‘कथा पंजाब’ में आपका स्वागत है ! मई 13 अंक में आप पढ़ेंगे- ‘पंजाबी कहानी : आज तक’ के अन्तर्गत पंजाबी के प्रख्यात लेखिका अजीत कौर की एक प्रसिद्ध कहानी 'एक और फालतू औरत', ‘आत्मकथा/स्व-जीवनी’ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक प्रेम प्रकाश की आत्मकथा ‘आत्ममाया’ की अगली कड़ी तथा ‘पंजाबी उपन्यास’ के अन्तर्गत बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास ‘पीला गुलाब’ की 15वीं किस्त …

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पंजाबी लघुकथा : आज तक

>> रविवार, 20 सितंबर 2009





पंजाबी भाषा में लघुकथा 'मिन्नी कहाणी' के नाम से लिखी और पढ़ी जाती है। कुछ विद्वान 'जन्म साखियों' में पंजाबी मिन्नी कहानी अर्थात लघुकथा के अंश ढूँढ़ते हैं। 'जन्म साखियों' के अलावा इसके कुछ अंश प्राचीन लेखन और मौखिक साहित्य में जैसे कथा, साखी(हिकायत), बचन, सुखन, परीकथा, पुराण कथा, दंतकथा और नीतिकथा आदि के रूपों में भी ढूँढ़े जा सकते हैं। पंजाबी लघुकथा के विद्वान आलोचक डॉ. अनूप सिंह का मानना है कि साहित्य के प्राचीन प्रकारों से आधुनिक साहित्य विधायों को अन्तर्संबंधित करने के पीछे जो भावना कार्य कर रही है, उसका अर्थ यह है कि वर्तमान पंजाबी लघुकथा के बीज हमारे 'विरसे' में मौजूद हैं। कुछ विद्वान पंजाबी लघुकथा का उद्भव भाई मनीसिंह द्वारा अट्ठाहरवीं सदी के उत्तरार्ध्द में लिखी गई 'ज्ञान रचनावली' और 'भगत रतनावली' पुस्तकों में वर्णित गल्प टुकड़ों से मानते हैं। इसी आधार पर पंजाबी के चर्चित लघुकथा लेखक जगदीश अरमानी भाई मनी सिंह को पंजाबी लघुकथा का पूर्वज समझते हैं, जबकि डॉ. श्यामसुंदर दीप्ति का मत है कि पंजाबी लघुकथा के इतिहास को समझते हुए इस बात को पूरी तरह समझने की आवश्यकता है कि साहित्य का इतिहास, नैतिक साहित्य का इतिहास और धर्म का इतिहास - ये सब पृथक पृथक विषय हैं। यह बात ठीक है कि ये सभी एक ही सामाजिक प्राणी अर्थात् मनुष्य का वर्णन करते हैं, परन्तु यह अलग-अलग क्षेत्रों के मनुष्यों के भिन्न-भिन्न पहलुओं को अपने-अपने ढंग से देखते-परखते हैं। इसीलिए साहित्य के इतिहास में किसी अन्य क्षेत्र को गड्ड-मड्ड नहीं किया जाना चाहिए और लघुकथा को एक साहित्यिक विधा मानते हुए इसके पिछले इतिहास को साहित्य के इतिहास में ही ढूँढ़ा जाना चाहिए। पंजाबी लघुकथा के प्रख्यात आलोचक डॉ. अनूप सिंह के अनुसार पंजाबी के चर्चित उपन्यासकार जसवंत सिंह 'कंवल' की पुस्तक 'जीवन कणियाँ' (प्रकाशन वर्ष 1944) में दर्ज रचनाओं में आधुनिक पंजाबी लघुकथा का जन्म देखा जा सकता है। इसके बाद, जनवरी 1956 में बिशन सिंह 'उपासक' की पुस्तक 'चोंभा' के प्रकाशित होने के साथ ही पंजाबी लघुकथा के लक्षण उभर कर सामने आते हैं। पुरातन जन्म साखियों के विपरीत इन दोनों पुस्तकों में संकलित कहानियाँ न तो उपदेशात्मक हैं और न ही धार्मिक। ये नितांत साहित्यिक, सामाजिक, दार्शनिक, रहस्यपूर्ण और रोमांटिक हैं। ये रचनाएं तात्कालिक सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुकूल हैं। तीसरी महत्वपूर्ण पुस्तक पंजाबी लघुकथा की विकास यात्रा में जगदीश अरमानी की 'धुआं और बादल' सन् 1967 में प्रकाशित हुई थी। इसमें 13 लघु रचनाएं संकलित थीं जिनके बारे में डॉ. कुलबीर सिंह कांग और कृश्न मदहोश ने अपनी-अपनी भूमिका में इनको 'ख्याल' और 'सुर्ख हाशिये' कहा था। इस प्रकार कहा जा सकता है कि इस समय तक इस विधा का नामकरण पंजाबी में नहीं हुआ था।


