‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

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पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर

>> मंगलवार, 3 अप्रैल 2012


पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर(5)


चूडे वाली बांह
जसवीर सिंह राणा

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

दिमाग में बन रही तस्वीर की ओर देखते हुए मैंने माचिस को तीली छुआ दी।
जीभ पर रखी कपूर की टिकिया लप-लप जल उठी। मैंने जीभ और बाहर निकाल ली। नाक के ऊपर से फिसलती नज़र आग की लपट पर जा टिकी। टांगों में जान भर गई। नसों में खून दौड़ने लगा। लपट की तरह लहकती औरत मेरी जीभ पर नाच रही थी। मैं खुशी में झूम उठा। मन में एक तरंग सी उठी। बांहें हवा में लहरा उठीं। पर साली खाँसी छिड़ गई। कपूर की टिकिया फिसलकर धरती पर जा गिरी। जीभ तालू से जा चिपकी। साँस था कि उखड़ता ही चला गया। मैं चारपाई पर जा गिरा। शरीर सांपिन की तरह बल खाने लगा। जब खाँसी टिकी, मैंने धीरे-धीरे ऑंखें खोलीं। दिल गा उठा, ''रन्न नहा के छप्पड़ चों निकली... सुलफे दी लाट वरगी...।''
आग की लपट में से औरत देखने की जुगत मैंने राम आसरे से सीखी थी। बड़ा स्कीमी बन्दा था वह। मुझे अक्सर समझाता रहता, ''जैसे ही दिमाग में तस्वीर बने, जीभ पर आग जला लिया कर।... ज्यों ही लौ में से नाचती औरत नज़र आने लगे... तो समझ ले तुझे राम का आसरा मिल गया...।''
उसकी बात सुनकर मैं उससे भी ज्यादा जोर-जोर से हँसने लग पड़ता।
जिस दिन बहुत उदास होता, मैं राम आसरे के पास जा बैठता। वह बान की ढीली-सी चारपाई पर लेटा पड़ा होता। चारपाई पर लेटे-लेटे बीड़ी पीना उसका स्टाइल था। मुझे बैठने का इशारा कर वह एक लम्बा-सा कश खींचता और फिर धुआं ऊपर की ओर छोड़ देता। जब धुआं नीम के पत्तों से टकराता, वह थूक की पतली धार धरती पर दे मारता और कहता, ''बग्गे !...अब तो साली नीम की छांह भी कड़वी लगने लग पड़ी...।''
''हाँ...'' मुझे पकड़ाई बीड़ी का कश खींचकर मैं उसे वापस कर देता। आखिरी कश खींचने से पहले वह मुझे एक जादूगर की तरह कहता, ''ले, अब मेरी ऑंखों में देखना... धुआं निकलेगा।''
मैं टकटकी बांध लेता। राम आसरा मुझे शिवजी की तरह लगने लगता। उसके नथुनों में से निकलती धुएं की लकीरों के साथ मेरी नज़र उसकी ऑंखों में धँसने लगती। ठीक इसी पल वह बीड़ी का जलता हुआ सिरा मेरे हाथ को छुआ देता।
''ओए... तेरी माँ...!'' मेरी चीख गाली में बदल जाती।
''न, न बग्गे ! गाली मत निकाल ऐसे... ये तो साले अपनी जुगतें हैं!... तू तो बीड़ी के सेक से ही तड़फ गया... इधर देख, यहाँ नागिन डंक मारती है, नागिन !...'' नागिन के डंकों से डसी जीभ बाहर निकालते हुए राम आसरा नीली हुई गर्दन पर हाथ फेरने लगता।
वह मेरा यार था। हमारी कई रगें साझी थीं। मेरा बाप नेक नशेड़ी काली नागिन का आशिक था। वह सारी ज़मीन अफीम की भेंट चढ़ाकर मरा। ज़मीन बगैर हमारी गति नहीं हुई थी। जब तक माँ जिन्दा रही, रोटी की खातिर मैं बिरादरी वालों की मेंड़ों पर फिसलता रहा। जिन दिनों गेहूं-जीरी(चावल) की फसल काटकर खोबड़ों में आग लगाई जाती, हाथों में माचिस थामे मैं आसमान की ओर उठते धूएं को देखता रहता। मेरी तन्द्रा उस वक्त टूटती जब शहर में दिहाड़ी करके लौटा राम आसरा ऊँची आवाज में गाता हुआ सड़क पर से गुजर जाता, ''इक जट्ट दे खेत नूं अग्ग लग्गी... देखां आके कदों बुझावंदा ई....।''
उसकी तुक सुनकर मुझे घबराहट होने लगती। मेरी नज़र फटने लगती। खत्तों की आग सड़क पर जा चढ़ती। फिर, घरों की तरफ दौड़ने लगती। माचिस जेब में ठूंस, मैं तेज कदमों से गाँव की ओर चल पड़ता। जैसे ही, बस-अड्डे की चौकड़ियों के निकट पहुँचता, सामने से आता मीता टकरा जाता। मुझे देखते ही वह कहने लगता, ''वहाँ आग लगाकर छोड़ आया तू... थोड़ा ठहरकर वहाँ से चलता।... घर जाकर क्या तूने आग बुझानी है !''
मेरा अन्दर जल उठता। पहले तो दिल में आता कि साले के पजामे में आग लगाकर रावण की तरह फूंक दूँ। सीता की तरह हमारी सारी ज़मीन चुरा कर ले गया था। पर दूसरा ही पल मेरे हाथ बांध देता। कितने सितम की बात थी ! क्ई बार जब किसी दूसरे के यहाँ काम न मिलता, मुझे विवश होकर मीते के उस खेत में ही काम करवाना पड़ता जो कभी हमारा हुआ करता था।
''नहीं बग्गे !...अब यहाँ तेरा कुछ नहीं।... हाँ, एक मर्जी ही है जो सिर्फ तेरी है। मैं तो कहता हूँ, छोड़ शरीको को... मर्जी का मालिक बन यार !...आ जा, मेरे साथ चल।'' राम आसरे की बात मानकर मैं उसके संग शहर में दिहाड़ी पर जाने लग पड़ा था।

