‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

Marquee

पंजाबी उपन्यास

>> मंगलवार, 3 अप्रैल 2012


बलबीर मोमी अक्तूबर 1982 से कैनेडा में प्रवास कर रहे हैं। वह बेहद सज्जन और मिलनसार इंसान ही नहीं, एक सुलझे हुए समर्थ लेखक भी हैं। प्रवास में रहकर पिछले 19-20 वर्षों से वह निरंतर अपनी माँ-बोली पंजाबी की सेवा, साहित्य सृजन और पत्रकारिता के माध्यम से कर रहे हैं। पाँच कहानी संग्रह [मसालेवाला घोड़ा(1959,1973), जे मैं मर जावां(1965), शीशे दा समुंदर(1968), फुल्ल खिड़े हन(1971)(संपादन), सर दा बुझा(1973)],तीन उपन्यास [जीजा जी(1961), पीला गुलाब(1975) और इक फुल्ल मेरा वी(1986)], दो नाटक [नौकरियाँ ही नौकरियाँ(1960), लौढ़ा वेला (1961) तथा कुछ एकांकी नाटक], एक आत्मकथा - किहो जिहा सी जीवन के अलावा अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मौलिक लेखन के साथ-साथ मोमी जी ने पंजाबी में अनेक पुस्तकों का अनुवाद भी किया है जिनमे प्रमुख हैं – सआदत हसन मंटो की उर्दू कहानियाँ- टोभा टेक सिंह(1975), नंगियाँ आवाज़ां(1980), अंग्रेज़ी नावल ‘इमिग्रेंट’ का पंजाबी अनुवाद ‘आवासी’(1986), फ़ख्र जमाल के उपन्यास ‘सत गवाचे लोक’ का लिपियंतर(1975), जयकांतन की तमिल कहानियों का हिन्दी से पंजाबी में अनुवाद।
देश –विदेश के अनेक सम्मानों से सम्मानित बलबीर मोमी ब्रैम्पटन (कैनेडा) से प्रकाशित होने वाले पंजाबी अख़बार ‘ख़बरनामा’ (प्रिंट व नेट एडीशन) के संपादक हैं।

आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यह उपन्यास ‘पीला गुलाब’ भारत-पाक विभाजन की कड़वी यादों को समेटे हुए है। विस्थापितों द्बारा नई धरती पर अपनी जड़ें जमाने का संघर्ष तो है ही, निष्फल प्रेम की कहानी भी कहता है। ‘कथा पंजाब’ में इसका धारावाहिक प्रकाशन करके हम प्रसन्नता अनुभव कर रहे हैं। प्रस्तुत है इस उपन्यास की चौथी किस्त…
- सुभाष नीरव


