‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

Marquee

पंजाबी कहानी : आज तक

>> रविवार, 13 दिसंबर 2009


पंजाबी कहानी : आज तक(3)

गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी ( 1895 - 1977)

गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी का जन्म 26 अप्रैल 1895 में स्यालकोट(पाकिस्तान) में हुआ था और इन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की थी। पंजाबी कहानी की प्रारंभिक कथा पीढ़ी के ये एक मजबूत स्तम्भ माने जाते हैं। इनकी सभी कहानियों में 'प्रेम' विषय प्रमुख है। यूँ तो गुरबख्श सिंह जी ने अनेक नाटक भी लिखे लेकिन जाने वह एक महान कहानीकार के रूप में ही हैं। 'राजकुमारी लतिका', 'प्रीत मुकट', 'पूरब-पश्चिम', और 'प्रीतमणि' इनके प्रमुख नाटक हैं। सन् 1947 के बाद इनके 'भाभी मैना', 'नवें खंडर दी उसारी', 'शबनम', 'आखरी सबक', 'प्रीतां दे पहरेदार' और 'इश्क जिन्हां दे हड्डीं रचया' कहानी संग्रह प्रकाशित हुए। गुरबख्श सिंह के पास कहानी कहने का अपना निजी दृष्टिकोण था और थी भावुक संवेदनशीलता और रसिक शैली। कई कहानियों में मनौवैज्ञानिक चित्रण गहरा विश्लेषण लिए हुए है और जीवन यथार्थ को नया अर्थ भी प्रदान करता प्रतीत होता है। 10 कहानी संग्रह, एक उपन्यास, 7 बाल साहित्य की पुस्तकें तथा अनेक लेख संग्रह इनके नाम हैं। कुछ पुस्तकों का अनुवाद भी किया। 'प्रीतलड़ी' मासिक पत्रिका के संस्थापक रहे गुरबख्श सिंह जी प्रीत नगर की स्थापना भी की। सन् 1977 में निधन।
संपादक - ‘कथा पंजाब’