सूरज चढ़ते ही हम साइकिल उठा शहर के लेबर-चौक में जा खड़े होते। कई बार तो दिहाड़ी मिल जाती, पर कई बार हम जानबूझकर दिहाड़ी पर न जाते। राम आसरा दलील देता, ''न कोई तेरे पीछे है, न मेरे।... फिर यूं ही किसके लिए खून-पसीना बहाते हैं।... चल, आज खोखे पर बैठकर ऑंखें सेंकते हैं।''
खोखे पर शाम तक चाय के कई दौर हो जाते। बीड़ी सुलगती रहती। चौक में से गुजरती एक-एक औरत का चेहरा हमारे दिमाग में अंकित होता रहता। रोटी की भूख से अधिक कोई दूसरी भूख ही हमें तंग करती रहती। जिस दिन मैं राम आसरे के साथ फिल्म देख आता, उस दिन तो हालत अजीब हो जाती। सारी रात उसके पास ही बैठा रहता। गई रात तक हम दोनों आग की लपट में नाचती हुई औरत देखते रहते। जब हर चेहरा मध्दम पड़ने लगता, राम आसरा चिलम में सुल्फा भर लेता। हर सुट्टे के साथ दिमाग में 'गिध्दा' पड़ने लगता। जब नशा हावी हो जाता, कहीं दूर से आती आवाज सुनाई देती-
''रन्न(औरत) नहा के छप्पड़ विचों (पोखर में से) निकली... सुल्फे की लाट वरगी...।''
गा तो राम आसरा रहा होता, पर आवाज मुझे ताया की लगती। वह भी बहुत बड़ा सुल्फेबाज था। बदमाश किस्म का बंदा ! बदमाशियों के कारण चढ़ती उम्र में बाबा ने उसे घर से निकाल दिया था। जब अधिक तंग करने लगा, बाबा ने उसकी ज़मीन का हिस्सा उसे दे दिया। पर विवाह से पहले ही उसके अन्दर एक अजगर पैदा हो गया। वह ज्यादातर ज़मीन निगल गया। जब औरत की कमी उसको अन्दर ही अन्दर खाने लगी, वह घर की तलाश में भटकने लगा। राम आसरे का बापू बान बंटने का काम करता था। कई बार ताया शराब के नशे में कहने लगता, ''यार कोई ऐसी रस्सी बंट जिससे घर बांधा जा सके...।''
उसकी बात सुनकर राम आसरे का बापू रुआंसा हो उठता, पर ऊपरी तौर पर जोर से हँसने लगता, ''ओए, इन रस्सियों से तो खाट मुश्किल से बंधती है। घर बांधने वाली रस्सियाँ तो दूसरी ही होती हैं।...''
''अच्छा !... ठीक है... ठीक है।'' जल्दी-जल्दी सिर मारता ताया सोच में पड़ जाता मानो उसे सारी बात समझ में आ गई हो।

पहले पहले मुझे एक बात समझ में नहीं आती थी। वह यह कि ताया कुत्तों के पीछे क्यों पड़ता था। जैसे ही गली में कोई कुत्ता नज़र आता, वह बेचैन हो जाता। उसकी ऑंखें ईंट-पत्थर का टुकड़ा खोजने लगतीं। उस वक्त तो वह पागल हो जाता था, जब वह किसी कुत्तिया के पीछे कुत्तों का समूह चलते हुए देखता। बस, फिर तो ताया का हाथ होता, बारह पोरी की लाठी होती। गली में गूंजती ललकार कुत्तों को सरपट भागने को मजबूर कर देती। जब फेंककर मारी लाठी भागते कुत्तों की टांगों पर बजती, दूर तक 'चऊँ-चऊँ' की आवाज गूंजती चली जाती। ऑंखें लाल किए खड़ा ताया बहुत देर तक बड़बड़ाता रहता, ''साला, वो कुत्ता भी ज़रूर इन कुत्तों में ही है...।''
दानी को वह कुत्ता कहता था। वह कुत्ता जो उसकी घरवाली को भगाकर ले गया था। ज़मीन का अन्तिम टुकड़ा बेचकर ताया 'मोल की औरत' ले आया था। खरीदते समय दानी भी उसके संग गया था। पैसे तो ताया ने दिए, पर वह औरत दानी को दिल दे बैठी। जिस दिन वह भागी, उस दिन से ही ताया ने बैठक के इर्दगिर्द रस्सियाँ बांध-बांधकर कहना प्रारंभ कर दिया था, ''मेरा बंधा हुआ घर खुल गया यार... एक मिनट ठहरो... पहले बांध लूं इसे। फिर देता हूँ रोटी। पर, ये थाली में तो छेद हुआ पड़ा है।... वो जा रहा है कुत्ता !... लाना तो ज़रा लाठी...।''
''हाँ, मैंने गिराया था एक लाठी से। साला एक कुतिया के पीछे-पीछे जाता था। ये गुनाह माफी के लायक नहीं।... इसको सजा मिलेगी।'' उस दिन ज़ख्मी किए कुत्ते को घसीटे लिए जाता ताया ऊँचे स्वर में बोल रहा था।
मैं और राम आसरा उसके पीछे-पीछे चले जा रहे थे। हमारे बिके हुए खेतों में खड़ी शीशम के नीचे जाकर वह रुक गया। उसकी नज़र हमसे मिली। राम आसरे ने कमर में बांधी मजबूत रस्सी खोलकर ताया की ओर बढ़ा दी। अगले ही पल फांसी के फंदे में फंसा कुत्ता शीशम से लटक रहा था। एक पल के लिए मुझे उसकी शक्ल मीते जैसे प्रतीत हुई। उसकी बाहर निकली जीभ की ओर देख-देखकर ताया जोर-जोर से हँस रहा था, ''इस कुत्ते की मौत में मेरी जान छिपी हुई है।''

''कुत्ते की मौत मर गया बेचारा !'' जिस रात कुत्तों के झुंड के पीछे भागता ताया खारा कुएं में गिर कर मरा, मैं और राम आसरा जोर-जोर से रो रहे थे।
सबसे अधिक मैं उस दिन रोया था, जिस दिन राम आसरा मरा। उस दिन हम शहर तो गए थे लेकिन दिहाड़ी पर नहीं गए थे। कुछ दिन पहले हम दोनों को एक घर में दिहाड़ी का काम मिला था। वहाँ दिन-रात मकान बनाने का काम चल रहा था। एक रात जब हम टूटी पर पानी पीने गए, हमें उस घर के बाथरूम में नहाती हुई औरत दिखाई दे गई। दरवाजे की फांकों में से देखी चमक ने हमारी ऑंखों को अंधा कर दिया। हम दिहाड़ी करना भूल गए। काम को बीच में ही छोड़ हम चुपचाप अपने गाँव में आ घुसे। मैं आग की लपट में से वो चमक देखना चाहता था, पर राम आसरा था कि दिल पकड़ कर बैठ गया। बोला, ''मेरे तो यहाँ कुछ डस गया आज...।''
दिमाग में उस औरत की तस्वीर बनाकर देखने के बाद जब मैं चिलम का कश खींच रहा था, धुंधली ऑंखों से मैंने देखा- राम आसरा नई पकड़ी नागिन को टोकरी में से निकाल रहा था। जब से उस पर हर तरह के नशे ने असर करना बंद कर दिया था, तब से वह जीभ पर नागिन का डंक मरवाने लग पड़ा था। पूरा गाँव उससे दूरी बनाकर रहने लग पड़ा था। जहाँ कहीं भी कोई साँप या साँपिन देखी जाती, वहाँ सपेरे के स्थान पर राम आसरा जा पहुँचता। बस, कुछ मिनटों की जद्दोजहद होती, जानवर हार जाता, उसका डंक राम आसरे का पालतू बन जाता। जब दिल भर जाता, वह उसे मारकर नया जानवर पकड़ लाता। पर उसका डंक वह उस वक्त ही मरवाता था, जब उसे कोई जलवा देखना होता था।
''देख बग्गे !... इधर देख.... कंजर के... यूं ही डरे जाता है।...हम उनमें से नहीं जो रस्सी को साँप समझकर डर जाते हैं। अरे, हम तो साँप को रस्सी समझने वाले बंदे हैं।...देख... देख... नागिन का पहला झटका ! ... हे... हे... हे... आ...ह...अ... च...च ।'' नई नागिन को रस्सी की भांति उठाये खड़ा राम आसरा पहले डंक पर ही लड़खड़ाने लग पड़ा था।
मेरे हाथों में से चिलम छूट गई, उसके हाथों से नागिन।
मैं उठ कर खड़ा हो गया। राम आसरा धरती पर गिर पड़ा। जब मैंने उसका सिर अपनी गोदी में रखा, उसके मुँह में से झाग बहने लगी थी। उसकी जुबान लड़खड़ाने लग पड़ी, ''साली नागिन में उस औरत से भी तीखा जहर था... एक बार तो स्वर्ग देख लिया बग्गे !... हाँ, सच... हम प्रेत बनेंगे...।''
''औरत के लिए भटकता मरा... साला जरूर प्रेत बनेगा।''
''विष-पुरुष था साला !... चिता को आग देते समय हवा देख लेना, किस तरफ की है। उसका तो धुआं भी जहर से ज्यादा जहरीला होगा।''
राम आसरे की चिता को आग देने उमड़ा सारा गाँव ही एक डरी हुई बोली बोल रहा था।
पर मैं उस दिशा में खड़ा था जिधर धुआं जा रहा था। मेरा शरीर नीला पड़ता जा रहा था।