पीला गुलाब
बलबीर सिंह मोमी

हिंदी अनुवाद
सुभाष नीरव

4
अँधेरा गहरा हो गया था और गुलाब इतना थक चुका था कि उसमें उठने की हिम्मत नहीं थी। वह कुएँ की गाधी पर ही सो गया और मुंदती आँखों से उसकी चेतना की सुई पुन: कई बरस पीछे की ओर मुड़ गई।
हमारा गाँव ढाबां सिंह स्टेशन से ननकाणा साहिब को जाने वाली कच्ची सड़क पर दो कोस की दूरी पर था। उससे आगे मजौरां वाला, कड़कन, मानांवाला और कई अन्य छोटे-छोटे गाँव थे। ननकाणा साहिब हमसे कोई सोलह मील दूर था। बाबा नानक के गुरपर्व के समय हम बैलगाड़ियों में पूर्णमासी नहाने ननकाणा साहिब जाया करते थे। बैलगाड़ियों का काफ़िला अपना-अपना रसद-पानी लेकर चल पड़ता। कार्तिक मास की पूर्णमासी को रात के समय रजाइयों वाली ठंड भी हो जाती और बाहर निकलने पर दाँत किटकिटाने लग पड़ते थे।
कई शौकीन ढाबां सिंह स्टेशन से रेलगाड़ी पकड़ कर शेखूपुरे पहुँच जाते और वहाँ से रेल बदल कर ननकाणा साहिब पहुँचते। लेकिन जो आनन्द बैलगाड़ियों पर जाने का था, वह रेलगाड़ी पर जाने का नहीं था। एक बार मैं बापू के साथ रेलगाड़ी पर गया था, पर कोई मज़ा नहीं आया था। बापू ने निहंगों वाले चोले पहनकर माँ से कहा था कि वह गुरपर्व पर बिना टिकट ही जाएगा। बापू ने पीले रंग का लम्बा चोगा, पट्टेदार कच्छा और नीली दस्तार(पगड़ी) सजाकर उस पर चक्र लगा लिया और मुझे संग ले लिया। मैंने भी अपना कुर्ता पीले रंग में रंगवा लिया मानो मैं दसवें पातशाह की तरह अपने बापू के साथ पाँचवा साहिबजादा बनकर जा रहा था।
हम बेटिकट ही रेलगाड़ी में चढ़ गए। सच्चा सौदा स्टेशन पार करके चूहड़खाने स्टेशन पर पहुँचे थे कि टी.टी. ने आ कर टिकट पूछा।
टी.टी. टिकट पूछता और बापू निहंगों वाले मस्तीभरे लहजे में बड़ी बेपरवाही से कहता, ''ओए तू ले जा अपनी भूतनी, हम अपने तेजा सिंह पर चढ़कर चले जाएँगे।''
बढ़ते-बढ़ते झगड़ा बढ़ गया। जब शेखूपुरे का स्टेशन आया तो टी.टी. हमें घेर कर बड़े टी.टी. के पास ले गया। वहाँ पहले ही कितने सारे बेटिकट निहंगों को घेरा हुआ था।
बापू के पहुँचने की देर थी कि उन्होंने गरज कर 'बोले सो निहाल' का जैकारा लगाया और निहंगों ने 'सतिश्री अकाल...' की गूंज से स्टेशन मास्टर का कमरा गुंजायमान कर दिया। एक सिंह जैकारा बुलाकर हटता तो दूसरा शुरू कर देता। करीब पन्द्रह मिनट तक जब ये जैकारे बन्द न हुए तो टी.टी. ने हाथ जोड़कर कहा, ''जाओ भाई, जाओ, हमारा पीछा छोड़ो।''
हम लौटकर ननकाणा साहिब वाली रेलगाड़ी पकड़ने के लिए आए तो डिब्बों में तो क्या, बाहर लटकने लायक भी जगह नहीं थी। एक सिंह ने सलाह दी कि सब गाड़ी की छत पर चढ़ जाएँ। बड़ी मुश्किल से रेलगाड़ी चली और जब तक ननकाणा साहिब नहीं आया, निहंग सिंह जैकारे लगाते रहे और ननकाणा पहुँच कर बापू और मैं भी दूसरे निहंगों के साथ एक निहंगों के डेरे में चले गए।
जब लंगर छकने का वक्त आया तो एक सेवादार बोला, ''मीठे परशादे लो भई, मीठे परशादे।''
मैंने मीठे परशादे के लालच में झट मीठा परशादा ले लिया, पर पता तब चला जब कई दिनों के बासी परशादे थमा कर सेवादार लौटकर दाल भी देने नहीं आया और मैंने भूखे मरते ने मीठा परशादा ही थोड़ा-थोड़ा करके चबा लिया।