पंजाबी लघुकथा के अगले पड़ाव में दो संपादित लघुकथा संग्रह सामने आए। पहला 'तरकश' नाम से जो सन् 1971 में रोशन फूलवी और ओमप्रकाश गाशो ने मिलकर संपादित किया था। इसमें 48 लेखकों की 76 लघु रचनाएं संकलित थीं। यह संपादित पुस्तक पंजाबी लघुकथा के इतिहास में इसलिए भी विशेष महत्व रखती है क्योंकि इसी पुस्तक में पहली बार 'मिनी' शब्द का प्रयोग किया गया था। संपादित पुस्तकों की लड़ी में दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक 'अब जूझन के दाव' है जिसे सन् 1975 में अनवंत कौर और शरन मक्कड़ ने मिलकर संपादित किया था। इसमें 63 लेखकों की 108 लघुकथाएं संकलित हैं।


'पंजाबी लघुकथा : आज तक' के अन्तर्गत सर्वप्रथम हम पंजाबी लघुकथा की प्रारंभिक और अग्रज पीढ़ी के लेखकों की लघुकथाओं को क्रमश: प्रकाशित करने का प्रयत्न करेंगे। इन लेखकों ने पंजाबी में श्रेष्ठ और मानक लघुकथाएं उस दौर में लिखीं जब पंजाबी लघुकथा में काफी धुंधलका था। इस धुंधलके को साफ करने में इन लेखकों का महत्ती योगदान रहा है। इनमें भूपिंदर सिंह, दर्शन मितवा, हमदर्दवीर नौशहरवी, सुलक्खन मीत, शरन मक्कड़, श्यामसुंदर अग्रवाल, श्यामसुंदर दीप्ति, जगदीश अरमानी, पांधी ननकानवी, हरभजन सिंह खेमकरनी, धर्मपाल साहिल, कर्मवीर सिंह, गुरमेल मडाहड़, सुरेंद्र कैले, प्रीतम बराड़ लंडे, रोशन फूलवी, जिंदर, निरंजन बोहा, बिक्रमजीत नूर, डॉ. अमर कोमल, मेहताबुद्दीन, जगरूपसिंह दातेवास, बलबीर परवाना, डॉ. बलदेव सिंह खहिरा, इकबाल दीप, सतवंत कैथ, कृश्न बेताब, एस. तरसेम आदि अनेक नाम लिए जा सकते हैं।


''कथा पंजाब'' के पहले अंक में 'पंजाबी लघुकथा : आज तक' सीरिज के अन्तर्गत सर्वप्रथम पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के कथाकार भूपिंदर सिंह की पाँच चुनिंदा लघुकथाएं प्रस्तुत कर रहे हैं। इन पर पाठकों की प्रतिक्रिया की हमें प्रतीक्षा रहेगी।
सुभाष नीरव
संपादक : कथा पंजाब



भूपिंदर सिंह की पाँच लघुकथाएं

हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव



(1) भविष्यवाणी


''जबरदस्त बरसात और आंधी आने वाली है, बेटा।'' बुजुर्ग़ माँ ने कहा।

''आपको कैसे मालूम ?''

''यह देख, चींटियाँ अपने अंडे मुँह में दबाये ऊँची और सुरक्षित जगह की ओर चली जा रही हैं।'' माँ ने दीवार पर ऊपर की ओर चढ़ती हुई चींटियों की लम्बी कतार दिखाते हुए कहा, ''कुदरत का करिश्मा है। इन्हें आने वाली जोरदार बरसात का पहले ही पता चल जाता है।''

मैं चींटियों पर से निगाहें हटा कर बाहर झांकने लगा।

विद्यार्थी चुपचाप स्कूल जा रहे थे। मज़दूर चुपचाप कारखानों की ओर बढ़ रहे थे। कर्मचारी ख़ामोशी से दफ्तरों की ओर जा रहे थे।

मुझे ये सब चींटियों-से लगे।

''कोई बड़ा इन्कलाब आने वाला है।'' मैं बुदबुदाया।

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(2) पहुँचा हुआ फकीर


एक कमरा कह लो या छोटा घर। वहीं सास-ससुर, वहीं पर बड़ी ननद, वहीं पर छोटा देवर ! और एक तरफ़ पति-पत्नी की दो चारपाइयाँ।

बहू को 'दांत भींचनी' पड़ने लगी। पलभर में हाथों-पैरों पर हो जाया करती। होंठों का रंग नीला पड़ जाता। हक़ीमों की दवा-बूटियाँ करके देखीं। डॉक्टरों के टीके लगवाए, पर कोई फायदा न हुआ।

किसी ने एक फक़ीर के विषय में बताया। सात मील पर उसका डेरा ! पति ने उसे आगे साइकिल के डंडे पर बिठाया और फिर पैडिल दबा दिए। रास्ते में एक छोटा-सा बाग पड़ा। डंडा चुभने का बहाना बना कर पत्नी उतर गई। दोनों बाग में जा कर बैठ गए। जी भर कर बातें हुईं। फिर दो आत्माएँ एक हो गईं। कोई रोकने वाला नहीं था। जो मन में आया, किया।

''आज की यात्रा से फूल की तरह हल्की हो गई हूँ, जैसे कोई रोग ही नहीं रहा हो।'' डेरे पर पहुँच कर उसने कहा।

''तो हर बुधवार बीस चौकियाँ भरो, बेटी। दवा-दारू की ज़रूरत नहीं। महाराज भली करेगा।''

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(3) रोटी का टुकड़ा


बच्चा पिट रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर अपराध का भाव नहीं था। वह ऐसे खड़ा था जैसे कुछ हुआ ही न हो। औरत उसे पीटती जा रही थी, ''मर जा जाकर... जमादार हो जा... तू भी भंगी बन जा... तूने उनकी रोटी क्यों खाई ?''

बच्चे ने भोलेपन से कहा, ''माँ, एक टुकड़ा उनके घर का खा कर क्या मैं भंगी हो गया ?''

''और नहीं तो क्या ?''

''और जो काकू भंगी हमारे घर में पिछले दस सालों से रोटी खा रहा है तो वह क्यों नहीं बामन हो गया ?'' बच्चे ने पूछा।

माँ का उठा हुआ हाथ हवा में ही लहराकर वापस आ गया। वह अपने बेटे के प्रश्न का जवाब देने में असमर्थ थी। वह कभी बच्चे को तो कभी उसके हाथ में पकड़ी हुई रोटी के टुकड़े को देख रही थी।

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(4) आज की द्रौपदी


द्रौपदी अपने पति और सास-ससुर के साथ एक छोटे से कमरे में रहती थी। यह छोटा-सा कमरा ही तो उसका घर था। द्रौपदी का ससुर जब भी घर में आता, उसके पांवों की आवाज़ कुछ ज्यादा ही होने लगती। बहू आदर के तहत घूंघट निकाल लेती।

द्रौपदी ने एक बच्चे को जन्म दिया। ससुर घर आने लगा। अब वह दूर से ही खांसना आरंभ कर देता। या अपने पोते को ऊँची आवाज़ में पुकारने लग पड़ता। बहू का काम बढ़ गया था। कभी-कभी वह जल्दबाजी में घूंघट निकाल लेती। बच्चा गोरी छाती चूंघता-चूंघता कभी माँ की ओर देखता, कभी उसकी छाती की ओर।

मुँह जो ढका होता !