कहानी

भाभी मैना
गुरबख्श सिंह
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

शहर की एक गली में आमने-सामने दो घरों के बीच मुश्किल से तीन-साढ़े तीज गज़ का फासला होगा। दो खिड़कियाँ भी पहली मंजिल पर आमने-सामने ही खुलती थीं। एक खिड़की में से सामने दीवार पर बड़ा-सा शीशा टंगा हुआ दीखता था। इस कमरे में बाकी चीजें भी कम ही थीं। एक चारपाई, एक पीढ़ा, एक आले में दो-चार किताबें, तेल की शीशी, दीवार पर एक-दो तस्वीरें और टोकरी में दो-चार कपड़े।
यह एक छोटा-सा कमरा था। इसमें सिवाय एक स्त्री के कोई दूसरी सूरत कम ही दिखाई देती थी। वह कभी कसीदा काढ़ती, कभी किताब पढ़ती, कभी सिर झुकाये बैठी रहती और कभी शीशे के सामने खड़ी होकर कितनी-कितनी देर तक बालों में कंघी करती। वह दिन में कई बार कंघी किया करती थी। घरवालों का ख़याल था कि वह कंघी के पीछे दीवानी है।
उसके बाल लम्बे भी बहुत थे। जब वह गर्दन घुमाकर बालों की लम्बाई देखती तो उसे अपने बाल टखनों को छूते दिखाई देते थे। और अगर किसी ने उजाले में देखे होते तो उनकी चमक को वह भूल न पाता। इसमें भी कोई शक नहीं कि उसे अपने बालों पर बड़ा नाज था।
वह जवान थी, बेहद खूबसूरत और लम्बी। उसकी आँखों का रंग सामने वाली खिड़की में से नहीं देखा जा सकता था लेकिन उसकी छवि बड़ी मीठी और उदास थी।
वह कितनी कितनी देर तक अपनी खिड़की में बैठी आँसू बहाती रहती। उसे कभी किसी ने खिड़की में से बाहर सिर निकालकर झाँकते नहीं देखा था। लेकिन गली की औरतों को उसके बैठे होने का अहसास ज़रूर होता था और कभी कोई वहाँ से गुजरते हुए उसे आवाज़ भी दे लेती थी। और वह प्रत्युत्तर में बड़े मीठे लहजे में ज़रा झुककर जवाब दे देती थी।
जब वह कमरे में नहीं होती थी तो खिड़की बन्द हो जाती थी। किन्तु, जाड़ों में तीसरे पहर, और गर्मियों में करीब बारह बजे उसकी खिड़की अवश्य खुलती थी। इस समय वह खिड़की में थोड़ा-सा घूमकर बैठी होती और कभी-कभी गली में झाँक भी लिया करती।
उस वक्त, एक लड़का जो देखने में बच्चा-सा ही लगता था, बस्ता उठाये गली के मोड़ से आता दिखाई देता। वह सब काम छोड़कर खिड़की की दरारों में से उधर ताकती रहती। वह लड़का भी कभी कभी ऊपर देखता और फिर अपने घर में घुस जाता। लड़के के सीढ़ियाँ चढ़ने की खट-खट स्त्री के कानों में सुनाई देती। वह कभी उस घर में नहीं गयी थी पर, उसे घर के जीने की सीढ़ियों की गिनती याद थी। हर सीढ़ी पर पड़ते कदमों को उनकी आवाज़ के साथ उसने कई बार अपनी छाती से दबाया था।
दूसरे के घर में कोई दरवाजा खुलता, वह बगैर देखते जान लेती कि सामने वाली बैठक में कोई आया है।
बस्ता एक ओर रखकर वह लड़का कुछ देर के लिए अपनी खिड़की खोलकर सामने वाली खिड़की की ओर देखता। स्त्री उधर नहीं देखती थी पर, उसे पता रहता था कि उसकी तरफ वे आँखें लगी हुई हैं जिसकी राह वह रोज़ देखा करती थी। और अगर किसी दिन उसे स्कूल से लौटने में देर हो जाती थी तो वह आ रहे लड़कों से पूछना चाहती थी - ''काका, क्यों नहीं आया ?'' लेकिन पूछा उसने कभी नहीं था।
काका आता और बैठक का दरवाजा बन्द करके कोठे पर चढ़ जाता।
इसी तरह बहुत-सा समय गुजर गया। काका अब तेरह बरस का हो रहा था। सामने वाली खिड़की में अब उसे कुछ अधिक ही स्वाद आने लगा था। एक दिन उसने माँ से पूछा, ''हमारे घर सभी आते हैं पर, सामने वाले घर से कभी कोई क्यूँ नहीं आता?''
''काका, हमारी गली में यही अकेला जैनियों का घर है। ये लोग माँस से बहुत परहेज करते हैं, इसलिए ये सिक्खों से कोई व्यवहार नहीं रखते।''
''पर माँ, हम तो माँस नहीं खाते।''
''ये समझते हैं कि सारे सिक्ख माँस खाते हैं।''
''तो क्या ये लोग घर से भी बाहर नहीं निकलते ?''
''निकलते हैं, लेकिन यह बड़ा दु:खी घर है। मौत ने इस घर को उजाड़कर रख दिया है। एक ही बेटा बचा था, उसकी शादी की लेकिन दो ही सालों में वह भी मर गया। मरने के बाद एक बच्चा हुआ, वह भी साल भर जिन्दा न रह सका। अब तीनों विधवा औरतें रोने-धोने को रह गई हैं।''
''वह बच्चा किसका था ?''
''मैना का, जिसे तुमने कई बार खिड़की में बैठे देखा होगा।''
''माँ, वह हर समय खिड़की में क्यों बैठी रहती है ?''
''ये लोग जवान विधवा बहुओं की बड़ी रखवाली करते हैं। और इस घर में काम भी ज्यादा नहीं है।''
''रखवाली क्यों करते हैं ?''
''यूँ ही, किसी के साथ घर की कोई बात कर बैठेंगी। खुश जो नहीं रहतीं।''
''माँ, हमारे घर जितनी औरतें आती हैं, किसी को आप कहते हो चाची कहूँ, किसी को मौसी, किसी को बुआ कहूँ। अगर वह कभी मुझे मिले तो मैं उसे क्या कहकर बुलाऊँ?''
''कौन ? मैना ?''
''हाँ, जो खिड़की में बैठी रहती है।''
''यह तुम्हारी भाभी है। इसका घरवाला, गली के नाते तेरा भाई लगता था। बड़ा अच्छा लड़का था।''
''यह मैना किस तरह का नाम हुआ ?''
''तुझे अच्छा नहीं लगा ?''
''नहीं, बड़ा अच्छा लगा है। लेकिन इससे पहले मैंने कभी इस तरह का नाम नहीं सुना। मैना वही होती है न, जो मामाजी के घर पिंजरे में बैठी बहुत प्यारी बातें करती है? तोता इतना अच्छा नहीं बोलता।''
''हाँ, वही।''
''माँ, मुझे एक मैना ले दोगी ?''
''काका, तू अपने मामा से ही कहना।''