भविष्य में, रेलगाड़ी पर न जाने की मैंने कसम डाल दी। बैलगाड़ियों के काफ़िले में जाने का आनन्द अलग ही था।
पंजीरी की पीपी भर ली जाती। दूध में आटा गूंधकर मीठी, खस्ता-नरम रोटियाँ माँ पका लेती जो कई दिनों तक नरम ही रहतीं। और ये मीठी रोटियाँ ननकाणा साहिब पहुँचकर खाने में बड़ा स्वाद आता। रास्ते भर बैलगाड़ियों में जाने वाले लोग प्रसन्न से होकर 'शबद' बोलते जाते और जब हमारी बैलगाड़ियाँ मुसलमानों के गाँवों के करीब से गुज़रती तो मुसलमान बड़े चाव से हमें जाते हुए देखते।
इन बैलगाड़ियों पर जाने का एक आनन्द यह भी था कि बापू की एक धर्म-बहन भागो जो पशौर के एक अमीर हलवाई सुन्दर सिंह के साथ ब्याही हुई थी, हर साल पति के साथ धार्मिक स्थानों की यात्रा के लिए आया करती थी। उसका विवाह सुन्दर सिंह हलवाई से बापू ने ही करवाया था। सुन्दर सिंह जाति का अरोड़ा था और आयु में अधिक था। काणा होने के कारण अमीर होने के बावजूद वह काफ़ी समय तक रंडा ही रहा था। कई लोगों का ख़याल था कि भागो बापू की धर्म-बहन नहीं थी। अपितु बापू ने कहीं माँ से छिपाकर उसके साथ अकाल-तख्त, अमृतसर में फेरे भी लिए थे और बाद में बापू ने सुन्दर सिंह हलवाई से उसका विवाह करवा दिया था या बेच दिया था। पर यह बात मुझे बहुत बुरी लगती थी।
बापू देश को आज़ाद करवाने की खातिर कई बरस जेल में भी रहा था और सुना था कि भागो भी देश की आज़ादी की खातिर कई बार कैद हुई थी और वह जाति की मुसलमान खोजिन थी और उसने बापू के पीछे सिक्ख-धर्म धारण कर लिया था। मेरे लिए यह सब एक गोरख-धंधा था और मुझे इसके भीतर का सच कुछ भी समझ में नहीं आता था।
यदि वह मेरे पिता की धर्म-बहन बनी थी और दोनों ने देश की आज़ादी की खातिर जेलें काटी थीं तो फिर उन्होंने माँ से चोरी अकाल तख्त में फेरे करवाने की क्या ज़रूरत थी। और यदि फेरे करवा ही लिए थे तो बापू द्वारा उसको सुन्दर सिंह हलवाई को बेचने की बात मेरी समझ से बाहर ही रही।
जो कुछ भी था, भागो को माँ अच्छा नहीं समझती थी। जब वह पशौर से आती, महीना महीना हमारे घर में रहती। उसके संग उसका नौकर भी आता। वह अखरोट, बादाम, मेवे, किशमिश, काजू और कई-कई किस्म के दूसरे फलों के अलावा मिठाइयों की टोकरियाँ भर भर कर लाती। मुझे इतना मालूम है कि माँ इन चीज़ों को हाथ तक न लगाती। कई बार बापू और भागो तांगे पर बैठकर मंडी सैर करने जाते। कभी-कभी वे मुझे भी संग ले जाते। भागो की मेरी उम्र की दो खूबसूरत बेटियाँ भी थीं।
मुझे भागो बड़ा प्यार करती। चूमती, अपनी गोदी में लेकर मुझे मेवे आदि खाने के लिए देती। मैं उसकी गोरी-चिट्टी लड़कियों के संग खेलते न थकता और हर साल उनके आने की प्रतीक्षा किया करता।
