‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

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पंजाबी लघुकथा : आज तक

>> गुरुवार, 12 नवंबर 2009

पंजाबी लघुकथा : आज तक(2)


''कथा पंजाब'' के पहले अंक में 'पंजाबी लघुकथा : आज तक' सीरिज के अन्तर्गत पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के कथाकार भूपिंदर सिंह की पाँच चुनिंदा लघुकथाएं प्रस्तुत की गई थीं जिन्हें पाठकों ने पसन्द किया और सराहा भी। इसी कड़ी में प्रस्तुत हैं- पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के ही एक और सशक्त और बहुचर्चित लेखक हमदर्दवीर नौशहरवी की पाँच चुनिंदा लघुकथाएं... इन पर पाठकों की प्रतिक्रिया की हमें प्रतीक्षा रहेगी।
सुभाष नीरव
संपादक : कथा पंजाब



हमदर्दवीर नौशहरवी की पाँच लघुकथाएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

(1) सलीब पर टंगा आदमी

सन् 1965...
शहर की जी.टी. रोड पर चौक के सामने पुराने फौजी सामान के कबाड़ की एक दुकान है। दुकानवाले ने पुराने फौजी सामान की बिक्री और प्रचार हेतु दुकान के आगे बांसों से बना एक नौ फुटे आदमी का पुतला खड़ा किया हुआ है। इस पुतले को नयी फौजी कमीज़ और नयी पैंट पहनायी गई है। कमीज़ के एक कंधे पर चमक रही लांस-नायक की एक फीती दूर से ही नज़र आ रही है।

चौके के बीच बिजली का एक खम्भा है। खम्भे पर खतरे की एक प्लेट पर एक नंगी खोपड़ी का चिह्न है। इस इंसानी खोपड़ी के निकले हुए दांत दूर से ही दीख रहे हैं। यह खोपड़ी लगातार सड़क पर से गुजरते लोगों को कोई चेतावनी देती प्रतीत होती है।

खम्भे के नीचे रोज एक हाड़ मांस का आदमी बैठता है। हर आते-जाते को वह बैठे-बैठे ही फौजी सलूट मारता है और अपने कटे हुए हाथों के टुंड से कासे की ओर इशारा करता है। उसने पुरानी फौजी कमीज़ पहन रखी है। उसकी कमीज़ पर सफेद फीती नहीं दिखती।

सन् 1971...
कबाड़ी ने बांसों के बने आदमी के पुतले की फौजी कमीज़ बदल दी है। अब नई वर्दी में नौ फुट का यह मनुष्य रूपी ढांचा और भी आकर्षक लग रहा है। चौक में बिजली के खम्भे के नीचे अब एक और भिखारी आकर बैठता है। वह मिली-जुली फौजी भाषा में स्वयं ही कुछ न कुछ बोलता जा रहा है। जब कभी वह इधर-उधर लुढ़कता है तो घुटनों से कटी हुई उसकी दोनों टांगें बड़ा ही डरावना दृश्य उपस्थित करती हैं। कभी-कभी वह सामने बिछाये हुए फटे फौजी तौलिये पर बिखरे आज़ाद देश के सिक्के गिनता है।

अब कभी-कभी यहाँ एक बूढ़ी औरत भी आकर बैठती है। उसके साथ एक सात साल का स्कूल जानेवाली उम्र का बच्चा भी बैठता है। उसके सामने सिलाई की मशीन का लोहे का कवर खुला हुआ पड़ा है। वह उस ढक्कन को कासे के रूप में इस्तेमाल करती है। जब वह ढक्कन बन्द करती है तो उस पर लिखे हुए मैले-से शब्द स्पष्ट पढ़े जाते हैं - ''देश रक्षा की खातिर सम्मान के तौर पर...''

जी.टी. रोड पर से कारें और स्कूटर बिना ध्यान दिए आ-जा रहे हैं। कोई-कोई पैदल चेहरा चौक की तरफ कोई सिक्का उछाल देता है और दूर किसी अदृश्य दिशा की ओर चला जाता है।

इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि यह चौक सरहद के उस पार है कि इस पार !
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(2) फटे काग़ज़ की कथा

हैड मास्टर साहब ने छठी कक्षा में पढ़ते करमे के पिता को स्कूल में बुलवाया था। हैड मास्टर बहुत दु:खी था और हैरान भी कि लोग इस हद तक झूठ बोल सकते हैं।
''तुम ही धरम सिंह हो ?''
''जी, साब !'' धरम सिंह ने सहमी हुई धीमी आवाज़ में कहा जैसे कोई कब्र की मिट्टी के नीचे से बोला हो।
हैड मास्टर ने एक बार धरम सिंह की दयनीय हालत की ओर देखा, फिर फीस माफी वाली अर्जी की ओर और जैसे स्वयं से ही बोला हो - 'ठीक ही तो लिखा है !'
''मैं जट्ट (किसान) हूँ। पर जट्ट भी कैसा ! दो किल्ले जमीन है। उसमें भी होता कुछ नहीं। पहले मैंने अपने आप को हरिजन लिखवाने के बारे में सोचा था। फिर, मैंने सोचा, झूठ क्यों बोलूं...'' और वह अपनी पगड़ी से आँखों में छलक आए आँसू पोंछने लगा।
''सोचता हूँ, किसी न किसी तरह करमा पढ़ जाए। कुछ बन जाए। मैं तो...।'' उसकी आँखें फिर भर आईं।
''आप सोचते होगे, मैंने झूठ लिखा है। पर मैं सच कह रहा हूँ। मैं मर चुका हूँ। मैं अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नहीं दे सकता। मैं मर चुका हूँ।''
''ऐसा नहीं सोचते। दिल को तगड़ा रख कर जूझते हैं। मैंने करमे की पूरी फीस माफी का नोट लिख दिया है। भविष्य में भी जितने समय यह मेरे पास रहेगा, इसकी फीस माफ रहेगी। ले, यह अर्जी फेंक दे।''
धरम सिंह ने अर्जी के दो टुकड़े किए और उन्हें मेज के नीचे 'मुझे प्रयोग करो' वाले पीपे में फेंक दिया और बाहर निकल आया।
काग़ज़ का एक टुकड़ा पीपे में गिरने की बजाय बाहर फर्श पर गिर पड़ा था जिस पर लिखे शब्द झांक रहे थे -
...दो बीघे जमीन है।
बाप मर गया है।
...माफ की जावे।
का आज्ञाकारी
करमसिंह, छठी बी
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(3) नीची जगह का पानी

थोड़ी-सी बारिश होती। पानी फिसलता और नीची जगह पर आकर जमा होता जाता तो मक्खियाँ-मच्छर और गंदगी फैलाते।
''इमरजेंसी राज में हमसे फैसलों में तो कोई गलती नहीं हुई। स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों ने अच्छे फैसलों को लागू करने में शायद ही ज्यादतियाँ की होंगी।'' इमरजेंसी के कारण हार गई सरकार के मुखिया का विचार था।

''चौकीदार जिम्मेदार है। घूंट लगाकर कहीं सो गया होगा, पीछे से सारा गोदाम खाली हो गया।'' सरकारी चीनी-गोदाम में चोरी हो जाने पर सुरक्षा अधिकारी का बयान था।

''संबंधित फाइल गुम हो गई है तो संबंधित क्लर्क से पूछो। उसकी लापरवाही से ही गुम हुई है।'' विभाग प्रमुख कह रहा था। विभाग में लाखों का घोटाला पकड़े जाने के बाद अचानक संबंधित फाइल गुम हो गई थी।

''स्वदेशी मिल्स में मिलावट ! हो सकता है रात की शिफ्टवाले मज़दूर से कोई कोताही हो गई हो और तबेले के बाहर पड़ी घोड़ों की लीद मसाले में मिल गई हो। लक्खू के बच्चे को ज़रूर सजा मिलनी चाहिए।'' मिल मालिक पुसिल से कह रहा था।

माली जिम्मेदार है...
चपरासी जिम्मेदार है...
सफाई कर्मचारी जिम्मेदार है...
मज़दूर जिम्मेदार है...

बारिश हो रही है। नीचे, गंदे तालाब में पानी अब और जमा नहीं हो सकता। और अब पानी का दरिया प्रवाह बनकर चल पड़ा है। किनारे पर खड़ी मजबूत इमारतें रेत के महलों की तरह ढह रही हैं...।
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(4) संस्कार

वह अस्पताल में पड़ी थी। अपनी आखिरी साँसें गिन रही थी। अन्तिम समय समीप आता देख मैं उसे देखने चला गया था।
मैं 'भाइया जी' को अपने संग लेकर अस्पताल पहुँचा। 'भाइया जी' उसके जेठ लगते थे और वह उम्रभर 'भाइया जी' से पर्दा करती रही थी।
''मैं सुखपाल हूँ, बरनाला से।''
''मैं पहचानती हूँ। बहुत अच्छा किया। अन्तिम समय दर्शन...'' उसे खाँसी छिड़ गई। उसका चेहरा नंगा था, शेष शरीर सिर समेत ढका हुआ था। उसका दायां हाथ कम्बल से बाहर था। वह इतनी कमजोर हो चुकी थी कि अपनी गर्दन भी स्वयं नहीं मोड़ सकती थी।
पास बैठी औरत ने उसका निर्जीव हाथ कम्बल के नीचे कर दिया।
''अकेले आए हो ?''
''भाइया जी, तुम भी अन्दर आ जाओ।''
'भाइया जी' अन्दर आ गए। उसके निर्जीव हाथों में जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गई कि उसने बड़ी तेजी से सिर का कपड़ा खींच कर अपना चेहरा ढक लिया।
अब चारपाई पर लाल कम्बल था। पता नहीं, कम्बल के नीचे उसके शरीर में कोई साँस बाकी भी थी या नहीं। आखिरी वक्त शायद उसे यह चिंता थी कि अस्पताल के बिस्तरे में जब उसकी लाश को बाहर निकालेंगे तब उसका चेहरा यदि नंगा हो गया तो !
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(5) भीग रहा आदमी