कुछ दिनों बाद काके की बैठक में एक पिंजरा टंगा हुआ था। जब वह छत पर जाता तो इस पिंजरे को भी संग ले जाता।
अपनी मैना को काके ने सिखलाया, ''भाभी मैना खिड़की में बैठी है।''
खिड़की वाली मैना ने काके के साथ बात नहीं की थी लेकिन उसे बड़ा अच्छा लगता था जब पिंजरे वाली मैना कहती थी- ''भाभी मैना खिड़की में बैठी है।''
जाड़े की रातों में भाभी मैना अपने कमरे में सोती थी। इम्तिहान नज़दीक होने के कारण काका भी कुछ दिनों से बैठक में सोने लग पड़ा था। भाभी मैना को कई बार सोये हुए काके की साँसों की आवाज़ सुनाई देती थी। वह बिस्तर से उठकर बहुत देर तक इस आवाज़ को सुनती रहती थी।
उसकी उम्र अब पच्चीस बरस की होने लगी थी। काका अभी पूरे तेरह बरस का भी नहीं हुआ था। वह मन ही मन कहती थी, ''काश ! कभी मुझे इस बच्चे के संग बोलने की आजादी हो, जब वह स्कूल से लौट रहा हो, उस वक्त मैं खिड़की में से झांक कर उसे देख सकूँ, उसके साथ बातें कर सकूँ ! और अगर वह बीमार पड़े तो मैं उसके घर जाकर उसकी चारपाई पर बैठ सकूँ। बीमारी में भला किसी को किसी खराबी का क्या डर हो सकता है !''
फिर स्वयं ही कहती, ''मुझे इतनी आज़ादी कौन देने वाला है ? मैं तो इसी कमरे में बूढ़ी हो जाऊँगी, मेरे बाल मेरी सास के बालों की तरह उड़ जाएँगे... काके का विवाह हो जाएगा... यह खिड़की फिर इस तरह खुली नहीं रहेगी... फिर मैं किस इन्तज़ार में इस अंधेरी ज़िन्दगी के लम्बे दिन और लम्बी रातें काटा करूँगी ?''
यह सब सोचते सोचते उसका दिल बैठने लगा। वह बिस्तर पर से उठकर खिड़की में चली गई। चाँदनी रात थी। खुली खिड़की में से हल्की हल्की चाँदनी काके के चेहरे पर पड़ रही थी। काका गहरी नींद में सोया हुआ था। वह तेज तेज साँसें ले रहा था। मैना के मन में एक उबाल सा उठा। उसे दो घरों के बीच का फासला बहुत कम लगा। कितना अच्छा हो अगर वह दोनों खिड़कियों के बीच चारपाई डालकर पुल बना ले। वह सोचने लगी- काश! वह काके के पास चली जाए। वह उसे जगाएगी नहीं, उसका मुख दूर से ही चूमकर अपने कमरे में लौट आएगी।
लेकिन न तो वह फासला इतना कम था और न ही उसके चाव जितनी हिम्मत उसके अन्दर थी। वह चारपाई पर आकर लेट गई। कुछ देर बाद काके की बैठक में से आवाज़ आई, ''भाभी मैना !'' वह चौंक कर फिर उठी। लेकिन वह तो पिंजरे की मैना की आवाज़ थी। काका उसी तरह सोया पड़ा था।
उसी समय मैना की सास शायद शौच के लिए उठी थी। उसे मैना के कमरे में से खटर-पटर सुनाई दी। साथ ही उसे 'भाभी मैना' की आवाज़ का भ्रम-सा हुआ। उसने मैना को आवाज़ दी। मैना अन्दर से तुरन्त बोल पड़ी।
सास का शक पक्का हो गया, ''तू सोयी नहीं थी, मैना ? रात तो आधी गुजर चुकी है।''
''यूँ ही नींद खुल गई थी।''
सास कमरे में आ गई। उसे सामने वाली खिड़की में कोई सोया हुआ दिखाई दिया- आदमी का चेहरा !
''तू किससे बातें कर रही थी?''
''मैंने भला किससे बातें करनी थी।''
सास ने पुन: सामने वाली खिड़की की ओर देखा।
''वह तो सरदारों का काका है, गहरी नींद में सो रहा है।'' मैना ने कहा।
सास चली गई। लेकिन बेशक काका अभी बच्चा था और अपनी उम्र से भी अधिक भोला, पर था तो आखिर मर्द-बच्चा। विधवाओं का भला क्या काम कि वे बच्चों की ओर भी इस तरह देखें।
मैना स्कूल से लौटते काके की ओर देखती है। काका भी आते ही पहले ऊपर की बैठक में जाता है और खिड़की खुली रखता है। पिछले साल की बनिस्पत वह इस साल कुछ बड़ा-सा भी मालूम होता है।
ये बातें सुनने वाली नहीं थी। यही छोटी-छोटी बदलियाँ कई बार काली घटाएँ बन जाती हैं।
आज जब काका स्कूल से लौटा, मैना की खिड़की बन्द थी। यह खिड़की रात में भी अब बन्द रहने लगी। यह खिड़की काके की ज़िन्दगी का भी एक हिस्सा बनती जा रही थी। उसका मन अब खेलों में भी इतना नहीं लगता था। माँ से पूछने का कोई लाभ नहीं था क्योंकि उस घर से माँ का कोई वास्ता नहीं पड़ता था। बस, शादी-ब्याह के अवसर पर ही भाजी देने-दिलाने के लिए दहलीजें लाँघी जाती थीं।
आज अंधेरी रात थी। मैना की खिड़की में से खटर-पटर सुनाई दी जैसे कोई चाबियाँ बदल-बदल कर ताला खोलने की कोशिश कर रहा हो। फिर, आहिस्ता से खिड़की खुली। मैना ने उठकर दरवाजे से कान लगाये, कहीं कोई जाग तो नहीं रहा ?...फिर गली में झांका, फिर काके के साँस की आवाज़ सुनी। काका सो रहा था, उस अंधेरे में किसी को कुछ दिखाई नहीं देता था। लेकिन मैना की प्यार भरी निगाहें काके का अंग-अंग देख रही थीं।
दूसरे ही पल उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह काके की चारपाई पर बैठी हो, उसके कोमल बालों में उँगुलियाँ फेर रही हो और उसे जगा रही हो ! मैना के कानों में उसकी अपनी ही आवाज़ सुनाई दी, ''काका... काका...काका...''
काका हड़बड़ाकर उठ बैठा।
मैना को बड़ी शर्म आयी। उसे अब मालूम हुआ कि वह मन में नहीं मुँह से बोल रही थी। और काका जाग उठा था। अगर कोई और भी जाग उठा हो तो ?
काका अपनी खिड़की में आ बैठा। वह भी महसूस कर रहा था कि खिड़की के अंधेरे में भाभी मैना बैठी थी। उसने कई बार चाहा था कि वह भाभी मैना के गले में बाँहें डाल दे। जब से खिड़की बन्द रहने लगी थी, वह बेहद उदास रहता था।
''भाभी मैना... भाभी मैना...''
''हाँ, काका, मेरा सुन्दर काका... लेकिन जरा धीमे। मैं धीमी से धीमी बात भी सुन लूँगी।''
''मुझे भी आपकी आवाज़ साफ सुनाई दे रही है। आप बहुत धीमा बोलते हो।''
''हाँ, मेरे प्यारे काके !''
''आप इतने दिन कहाँ चले गए थे ?''
''मेरा कमरा हवालात बना दिया गया है। इस खिड़की को ताला लगा दिया गया है।''
''सो क्यों ?''
''उस दिन तेरी मैना ने मुझे आवाज़ दी थी, मैं उठ गई थी। मुझे लगा, तुमने आवाज़ दी है। मेरी शामत आयी थी, मेरी सास भी उसी वक्त उठ बैठी। उसे लगा, मैं तुझसे बातें कर रही थी।''
''तो फिर क्या हुआ ? माँ ने बताया था, आप मेरी भाभी हो।''
''काका, बहुत कुछ हो गया। फाटकों को ताले लग गए, इसलिए अब मैं यहाँ से चली जाऊँगी। इस घर में यह मेरी आखिरी रात है। मैं तुझसे मिलकर जाना चाहती थी, तुम किसी को बताओगे तो नहीं ?''
''मैं नहीं बताऊँगा, भाभी मैना पर, आप क्यों जा रहे हो ? न जाओ। मैं बड़ा होऊँगा, मेरा विवाह होगा, मैं अपनी बीवी को आपके पास भेजा करूँगा। वह आपको बुलाया करेगी। आप उससे मिलने आया करना। फिर कोई कुछ नहीं कहेगा। आप न जाओ।''
''लेकिन काका, अभी तुम बहुत छोटे हो। तुम्हारी शादी दूर है। इतने बरस इस कैदखाने में कैसे काटे जाएँगे जबकि तेरी ओर देखना भी मेरा बन्द हो गया है।''
''आप कहाँ जाएँगी ? मैं वहाँ आपसे मिलने आऊँगा।''