भागो एक महीना पहले आ जाती और सुन्दर हलवाई गुरपर्व के बिल्कुल करीब आता और हम सब बैलगाड़ी भरकर ननकाणा साहिब पहुँचते। वहाँ पहुँचकर सरायों की भीड़ से बचने के लिए सुन्दर सिंह शहर में कोई बैठक या चौबारा किराये पर ले लेता। एकबार सुन्दर सिंह भागो को लेकर सीधे ही ननकाणा साहिब पहुँच गया और बापू को वहाँ पहुँचने के लिए ख़त डाल दिया। हम भी पहुँच गए। मेले में बहुत भीड़ थी। बापू ने मुझे कंधे पर उठा रखा था। हम वो जगह देखकर लौट रहे थे, जहाँ साँप ने बाबा नानक के मुख पर छाया की थी। रास्ते में मैं सतौली शाह के चूहे देखने और गुब्बारा लेने के लिए बापू के कंधे से उतर गया। गुब्बारा लेने गया मैं गुम हो गया और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। कुछ सेवादार मुझे उठाकर गुम हुए बच्चों वाले तम्बू में ले गए। वहाँ मुझसे छोटे-बड़े अनेक गुम हुए बच्चे ज़ोर-ज़ोर से रो रहे थे। जब खोजते-खोजते उनके माता-पिता उनके पास पहुँच जाते, तो वे उनसे लिपट कर और अधिक ऊँची आवाज़ में रोने लग पड़ते। माता-पिता के मिलने की मुझे भी कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती थी और हम ठहरे कहाँ पर हैं, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी।
करीब एक घंटे के पश्चात् बापू, माँ, सुन्दर सिंह, भागो और उसकी दोनों बेटियाँ मुझे खोजते-खोजते वहाँ आ पहुँचे। भागो ने मुझे माँ की गोद से छीन कर पता नहीं कितनी बार चूमा-चाटा। और मैंने देखा कि भागो बहुत सुन्दर थी। मेरी माँ से भी सुन्दर!
माँ भी कोई बदसूरत औरत नहीं थी। कद बेशक उसका छोटा था, पर रंग बड़ा गोरा और आँखें नीली थी। नीली आँखों वाली औरतें हिंदुस्तान में कम ही हुआ करती हैं और मैं अपनी माँ का अकेला लाड़ला पुत्र था।
भागो का अपना कोई बेटा नहीं था, परन्तु वह सुन्दर बहुत थी। मुझे उसने अपना बेटा बना रखा था और मुझे इसमें कोई अधिक एतराज़ भी नहीं था।
गाँव में लोग बातें किया करते थे कि भागो जाति की खोजन थी और खोजे मुसलमानों में सबसे सुन्दर जाति मानी जाती है। परन्तु, इस खोजन का बापू से रिश्ता कैसे जुड़ा था, इसका मुझे कभी पता न चल सका।
फिर पशौर से चिट्ठी आई कि भागो अपनी बेटियों और सामान सहित हमारे पास आ रही थी। पशौर मुसलमानी इलाका था और उधर खून-खराबे की वारदातें शुरू हो गई थीं।
बापू बैलगाड़ी लेकर स्टेशन पर गया और भागो को गाँव ले आया।
फिर क्या हुआ - परिवारों के परिवार रावलपिंडी, पशौर, लंडी कोतल, पंजा साहिब, जेहलम और गुजरात से इधर आने लग पड़े और सारी मंडी बेघरों से भर गई।
कई बार मंडी में से ये गोरे-चिट्टे पशौरिये भापे सलवारें पहने लस्सी लेने हमारे गाँवों में आ जाते और गाँव वाले लस्सी के साथ-साथ इन्हें रोटी भी पका कर लिखा देते।
भागो की इस आमद में और पहले की आमद में बड़ा फ़र्क था। पहले भागो मेहमान बनकर कुछ न कुछ लेकर आती थी। इस बार भागो बोझ बनकर, बेघर और बेआसरा होकर पनाह लेने आई थी। इस बार न उसमें पहले जैसी चमक थी, और न ही मटक।
एक दिन मिलेट्री से भरी गाड़ी आई और स्टेशन पर खड़ी हो गई। मिलेट्री ने मंडी पर फायरिंग करनी शुरू कर दी। कई आदमी मारे गए, कई ज़ख्मी हो गए। रातोंरात सारी मंडी खाली हो गई। जिन बाज़ारों में दिनभर रौनक रहती थी, वहाँ सन्नाटा पसर गया। आधे से ज्यादा लोग मंडी छोड़कर हमारे गाँव में आ घुसे। स्कूल में छुट्टियाँ थीं, वहीं खाली कमरों में उनका प्रबंध कर दिया गया। कुछ लोग गुरद्वारे चले गए। कुछ परिचितों के घरों में समा गए। हमारी एक बैठक खाली थी, वह भी भर गई। दूसरी में भागो का डेरा था। मास्टर कहीं से बैटरी वाला रेडियो ले आया था। आसपास के तीन गाँवों के लोग रेडियो सुनने आते। इस रेडियो पर रोज़ छुरेबाज़ी और आगजनी की खबरें आती थीं। फिर मुझे पता चला कि गाँव के नौजवान लड़के रातों में इकट्ठा होकर कुछ खुफ़िया बातें करते थे।