आज दोपहर से ही गली में कुत्ते रोते हुए घूम रहे थे। धन्ना बाबा कहा करता है- ये उस वक्त रोते हैं, जब इनको प्रेत दिखाई देते हैं। तो क्या राम आसरा और ताया प्रेत बन गए थे ? नहीं...नहीं... मैं तो....।
''क्या मैं तो, मैं तो किए जा रहा है ?...अच्छा, हम चलते हैं।'' आवाज तो राम आसरे और ताया की ही थी।
पर यह कैसे हो सकता है ? मैं दुविधा में पड़ गया। दिल हुआ कि चारपाई छोड़ दूंँ, पर चारपाई थी कि मुझे छोड़ ही नहीं रही थी। मैंने करवट बदली। चारपाई ने 'चरर-मरर' की आवाज की। बिलकुल यही आवाज थी। मुझे लगा, जैसे अभी कोई चारपाई की बाही पर बैठा था और अभी-अभी उठकर आगे बढ़ गया है। मैं डर गया। चारपाई घूमने लगी। मैं और अधिक दहल गया। चारपाई के इर्द-गिर्द चुड़ैलों की 'कीकली' पड़ने लगी। वे मुझे बुलाने लग पड़ीं। पर मैं चुपचाप पड़ा रहा। कुछ पल चुप्पी छायी रही, फिर 'गिध्दा' पड़ने लगा। मेरा नाम ले-लेकर बोलियाँ पड़ने लगीं-
''मैंनूं खिच लै वे बग्गिया... खिच लै तू चूड़े वाली बांह फड़ के...।''
''बग्गे... ओ बग्गे.... आ जा... बांह पकड़ ले मेरी...।'' कई चुड़ैलें मुझे हांकें मार रही थीं।
पर मैं बिलकुल न बोला। सांस तक रोक लिया। जब दम घुटने लगा तो पड़ता हुआ गिध्दा दूर होता चला गया।
''अच्छा हुआ बोला नहीं।... नहीं तो आज ले ही जातीं।'' उलझी हुई आवाजें सुनकर मेरी तंद्रा टूट गई।
मैं गरमी में भीगा पड़ा था। मुझे याद आया, मरने से पहले राम आसरे और ताया को भी चुड़ैलें दिखाई देने लग पड़ी थीं। तो क्या मैं मर रहा...।
नहीं... नहीं... मैं इस तरह नहीं मरुँगा। मैं तो...।

''मैं तो बुझा हुआ दीप हूँ, बग्गे !'' वह यही कहा करता था।
नाम तो उसका गुरदीप था, पर कच्चा नाम दीप था। पता नहीं क्यों मुझे उसका कच्चा नाम पक्के नाम से भी अधिक पक्का लगता। मैं उसे दीप ही कहा करता।
''बुझा हुआ दीप क्यों ?... तू कहे तो तुझे लपलपाती लपट बना देते हैं।''
लेकिन वह राम आसरे की जुगतों को पसन्द नहीं करता था। वैसे भी वह मुझसे ही अधिक खुला हुआ था। जिस बस पर वह ड्राइवर था, वह हमारे गाँव में से ही होकर गुजरती थी। शहर में जिस खोखे पर हम चाय पीते थे, कई बार वह भी वहाँ आ जाता। एक-दो बार जब राम आसरा दिहाड़ी पर गया हुआ था, मन उदास होने के कारण मैं खोखे पर ही बैठा रहा। जिस समय दीप आया, वह मुझसे भी अधिक उदास दिख रहा था। जर्दे की फंकी को बांटते हुए हमारी बात चल पड़ी। कई बातें उसकी और कई बातें मेरी हमारे दिलों पर डंक मार गईं। दुख साझा था, हम अंतरंग मित्र बन गए। कई बार वह हमें बस में मुफ्त ले जाता। साइकिलों पर हमारी टांगों की तुड़वाई होने से बच जाती। वह हमें अपनी सीट के पास बोनट पर बिठा लेता। जब बस टॉप गियर में होती, वह मुझे ऊपर की ओर इशारा करता। मैं उसके सिर के ऊपर लगे शीशे की ओर देखता। उसमें पीछे बैठी सवारियाँ दिखाई देतीं। शीशा किसी सुन्दर सी सवारी पर फिट होता। मैं दीप की ओर देखता। उसके चेहरे पर कुटिल-सी मुस्कान होती। उसकी ऑंख बार-बार शीशे से टकराती। जब शीशे में कैद सवारी उतरने लगती, दीप धीमे स्वर में गाने लगता-
''तेरी अक्ख हानणे नीं
अम्बरों उड़दे पंछी लाहुंदी....।''