छाती जो नंगी होती !

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(5) विवशता



प्रतिमा जितना अपनी कलम को प्यार करती थी, उतना ही देव को भी। प्रतिमा शादीशुदा न थी। देव जब भी कुछ लिखता, उसे लगता, जैसे वह प्रतिमा को ख़त लिख रहा हो। प्रतिमा भी जब कुछ लिखती, वह समझती, वह मानो देव के लिए विशेष संदेशा लिख रही हो।

प्रतिमा की जब नई किताब छपी, उसने सोचा, देव आएगा तो उसे हसीन पलों की याद भेंट करेगी। किताब की एक प्रति पर लम्बे और लाल सुर्ख नाखूनों वाली उसकी उंगलियाँ अपने आप चलने लगीं -

'देव को

दोस्ती की निशानी...

- प्रतिमा।'

अगली शाम, तारों की छांव में लेटी हुई प्रतिमा को न जाने क्या सूझी कि उसने वह किताब उठाई और कुछ और शब्द जोड़ दिए :

'मिसेज देव और मि. देव को

दोस्ती की निशानी...

- प्रतिमा और प्रतिमा।'

देव आया तो प्रतिमा ने बड़े चाव से अपनी यादों के पल उसे भेंट किए।

''ये ढाई शब्द दो शामों में लिखे थे न, प्रतिमा ?''

''नहीं, दो जीवन जी कर।'' सहज ही उसके मुँह से निकल गया।

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जन्म : 1 जुलाई 1937
शिक्षा : एम.ए.(राजनीति शास्त्र)
कृतियाँ : सौ पत्त मछली के (लघुकथा संग्रह), ऊँचा टीला, सायरन की आवाज़, मीना बाजार, इश्क सिरों की बाजी, एक किनारे वाला दरिया, कर्फ्यू आर्डर, सूरज-सूरज धूप निकाल, इक्यावन का नोट(सभी कहानी संग्रह), सलीब और सरहद, किरनों की आह, रिश्ता धुंध जैसा(उपन्यास)।

9 टिप्पणियाँ:

नारायण प्रसाद 21 सितंबर 2009 को 10:48 pm  

भूपिन्दर सिंह जी की लघुकथा "रोटी का टुकड़ा" बहुत पसन्द आया ।

इसका मूल पंजाबी में शीर्षक क्या है ?

सुझाव - अनुवाद प्रस्तुत करते समय मूल भाषा के मूल शीर्षक का भी उल्लेख किया जाय ।

बेनामी 22 सितंबर 2009 को 11:53 am  

सुभाष जी,
नमस्कार !
इस साइट का अवलोकन किया । बहुत पसन्द आया । भूपिन्दर सिंह जी की लघुकथा का मगही अनुवाद संलग्न है । यदि कोई आपत्ति न हो तो इसे मगही मासिक "अलका मागधी" में प्रकाशन हेतु भेजना चाहूँगा ।
क्या मूल पंजाबी लघुकथा का कोई ब्लॉग है ? यदि नहीं तो चर्चित पंजाबी लघुकथाओं के किसी संग्रह का विवरण देने की कृपा करें ।
धन्यवाद !
सादर
नारायण प्रसाद
hindix@gmail.com

सुभाष नीरव 22 सितंबर 2009 को 12:13 pm  

नारायण प्रसाद जी, आपकी टिप्पणी बॉक्स में छोड़ी टिप्पणी और मेल द्वारा मुझे भेजी गई प्रतिक्रिया के लिए मैं आपका आभारी हूँ। आपके सुझाव की मैं कद्र करता हूँ। आपने भूपिंदर सिंह जी की लघुकथा 'रोटी का टुकड़ा' का मगही में बहुत ही सुन्दर अनुवाद किया है। आप इसे मगही मासिक "अलका मागधी' में सहर्ष प्रकाशन के लिए भेज सकते है। अगर संभव हो तो 'कथा पंजाब' का उल्लेख कर दें जहाँ से आपने इस लघुकथा को लिया है। पंजाबी लघुकथा पर भाई श्याम सुन्दर अग्रवाल जी ने अभी हाल ही में ब्लॉग आरम्भ किए हैं। बहुत अरसा हुआ भाई अशोक भाटिया ने 'पंजाबी की श्रेष्ठ लघुकथाएं' नाम से हिन्दी में पुस्तक दी थी। वर्ष 1997 में हिन्दी में मेरी एक पुस्तक "पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं" प्रकाशित हुई थी जो अब आउट आफ़ स्टाक है। मेरे पास बस एक ही प्रति है। इस पुस्तक में पंजाबी की आरंभिक तीन लघुकथा पीढ़ियों के चर्चित लघुकथाकारों की बारह बारह लघुकथाएं संकलित की गई थीं। इसके बाद भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल, डा0 श्यामसुन्दर दीप्ति,सुकेश साहनी ने इस प्रकार का बहुत महत्वपूर्ण काम किया है, पुस्तकों के माध्यम से।

M.A.Sharma "सेहर" 22 सितंबर 2009 को 1:36 pm  

भविष्यवाणी और रोटी का टुकडा...अंतर्मन को छूती हुयी लाजवाब रचनाएँ !!

बहुत बधाई !!

बेनामी 23 सितंबर 2009 को 6:54 pm  

Bhupendar singh kee kahaniyan bhee aprtim hain or lekhak ke sath huee
batcheet laghu katha ka ek or aayam kholtee hai pathak ke samne ! is
naye prayas kee sanjhedaaree kee kritgynta sahit-
Rekha
rekha.maitra@gmail.com

सुभाष नीरव 24 सितंबर 2009 को 12:29 pm  

निम्न टिप्पणी विश्वमोहन तिवारी जी ने 'पंजाबी लघुकथा : आज तक' पर दी है जो कि गलती से वह इसे 'कथा पंजाब' के कालम 'लेखक से बातचीत पर दे बैठे हैं-

भूपिंदर की लघु कथा 'चीटियाँ , बहुत सशक्त और समसामयिक है.
पत्रिका 'पाठक मित्र' है.
बधाई
विश्व मोहन तिवारी

भगीरथ 25 सितंबर 2009 को 10:06 am  

नये व बढिया पत्रिका के लिये बधाई

ashok andrey 25 सितंबर 2009 को 6:16 pm  

bhupendar jee kii paancho laghu kathaen apne aap mei bahut gehrii soch ke saath man ko chhu jaati hein kisi ek ke baare mei kehnaa yaa jikr karnaa bemaani hogaa inn adbhut laghu kathaon ke liye mei aapko tathaa lekhak ko badhai detaa hoon
ashok andrey

रूपसिंह चन्देल 26 सितंबर 2009 को 9:37 pm  

भूपिन्दर सिंह की पांचों लघुकथाएं पढ़ गया .

‘अद्भुत’ के अलावा कोई शब्द ही नहीं सूझ रहा . पहली लघुकथा ने तो पूरी तरह झकझोर ही दिया.

बस बधाई और बधाई ---

चन्देल

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश है। कथा-कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, शब्दचित्र आदि से जुड़ी कृतियों का हिंदी अनुवाद हम ‘अनुवाद घर’ पर धारावाहिक प्रकाशित करना चाहते हैं। इच्छुक लेखक, प्रकाशक ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ जानने के लिए हमें मेल करें। हमारा मेल आई डी है- anuvadghar@gmail.com

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पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

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कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

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