‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

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संपादकीय

>> रविवार, 3 जनवरी 2010



रेखाचित्र - साहित्य की महत्वपूर्ण और स्वतंत्र विधा

जब 'कथा पंजाब' की परिकल्पना की जा रही थी तो इसमें पंजाबी कहानी, लघुकथा, उपन्यास के साथ साथ साहित्य की महत्वपूर्ण और स्वतंत्र विधा 'रेखाचित्र' और 'संस्मरण' को भी शामिल किए जाने की बात बड़ी शिद्दत से महसूस की गई थी। रेखाचित्र समाज के किसी भी क्षेत्र के किसी भी खास अथवा आम व्यक्ति पर हो सकते हैं। चाहे वह साहित्य जगत की कोई शख्सियत हो, अथवा अपने परिवार का ही कोई व्यक्ति। राजनीतिज्ञ हो, खिलाड़ी हो, पत्रकार हो अथवा कोई खास मित्र। लेकिन, अधिकांश रेखाचित्र हमें साहित्यकारों पर ही मिलते हैं। रेखाचित्र के केन्द्र में जो भी शख्सियत होती है, वह अपने गुण-दोष दोनों के साथ प्रकट होती है। रेखाचित्र को चुटीली, मारक और कभी कभी मार्मिक भाषा की ज़रूरत होती है, जिससे वह पठनीय बनता है। पिछले वर्ष जनवरी-जून 2009 में पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका ''शबद'' ने रेखाचित्र विधा पर अपना विशेष अंक निकाला था। ''शबद'' के इस विशेष अंक में पंजाबी में लिखे गए अथवा लिखे जा रहे रेखाचित्रों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी संकलित है। इसमें जहाँ प्रो. परमजीत सिंह ढींगरा और मेघा सलवान के महत्वपूर्ण आलेख हैं, वहीं राजेन्द्र सिंह बेदी, सुखवंत कौर मान, पाश, सुरजीत पात्तर, रामसरूप अणखी, गुरचरन सिंह दीपक, गुरदेव सिंह रुपाणा, जोगिंदर सिंह निराला, सर्वमीत आदि साहित्यकारों पर खूबसूरत रेखाचित्र भी हैं। रेखाचित्र गद्य की एक महत्वपूर्ण विधा है। कई बरस पहले मैंने पंजाबी के विख्यात लेखक बलवंत गार्गी के रेखाचित्रों की एक किताब लायब्रेरी से लेकर पढ़ी थी और मैं दंग रह गया था। गार्गी के रेखाचित्रों की किताब 'निम्म दे पत्ते' सन् 1961 में प्रकाशित हुई थी। यहीं से पंजाबी रेखाचित्रों की मुक्कमल तौर पर शुरुआत मानी जा सकती है। गार्गी ने इसके बाद 'सुरमे वाली अक्ख' (सन् 1964), 'कौड़ियों वाला सप्प' (सन्1980), और 'हुसीन चेहरे'( सन् 1985) रेखाचित्रों की और पुस्तकें पंजाबी साहित्य की झोली में डालीं। इनमें उसने लगभग चालीस साहित्यिक शख्सियतों के अक्स खींचे हैं। उसने अपने विशाल अनुभव, ज्ञान और निकटता का प्रकटीकरण करते हुए इन सब को अपनी निजी आत्मीयता और साहित्यिक दृष्टि के तौर पर चित्रित किया। गार्गी के बाद रेखाचित्र के क्षेत्र में कुलबीर सिंह कांग का नाम आता है। वह लगभग गार्गी की लीक पर ही चलने वाला लेखक है। कांग के पांच रेखाचित्र संग्रह मिलते हैं - 'बदलां दे रंग'(1963), 'पत्थर लीनां'(1965), 'पक्कियाँ इंटां'(1973), 'सिरनावें मित्तरा दें'(1988) और 'दुध दे दरिया'(2003)। सन् 1965 में प्रकाशित अमृता प्रीतम का रेखाचित्र संग्रह 'किरमिची लकीरां' में 41 लेख शामिल हैं जिनमें से करीब दस को ही रेखाचित्र विधा के अन्तर्गत रखा जा सकता है। इनमें से कुछ पंजाबी के अग्रणी कथाकारों के बारे में रेखाचित्र हैं। एक अमृता जी का अपना स्व चित्र भी है। वह न तो किसी का मजाक उड़ाती है और न ही किसी को नीचा दिखाने की कोशिश करती है। सहज स्वभाव से वह शख्सियत का चित्र खींचती चली जाती है। सन् 1968 में जीत सिंह शीतल का रेखाचित्र संग्रह 'मित्र असाडे सेई' प्रकाशित हुआ था। इसमें पंद्रह साहित्यिक शख्सियतों पर व्यक्ति चित्र हैं। सन् 1979 में भंगवत सिंह का रेखाचित्र 'शिनाख्ती परेड' प्रकाशित हुआ। इसमें तेइस साहित्यकारों के रेखाचित्र शामिल हैं। भगवंत सिंह की विशेषता यह है कि उसने तीन पीढ़ियों के लेखकों को अपने रेखाचित्रों में समेटा है। वर्ष 1987 में गुरमेल मडाहड़ का रेखाचित्र संग्रह 'सूरजां दी सथ' प्रकाशित हुआ जिसमें 16 लेखकों के रेखाचित्रों के साथ साथ एक स्व चित्र