कोठरी में से तीखी बरछी-सी रोशनी की एक लकीर एक दरार के रास्ते बाहर आ रही थी। बैठक के बड़े तख्तों की दरार में से भी रोशनी की एक लकीर सफेद लहू की धार जैसी बाहर जा रही थी।
आँगन के बीच एक पुरानी घनी नीम थी। नीम के नीचे वह अतीत के टूटे धागे जोड़-जोड़ कर कोई कथा बुन रहा था।
कच्चे पुराने धागे।
काली अंधेरी रात थी। टिप्...टिप्... वर्षा की नन्हीं-नन्हीं बूँदें पड़ रही थी। कभी बादल गजरते, कभी बिजली चमकती।
उसके चार बेटे थे। उसे सभी की शादी की चिंता थी। पिछवाड़े दो कोठरियाँ थीं, आगे एक साझा-सा कमरा। बाहरी गेट के समीप एक बैठक थी।
उसका बड़ा लड़का ब्याहा गया। पिछली कोठरी उसके और उसकी घरवाली के लिए रिजर्व हो गई। उसका दूसरा लड़का भी ब्याहा गया। उसके लिए पीछे की दूसरी कोठरी के अन्दर आना-जाना वर्जित हो गया।
उसके तीसरे लड़के की शादी के बाद आगे का साझा कमरा मिल गया। उसे चौथे और आखिरी बेटे की बहुत फिक्र थी। उसके तौर-तरीके ठीक नहीं थे। खेती-बाड़ी में उसका जी नहीं लगता था, अगर कुआंरा रह गया तो लोग क्या कहेंगे ?
एक दिन उसका यह बेटा भी ब्याहा गया। उसने बैठक में अपने दहेज का सामान लगा दिया।
बूढ़ा पिता अब नीम के नीचे था, बिलकुल अकेला, बिलकुल चिंतामुक्त और आज़ाद !
वह सोच रहा था, इस नीम को काट कर वह अपने लिए एक छोटा-सा कच्चा कोठा क्यों न डाल ले, पर उसकी मृत्यु के बाद उसके चारों बेटे कोठे को कैसे बांटेंगे ? नीम की टहनियाँ तो चलो काट-बांट भी लेंगे।
वह गुरुद्वारे की ओर चल दिया लेकिन फिर लौट आया, 'लोग क्या कहेंगे ? इतने बड़े परिवार का मालिक...।'
और, वह खेस की बुक्कल मारे नीम के नीचे बैठा था। टिप्... टिप्... आहिस्ता-आहिस्ता बारिश हो रही थी और एक-एक कर उसके सारे कपड़े भीगते जा रहे थे।
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जन्म : 11 फरवरी 1937
शिक्षा : एम.ए.(पंजाबी, इतिहास और राजनीति)
कृतियाँ : धरती भरे हुंगारा, तपती भूमि, नंगे पैर, चट्टान और किश्ती, फिर आई बाबरवाणी, काले समय के साथ-साथ(सभी कविता संग्रह), धूप, उजाड़ और राहगीर, खंडित मनुष्य की कथा, बर्फ़ के आदमी और सूरज, सलीब पर टंगा मनुष्य, छोटे-छोटे हिटलर, नीरो बंसी बजा रहा था, कहानी अभी खत्म नहीं हुई, एक आदमी का काफिला(सभी कहानी संग्रह), प्लस आदमी(उपन्यास), आधुनिक साहित्य अनुभव, नये पंजाबी साहित्य की गति(आलोचना), तिनके और घोंसला(संपादन)।
सम्मान : रंगकर्मी समराला, गांधी नेशनल कॉलेज, अम्बाला छावनी, पंजाबी लोककला अकादमी, अमृतसर की ओर से सम्मानित।
संपर्क : कविता भवन, माछीवाड़ा रोड, समराला-141114, जिला- लुधियाना (पंजाब)।

1 टिप्पणियाँ:

Roop Singh Chandel 17 नवंबर 2009 को 7:24 pm  

सुभाष

हमदर्दवीर जी की पांचों लघुकथाएं पढ़ गया. प्रारंभ की दोनों लघुकथाएं - १. सलीब पर टंगा आदमी और २.फटे कागज की कथा निश्चित ही बहुत उत्कृष्ट रचनाएं हैं. सलीब ---- का अंतिम वाक्य : ’इससे क्या फर्क पड़ता है कि यह चौक सरहद के उस पार है या इस पार’ सत्ताओं पर कटु मार्मिक व्यंग्य है.

अन्य लघुकथाएं भी पसंद आयीं.

चन्देल

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