गरजा, ''कहाँ है वो बदजात छिनाल ? मेरा ही खेत रह गया था इसे खराब करने को...?'' रतना उछल-उछल पड़ रहा था। मन मन की गालियाँ सुनाता, सारा मुहल्ला उसने इकट्ठा कर लिया। अड़ोसी-पड़ोसी मुंडेरों पर आ खड़े हुए।
''मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है। तड़के मैं कुएँ की ओर जा रहा था, मैंने खुद अपनी आँखों से देखा - पहले यह निकली मेरी खेत में से मुक्कैश वाली चुनरी ओढ़े हुए, मैंने सोचा, लड़की शायद बाहर बैठने आई है। और फिर एक पल गुजरा तो इसका यार किसी दूसरी ओर से नीचे उतर गया।''
''क्यों झूठ बोलते हो चाचा ?'' बिजली की तरह कड़ककर मिन्नी भीड़ को हटाती हुई आगे बढ़ी। देर से वो मन्दिर से लौटी हुजूम के पीछे खड़ी सब-कुछ सुन रही थी।
''मैं झूठ बोलता हूँ बदजात ? मैं झूठ बोलता हूँ कुलच्छनी ? यह लाल चूड़ी किसकी टूटी हुई थी मेरे खेत में ?'' और अपनी चादर के पल्लू में बँधी लाल चूड़ी उसने मिन्नी की हथेली पर जा रखी। एक आँख झपकने में मिन्नी ने अपनी कलाइयों पर चूड़ियों को गिना - ग्यारह थीं। और वो ठिठककर रह गई। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
और फिर मुहल्लेवालियाँ आँखों ही आँखों में एक-दूसरी को कहने लगीं। उन्होंने स्वयं मिन्नी को पिछले दिन चूड़ियाँ चढ़वाते देखा था, दस के ऊपर दो चूड़ियाँ। लाल रंग चुनकर उसने निकलवाया था।
लोगों से आँगन भर गया था। और मालिन का समधी आया भीड़ को चीरता हुआ। उसके पीछे मिन्नी की होने वाली सास थी। और उन्होंने सारे वो थाल, सारे वो कपड़े, सारे वो नोट, सब वो मुँदरियाँ मालिन के सामने ला पटकीं। हक्के-बक्के लोग एक-दूसरे के मुँह की ओर देख रहे थे। औरतें बार-बार कानों को हाथ लगातीं। जवान-जहान लड़कियाँ मुँह में उंगलियाँ लिए काट रही थीं।
और फिर, धड़ाम से पड़ोस के कुएँ में किसी के गिरने की आवाज़ आई। सबकी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की साँस नीचे रह गई। लोगों ने आगे-पीछे देखा, मालिन की गऊ जैसी सुशील बेटी कहीं भी नहीं थी। वो बेटी जिसका ऊँचा बोल किसी ने नहीं सुना था, सच्चा मोती। जो सुबह-शाम भगवान के सामने हाथ जोड़-जोड़ नहीं थकती थी, वो बेटी कहीं भी नहीं थी। और लोग एक साँस कुएँ की ओर दौड़ पड़े।
मालिन तख्ते का तख्ता, वैसी की वैसी पड़ी थी। उसका आँगन भाँय-भाँय कर रहा था। अड़ोसी-पड़ोसी अल्ले-मुहल्लेवाले सारे कुएँ की ओर दौड़ पड़े थे - किसी तरह लड़की बच सके।

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ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव
प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

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‘नई किताबें’ के अन्तर्गत केवल हिन्दी में अनूदित हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तकों पर समीक्षा के लिए विचार किया जाएगा।
संपादक – कथा पंजाब

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