भी दर्ज है। प्रो. सरवण सिंह ने पंजाबी रेखाचित्र के विकास में अपना विशेष योगदान दिया है। उसने साहित्यिकारों से हटकर पहली बार खिलाड़ियों के बारे में रेखाचित्र लिखे जो उसकी पुस्तक 'पंजाबी खिडारी' में संकलित हैं। इसके पश्चात् शमेशर संधू ने पंजाबी रेखाचित्र में आये ठहराव को तोड़ा। उसने भारतीय पंजाब तथा पाकिस्तानी पंजाब के करीब पचास कित्ताकारों, लोक गायकों पर अपने रेखाचित्र लिखे जो उसके संग्रह 'लोक सुरां' और 'सुर दरिया पार के' में शामिल हैं। वर्ष 1987 में पंजाबी की प्रख्यात कथाकार अजीत कौर का रेखाचित्र संग्रह 'तकिये की पीर' प्रकाशित हुआ। अजीत कौर के रेखाचित्रों में कहानी की-सी अदा है, गद्यमयी रस है। किसी माहिर कार्टूनिस्ट की तरह वह अपने पात्र के जिस नक्श को उघाड़ना चाहती है, जहाँ पर चोट करना चाहती है, बहुत ही चटखारे लेकर करती है। अजीत कौर के पास गद्य शैली और भाषा के साथ साथ सहृदयता, सहजता, कोमलता, थोड़ा सा व्यंग्य, हल्का सा विस्तार और बयान का जादुमयी भरम है। उसकी शैली में कहीं कहीं गार्गी वाला प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। जसवंत सिंह विरदी ने 'पाणी दे सप्प' शीर्षक के अधीन 60 के करीब रेखाचित्र लिखे हैं। वर्ष 1990 में डॉ. कुलदीप सिंह धीर ने 'दरियावों की दोस्ती' शीर्षक के अन्तर्गत अपना रेखाचित्र प्रकाशित किया था। वह अपने रेखाचित्रों में पात्रों की अंदरूनी परतों को भी सरल ढंग से उघाड़ता है। 1992 में हरभजन सिंह हुंदल का रेखाचित्र संग्रह 'घसमैले चेहरे' प्रकाशित हुआ जिसमें आम साधारण लोगों पर रेखाचित्र हैं। वर्ष 1992 में प्रख्यात कथाकार गुरबचन सिंह भुल्लर का रेखाचित्र संग्रह 'नेड़े-तेड़े' प्रकाशित हुआ जिसमें दस लेखकों के रेखाचित्र संकलित हैं। इनकी खासियत यह है कि ये इंटरव्यू आधारित रेखाचित्र हैं। इस तरह लेखकों ने अपने बारे में अधिक कहा है। इसके अतिरिक्त, कर्तारसिंह दुग्गल का 'याद करदियाँ', सरवण सिंह का 'चित्र-विचित्र', गुलवंत फारिग का 'अलविदा तों बाद'। प्रो. प्रीतम सिंह ने इस विधा में अपना विशेष योगदान दिया है। 1997 में उनका पहला रेखाचित्र संग्रह 'मूरतां' और 2006 में 'मुहांदरे' प्रकाशित हुए। जिन्दर पंजाबी की चौथी कथापीढ़ी का एक सशक्त हस्ताक्षर है। उसने इस विधा में संपादन ही किया है। 1998 में उसका पहला रेखाचित्र संग्रह 'कआसी रोटी' आया जिसमें 9 रेखाचित्र शामिल थे। 2004 में 'ये जो सच है तो' और 2006 में 'प्रेम प्रकाश इक गोरखधंधा', 2008 में 'तेरे मेरे अक्स' आदि पुस्तकों का संपादन किया। 2007 में पंजाबी के बहुचर्चित अग्रणी कथाकार प्रेम प्रकाश का रेखाचित्र संग्रह 'उम्रां दी खट्टी' प्रकाशित हुआ। प्रेम प्रकाश मनौवैज्ञानिक परतों को उघाड़ने वाला एक समर्थ लेखक है। अपने रेखाचित्रों में वह इस बात का सबूत देता है। उसकी वर्णन शैली थोड़े में बहुत कुछ कह जाती है। अपने सम्पर्क में आए साहित्यकार मित्रों के विषय में उसने अच्छा-बुरा सब कुछ लिख दिया है। वर्ष 2007 में निंदर घुगियाणवी की पुस्तक 'सज्जण मेरे रंगुले' प्रकाशित हुई थी जिसमें लेखक ने अपने सम्पर्क में आए लेखकों, गायकों, आम व्यक्तियों के बारे में बड़ी बेबाकी से लिखा है। इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से लेखकों ने इस विधा में लेखन किया है और इसे विकसित करने में अपना योगदान दिया है।
मेरे इस संपादकीय लेख में आई उक्त सारी जानकारी का स्रोत ''शबद'' में प्रकाशित प्रो. परमजीत सिंह ढींगरा का आलेख ''रेखा चित्र : विधा और विकास'' है जिसें मैं हिंदी पाठकों से साझा कर रहा हूँ।
'कथा पंजाब' के इस अंक में 'रेखाचित्र/संस्मण' स्तम्भ के अन्गर्तत आप पढ़ेंगे पंजाबी की बहुचर्चित लेखिका सुखवंत कौर मान पर उनकी समकालीन कहानीकार बलजीत कौर बली द्वारा लिखा गया एक बेबाक रेखाचित्र...
आपकी बेबाक राय की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