वैसे वह मेरी तरह ही परकटा पंछी था। मैं जन्म से छड़ा था, वह ब्याहता छड़ा था। शराब पीने के बाद वह अक्सर कहा करता ,''लो, एक रात का भी कोई ब्याह होता है?''
उसकी बात सुनकर मेरे अन्दर एक रात का भी ब्याह हो जाने की इच्छा पैदा होने लगती। मेरे अन्दर उल्टे-सीधे विचार उठने लगते। दिमाग में सवालों-जवाबों की लड़ी चलने लगती। दीप की तलाकशुदा घरवाली का विवाह क्या मेरे साथ नहीं हो सकता ? वह अपने बड़े भाई की घरवाली का आशिक क्यों था ? उसका विवाह उसके साथ क्यों नहीं हुआ ? यदि पहली रात ही दीप को अपनी घरवाली में अपनी भाभी नहीं मिली तो दोष किसका था ? ये जायज़ रिश्ते नाजायज़ होते हैं या नाजायज़ रिश्ते जायज़ ? मेरी समझ में कुछ न आता। मैं दीप की तरह उलझ जाता। उलझन में फंसा वह अजीब किस्म की बेबसी जाहिर करने लगता, ''जब और कोई बात न हो सकी, मेरा मेरी घरवाली से तलाक हो गया। घरवालों ने मुझे घर से बाहर निकाल दिया। पर मैं छाती ठोंक कर कहता हूँ कि उस औरत में औरत नहीं थी।''
''आदमी तो सबकुछ छोड़ देता है, पर आदमी को कुछ नहीं छोड़ता बग्गे !'' दीप की यह बात मेरे ऊपर एक वजन की भांति गिर पड़ती।
मेरे लिए सांस लेना कठिन हो जाता। मैं ऑंखें बन्द कर लेता। दीप पैग पर पैग चढ़ाने लगता। नशा बढ़ने से मेरा दिमाग घूमने लगता। दीप की घरवाली। उसकी भाभी। ताये की भागी हुई औरत। शीशे में से दीखती सवारियाँ। और बाथरूम में नहाती औरत ! एक-एक शै ऑंखों में उतरने लगती। कभी लगने लगता, मानो मैं गिध्दा डाल रहा होऊँ। कभी लगता, मानो भोंकने लगा होऊँ। जब होश आता, मुझे अपने आप में से एक गंध आने लगती। लम्बे-लम्बे सांस भरता मैं राम आसरे के साथ गाँव को जाती सड़क पर चलने लगता।
दीप के गाँव को जाती सड़क की धूल मुझे सुरमे जैसी लगती थी। पर वह खुद कभी कभी ही गाँव जाता था। अधिकतर ढाबों पर ही रातें गुजारता। जिस दिन दिल में हौल उठता, वह शराब से भरापूरा उस घर में जा घुसता, जहाँ उसका घर नहीं था। जबरदस्त झगड़ा होता। वह तड़के ही पहली बस पकड़ अपनी बस की ओर चल पड़ता। पर उस दिन वह चला नहीं था, दौड़ा था। कुछ रात का नशा था, पर टेंशन ज्यादा थी। जब खड़ी हुई बस चल पड़ी, अपनी आदत के अनुसार वह चलती बस के आगे वाली खिड़की को पकड़ने के लिए दौड़ा। बस की गति तेज हो गई थी। उसका हाथ छूट गया। जब बस रुकी, वह पिछले टायरों के नीचे से निकलकर सड़क पर बिछ गया था। खबर सुनकर मैं और राम आसरा भी लाश देखने गए थे। बाहर निकली ऑंखों से वह ऐसे देख रहा था मानो शीशे में दिखती सवारी को देख रहा हो। पता नहीं किसकी ऑंख ने उसे अम्बर पर से उतार लिया था। उस रात मुझे बड़ा डरावना सपना दिखाई दिया था। सपने में रात भर ऐसी बस चलाता रहा, जिसके कोई टायर ही नहीं था।
जब ऑंख खुली, पहले तो दीप की घरवाली याद आई। फिर, वह याद आया। मेरी आह निकल गई- ''तू भी बस, यूं ही चला गया वैरी !''
''छड़े बंदे की यही होनी है पुत्त !'' शायद ताया बोला था।
नहीं, गली में कुत्ता भौंका था। मैं द्वंद में पड़ गया। ध्यान से सुनने की कोशिश की। गुरद्वारे का पाठी पाठ कर रहा था। समझ में नहीं आया, यह क्या हो रहा था ? मैं तो अभी जीवित था। फिर मरने से पहले ही मेरा भोग क्यों डाला जा रहा था ? मेरा दिल बैठने लग पड़ा। सांसें धौंकनी की भांति चलने लगीं। अन्दर से कोई चीज गले की ओर रेंगने लग पड़ी थी। मैंने चारपाई के सिरहाने के नीचे हाथ मारा। कोई भी दवा हाथ न लगी। नशे वाले टीके भी खत्म हो गए थे। कपूर की टिक्की वाली जुगत भी आखिरी टीका लगाकर खेली थी।
''बाबुल, मेरी गुड़ियां तेरे घर रह गईं....।'' डोली में बैठा जाता राम आसरा फिर दिखाई देने लग पड़ा।
वह गा रहा था। साथ ही, हाथ में पकड़ी नागिन को रस्सी की तरह लपेटे भी दे रहा था। मेरा ताया और दीप दोनों अर्थी को उठाकर ले जा रहे थे। उनके पीछे मैं कुत्तों के संग चला जा रहा था। ज्यों ही अर्थी श्मसानघाट में प्रवेश करने लगी, मैं दूर भाग गया। कुत्ते मेरे पीछे पड़ गए। उन्होंने मेरी टांगे-बांहें फाड़ दीं। हवा में दुर्गन्ध फैलने लगी।
मैंने अपना नाक ढक लिया। पर गंध अभी भी आ रही थी। टीके लगाकर छलनी हुई टांगें और बांहें साथ छोड़ रही थीं। मेरा दम घुटने लगा। मैं लम्बे-लम्बे सांस भरने लग पड़ा। ठीक वैसे, जैसे श्मसानघाट में लिया करता था।
श्मसानघाट वाली घटना हर तीसरे दिन घटा करती थी। शहर में दिहाड़ी लगाकर मैं शाम को गाँव की तरफ लौट पड़ता। जिस स्थान पर दीप का एक्सीडेंट हुआ था, वहाँ पहुँचकर मेरा साइकिल धीमा होने लगता। पीछे से झांझरों के छनकने का स्वर उभरने लग पड़ता। मैं साइकिल रोक लेता। हवा में से हँसने की आवाज आती। मैं सिर घुमाकर पीछे झांकता। लाल सूट पहने एक लड़की चली आती दिखाई देती। मेरी दिन भर की थकान उतर जाती। वह करीब आकर खड़ी हो जाती। मैं बोलना भूल जाता।
''मुझे ये तरखाण माजरे तक ही ले चल।'' वह मेरे जवाब की प्रतीक्षा किए बगैर पीछे कैरिअर की बजाय आगे वाले डंडे पर उचक कर बैठ जाती।
मैं साइकिल की रेल बना देता।
पूरे रास्ते वह कुछ न बोलती। मैं उसका साथ पाकर आनन्द में डूबा वैसे ही कुछ न बोलता।
तरखाण माजरा दीप का गाँव था। गाँव के आते ही उसकी गोरी-चिट्टी बांह हरकत में आती। चलता हुआ साइकिल अचानक उलटा हो जाता। सड़क पर गिरा मैं ऑंखें फाड़-फाड़कर देखने लगता।
सिर रहित उस लड़की का धड़ अंधेरे में गुम होता चला जाता।
मेरी चीख निकल जाती। साइकिल उठा ज्यों ही भागने लगता, ''भागकर कहाँ जाएगा, बग्गे... मैं तो सारी सड़क पर ही बिछा हुआ हूँ...'' दीप की यह आवाज सड़क पर दूर-दूर तक गूंजती चली जाती।

''इस तरह के सीन दिखना और आवाजें सुनाई देना एक मानसिक बीमारी है। बाकी, मैं दवा लिख देती हूँ।'' खूबसूरत लेडी डॉक्टर की आवाज मेरे कानों में मिश्री घोलती चली गई थी।
मन का वहम दूर करने के लिए एक दिन मैं चैकअप करवाने चला गया था। ब्लॅड-प्रैशर चैक करने के लिए जब उसने मेरी बांह पकड़ी, मैं घोड़े जैसा हो गया। जब वह दवा की पुड़िया पकड़ाने लगी, मेरे मुख से अनायास ही निकल गया, ''बस जी!... अब दवाई की ज़रूरत नहीं...।''
घर पहुँचकर सारी रात मैं बांह का वह हिस्सा चूमता रहा था, जिस हिस्से को लेडी डॉक्टर ने पकड़ा था। उसके स्पर्श में फूलों जैसी खुशबू थी। वो खुशबू सूंघने के लिए मैंने बांह को अपनी नाक से छुआ लिया। पर मेरा अन्त:करण जलता चला गया। मैं उदास हो उठा। आंगन का सूनापन खाने को आने लगा।
''फूल खाने के लिए नहीं, सूंघने के लिए होते हैं।'' मेरी समस्या सुन, बालों में फूल टांके बैठी डॉक्टर मुस्कराई थी।
उसकी मुस्कराहट की धार बहुत तीखी थी। ज़ख्मी हुआ मैं फिर श्मसानघाट जा पहुँचा। वहाँ मन लगता था। बंदे का आखिरी ठिकाना फूलों की सेज बना पड़ा था। पक्के रास्ते। सीमेंट के बेंच। शैडों पर फूलों लदे बूटे। मैं एक बेंच पर बैठ मुर्दे जलाने वाले शैड की तरफ देखने लगा, पर उधर अधिक देर तक देख न सका। फटाफट उठा। जेब में से सेंट वाली शीशी निकाली और फूलों पर स्प्रे करने लग पड़ा। पर खुशबू पता नहीं कहाँ चली गई थी। मैंने सारी शीशी छिड़क दी लेकिन, खुशबू की जगह अजीब-सी बास। मैं पागल होने की स्थिति में पहुँच गया। सेंट की शीशी दूर फेंक दी। फूलों को तोड़-मरोड़ कर खाने लग पड़ा।
मुझे लगा जैसे कोई चारपाई के नीचे घुसकर बान की रस्सियाँ खोल-खोलकर खा रहा था। मानो कुत्ते जैसा कुछ मेरे अन्दर घुस गया था। और मानो सड़क की तारकोल मेरे ऊपर बिछती जा रही थी।
मैं बंद हो रही ऑंखों को खोलने की कोशिश करने लगा।
पर ऑंखें थीं कि...
''रे, तेरी तो ऑंखें भी गीली न हुईं, कोढ़ी ! रो ले, तेरा भाई था वो...।'' केसर की लाश पर गिरी पड़ी माँ विलाप कर रही थी।
जिस दन वह मरा, मैं ज़रा भी नहीं रोया था। ऐसी बात नहीं कि मुझे दुख नहीं हुआ। बड़ा दुख हुआ था। पर, पता नहीं क्यों मुझे रोना नहीं आया। कोई केसर की मौत से भी बड़ा दुख मेरे ऑंसुओं को पी गया था। बैठक में दीवार से पीठ टिकाये बैठा मैं फ्रेम में जड़ी उसकी फोटो वाला अखबारी लेख देख रहा था जिसमें लिखा था- ''चलता-फिरता मैरिज ब्यूरो - केसर सिंह नसराली।''
पर खुद वह छड़ा मरा और मुझे छड़ा मरने लायक छोड़ गया।
बड़ा अजीब केस था। सारे गाँव के आनंद-कारज (विवाह) करवाने वाले भाई जी का आनंद-कारज करवाने वाला कोई नहीं मिला था। वैसे, केसर हर वक्त कुछ खोजता-सा रहता था। मैं पूछता, ''क्या खो गया तेरा ?''
''अगर कुछ खोया नहीं तो खोजने में क्या हर्ज है।'' वह उल्टा ही जवाब देता।
सगे भाई होकर भी पता नहीं क्यों हमारी आपस में बनती नहीं थी। पता नहीं, हम किसका गुस्सा एक -दूसरे पर उतारते रहते थे। अगर केसर अन्दर होता तो मैं बाहर चला जाता। अगर मैं अन्दर होता तो वह दरवाजे की चौकड़ियों पर जा बैठता। पीछे बैठी माँ कलपती रहती, ''किस्मत तो मेरी जल गई... नाशपिटा, कोई भी ठीक न निकला।''
उसके कहे अनुसार सारा आवां ही ऊत गया था। पहले बापू का अमल(नशा), फिर टब्बर का बेज़मीन होना। और फिर हमारा छड़े रह जाना। ये सब माँ का न टूटने वाला दुख बन गया था। पहले तो वह इन दुखों से टक्कर लेती रही, पर बाद में उसके दिमाग में फर्क आ गया। फर्क उसकी मौत के साथ ही मिटा था। जिस दिन वह मरी, मैं अकेला रह गया था। केसर तो उससे पहले ही जा चुका था।
''मैं अब किधर जाऊँ ?'' मैं दिन रात सोचता रहता।
पर कोई ठौर नज़र न आती। एक जो थी, वह भी 'न हुई' बन गई थी। चन्नी का ख्याल आते ही मेरे मुख से गालियाँ निकलने लगतीं, ''कंजरी, साली !''
उसका प्यार तो पैसे के साथ था। तगड़े की छाती पर नागिन की तरह लोटने लगी। मेरे जैसा नंग उसका क्या लगता था। मैं जब भी जाता, वह गालियाँ बकने लग पड़ती। अगर कभी मन में आता, डंक मार देती। नशा तो उसमें बहुत था। पर जो बदचलनी वह करती, उससे सारा नशा जहर बन जाता था। अजीब किस्म की बेचैनी मेरा अन्दर फूंकने लगती। मैं रात-रात भर स्वयं को लाहनतें देता रहता, ''हराम का होगा अगर फिर कभी उसके घर में जाए...।''
''जिसका अपना घर नहीं होता, उसे बेगाना घर भी नहीं संभालता।'' शराब पीने के बाद ताया अक्सर कहा करता था।
माँ और बापू उसके साथ वही कुत्तेखानी करते थे, जो चन्नी मेरे साथ करती थी। हारकर मैंने राम आसरे की शरण ली थी। लेकिन माँ को मेरा उसके पास जाना अच्छा न लगता। वह रोकती रहती, ''रे बग्गे ! उसके पास न जाया कर।... वह तो मरजाणा विष पुरुष है। बरबाद हो जाएगा तू भी...।''
''और नहीं तो जात-कुजात तो देख ले, साले।'' मुझे रोकने में केसर भी आगे आ जाता था।
पर मुझे न रुकना था, न मैं रुका। मैं तो वहाँ जा पहुँचा था, जहाँ सब जात-गोतों का दुख एक बन जाता है। मेरे अन्दर कोई चीज थी जो मुझे फिरकी की भांति घुमाए रखती। वह चीज केसर के अन्दर भी घूमती रहती। तभी तो वह भी घर में नहीं बैठता था।
''ये घर है ?... तुम्हारी माँ का सिर !'' खीझा हुआ केसर सुबह-सवेरे ही खन्ने की ओर चल पड़ता।
मैं बिरादरी के लोगों के खेतों में काम करवाता घूमता रहता। केसर को यह बात बुरी लगती थी। वह बड़बड़ाता-सा रहता, ''साला, टुच्चा-कमीना! अच्छा लगता है, वहाँ शरीकों के खेतों में मजदूरी करता हुआ ?''
और मैं करता भी क्या। मेरे अन्दर एक ऐसा आदमी पैदा हो गया था जो कोई भी काम कर सकता था। जिन दिनों घुटनों के दर्द ने माँ को बिस्तर से लगा दिया था, मैं ही सब कुछ संभालता था। कपड़े धोता। बर्तन मांजता। जिस वक्त रोटी बनाने बैठता, लोगों के घरों में बन रहे परांठों की उठती महक मेरी रोटियों को आड़ा-तिरछा कर जाती। दाल-सब्जियों को लग रहा तड़का मुझे अन्दर तक छलका जाता। चूल्हे की आग देह में चढ़ने लगती। मोटी-मोटी रोटियाँ थाप कर मैं काम खत्म कर देता। कई बार तो रात की उतारी से ही सुबह का काम चलता। बिस्तर पर पड़ी माँ ताजी रोटियाँ उतारने को कलपती रहती। पर रात की बची रोटी को गरम करता हुआ केसर जोर-जोर से हँसकर कहता, ''कहते हैं- सिक्ख ने सिक्ख को मारी अक्ख... चक कड़ाही अन्दर रक्ख... तड़के उठकर नहाएंगे... तत्ती(गरम) करके खाएंगे।''
रोटी पर नमर्क-मिर्च छिड़क कर उसके ग्रास चाय के घूंट से गले से नीचे उतार कर वह बैठक में जा घुसता। मैं चोर निगाहों से देखता, वह दीवार से टंगे शीशे के सामने खड़े होकर पगड़ी बांधने लगता। मेरा हाथ सिर पर बंधे अंगोछे पर फिरने लगता। केसर मुँह में पगड़ी का एक सिरा दबाकर पहला पेच लगाने के बाद गोल गोल फेरे पर फेरा दिए जाता। पगड़ी इस तरह गोलाकार बन जाती मानो सिर पर स्कूटर का टायर रखा हो। तिरछा-सा झांक कर वह पता नहीं किसे सुनाकर कहता, ''इसे कहते हैं टोकरा स्टाइल पगड़ी !''
मेरी हँसी छूट जाती। मैं घूमकर दूसरी तरफ देखने लगता। अचानक ही 'फड़ाक' की आवाज आती। मैं सिर घुमाकर देखता। दूसरा सिरा छोटा रह जाने के कारण केसर सिर पर से पगड़ी उतार कर ठांय से नीचे दे मारता था। फिर, मुंडे हुए सिर पर अंगोछा लपेटता हुआ वह बाहर को चल पड़ता था, ''नहीं भई... बनी नहीं बात। साला आखिरी सिरा छोटा रह गया।''
उसके चले जाने के बाद मैं भी उसकी गिरी हुई पगड़ी को बांध-बांध कर देखता। पर केसर की तरह मैं भी पगड़ी बांधने में सफल न हो पाता। मैं उदास हो जाता। पर कई बार मुझे केसर में से एक आस की किरण नज़र आने लगती। मुझे लगने लगता कि एक दिन वह अपना और मेरा कुछ न कुछ ज़रूर करेगा। पर केसर था कि आखिर तक अपनी जिद्द पर अड़ा रहा। मेरे और अपने विवाह की बात तो वह करने ही नहीं देता था। उसका पारा हाई हो जाता, ''लोगों को रिश्ते के लिए किस मुँह से कहूँ !... यह बताऊँ कि हमारा बाप अमली था।... भाई बिरादरी वालों के साथ खेत-मजदूरी करता है।... साले, बेगानी बेटी को खिलाएगा क्या ?... नशों ने तो तुझे पहले ही खा रखा है... और फिर मेरी क्या अब उम्र है विवाह करवाने की !''
उसकी ठंडी-गरम बातें सुनकर मैं माँ की भांति चुप लगा जाता था। मन में आता कि केसर की जुबान खींच लूँ। अगर रिश्ता नहीं करवाना तो झूठा वायदा ही किए जाता। पर वह तो बड़ा कड़वा बंदा था। हर वक्त शराब पीता रहता। अगर माँ टोकती कि -''रे, दिन में तो हट जाया कर।'' तो ''नानक नाम चड़दी कला, तेरे भाणे सरबत दा भला।'' कहता हुआ वह माँ के सामने लोगों से मिली मिठाई का ढेर लाकर रख देता।
पर खुद वह बिलकुल मीठा न खाता। मैं एक-एक चीज अपने विवाह की मिठाई समझ कर खा जाता था। जिस दिन किसी का रिश्ता करवाकर आता, शराबी हुआ केसर एक अजीब खेल खेलता था। पहले वह मुझे शराब पिलाता, फिर मीते को बेची अपनी ज़मीन की तरफ चल पड़ता। टयूबवैल वाले कोठे के पास जाकर साफ सी जगह देख बैठ जाता। बहुत देर तक बैठा रहता। मैं असमंजस की स्थिति में खड़ा रहता। बहुत देर बाद उसकी आवाज मेरे कानों में पड़ती, ''बग्गे ! यहाँ से बढ़िया से तिनके तो चुग जरा ! ... हम घर बनाएं...।''
वह स्वयं भी छोटे-छोटे तीले-तिनके चुगने लग पड़ता। फिर मजबूत से तिनके से धरती पर चार गङ्ढे खोदता। फिर उनमें एक ही लम्बाई के चार तिनके फंसा कर उन्हें पिलरों की भांति खड़ा करता। और फिर खड़े तिनकों पर चार लम्बे तिनके गार्डर की तरह लिटा देता। नशीली ऑंखों से मैं उसकी कलाकारी देख रहा होता। जब वह तीलों जैसे बारीक तिनकों से घर की छत चिन रहा होता, अचानक ही कहीं से हवा का एक झोंका आता और घर तिनका-तिनका होकर बिखर जाता। केसर की आवाज दूर-दूर तक गूंजती चली जाती, ''यह फूंक किसने मारी ?... किसने मारी है फूंक ?''
''मैंने नहीं मारी, केसर!...मैंने नहीं मारी...!'' उसकी फ़ना कर देने वाली आवाज सुनकर मैं गाँव की ओर दौड़ लेता।
वह बहुत समय तक हवा में मिट्टी के ढेले मारता रहता। सवेर होते ही सबकुछ भूल जाता। उसके चेहरे पर किसी रिश्ते की तलाश होती। अगर कोई रिश्ता न मिलता तो वह खन्ना बस-अड्डे पर सवारियों को हांके मारना शुरू कर देता, ''ओए आ जाओ... इकलाहा... ईसड़ू... नसराली... जरग... रौणी... जौड़ेपुल... भुरथला... रावणां... मलेर कोटला....आ जाओ भई...।''
हांके लगाता वह अपना माथा खुरचता रहता था। जिस दिन उसके माथे में उगे कैंसर में से खून की धार निकली, वह फोटो खिंचवाने की जिद्द करने लग पड़ा था। मैं ईसड़ू से फोटोग्राफर बुला लाया। माँ और मेरे संग उसने कई फोटो खिंचवाईं। जिस वक्त मौत की फ्लैश पड़ी, केसर फोटो बन फ्रेम में कैद हो गया था। भोग के अवसर पर महाराज की हुजूरी में रखी उसकी फोटो खासी पुरानी थी। टोकरा स्टाइल पगड़ी बांधे वह जबरन मुस्करा रहा था। उस फोटो में कोई रंग नहीं था। पूरी की पूरी फोटो ब्लैक एंड व्हाइट थी।
काफी समय तक मुझे उसकी मौत का यकीन नहीं हुआ था। हर पल उसकी आहट-सी आती रहती। उसकी मौत के बाद एक अजब घटना घटी थी। अपने बेटे के लिए रिश्ता पूछने एक आदमी हमारे यहाँ आया। दरवाजा खड़का। उसने आवाज लगाई, ''केसर ! घर में ही हो भाई !''
''नहीं भाई, केसर अब यहाँ नहीं रहता।'' माँ ने अन्दर से ही उत्तर दिया। उसकी बात में पता नहीं क्या था, मैं आर्तनाद कर उठा। ऑंखों का पानी बाढ़ की तरह बह चला। मन में आया कि उठकर भाग लूँ, पर टांगें साथ छोड़ती जा रही थीं। सूरज डूब चुका था। सारे आंगन में अंधेरे छाया हुआ था। आसमान में चमकते तारे फिरकी की तरह मेरी ओर बढ़ रहे थे।
मेरी नज़र आसमान से जा टकराई। एक तारा टूटा, एक और टूटा। और फिर टूटते तारों की बरसात होने लगी। मेरा हलक सूखने लगा। मेरी चेतना श्मसानघाट में चली गई। सीमेंट के बेंचों पर चार लोग काले कपड़े पहने बैठे थे। फूलों की बेलें साँपों की भांति लटक रही थीं। मन हुआ कि एक हाथ से टूट रहे तारों को पकड़ लूँ, दूसरे हाथ से फूलों को उठा लूँ। और फिर पूछूँ कि तुम में से केसर कौन है और राम आसरा कौन ? दीप कौन सा है और ताया कौन ?
''वे हममें से कोई नहीं... उनकी मुक्ति नहीं हुई।...'' फूलों की आवाज थी कि पता नहीं तारों की। मैं शशोपंज में पड़ गया। केसर के फूल तो मैं स्वयं डाल कर आया था। फिर उसकी मुक्ति क्यों नहीं हुई ?
''क्योंकि तूने मुझे उसके कपड़े नहीं दिए...।'' किसी लड़की की आवाज थी।
यह आवाज मैंने कीरतपुर में सुनी थी। पानी में केसर के फूल प्रवाहित कर जब मैं गुरद्वारे में से बाहर सड़क पर आया, मंगतों की भीड़ मेरी ओर दौड़ पड़ी थी। उनमें एक सुन्दर सी लड़की भी थी। मेरी नज़र उससे जा मिली। उलझी आवाजों के बीच फंसी वह कपड़े मांग रही थी, ''जाने वाले के कपड़े दे जा, उसको मुक्ति मिलेगी।''
उसको कपड़े देने के लिए ज्यों ही मैंने झोले में हाथ डाला, कितनी ही बांहें मेरे पर झपट पड़ीं। एक लफंगा-सा मंगता तो झोला ही छीनकर भाग खड़ा हुआ। मैं भी उसके पीछे भागा, पर वह रोज का खिलाड़ी मुझे मात दे गया। मैं ओंधे मुँह सड़क पर गिर पड़ा। मंगतों की भीड़ हँसने लग पड़ी। मैं खाली हाथ खड़ी लड़की की ओर देखकर रोने लग पड़ा। वह भीड़ में से निकलकर सड़क किनारे जा बैठी। सड़क पर गिरा मैं उसकी ओर देख रहा था। वह मेरे कुरते-पायजामे की ओर देख रही थी।
मुझे अपना कुरता-पायजामा याद आ गया। बम्बे टेलर के यहाँ सिलना दिया था। पर लाने के लिए टाइम ही नहीं मिला। कहीं वह मेरा कफन तो नहीं सिल रहा था। मैं सूखे पत्ते की भांति कांप उठा। देह चारपाई से बिलांद भर ऊपर उठ गई। बाही पर से होता हुआ मैं धरती पर जा गिरा। शरीर मछली की भांति तड़पने लगा। यानी कोई मेरा गला घोंट रहा था। बचने के लिए मैं दीवार से जा लगा। दीवार हिलने लगी। मैं हाथ-पैर का सहारा लेकर दूर घिसटने लग पड़ा। मुँह में से आवाज निकलने लगी, ''पा....नी...।''
''हवा का काटा पानी नहीं मांगा करता, बग्गे...!'' खोखे वाले की बात मेरे सिर के इर्द-गिर्द मक्खी की तरह भिनभिनाने लगी।
वह किस हवा की बात करता था ? मेरी चेतना चक्रवात की भांति घूमने लगी। सिर के इर्द-गिर्द होती 'भिनभिनाहट में बाजा बजने लगा। मैं छोटा-सा बन गया। किसी का बड़ा-सा हाथ हवा में लहराया। पैसों की मुट्ठी विवाह वाली कार के आगे आ गिरी। मिट्टी में पाँच और दस पैसे के सिक्के बिखर गए। मैं चुगने लग पड़ा। भीड़ में हड़कंप मच गया। मेरा हाथ नाली में जा पड़ा। विवाह वाली कार मेरे ऊपर आ चढ़ी। मैं चीखने लग पड़ा।
''चीखने से कुछ नहीं होता, भाई जी...। यह इश्तहारबाजी का जमाना है।'' चाय वाले खोखे पर मिला पत्रकार मुझे यही कहकर गया था।
उस दिन मैं शहर तो गया, पर दिहाड़ी पर नहीं गया था। दिनभर खोखे के सामने बिछे बेंच पर बैठा रहा। कभी चाय का कप पी लेता, कभी बीड़ी सुलगा लेता। मन को चैन नहीं पड़ रहा था। अजीब-से खयाल आ रहे थे। मिनट भर बाद पत्रकार की कही बात याद आ जाती, ''एक इश्तहार का तीन सौ लगेगा...।''
पैसों की बात नहीं। बात कुछ और थी। मैंने महीना भर जमकर दिहाड़ी की। पैसे इकट्ठे किए। सबसे पहले अपना ही नम्बर लगवाया। जिस दिन इश्तहार छपा, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। गाँव तक साइकिल हवा से बातें करता आया। हैंडिल से टंगे अखबार में मेरी जान थी। रात में सोने से पहले कईबार इश्तहार पढ़ा। लिखा था- 'जट्ट सिख लड़का, उम्र 26, कद 5'-9'', घर की अच्छी जमीन-जायदाद, के लिए खूबसूरत कन्या की ज़रूरत है। जल्दी विवाह। कोई जाति-बंधन नहीं।'
राम आसरे का इश्तहार पढ़कर भी बड़ा मजा आया था। उसमें लिखवाया- कैनेडीयन रामगढ़िया लड़का, उम्र 24/5'-10'', अपनी फैक्ट्री, के लिए पढ़ी-लिखी सुन्दर लड़की की ज़रूरत है। तुरन्त विवाह। कोई दान-दहेज नहीं।
थोड़े से पैसे कम पड़ जाने के कारण दीप और ताया का इश्तहार मैंने साझा छपवाया। दोनों का जिक्र था- दो जट्ट सिक्ख लड़के, बड़ा फार्म और ट्राँसपोर्ट, उम्र 30/5'-7'' और 35/5'-6'' के लिए दो खूबसूरत लड़कियों की ज़रूरत है। तलाकशुदा भी सम्पर्क कर सकते हैं।
जट्ट सिक्ख कुआंरा लड़का, उम्र 38/5'-3'', सरकारी नौकरी, के लिए बहुत ही सुन्दर और सुशील कन्या की ज़रूरत है। कोई दहेज और जाति बंधन नहीं। बच्चे वाली, विधवा और तलाकशुदा भी सम्पर्क करें।... केसर का इश्तहार छपवाकर मानो मैं जिम्मेदारी से मुक्त हो गया था। मन पर से मनों भारी बोझ उतर गया। चित्त में लड्डुओं की पंसेरी ढेरी हो गई। अखबारों में से काट कर मैंने सारे इश्तहार बैठक की दीवार पर लगा लिए थे। आधी रात तक खड़े-खड़े पढ़ता रहता। माँ कलपती रहती, ''रे, ये किसका मर्सिया पढ़ता रहता है !''
''कड़वा न बोल माँ।... बस तेरा मुँह मीठा होने वाला है।'' माँ से बातें करता हुआ मैं कहीं दूर खो जाता।
शहर में खोखेवाला शौकीन बंदा था। उसके पास मोबाइल था। सभी इश्तहारों में सम्पर्क के लिए मैंने उसका नम्बर ही लिखवाया था। उसने मना किया था, पर मैंने चोरी से लिखवा दिया। जब रिश्ते वालों के फोन आने लगे तो उसे पता चला। वह मेरे से लड़ पड़ा, ''साले कुत्ते, तुझे मना किया था... अब मुझे तो मरवाएगा ही, खुद भी फंसेगा...।''
गालियाँ बकते हुए जब वह बताता कि किसी लड़की का फोन आया था, तो मैं नाचने लग पड़ता। उसकी गालियाँ तेज हो उठतीं। मैं गाने लग पड़ता, ''जिंद वेच के मिलें जे तूं....फेर वी पुगदी ऐं...।''
''देखते जाओ... तुम तो नाचते फिरोगे।''
पर एक दिन मैं मौके पर ही पकड़ा गया था।
पता नहीं, किस तरह खोज-खबर निकाल ली। एक रिश्तेवाले पूछताछ करते हुए खोखे पर आ पहुँचे थे। उन्होंने पुलिस बुला ली। मैं और खोखे वाला थाने में बैठे थे। वह तो सच बात बताकर निकल गया, पर मैं फंस गया। कई दिन मार पड़ती रही। जैसे ही फेंटा चढ़ता, गालियाँ बकता थानेदार वही सवाल पूछने लग जाता, ''क्यों बे माँ के सरबाले !... चल, बता यह चार सौ बीसी की क्यों ?...''
''नहीं जनाब, आपको धोखा हुआ है.... चार सौ बीसी तो हमारे साथ हुई है।'' पट्टों की मार सहता मैं लक्स साबुन का विज्ञापन देती एक्टरनी की चार सौ बीस बातें सुनाने लग पड़ता।
पुलिस वाले हँसने लगते। मेरी बातों से तंग आया थानेदार एक दिन बोला, ''छोड़ो इसे, यों ही फुद्दू भड़ाके मारता है साला...।''
उन्होंने मुझे पागल समझ छोड़ दिया था। लेकिन मेरा साइकिल थाने में ही रख लिया। मैं पैदल ही गाँव पहुँचा। मेरे साथ चले आ रहे चार साये गाँव की बाहरी सड़क पर से श्मसानघाट की तरफ मुड़ गए। गुरद्वारे वाला पाठी 'रहिरास' का पाठ कर रहा था। हमारी बैठक में से रोने की आवाजें आ रही थीं। माँ मरी पड़ी थी। मेरी आह निकल गई, ''यह कैसे मरी...?''
''तेरा इंतजार करती मर गई।'' जिन्हें कोई दुख नहीं था, उनके शब्द मेरे कानों में पड़ रहे थे।
माँ के सिरहाने बैठा मैं दीवार पर चिपके इश्तहारों की ओर देख रहा था।
पर कुछ भी साफ नज़र नहीं आ रहा था। मेरी ऑंखों में मिट्टी पड़ गई थी। खून में जलन हो रही थी। मुझे प्यास लगी थी, पर नलका दूर था। मैंने किसी को पुकारा। नहीं, किसी ने मुझे पुकारा था। नहीं, शायद नलका खड़का था। मैंने धीरे-धीरे ऑंखें खोलीं। एक चूड़े वाली बांह दिखाई दी। मेरा मुँह खुल गया। हाथ में गिलास थामे वह मेरे मुँह में पानी डालने लगी। मुझे खांसी छिड़ गई। सांस उखड़ गई। मैंने दोनों हाथों से गले की घंटी पकड़ ली।
''ला, मेरी बांह पर सिर रख ले।... तकलीफ कम होगी....।'' मेरे सिरहाने बैठी औरत जोर-जोर से हँसने लग पड़ी।
उसकी बांह पर रखने के लिए जैसे ही मैंने अपना सिर उठाया, वह गायब हो गई। मेरा सिर धड़ाम से धरती से जा बजा। मेरी चीख निकल गई।
''चुप कर बग्गे ! चल अब, राह बहुत लम्बी है....।'' चार साये मेरे पैरों की तरफ खड़े थे।
मैं उनकी तरफ देखने लग पड़ा। वे आसमान में उन तारों की ओर देख रहे थे, जिन्हें सारा गाँव 'छड़ों का राह' कहा करता था।
''नहीं...।'' अपनी जानिब मैंने उनकी ओर से पीठ कर ली।
मेरी ऑंखें बन्द होने लग पड़ीं। कुछ ऊपर की ओर उठने लग पड़ा। मैं बहुत हल्का हो गया। दिमाग में फूलों की क्यारी खिल उठी। मैं उसमें एक फूल बनकर खिल उठा।
''मुझे तो यही फूल लेना है....।'' एक लड़की की आवाज मेरे कानों के बहुत करीब से होकर गुजर गई। लड़के ने मुझे तोड़कर उसके हाथों में पकड़ा दियाय। वह सूंघने लगी। मैं बहुत भीतर तक महक उठा। महक छोड़ती लड़की रात की रानी बन गई। मैं आसमान का तारा बन गया । वह मेरी ओर इशारे करने लगी, ''मुझे वो तारा तोड़कर ला दे...।''
मेरी ओर देखता लड़का, लड़की से वायदा करने लगा।
मैं अपनी शांत हो रही चेतना को बाहर की ओर मोड़ने लग पड़ा।
शायद, कोई बाहर वाला दरवाजा खड़का रहा था।
00


जसवीर सिंह राणा
जन्म : 18 सितम्बर 1968, अमरगढ़, ज़िला-संगरूर(पंजाब)
शिक्षा : एम.ए.(पंजाबी), बी.एड.
प्रकाशित पुस्तकें : शिखर दुपहिरा(कहानी संग्रह-2003),खित्तियाँ घुम्म रहियां ने(कहानी संग्रह-2008), मैं ते मेरी खामोशी(शब्द चित्र-2012)
मान-सम्मान :-
कहानी संग्रह 'शिखर दुपहिरा' पर भाषा विभाग पंजाब का 'नानक सिंह पुरस्कार, 2004' 'चूड़े वाली बांह' कहानी को सर्वोत्तम कहानी के तौर पर 'बीबी स्वर्ण कौर यादगारी पुरस्कार, 2007', 'पट ते वाही मोरनी' कहानी को सर्वोत्तम कहानी के तौर पर 'बीबी स्वर्ण कौर यादगारी पुरस्कार, 2009','चादर' कहानी को सर्वोत्तम कहानी के तौर पर 'करनल नरैण सिंह भट्टल यादगारी पुरस्कार,2001'

सम्प्रति :अध्यापन।
सम्पर्क :स्वर्ण विला, गाँव व डाकखाना-अगरगढ़, ज़िला-संगरूर (पंजाब)
फोन :098156-59220
ई मेल :jasvir_rana@yahoo.com

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‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश है। कथा-कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, शब्दचित्र आदि से जुड़ी कृतियों का हिंदी अनुवाद हम ‘अनुवाद घर’ पर धारावाहिक प्रकाशित करना चाहते हैं। इच्छुक लेखक, प्रकाशक ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ जानने के लिए हमें मेल करें। हमारा मेल आई डी है- anuvadghar@gmail.com

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव

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पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव

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काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-1100-6, मूल्य : 125 रुपये

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव
प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

पंजाबी की साहित्यिक कृतियों के हिन्दी प्रकाशन की पहली ब्लॉग पत्रिका - "अनुवाद घर"

"अनुवाद घर" में माह के प्रथम और द्वितीय सप्ताह में मंगलवार को पढ़ें - डॉ एस तरसेम की पुस्तक "धृतराष्ट्र" (एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा) का धारावाहिक प्रकाशन…

समकालीन पंजाबी साहित्य की अन्य श्रेष्ठ कृतियों का भी धारावाहिक प्रकाशन शीघ्र ही आरंभ होगा…

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संपादक – कथा पंजाब

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