पंजाबी लघुकथा : आज तक

>> शुक्रवार, 19 नवंबर 2010


पंजाबी लघुकथा : आज तक(7)

'पंजाबी लघुकथा : आज तक' के अन्तर्गत पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के कथाकार भूपिंदर सिंह, हमदर्दवीर नौशहरवी, दर्शन मितवा, शरन मक्कड, सुलक्खन मीत और श्याम सुन्दर अग्रवाल की चुनिंदा लघुकथाएं आप पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत हैं- पंजाबी लघुकथा के अग्रणी एवं बहुचर्चित लेखक डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति (जन्म : 30 अप्रैल 1954) की पाँच चुनिंदा लघुकथाएं...। डॉ. दीप्ति पेशे से डॉक्टर हैं और सरकारी मेडिकल कॉलेज, अमृतसर में अध्यापन कार्य से संबंद्ध हैं तथा साहित्य और मनोविज्ञान से इनका बेहद लगाव है। पंजाबी और हिंदी दोनों भाषाओं में लिखते हैं। लघुकथाओं के अतिरिक्त कविताएँ, कहानियाँ और सामाजिक मुद्दों पर आलेख भी लिखते रहे हैं। ''मैं और तुम'', ''सिर्फ़ एक दिन'', ''पाँचवे पहर की ओर'' सभी कविता संग्रह हिंदी में। पंजाबी में मौलिक लघुकथा संग्रह ''बेड़ियाँ'' और ''इक्को ही सवाल'' प्रकाशित हो चुके हैं। ‘अष्ठधारा’, ‘आईना’, ‘शतकथाएँ’, ‘पंजाबी लघुकथाएं’(हिंदी में संपादित पुस्तकें)। ‘दायरे’, ‘सिलसिला’, ‘अक्श-पंजाब’, ‘अँधेरे के खिलाफ़’(पंजाबी में श्यामसुंदर अग्रवाल के साथ मिलकर संपादन)। इसके अतिरिक्त मेडिकल, बाल मनोविज्ञान, सेहत आदि विषयों पर अनेक पुस्तकें। पुस्तकों का गत 20 वर्षों से पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका ''मिन्नी'' का संपादन कर रहे हैं।
सुभाष नीरव
संपादक : कथा पंजाब

डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति की पाँच लघुकथाएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

(1) हद

एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
''साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।''
''तू इस बारे में कुछ कहना चाहता है।'' मजिस्ट्रेट ने पूछा।
''मैंने क्या कहना है, सरकार ! मैं खेतों में पानी लगाकर बैठा था। 'हीर' के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नज़र नहीं आई।''
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(2) पाड़

''तुझे दिखाई नहीं देता ? यूँ ही पीं-पीं लगा रखी है।'' कार स्कूटर को डांट रही थी।
''एक ओर होकर भी तो बातें हो सकती हैं। सड़क कोई अकेले तेरे लिए ही तो नहीं है।'' स्कूटर कुछ गुस्से में आकर बोला।
''तो क्या तू मुझसे आगे हो जाएगा ? चूहे-सा मुँह लेकर...।'' कार तैश में आ गई थी, ''स्कूटरों ने ही सारा आसमान सिर पर उठा रखा है। ऐरे-गैरे न हों तो...।''
स्कूटर के पीछे साइकिल की घंटी बजी।
स्कूटर ने पीछे मुड़कर साइकिल को घूरा।
''आगे तेरी ताई चलेगी, तभी तो तू जाएगी।''
स्कूटर और साइकिल को झगड़ते देख कार मुस्कराती हुई आगे बढ़ गई।
स्कूटर स्टार्ट होने लगा तो साइकिल आगे बढ़कर पहले निकल गई। स्कूटर स्टार्ट होते हुए खीझकर बोला, ''निकल जा, तू भी निकल जा...''
जब स्कूटर स्टार्ट हुआ तो साइकिल कोई सौ गज़ आगे जा चुकी थी। स्कूटर ने रफ्तार पकड़ी और साइकिल के पास पहुँचकर बोला, ''कैसी जल्दी मची थी, पीपनी-सी ! अब आ जा... आ जा...।''
''मैंने तो आपको कुछ नहीं कहा, सा'ब जी!'' साइकिल हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।
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(3) संबंध

किशोर के घर से लौटते-लौटते अँधेरा हो गया। कभी-कभार मिलना होता था। वर्तमान हालात को लेकर ही बात चल पड़े तो वक्त बीतते पता नहीं चलता।
सी.आर.पी के जवानों की चौकी के पास पहुँचते ही व्हिसिल सुनाई दी। स्कूटरों-कारों को रोक कर वाहन के काग़ज़ों की जाँच हो रही थी। मैं भी रुक गया।
''पापा, रुक क्यों गए ?'' बेटी ने पूछा। मैं डिक्की में से स्कूटर के काग़ज़ निकालने लग गया और सिपाही मेरे करीब आ गया।
''पापा, यह अंकल अपने को जानते हैं ?'' मैं बेटी के सवाल पर मुस्कराया।
''हम इनके घर तो कभी नहीं गए पापा !'' फिर उस सिपाही को संबोधित करके बोली, ''आपका घर कहाँ है, अंकल ?''
मुझे डिक्की में काग़ज़-पत्र नहीं मिले। मैं सोचने लगा, कहाँ गए ? फिर ख़याल आया कि स्कूटर धोया था तो बाहर निकालकर रखे थे। फिर स्कूटर में रखना भूल गया। लेकिन अब इसे क्या कहें ? कोई परेशानी ही न खड़ी कर दे। पुलिसवालों का क्या भरोसा?
''पापा, चलो न, देखो तो कितना अँधेरा हो गया है। मम्मी को डर लग रहा होगा।''
मैंने बेटी की तरफ़ देखा तो सिपाही ने कहा, ''जाओ, साहब।''
फिर बेटी ने कहा, ''पापा, मुझे अंकल के घर लेकर चलोगे न ? अंकल के घर भी एक गुड़िया है, मेरे जैसी !''
''ज़रूर चलेंगे, बेटा।'' कहकर मैंने सिपाही से हाथ मिलाया और स्कूटर स्टार्ट कर आगे बढ़ गया।
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(4) गुब्बारा

