पंजाबी लघुकथा : आज तक

>> रविवार, 13 दिसंबर 2009

पंजाबी लघुकथा : आज तक(3)
'पंजाबी लघुकथा : आज तक' के अन्तर्गत पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के कथाकार भूपिंदर सिंह और हमदर्दवीर नौशहरवी की चुनिंदा लघुकथाएं आप पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत हैं- पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के ही एक और सशक्त और बहुचर्चित लेखक दर्शन मितवा की पाँच चुनिंदा लघुकथाएं... दर्शन मितवा का जन्म पंजाब के मानसा जिले में 5 अप्रैल 1953 में हुआ था और 13 मई 2008 को उनका निधन हो गया। मितवा हिन्दी और पंजाबी में समान रूप से पढ़े जाने वाले लेखक रहे। लघुकथाओं के अलावा उन्होंने अनेक कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे। 'नंगे सिर वाली औरत', 'इक रात का जख्म', 'चुप रात का सिवा' उनके प्रमुख उपन्यास हैं और 'छिलकों का घोड़ा', 'बर्फ़ का आदमी', 'दस गिट्ठ धरती', और 'ऊँचे चढ़कर देखा' कहानी संग्रह। इसके अतिरिक्त 'जनाब, हम हाजिर हैं', 'इश्क अल्ला की जात' दो नाटक तथा 'इधर-उधर कहाँ तक' और 'कथा एक मृत की' दो एकांकी संग्रह। प्रस्तुत लघुकथाओं पर पाठकों की प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
सुभाष नीरव
संपादक : कथा पंजाब



दर्शन मितवा की पाँच लघुकथाएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

(1)
कुत्ते का खाना
आयकर अधिकारी को तीन-चार मातहतों के संग अपनी दुकान की ओर आता देख दुकानदार ने अपनी ऐनक ठीक की और तेजी से गद्दी से उठकर खड़ा हो गया। हाथ जोड़कर उसने नमस्ते की और उनको बिठाने के लिए अपनी धोती के पल्लू से कुर्सियाँ साफ करने लगा। जब तक वे लोग कुर्सियों पर सजें, तब तक खाने के लिए काजू और पीने के लिए फलों का जूस आ गया। खाने-पीने के उपरांत आयकर अधिकारी ने अपनी मूंछों पर हाथ फिराते हुए दुकानदार से हिसाब-किताब की किताबें लीं और औपचारिकतावश उनको उलटने-पलटने लगा। एक पन्ने पर उसकी नज़र अटक गई। वह हैरान भी हुआ और मुस्कराया भी। उसने वह पन्ना अपने मातहतों को दिखाया। वे भी मुस्कराये बिना न रह सके - ''कैसे-कैसे लोग हैं जो आयकर बचाने के लिए कुत्ते को डाली गई रोटी के टुकड़े का खर्च भी किताबों में डाल देते हैं।''
खुले हुए पन्ने पर खर्च वाली लाइन इस प्रकार लिखी हुई थी-
'तारीख 17-2-89
कुत्ते का खाना - पचास रुपये।'

खर्च की लाइन पढ़कर दुकानदार भी 'ही-ही' करता हुआ उन सबके साथ हँसने लगा।
थोड़ी देर बाद वे सब चले गए। दुकानदार ने अपने हिसाब-किताबवाली किताब खोली। काजू से लेकर जूस का सारा खर्च जोड़ा और किताब में उसने एक नई लाइन लिखी - 'तारीखी 29-8-89, कुत्तों का खाना -एक सौ पचास रुपये।'
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(2)
मायाजाल
वह अपनी धुन में चला जा रहा था। सामने सड़क पर गिरे पड़े पैसों पर अकस्मात् उसकी नज़र पड़ी तो उसने चारों ओर से चौकस होते हुए झट से उन्हें उठाकर अपनी मुट्ठी में भींच लिया। चाल पहले से कुछ तेज कर ली। थोड़ा आगे जाकर उसने अपनी बन्द मुट्ठी को खोलकर देखा तो दो रूपये थे। एक-एक के दो नोट !
क्षणभर के लिए वह खुश हुआ और रुपये पैंट की जेब में डालकर आगे चल दिया। फिर अचानक जैसे उसे कुछ याद आया। वह पहले से धीमी गति में चलने लगा।
''अगर कहीं ये दोनों दस-दस के नोट होते... बात बन जाती।'' यह सोचकर वह उदास हो गया, ''कम से कम कुर्ता-पाजामा... और अगर कहीं सौ-सौ के नोट होते तो नज़ारा बँध जाता। वाह रे खुदा ! जब देने ही लगा था तो कुछ अधिक दिए होते। किसी काम तो आ जाते। हजार-पाँच सौ से कोई कामकाज ही शुरू कर लेता। तू देता तो है मगर मुट्ठी भींच लेता है देते वक्त...। कभी दस-बीस हजार इकट्ठे ही दे दे, हम भी जीकर देख लें।'' सोचते-सोचते उसने फिर से अपनी जेब में हाथ डाला जैसे रुपये सचमुच ही दो से बढ़कर हजार-दो हजार बन गए हों।
मगर, उसका कलेजा धक्क् से रह गया।
उसका हाथ जेब के आर-पार था। दो रुपये भी फटी हुई जेब में से कहीं गिर गए थे।
''बस...!'' वह रुआँसा-सा हो गया, ''वे भी गए ससुरे ! और नहीं तो शाम की रोटी का ही जुगाड़ हो जाता।'' वह अपनी फटी जेब में हाथ डाले वहीं खड़ा रह गया और चारों तरफ ऐसे देखने लगा जैसे वह अपनी गुम हो गई किसी वस्तु को ढूँढ़ रहा हो।
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(3)
धंधा
वह भिखारी एक लम्बे अरसे से परेशान था। उसका धंधा बिलकुल चौपट होता जा रहा था। पहले वह कभी-कभार दारू का पेग भी लगा लिया करता था, पर अब उसे दो वक्त की रोटी कमाना भी मुश्किल हो गया था। उसने अंधा होने का नाटक किया, गूंगा-बहरा भी बना। कोढ़ी बनकर भी भीख मांगी, मगर उसे कोई कुछ नहीं देता था। शायद उसे सभी पहचानने लगे थे और चालबाज कहने लगे थे।
एकाएक उसने अपने पिछले सभी ढोंग बन्द कर दिए। अब मैं कुछ दिन से सुन रहा हूँ कि वह कहीं पर किसी भगवान का घर बनवा रहा है और इस काम के लिए शहर भर से चंदा एकत्र कर रहा है। अब भी सभी लोग उसे जानते-पहचानते हैं मगर फिर भी जोर-शोर से रुपये देते जा रहे हैं।
उसका धंधा फिर से चल निकला है।
अब दारू और मुर्ग-मुसल्ल्म की तो बात ही क्या है !
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(4)
औरत और मोमबत्ती
''अच्छा तो इधर आ।'' वह औरत को घर के अन्दरवाले कमरे में ले गया।
''देख, यहाँ कितना अँधेरा है... और जब मुझे उजाले की ज़रूरत पड़ती है...'' उसने जेब से दियासलाई निकाली और सामने कार्निश पर लगी मोमबत्ती जला दी।
कमरे में उजाला बिखर गया।
''देख, जब तक मुझे उजाला चाहिए... यह जलती रहेगी।''
वह औरत उसकी ओर देखती रही।
''जब मुझे इसकी ज़रूरत नहीं होती तो...'' कहते ही उसने मोमबत्ती को फूंक मार दी।
कमरे में अँधेरा पसर गया।
उस औरत ने उसके हाथ से दियासलाई की डिबिया ली और सामने कार्निश पर लगी मोमबत्ती फिर से जला दी।
आदमी उसकी ओर देख रहा था।
''पर, औरत कभी मोमबत्ती नहीं होती।'' उस औरत के होंठ हिले, ''जिसे जब जी चाहा, जला लो और जब जी चाहा, बुझा दो...।''
दोनों की नज़रें मिलीं।
''समझे !... और मैं भी एक औरत हूँ, मोमबत्ती नहीं।''
अब आदमी चुप था।
औरत के चेहरे पर अनोखा जलाल था।
और, अब मोमबत्ती जल रही थी।
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(5)
झिझक
उस पढ़े लिखे नौजवान ने कहीं जाना था।
वह बस-अड्डे पर बसों के बोर्ड पढ़ता घूम रहा था। मूर्ख कहलाये जाने के डर से उसने किसी से भी बस के बारे में नहीं पूछा।
बस, वह घूमता रहा। एक बस से दूसरी और दूसरी से तीसरी।
एक कोई अनपढ़-सा आया।
उसने बस में बैठी सवारी से बस के बारे में पूछा और झट से बस में सवार हो गया।
बस चल पड़ी थी।
पर वह पढ़ा-लिखा नौजवान अभी भी बसों के बोर्ड पढ़ता हुआ अड्डे का चक्कर काट रहा था।
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4 टिप्पणियाँ:

बलराम अग्रवाल 15 दिसंबर 2009 को 7:30 pm  

भाई दर्शन मितवा की लघुकथाओं के माध्यम से ही उनसे परिचय हुआ था और पत्राचार भी। उनकी लघुकथाओं का पंजाबी और हिन्दी दोनों भाषाओं में विशेष स्थान है। इतनी कम उम्र में उनके निधन के समाचार ने चौंका दिया। मेरी ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

Roop Singh Chandel 16 दिसंबर 2009 को 7:05 pm  

भई; कुत्ते का खाना ; मायाजाल ; धंधा ----सभी लघुकथाएं उल्लेखनीय हैं. लेकिन पहली का जवाब नहीं---- तुम्हारा अनुवद भी लाजवाब है.

चन्देल

Anuj 20 दिसंबर 2009 को 10:52 am  

दर्शन मितवा जी की लघुकथाएं पहले भी पढ़ीं हैं। अच्छी लगती रही हैं, पर आपका चयन तो लाजवाब है। लेखक की श्रेष्ठ रचनाएं देकर आपने न केवल रचनाकार का कद ऊँचा किया है बल्कि आप स्वय भी ऊँचे हुए हैं।

सुरेश यादव 24 दिसंबर 2009 को 11:17 pm  

भाई सुभाष नीरव जी के रवानीदार अनुवाद के माद्ध्यम सेदर्शन मितवा जी की इतनी सशक्त लघु कथाओं से परिचय हो सका .इन्हें पढ़कर ऐसा लग रहा है की हिंदी से इतर अन्य भाषाओँ में बहुत महत्वपूर्ण लघु कथाएं -कथाएं लिखी जा रही हैं तो गलत नहीं होगा.कथाकार तो बधाई का पात्र है ही ,नीरव जी को ऐसे चुनाव तथा अनुवाद के लिए धन्यवाद.

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प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

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