''नहीं काका, जहाँ मैं जा रही हूँ, वहाँ मुझसे कोई मर्दजात बात नहीं कर सकेगा।''
''आप वहाँ न जाओ।''
''मेरे लिए और कोई रास्ता नहीं बचा। मैंने पूजनी बनने का फैसला किया है।''
''पूजनी क्या होती है ?''
''ऐसी औरतें जिनके सिर मुंडे होते हैं, मुँह पर पट्टियाँ बंधी होती हैं और पैर नंगे होते हैं।''
''ना भाभी मैना, आप कभी वैसी मत बनना। मुझे उनसे बहुत डर लगता है। उनकी आँखों पर बंधी पट्टियाँ कुछ और ही तरह की लगती हैं।''
''काका, मेरे सामने कोई और रास्ता नहीं रहा।'' उसने एक गेंद सी बनाकर खिड़की में से उसकी बैठक में फेंकी और कहा, ''मेरी यह निशानी रखना- सुबह ढूँढ़ लेना। इस वक्त खटर-पटर सुनकर कोई जाग न जाए।'' और मैना की खिड़की बन्द हो गई। काके ने ताले में चाबी घुसाने की आवाज सुनी। शेष रात वह सो नहीं सका।
दूसरे दिन जब वह स्कूल से लौटा तो उसकी माँ ने बताया कि मैना बड़ी दुखी थी। रोज उसकी सास उससे लड़ती थी और ताने देती थी। मैना तंग आकर घर से निकल गयी है और लिखकर छोड़ गई है कि वह पूजनी बनने जा रही है।
''लेकिन माँ, वह यहाँ रहकर पूजनी नहीं बन सकती थी ?''
''नहीं, जिसे पूजनी बनना हो वह अपना शहर छोड़कर किसी दूसरे शहर के मन्दिर में जाकर रहने लगती है। वे लोग उसकी जाँच-पड़ताल करते हैं। अगर उसकी नीयत पर यकीन हो जाए तो उसकी पूरी हिफाजत करते हैं, अच्छा खाने-पहनने को देते हैं और कुछ दिनों के लिए उसे जो चाहे सो करने देते हैं। फिर उसका सर मूंड कर उसे पूजनी बना देते हैं। उसके बाद न वह अच्छा खा सकती है, न अच्छा पहन सकती है, न ही मर्दों से बातचीत कर सकती है।''
''भाभी मैना गई कहाँ होगी ?''
''पता चल जाएगा।''
''अगर वह किसी नज़दीक के शहर में होगी तो मुझे दिखा लाओगे ?''
''पिंडी में इनका बहुत बड़ा मन्दिर है। वहाँ तेरी मौसी भी रहती है। अगर वहाँ होगी तो दो दिन के लिए हो आना। तुम्हारी मौसी तुम्हें दिखा देगी। जब कभी कोई पूजनी बनती है, सारे शहर में बड़ी रौनक होती है।''
काके ने अपनी मौसी को लिख दिया कि वह उसका पता लगाएँ।
दो हफ्तों में ही सबको पता चल गया। सारी गली में मैना की ही बातें हो रही थीं। बड़ी अच्छी औरत थी। किसी ने उसका माथा तक नहीं देखा था। कितने खूबसूरत बाल थे। बालों की देखभाल भी कितना करती थी। उसे रुंड-मुंड कर दिया जाएगा। नोंच-नोंच कर सारे बाल उखाड़ लिए जाएंगे। बेचारी !
काका मौसी के पास पहुँच गया। उसकी मौसी आज मैना को देखकर आयी थी। उसने बहुत सुन्दर वस्त्र पहन रखे थे, गहने भी। ये गहने लोगों ने उसे उधार में दिए थे। वे लोग गाना-बजाना भी करवा रहे थे। जब मौसी को यह मालूम हुआ कि मैना काके की गली में ही रहती थी तो उसकी दिलचस्पी और ज्यादा बढ़ गई थी। वह हर रस्म पर जाती रही। उसने काके को बताया कि मैना को बड़ा रूप चढ़ा हुआ था। कल उसे डोली में बिठाकर शहर में घुमाया जाएगा। लोग उस पर फूल बरसाएँगे, गुलाब जल छिड़केंगे।
काका अपनी भाभी को देखने के लिए बड़ा बेताब था। उसने उसे हमेशा एक ही पोशाक में देखा था। वह उन कपड़ों में भी बड़ी अच्छी लगती थी। गहने उस पर कैसे फबते होंगे ?... काके ने उसे कभी हँसते हुए नहीं देखा था। मौसी उसका जिक्र करते हुए बताती थी कि मैना की मुस्कराहट बड़ी ही मनमोहक थी।
मैना का दिया हुआ रूमाल, उसकी निशानी काके की भीतरी जेब में थी। उसने यह बात किसी को नहीं बतायी थी। लेकिन वह उस रूमाल को रोज देखता था। उसने हिन्दी के अक्षर सीख लिए थे क्योंकि रूमाल पर मैना ने हिन्दी में कढ़ाई की थी- 'बहुत प्यारे काके को, उसकी भाभी की ओर से...'
उसकी मौसी ने बताया कि अगले दिन दुपहर के बाद मैना की डोली निकलेगी। वह सब बाजारों में घूमेंगी। हर कोई उसे देख सकता है।
काके ने दूसरे दिन मौसी के बाग में से बहुत सारे फूल तोड़कर रूमाल में बाँध लिए थे। और जब डोली उनके चौक के नज़दीक से गुजरी तो वह जान-बूझकर घर के लोगों से अलग हो गया। वह डोली देखकर ही लौटना नहीं चाहता था बल्कि पूरे रास्ते डोली के साथ रहना चाहता था।
वर्दी पहने लोग बाजे बजा रहे थे। जैनी लोग रुपये-पैसों की वर्षा कर रहे थे। डोली में उसकी भाभी गहनों से लदी बैठी थी। बेशक उसका चेहरा कुछ और ही तरह का लग रहा था लेकिन उसमें पहले वाली झलक भी थी। इस हँसते हुए चेहरे से कहीं अधिक काके को उसकी उदास आँखें प्यारी लगती थीं। लोग कहते थे कि इस पूजनी को बेइन्तहा रूप चढ़ा है। लेकिन इस आडम्बर में काके को मैना भाभी के वे प्यारे नक्श पूरी तरह से दिखाई नहीं दे रहे थे।
उसे जब भी लगता कि भाभी उसकी ओर देख रही है, वह उस पर फूल फेंक देता था। वह हाथ जोड़ देती थी। लेकिन वे हाथ काके के लिए नहीं थे। वह सोच रहा था कि इतनी बड़ी भीड़ में छोटा-सा काका मैना भाभी देख भी कैसे सकती थी।
एक मोड़ मुड़ते समय अचानक डोली उसके बहुत करीब आ गई। जब फूलों की वर्षा हुई तो मैना ने हाथ जोड़ दिए। उसी वक्त काका फूल बरसाने वाला था। तभी मैना ने उसे पहचान लिया। उसकी अधमुंदी आँखें खुलकर चौड़ी हो गईं। उसने ध्यान से देखा। फिर हिम्मत करके डोली रोकने के लिए कहा, ''यह काका हमारी गली का है। मुझ पर फूल फेंकना चाहता है... उसके हाथ डोली तक नहीं पहुँच सकते... उसे एक मिनट के लिए मेरे पास ला दो।''
एक अजब बात थी यह। लेकिन, पूजनी बनने वाली की बात टाली नहीं जाती।
''ला काका, तेरे ये फूल मैं ले लूँ, तू बड़ी दूर से आया है, मेरी गली के काके...''
काका बहुत खुश हुआ कि भाभी मैना ने उसे पहचान लिया। पास बुलाकर हाथों की अँजुरी बनाकर फूल ले लिए। रूमाल भी नहीं लौटाया, शायद, भाभी निशानी रखेगी।
जुलूस मन्दिर पर पहुँच गया। लोग विदा हो गए। मैना और उसके साथ की कुछ स्त्रियाँ मन्दिर में चढ़ गईं। सीढ़ियों पर पैर रखने से पहले मैना ने देखा, काका सामने वाली एक दुकान के तख्ते पर खड़ा था।
मन्दिर में बड़े पुजारी के सामने उसे बिठा दिया गया।
''क्या तुमने दृढ़-निश्चय कर लिया है ?'' बड़े पुजारी ने पूछा।
''जी महाराज, कर लिया है।''
''तुम्हें सारे कपड़े-गहने उतार देने होंगे, और फिर ज़िन्दगी में तुम इन्हें अंगीकार नहीं कर सकोगी।''
''जी महाराज, मुझे इनकी कोई चाह नहीं।''
''तुम वही कुछ खा-पी सकोगी जो हमारी श्रेणी के नियमानुसार होगा।''
''जी महाराज, मुझे अच्छे भोजन की कोई ज़रूरत नहीं।''
''मर्दों को छूना तो दूर रहा, उनका ख़याल भी उस धर्म में विघ्न डालेगा जिसे इस वक्त तुम चुन रही हो।''
मैना ने लम्बी साँस ली। उसे जेब में रखा काके का रूमाल खुलता महसूस हुआ। उसे लगा जैसे रूमाल के छोर छोटी-छोटी बाँहें बनकर उसकी कमर के गिर्द लिपट गए हैं। कुछ सम्भलकर उसने उत्तर दिया, ''हाँ महाराज, यह भी कुबूल...''
''अब तू उस कमरे में जाकर ये कपड़े उतार दे। जो कपड़े तुझे दिए जाएँ, वे पहन ले। इसके बाद तुझे अपने केश कटवाने होंगे। और उसके बाद तुझे तेरी पूजनी माता बताएगी कि किस तरह उँगलियों की पोरों से एक एक बाल नोंचा जाता है।''
बालों के काटने-उखाड़ने का जिक्र सुनकर वह अपनी आह न रोक सकी और साहस करके बोली, ''पूज्य पिताजी, क्या आप मुझे बाल रखने की आज्ञा नहीं दे सकते?''
''यह कैसे हो सकता है ?'' बड़ा पुजारी बेहद हैरान होकर बोला।
''मैं जानती हूँ, मेरी यह माँग अनौखी है।'' मैना को एकाएक अपने अन्दर एक ताकत-सी महसूस हो रही थी, ''लेकिन अगर आप मान लें, मैं कभी आपसे शिकायत नहीं करूँगी... मेरे अन्दर न जाने कौन सी गाँठ है। मैं आपकी ऐसी सेवा करूँगी कि सारी कौम दंग रह जाएगी। मेरे बाल न काटे जाएँ।''
''लेकिन यह कदापि नहीं हो सकता। तुम्हें पता नहीं था ?''
''मुझे पता था। मैं बाल कटवा लूँगी... लेकिन... काटने का समय अभी नहीं आया है। मुझे लग रहा है कि मेरे बाल जिन्दा हैं, ये मेरे प्राणों में से उगे हुए हैं। जब मैं इनमें कंघी करती थी तो ये एक झटके में ही मेरी टांगों को छू लेते थे। इनमें काई जिन्दा स्पर्श था। कई बरसों से मैंने सिवाय इन बालों के किसी से बात तक नहीं की है।'' फिर वह माथा टेक कर बोली, ''हे परम पूज्य ! एक बार अनहोनी भी करके देख लीजिए। आपको अपने निर्णय पर कभी पश्चाताप नहीं होगा।''
बड़े पुजारी का दिल पसीज तो गया लेकिन पूजनी स्त्री के सिर पर बाल देखकर लोग क्या कहेंगे ?
''नहीं, तुम्हारी यह बात नहीं मानी जाएगी।''
''तो फिर, हे पूज्य, मुझे पाँच मिनट का समय दीजिए ताकि मैं एकान्त में अपने मन को समझा लूँ।'' मैना ने मन मज़बूत करके कहा।
''हाँ, जाओ, सामने चबूतरे पर बैठकर सोच लो।''
मैना उठी और धीमे लेकिन मज़बूत कदमों से सामने वाले चबूतरे पर जा बैठी।
''यह कोई अनोखी औरत है। मैंने कई औरतों की यह रस्म अदा की लेकिन इस औरत की हर बात सोच में डाल देती है। अगर यह पूजनी बन गई तो बड़ी शोहरत हासिल करेगी।''
''लेकिन यह चबूतरे पर खड़ी क्यों हो गई है ?'' दूसरे आदमी ने घबराकर पूछा।
बड़े पुजारी ने भी देखा। मैना चबूतरे पर खड़ी हो गई थी। उसने अपनी उँगलियाँ जूड़े में फेरीं, जूड़ा खुल गया, बाल कमर से नीचे तक गिरने लगे। मद्धम हवा के झोंकों में बालों की रेशमी जुल्फें सरसरा रही थीं।
''कितने लम्बे...''
''ओह !'' सब उठकर सीढ़ियों की ओर दौड़ पड़े। छज्जे पर कोई औरत नहीं खड़ी थी।
सब लोग नीचे पहुँच गए। बाजार में हाहाकार मचा हुआ था। एक लड़का क्षत-विक्षत मैना के सिरहाने बैठा था। उसने बिखरे हुए बालों को माथे पर से हटाकर मांग सीधी कर दी थी। काले बालों में जगह-जगह सिन्दूर की तरह लहू चमक रहा था। लड़के की आँखों से जार-जार आँसू बह रहे थे और वह नीचे पड़ी औरत की आँखों में देख रहा था, आँखें खुली हुई थीं।
काके ने इन आँखों का रंग पहले कभी नहीं देखा था। वे उस काली रात जैसी स्याह थीं जिस रात आखिरी बार उसने काके को जगाया था। लेकिन उस रात की गहराइयों में कोई सूरज छिपा हुआ था। तभी तो उस रात वह अँधेरे में भी देख सकती थी।
वे अब भी उतनी ही काली और उतनी ही रौशन थीं। वे खुली हुई थीं। लेकिन इस समय उनमें कोई सूरज नहीं था।
00

3 टिप्पणियाँ:

निर्मला कपिला 15 दिसंबर 2009 को 5:20 pm  

बहुत सुन्दर कहानी है प्रीत लडी जी की हर रचना यथार्थ के बहुत करीब होती है। धन्यवाद

Roop Singh Chandel 16 दिसंबर 2009 को 6:59 pm  

बहुत मार्मिक और सुन्दर कहानी.

रूढ़ियों और धर्मान्धता पर चोट करती.

अद्भुत---

चन्देल

Anuj 20 दिसंबर 2009 को 10:49 am  

"भाभी मैना" ने दिल को छू लिया। इतनी ह्रदयस्पर्शी कहानी है कि जेहन पर से उतर ही नहीं रही। आप अच्छा काम कर रहे हैं। पंजाबी की बेहतरीन कहानियों को अपने ब्लॉग के माध्यम से हिन्दी के विशाल पाठकों तक पहुँचाने का यह कार्य नि:संदेह प्रशंसनीय और सराहनीय है।

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश है। कथा-कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, शब्दचित्र आदि से जुड़ी कृतियों का हिंदी अनुवाद हम ‘अनुवाद घर’ पर धारावाहिक प्रकाशित करना चाहते हैं। इच्छुक लेखक, प्रकाशक ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ जानने के लिए हमें मेल करें। हमारा मेल आई डी है- anuvadghar@gmail.com

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव
वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, मूल्य : 300 रुपये

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
शुभम प्रकाशन, एन-10, उलधनपुर, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032, मूल्य : 120 रुपये

रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव

रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव
यूनीस्टार बुक्स प्रायवेट लि0, एस सी ओ, 26-27, सेक्टर 31-ए, चण्डीगढ़-160022, मूल्य : 400 रुपये

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव
नीरज बुक सेंटर, सी-32, आर्या नगर सोसायटी, पटपड़गंज, दिल्ली-110032, मूल्य : 150 रुपये

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह) संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह)  संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव
नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नेहरू भवन, 5, इंस्टीट्यूशनल एरिया, वसंत कुंज, फेज-2, नई दिल्ली-110070, मूल्य :60 रुपये।

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष 1998, 2004, मूल्य :35 रुपये

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-1100-6, मूल्य : 125 रुपये

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव
प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

पंजाबी की साहित्यिक कृतियों के हिन्दी प्रकाशन की पहली ब्लॉग पत्रिका - "अनुवाद घर"

"अनुवाद घर" में माह के प्रथम और द्वितीय सप्ताह में मंगलवार को पढ़ें - डॉ एस तरसेम की पुस्तक "धृतराष्ट्र" (एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा) का धारावाहिक प्रकाशन…

समकालीन पंजाबी साहित्य की अन्य श्रेष्ठ कृतियों का भी धारावाहिक प्रकाशन शीघ्र ही आरंभ होगा…

"अनुवाद घर" पर जाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें - http://www.anuvadghar.blogspot.com/

व्यवस्थापक
'अनुवाद घर'

समीक्षा हेतु किताबें आमंत्रित

'कथा पंजाब’ के स्तम्भ ‘नई किताबें’ के अन्तर्गत पंजाबी की पुस्तकों के केवल हिन्दी संस्करण की ही समीक्षा प्रकाशित की जाएगी। लेखकों से अनुरोध है कि वे अपनी हिन्दी में अनूदित पुस्तकों की ही दो प्रतियाँ (कविता संग्रहों को छोड़कर) निम्न पते पर डाक से भिजवाएँ :
सुभाष नीरव
372, टाइप- 4, लक्ष्मीबाई नगर
नई दिल्ली-110023

‘नई किताबें’ के अन्तर्गत केवल हिन्दी में अनूदित हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तकों पर समीक्षा के लिए विचार किया जाएगा।
संपादक – कथा पंजाब

सर्वाधिकार सुरक्षित

'कथा पंजाब' में प्रकाशित सामग्री का सर्वाधिकार सुरक्षित है। इसमें प्रकाशित किसी भी रचना का पुनर्प्रकाशन, रेडियो-रूपान्तरण, फिल्मांकन अथवा अनुवाद के लिए 'कथा पंजाब' के सम्पादक और संबंधित लेखक की अनुमति लेना आवश्यक है।
‘कथा पंजाब’ के आगामी अंक में आप पढ़ेंगे –‘पंजाबी कहानी : आज तक’ में पंजाबी के प्रख्यात लेखक गुलजार सिंह संधु की कहानी, ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी और बलबीर मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की अगली किस्त…

Marquee

  © Free Blogger Templates Wild Birds by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP