‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

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स्त्री कथालेखन : चुनिंदा कहानियाँ

>> गुरुवार, 12 नवंबर 2009







स्त्री कथालेखन : चुनिंदा कहानियाँ (1)

अमृता प्रीतम ( 31 अगस्त 1919 - 31 अक्तूबर 2005)

पंजाबी की प्रख्यात कवयित्री, कहानीकार व उपन्यासकार अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 में गुजरांवाला, पंजाब(अब पाकिस्तान में) में हुआ। वह मात्र ग्यारह वर्ष की थीं जब उनकी माता का देहान्त हुआ। फिर वह अपने पिता के साथ लाहौर आ गईं। सोलह वर्ष की आयु में इनका पहला संग्रह प्रकाशित हुआ। सन् 1947 में भारत-पाक विभाजन के समय मुस्लिम, हिन्दू और सिक्खों के हुए क़त्लेआम से क्षुब्ध होकर उन्होंने अपनी विश्वप्रसिद्ध कविता लिखी -''अज्ज आक्खां वारिस शाह नूं, कितों कब्रों विचों बोल/ ते अज किताबे इश्क दा कोई अगला वरका फोल/ इक रोई सी धी पंजाब दी, तू लिख लिख मारे वैण/ अज्ज लक्खां धीयां रोन्दियाँ, तैनू वारिस शाह नूं कहिण..।'' अपनी पुस्तक ''सुनेहे'' पर वर्ष 1956 में साहित्य अकादमी अवार्ड से सम्मानित होने वाली प्रथम महिला। वर्ष 1982 में ''कागज़ ते कैनवास'' पुस्तक पर भारतीय ज्ञानपीठ अवार्ड तथा पदमभूषण सम्मान से सम्मानित अमृता प्रीतम जी के आठ उपन्यास - 'पिंजर', 'डॉक्टर देव', 'कोरे कागज़, उनचास दिन', 'सागर और सीपियाँ', 'रंग का पत्ता' , 'दिल्ली की गलियाँ', 'तेरहवाँ सूरज' और 'यात्री', एक कविता संग्रह और दो कहानी संग्रह तथा एक आत्मकथा की पुस्तक ''रसीदी टिकट'' प्रकाशित। इसके अतिरिक्त पंजाबी साहित्यिक पत्रिका ''नागमणि'' का प्रकाशन भी किया।


कहानी
एक ज़ब्तशुदा किताब
अमृता प्रीतम
हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव



वे दोनों एक-दूसरे को आमने-सामने देखकर नीचे धरती की ओर देखने लग पड़ीं।
नीचे कुछ भी नहीं था, पर दोनों को पता था कि दोनों के बीच एक लाश है...
''सब लोग चले गए ?''
''सब लोग जा सकते थे इसलिए चले गए। माँ दूसरे बेटे के पास रहने के लिए, दोनों बच्चे होस्टल में। अब सिर्फ़ मैं हूँ, अकेली...।''
''बच्चे छुट्टियों में आएंगे, कभी-कभी माँ भी आएगी।''
''हाँ, कभी-कभी।''
''पर मेरे पास कभी कोई नहीं आएगा।''
''आज तू ज़िन्दगी में पहली बार घर के अगले दरवाजे से आई है।''
''यह दरवाजा तो तेरा था, कभी भी मेरा नहीं था इसलिए।''
''पर जब तू पिछले दरवाजे से आती थी, मुझे पता चल जाता था। उस दिन एक मर्द अपने घर में ही चोर होता था।''
''घर में नहीं, सिर्फ़ बागीचे वाली अपनी लायब्रेरी में... वहाँ मैं उसकी एक किताब की तरह हुआ करती थी।''
''पर औरत एक किताब नहीं होती।''
''होती है, पर ज़ब्तशुदा...।''
''क्या मतलब ?''
''यही कि तू शादीशुदा थी, मैं नहीं।''
एक औरत ज़ोर से हँस पड़ी। शायद उसका सारा रुदन हँसी की योनि में पड़ गया। वह उस दूसरी औरत को कहने लगी, ''इसलिए आज मैं विधवा हूँ, तू नहीं...।''
''मेरा हक न पहले लफ्ज़ पर था, न दूजे पर।''
''तूने मुझसे बस ये दो लफ्ज़ नहीं छीने, बाकी सब कुछ छीन लिया।''
''एक और भी है तीसरा लफ्ज़ जो सिर्फ़ तेरे पास है, मेरे पास नहीं।''
''कौन सा ?''
''उसके बच्चे की माँ होने का।''
''तीन लफ्ज़, सिर्फ़ तीन लफ्ज़... पर वह खुद इन तीन लफ्ज़ों से बाहर था।''
''इसीलिए खाली हाथ था।''
''पर इन लफ्ज़ों के सिवा उसके पास मुहब्बत के सारे लफ्ज़ थे।''
''हाँ, पर जब ये तीन लफ्ज़ ज़ोर से हँसते थे, ज़िन्दगी के बाकी लफ्ज़ रो पड़ते थे।''
''तूने ये भी उससे मांगे थे ?''
''नहीं, क्योंकि मांगने पर मिल नहीं सकते थे।''
''अगर मिल जाते, तू आज मेरी तरह विधवा होती...।''
''अब भी हूँ।''
''पर सबकी नज़र में कुआँरी।''
''छाती में पड़ी हुई लाश किसी को नज़र नहीं आती।''
''पर मेरी छाती में उस वक्त भी उसकी लाश थी, जब वह जीवित था।''
''हाँ, समझती हूँ।''
''मैं तब भी एक कब्र की तरह ख़ामोश थी।''
''शायद, हम तीनों ही कब्रों के समान थे। एक दूसरे की लाश को अपनी-अपनी मिट्टी में संभाल कर बैठी हुई कब्रें...।''
''शायद। पर अगर तू उसकी ज़िन्दगी में न आती...''
''कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।''
''कैसे ?''
''फिर वह खाली कब्र की तरह जीता।''
''शायद, शायद नहीं।''
''उसने अन्तिम समय कुछ कहा था ?''
''कुछ नहीं, सिर्फ़...।''
''अब जो कुछ तुझसे गुम हुआ है, वह मुझसे भी गुम हो चुका है। इसलिए जो कुछ उसने कहा था, मुझे बता दे।''
''कुछ नहीं कहा था। बस, जब कोई कमरे में आता था, वह आँखें खोल कर एक बार ज़रूर उसकी ओर देखता था, फिर चुपचाप आँखें मूंद लेता था।''
''शायद, वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।''
''शायद...।''
''तूने मुझे बुलाया क्यों नहीं था ?''
''घर में उसकी माँ थी, उसका छोटा भाई था, बच्चे भी... मैं सबकी नज़र में उसको बचाना चाहती थी।''
''क्या खोया, क्या बचाया, इसका हिसाब लग सकेगा ?''
''मैंने जो खोना था, खो चुकी थी। मुझे अपना ख्याल नहीं था।''
''तूने ठीक कहा था, अगर मैं उसकी ज़िन्दगी में न आती...।''
''मैं नफ़रत के दुख से बच जाती... और शायद दूसरे दुख से नहीं बच सकती थी।''
''दूसरा दुख ?''
''खालीपन का... शुरू से ही जानती थी, पाकर भी कुछ नहीं पाया। वह मेरे बिस्तर में भी मेरा नहीं होता था। खाली-खाली आँखों से शून्य में देखता रहता था।''
''फिर तो तुझे तसल्ली होती होगी, अगर वह अन्तिम समय में भी सिर्फ़ शून्य में देखता ?''
''शायद होती... यह तसल्ली ज़रूर होती कि उसकी लाश पर सिर्फ़ मेरा हक है... पर अब...।''
''अब ?''
''लगता है, तूने उसकी लाश भी मुझसे छीन ली है।''
''सिर्फ़ लाश...।''
''नहीं, उसे भी छीना था, जब वह जिन्दा था।''
''वह अकेला कभी नहीं था। उसके अन्दर तू भी शामिल थी, बच्चे भी... मैंने जब भी उसे पाया, तेरे और तेरे बच्चों समेत पाया।''
''पर जब तू उसके करीब होती होगी, उस वक्त उसके जेहन में न मैं होती होऊँगी, न बच्चे...।''
''कुछ चीज़ों को याद नहीं करना होता, वे होती हैं, चाहे दीवार से परे हों, पर इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता।''
''उसने तुझे यह बताया था ?''
''यह कहने वाली या पूछने वाली बात नहीं थी। जब वह कभी अकेला होता तो शायद पूछ लेती।''
''पर वहाँ लायब्रेरी में वह सदैव तेरे पास अकेला होता था।''
''वहाँ उसकी बीवी एक खुली किताब-सी होती थी और बच्चे भी, किताब की तस्वीरों की तरह...।''
''और तू ?''
''मैं एक खाली किताब थी जिस पर उसने जो इबारत लिखनी चाही, कुछ लिख ली...।''
''तन की इबारत भी ?''
''हाँ, तन की इबारत भी... पर वह बहुत देर बाद की बात है।''
''बहुत देर बाद की ? किससे बहुत देर बाद की ?''
''मन की इबारत लिखने से बहुत देर बाद की।''
''क्या उस वक्त भी मैं एक खुली किताब की तरह उसके सामने होती थी ?''
''हाँ, होती थी... इसलिए वह हमेशा एक कांपती हुई कलम की तरह होता था।''
''वह बच्चों को बहुत प्यार करता था।''
''हाँ, इसलिए उसने अपना दूसरा बच्चा दुनिया से लौटा दिया था।''
''दूसरा बच्चा ?''
''वह मेरी खाली किताब में एक फटी हुई तस्वीर जैसी बात है।''

दोनों गहरी चुप्पी में खो गईं। पहली खुली हुई किताब की भाँति और दूसरी खाली किताब की तरह... फिर पहली ने एक ठंडी साँस भरते हुए कहा, ''पर आज तू मेरे पास क्यो आई है ?''
''क्यों ? पता नहीं...''
''मैं ही तो तेरे रास्ते की दीवार थी।''
वह दूसरी, पहली के कंधे पर सिर रख कर रो पड़ी, कहने लगी, ''शायद इसलिए कि जब कोई बहुत अकेला होता है, उसे किसी दीवार से सिर लगाकर रोने की ज़रूरत होती है।''
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3 टिप्पणियाँ:

Chhavi 14 नवंबर 2009 को 3:22 am  

अमृता जी की कहानियां जितनी बार पढो, हर बार एक नया एहसास ही दे जाती हैं.
उनकी यह कहानी पहले भी पड़ी थी, पर आज भी वो एक ताजी हवा सी लगती है..
शुक्रिया नीरव जी...

Roop Singh Chandel 17 नवंबर 2009 को 9:50 pm  

भाई सुभाष

भाषा और शिल्प में दार्शनिकता का पुट लिए अमृता जी की यह कहानी नारी जीवन की विद्रूपता को अत्यंत गहनता और मार्मिकता से उद्घाटित करती है. नारी के शोषण का जीवंत दस्तावेज बन गयी है यह कहानी.

तुम्हारा अनुवाद श्लाघनीय है. अब तक जो लोग भी पंजाबी से हिन्दी अनुवाद करते रहे हैं तुम्हारे अनुवाद उनसे विशिष्ट होते हैं . इसका कारण शायद यह है कि तुम व्यासायिक कारणॊं से अनुवाद न करके स्वेच्छाया करते हो.

चन्देल

shail 22 जून 2011 को 3:28 pm  

अमृता जी की मैं दीवानी प्रशंसक रही हूं। पानी सी रिसती हैं उनकी रचनाएं। यह कहानी भी अपवाद नहीं। धन्यवाद और बधाई सुभाष जी इतने सहज अनुवाद के लिए।

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प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

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