हमारे गाँव के साथ-साथ कई मुसलमानों के गाँव थे। जैसे गोंदरा वाला, मजौरां वाला आदि। इन गाँव में पूरी की पूरी आबादी मुसलमान जांगलियों की थी। कोलरां वाला जो बिल्कुल रेलवे लाइन पर ढाबां सिंह और मोमन स्टेशन के बीच था, सारा ही मुसलमानी गाँव था। एक दिन एक गाड़ी घंटा भर कोलरां वाले गाँव के नज़दीक खड़ी रही और हथियार गाँव में पहुँचते रहे। इन हथियारों में बन्दूकें, पिस्तौलें, छुरे, बरछे और तलवारों के अलावा छोटे बंब भी थे। इस घटना से सिक्खों के गाँवों में खलबली मच गई। लोगों के रंग जो मंडी में गोली चलने से फक्क हुए पड़े थे, और ज्यादा फीके पड़ गए।
एक दिन छींबों के प्रीतू ने बताया कि उस रात के बजे के आसपास कुछ लोग तेलियों के घर जाते और फिर वहाँ से निकलते देखे थे।
सवेरे पड़ताल की गई तो तेली साफ़ मुकर गए। अपितु कहने लगे कि हमें तो सिक्खों से डर लगता है और हम गाँव छोड़कर साथ वाले गाँव मजौरां वाले जा रहे हैं। गाँव इस बात को अपनी हेठी समझता था और अन्दर ही अन्दर लुहारों और तेलियों की नीयत पर शक भी कर रहा था।
कुछ दिनों बाद एक रात तेलियों के घर के करीब बंब चल गया। यद्यपि नुकसान तो कुछ नहीं हुआ था, पर सारा गाँव भयभीत हो उठा। लोगों का कहना था कि यह तेलियों की शरारत थी और तेली कहते कि हमें डराने और यहाँ से भगाने के लिए यह सब किया जा रहा था।
फिर, कई गाँवों के नेता तख्तपोशों पर इकट्ठे हुए जिनमें जांगलियों का चौधरी सराज अपनी दोनाली बन्दूक भी लेकर आया। फैसला हुआ कि चाहे यह इलाका पाकिस्तान में चला जाए या हिंदुस्तान में रहे, पर सभी इसी तरह अमन से बसते रहेंगे जैसे पिछले कई बरसों से भाइयों की भाँति रहते, बसते और आपस में व्यवहार करते आए हैं। कोई भी किसी का जानी नुकसान नहीं करेगा।
इस बात का प्रभाव चार दिन ही रहा और भीतर ही भीतर आग सुलगती रही। मुसलमान बरवाला एक रात अपने घर को ताला लगाकर भाग गया।
फिर, कानाफूसी हुई कि गाँव के कुछ जवान लायलपुर के करीब से कुछ पठानी बन्दूकें और ट्राली से बांध कर चलाने वाली एक छोटी-सी तोप ले आए थे और कुछ बंब भी तैयार कर लिए थे। वे कहते थे कि यदि मुसलमानों ने गाँव पर हमला किया तो वे पूरी तैयारी से मुकाबला करेंगे।
एक दिन शिखर दोपहरी चार विर्क घोड़ियों पर चढ़कर हमारे गाँव में घुस आए। उनके हाथों में किरपानें और जेबों में पिस्तौलें थीं। जब लोग उनके पास आकर एकत्र हुए तो एक ने ऊँची आवाज़ में कहा, ''हमारी विर्क बिरादरी पूरी तैयारी में है। हम अपने घर और ज़मीनों को छोड़कर कहीं नहीं जाएँगे। जब तक हमारे अन्दर खून का एक कतरा भी बाकी है, हम दिलेरी से लड़ेंगे। अगर तुम्हारे ऊपर हमला हो तो हमें ख़बर करो, हम बिजली की तरह यहाँ पहुँच जाएँगे। कोई हमारे पर हमला करे और हम कव्वे के हाथ भी सन्देशा भेजें तो तुम पहुँचने में देरी न करना।''
और वे घोड़ियों को ऐड़ी मारकर ये गए, वो गए।
(जारी…)