गली में से गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चे को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चा माँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे जाता या उसके माँ-बाप। इसी तरह एक दिन मेरी बेटी के साथ हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे आया। दूसरे दिन फिर बेटी ने वैसा ही किया। मैंने कहा, ''बेटे, क्या करना है गुब्बारा। रहने दे न।'' पर वह कहाँ मानती थी, रुपया ले ही गई। तीसरे दिन रुपया दिया तो लगा कि रोज़-रोज़ तो यह काम ठीक नहीं। एक रुपया रोज़ महज दस मिनट के लिए। अभी फट जाएगा।
मैंने आराम से बैठकर बेटी को समझाया, ''बेटे ! गुब्बारा कोई खाने की चीज़ है ? नहीं न ! एक मिनट में ही फट जाता है। गुब्बारा अच्छा नहीं होता। अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते। हम बाज़ार से कोई अच्छी चीज़ लेकर आएँगे।'' वह सिर हिलाती रही।
अगले दिन जब गुब्बारेवाले की आवाज़ गली से आई तो बेटी बाहर न निकली और मेरी तरफ़ देखकर कहने लगी, ''गुब्बारा अच्छा नहीं होता न ! भैया रोज ही आ जाता है। मैं उसे कह आऊँ कि वह चला जाए।''
''वह आप ही चला जाएगा।'' मैंने कहा। वह बैठ गई।
उससे अगले दिन गुब्बारेवाले की आवाज़ सुनकर वह बाहर जाने लगी तो मुझे देखकर बोली, ''मैं गुब्बारा नहीं लूँगी।'' और जब वह वापस आई तो फिर कहा, ''अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते न ? राजू तो अच्छा बच्चा नहीं है। गुब्बारा तो मिनट में फट जाता है।'' वह कहती हुई मम्मी के पास रसोई में चली गई और मम्मी से कहने लगी, ''मम्मी जी, मुझे गुब्बारा ले दो न !''
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(5) रिश्ता

''मोगा से पहले रास्ते की सवारी कोई न हो, एक बार फिर देख लो।'' कहकर रामसिंह ने सीटी बजाई और बस अपने रास्ते पड़ गई।
बस में बैठे निहाल सिंह ने अपना गाँव नज़दीक आते देख, सीट छोड़ी और ड्राइवर के पास जाकर धीमे से बोला, ''डरैवर साब जी, जरा नहर के पुल पर थोड़ा-सा ब्रेक पर पाँव रखना।''
''क्या बात है ? कंडेक्टर की बात नहीं सुनी थी।'' ड्राइवर ने खीझ कर कहा।
''अरे भाई, ज़रा जल्दी थी। भाई बनकर ही सही। देख, तू भी जट और मैं भी जट। ज़रा-सा रोकना।'' निहाल सिंह ने गुजारिश की।
ड्राइवर ने निहाल सिंह को देखा और फिर उसने भी धीमे से कहा, ''मैं कोई जट-जुट नहीं, मैं तो मज्हबी हूँ।''
निहाल सिंह ने ज़रा रुककर फिर कहा, '' तो क्या हुआ ? सिक्ख भाई हैं हम, वीर (भाई) बनकर ही रोक दे।''
ड्राइवर इस बार ज़रा-सा मुस्कराया और बोला, ''मैं सिक्ख भी नहीं हूँ, सच पूछे तो।''
''तुम तो यूँ ही मीन-मेख में पड़ गए। आदमी ही आदमी की दवा होता है। इससे बड़ा भी कुछ है।''
जब निहाले ने इतना कहा तो ड्राइवर ने खूब गौर से उसको देखा और ब्रेक लगा दी।
''क्या हुआ ?'' कंडेक्टर चिल्लाया, ''मैंने पहले नहीं कहा था ? किसलिए रोक दी?''
''कोई नहीं, कोई नहीं। एक नया रिश्ता निकल आया था।'' ड्राइवर ने कहा और निहाल सिंह तब तक नीचे उतर गया था।
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सम्पर्क : 97-ए, गुरू नानक एवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर (पंजाब)
दूरभाष : 0183-2421006 मोबाइल : 09815808506
ई मेल : drdeeptiss@yahoo.co.in

2 टिप्पणियाँ:

बलराम अग्रवाल 19 नवंबर 2010 को 8:23 pm  

भाई दीप्तिजी की आपने चुनी हुई रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। इनमें मनोविज्ञान के भी दर्शन होते हैं और अन्य मानवीय गुणों के भी। आपको धन्यवाद।

सहज साहित्य 21 नवंबर 2010 को 9:00 pm  

दीप्ति जी की लघुकथाएँ सदा एक नई और मानवीय सोच की संवाहक के रूप में सामने आती हैं ड़ॉ साहब को बधाई !

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372, टाइप- 4, लक्ष्मीबाई नगर
नई दिल्ली-110023

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