सुभाष नीरव
संपादक - कथा पंजाब

7 टिप्पणियाँ:

PRAN SHARMA 3 जनवरी 2010 को 10:52 pm  

PUJABI MEIN LIKHE GYE REKHACHITRA
KAA ITIHAS AAPNE BKHOOBEE PRASTUT
KIYAA HAI.IS SE PAHLE HINDI MEIN
ISKE BAARE MEIN ITNEE ZIADA JAAN-
KAAREE MEREE NAZAR MEIN NAHIN AAYEE
PUNJABI SAHITYA AAPNE BAHUT PADHAA
HUA LAGTA HAI.SHUBH KAMNAAYEN.

रूपसिंह चन्देल 6 जनवरी 2010 को 7:20 pm  

भाई सुभाष

तुम्हारा सम्पादकीय पढ़ा . तुमने ’शबद’ के आधार पर पंजाबी रेखाचित्र विधा पर जो जानकारी हिन्दी पाठकों को उपलब्ध करवायी वह महत्वपूर्ण है. लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं कि रेखाचित्र केवल साहित्यकारों पर ही लिखे जाते या लिखे गये हैं. मुझे लगता है कि उनपर हम संस्मरण लिखते हैं जिसमें रेखाचित्र का प्रभाव भी परलक्षित होता है. शायद रेखाचित्रों की वास्तविक पुस्तक पंजाबी में ’सज्जण मेरे रंगुले’ ही है. यहां पुनः याद दिलाना चाहूंगा कि हिन्दी में महादेवी वर्मा ने जो रेखाचित्र लिखे हैं वे सभी सामान्य ही नहीं अति सामान्य पात्रों पर हैं..... उन पर जिनकी ओर लोग तवज्जो नहीं देते. ऎसा नहीं कि साहित्यकारों पर रेखाचित्र लिखे ही नहीं गये या लिखे ही नहीं जा सकते. बलवंत गार्गी के रेखाचित्रों का जिक्र आया . मैंने नहीं पढ़े लेकिन जिक्र से लगा कि वे साहित्यकारों को केन्द्र में रखकर लिखे गये रेखाचित्र ही होंगे और अजीत कौर के भी. अब एक रेखाचित्र बलजीत कौर बली का है जिसे तुमने प्रकाशित किया है. उसे पढ़कर कहीं से भी नहीं लगा कि वह रेखाचित्र है. मैं चाहता हूं कि पंजाबी के कथा लेखक मेरी बात पर बात करें . मैं उनके तर्क जानना चाहता हूं.

तुम्हारी भाषा में पहली बार मुझे एक कमी नजर आयी और संभव है वह ’शबद’ के प्रभाव के कारण हो. तुमने सर्वत्र वरिष्ठ रचनाकारों के लिए ’उसके’ ’उसकी’ --- अर्थात ठेठ खड़े शब्दों का प्रयोग किया है. समकालीनों तक -- वह भी हमउम्र समकालीनों पर यह भाषा निरापत्तिजनक है लेकिन यदि इससे बच सको तो अच्छा होगा. हिन्दी के अपने संस्कार हैं और उसे बचा रखने की जिम्मेदारी हम पर ही है.

बलजीतकौर बली के अनुवाद में भी इसका प्रयोग हुआ है.

इतनी सामग्री देने के लिए बधाई.

रूपसिंह चन्देल
०९८१०८३०९५७

निर्मला कपिला 9 जनवरी 2010 को 4:29 pm  

ांभी अभी श्री चन्देल जी के ब्लोग पर आपका साक्षात्कार पढ कर आयी हूँ बहुत खुशी हुई आपके बारे मे जानकर। अपके ब्लाग पर पहले भी आती रही हूँ। इ9स आलेख मे बहुत विस्त्रित जानकारी पढ कर बहुत अच्छा लगा धन्यवाद और शुभकामनायें

अलका सैनी 17 फ़रवरी 2010 को 9:36 pm  

नीरव जी आपने बहुत ही बढ़िया काम किया है , इस तरह भारत की सब क्षेत्रीय भाषाएँ एक दूसरे के साथ न सिर्फ जुडती है बल्कि उनका विस्तार भी होता है. इस तरह के अनुवाद हमारी मातृभाषा को भी काफी प्रबल बनाते है . आपके इस तरह के कार्य से प्रेरणा पाकर मैंने भी हिंदी भाषा में अपना ब्लॉग शुरू किया है( http://alkasainipoems-stories.blogspot.com/)

आपको साहित्य जगत में इस महान योगदान के लिए बहुत बहुत बधाई..

psingh 24 फ़रवरी 2010 को 12:47 pm  

sundra post
behtarin jankari di apne

psingh 24 फ़रवरी 2010 को 12:47 pm  

sundra post
behtarin jankari di apne

लता 'हया' 3 मार्च 2010 को 7:13 am  

.शुक्रिया सुभाष जी ,
आपकी स्रजन -यात्रा पर गयी तो वही पोस्ट देखी ; हम भी पढ़ना चाहते हैं आपकी और भी अच्छी कवितायेँ .दूसरों की तो पढ़वाते ही रहते हैं ,मुझे भी अपना वादा याद है मगर मैं पूरा करते -करते अरसा गुज़ार देती हूँ .मैं देर करती नहीं ,देर हो 'ही ' जाती है .जल्द ही पूरा करुँगी .

socha to tha ki bus itna hi comment karungi magar aapke panjabi blog par aakar to sammohit ho gayi,aapka sampadkiya aur sukhwant ji par baljeet ji ka rekhachitra kamaal ka laga,dil in donon aadarniya se mulaqaat karne ko machal utha hai. shukria inko padhwane ke liye.

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश है। कथा-कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, शब्दचित्र आदि से जुड़ी कृतियों का हिंदी अनुवाद हम ‘अनुवाद घर’ पर धारावाहिक प्रकाशित करना चाहते हैं। इच्छुक लेखक, प्रकाशक ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ जानने के लिए हमें मेल करें। हमारा मेल आई डी है- anuvadghar@gmail.com

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव

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पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

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रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव

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पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव

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कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह) संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव

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कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष 1998, 2004, मूल्य :35 रुपये

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-1100-6, मूल्य : 125 रुपये

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव
प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

पंजाबी की साहित्यिक कृतियों के हिन्दी प्रकाशन की पहली ब्लॉग पत्रिका - "अनुवाद घर"

"अनुवाद घर" में माह के प्रथम और द्वितीय सप्ताह में मंगलवार को पढ़ें - डॉ एस तरसेम की पुस्तक "धृतराष्ट्र" (एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा) का धारावाहिक प्रकाशन…

समकालीन पंजाबी साहित्य की अन्य श्रेष्ठ कृतियों का भी धारावाहिक प्रकाशन शीघ्र ही आरंभ होगा…

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