1 टिप्पणियाँ:

कुसुम 6 अप्रैल 2012 को 11:05 am  

मोमी जी का यह उपन्यास एक आत्मकथा सा प्रतीत हो रहा है। रोचक है।

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश है। कथा-कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, शब्दचित्र आदि से जुड़ी कृतियों का हिंदी अनुवाद हम ‘अनुवाद घर’ पर धारावाहिक प्रकाशित करना चाहते हैं। इच्छुक लेखक, प्रकाशक ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ जानने के लिए हमें मेल करें। हमारा मेल आई डी है- anuvadghar@gmail.com

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव
वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, मूल्य : 300 रुपये

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
शुभम प्रकाशन, एन-10, उलधनपुर, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032, मूल्य : 120 रुपये

रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव

रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव
यूनीस्टार बुक्स प्रायवेट लि0, एस सी ओ, 26-27, सेक्टर 31-ए, चण्डीगढ़-160022, मूल्य : 400 रुपये

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव
नीरज बुक सेंटर, सी-32, आर्या नगर सोसायटी, पटपड़गंज, दिल्ली-110032, मूल्य : 150 रुपये

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह) संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह)  संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव
नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन, 5, इंस्टीट्यूशनल एरिया, वसंत कुंज, फेज-2, नई दिल्ली-110070, मूल्य :60 रुपये।

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष 1998, 2004, मूल्य :35 रुपये

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-1100-6, मूल्य : 125 रुपये

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव
प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

पंजाबी की साहित्यिक कृतियों के हिन्दी प्रकाशन की पहली ब्लॉग पत्रिका - "अनुवाद घर"

"अनुवाद घर" में माह के प्रथम और द्वितीय सप्ताह में मंगलवार को पढ़ें - डॉ एस तरसेम की पुस्तक "धृतराष्ट्र" (एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा) का धारावाहिक प्रकाशन…

समकालीन पंजाबी साहित्य की अन्य श्रेष्ठ कृतियों का भी धारावाहिक प्रकाशन शीघ्र ही आरंभ होगा…

"अनुवाद घर" पर जाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://www.anuvadghar.blogspot.com/

व्यवस्थापक
'अनुवाद घर'

समीक्षा हेतु किताबें आमंत्रित

'कथा पंजाब’ के स्तम्भ ‘नई किताबें’ के अन्तर्गत पंजाबी की पुस्तकों के केवल हिन्दी संस्करण की ही समीक्षा प्रकाशित की जाएगी। लेखकों से अनुरोध है कि वे अपनी हिन्दी में अनूदित पुस्तकों की ही दो प्रतियाँ (कविता संग्रहों को छोड़कर) निम्न पते पर डाक से भिजवाएँ :
सुभाष नीरव
372, टाइप- 4, लक्ष्मीबाई नगर
नई दिल्ली-110023

‘नई किताबें’ के अन्तर्गत केवल हिन्दी में अनूदित हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तकों पर समीक्षा के लिए विचार किया जाएगा।
संपादक – कथा पंजाब

सर्वाधिकार सुरक्षित

'कथा पंजाब' में प्रकाशित सामग्री का सर्वाधिकार सुरक्षित है। इसमें प्रकाशित किसी भी रचना का पुनर्प्रकाशन, रेडियो-रूपान्तरण, फिल्मांकन अथवा अनुवाद के लिए 'कथा पंजाब' के सम्पादक और संबंधित लेखक की अनुमति लेना आवश्यक है।
‘कथा पंजाब’ के आगामी अंक में आप पढ़ेंगे –‘पंजाबी कहानी : आज तक’ में पंजाबी के प्रख्यात लेखक गुलजार सिंह संधु की कहानी, ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी और बलबीर मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की अगली किस्त…

Marquee

  © Free Blogger Templates Wild Birds by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP