आत्मकथा/स्व-जीवनी

>> मंगलवार, 2 अप्रैल 2013



आत्मकथा/स्व-जीवनी(13)


पंजाबी के एक जाने-माने लेखक प्रेम प्रकाश का जन्म ज़िला-लुधियाना के खन्ना शहर में 26 मार्च 1932(सरकारी काग़ज़ों में 7 अप्रैल 1932) को हुआ। यह 'खन्नवी' उपनाम से भी 1955 से 1958 तक लिखते रहे। एम.ए.(उर्दू) तक शिक्षा प्राप्त प्रेम प्रकाश 'रोज़ाना मिलाप' और 'रोज़ाना हिंद समाचार' अख़बारों
में पत्रकारिता से जुड़े रहे। 1990 से 2010 तक साहित्यिक पंजाबी त्रैमासिक पत्रिका 'लकीर' निकालते रहे। लीक से हटकर सोचने और करने में विश्वास रखने वाले इस लेखक को भीड़ का लेखक बनना कतई पसन्द नहीं। अपने एक इंटरव्यू में 'अब अगर कहानी में स्त्री का ज़िक्र न हो तो मेरा पेन नहीं चलता' कहने वाले प्रेम प्रकाश स्त्री-पुरुष के आपसी संबंधों की पेचीदा गांठों को अपनी कहानियों में खोलते रहे हैं। यह पंजाबी के एकमात्र ऐसे सफल लेखक रहे हैं जिसने स्त्री-पुरुष संबंधों और वर्जित रिश्तों की ढेरों कामयाब कहानियाँ पंजाबी साहित्य को दी हैं। इनकी मनोवैज्ञानिक दृष्टि मनुष्य मन की सूक्ष्म से सूक्ष्मतर गांठों को पकड़ने में सफल रही हैं।

       कहानी संग्रह 'कुझ अणकिहा वी' पर 1992 मे साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त यह लेखक अस्सी वर्ष की उम्र में भी पहले जैसी ऊर्जा और शक्ति से निरंतर लेखनरत हैं। इनके कहानी संग्रह के नाम हैं - 'कच्चघड़े'(1966), 'नमाज़ी'(1971), 'मुक्ति'(1980), 'श्वेताम्बर ने कहा था'(1983), 'प्रेम कहानियाँ'(1986), 'कुझ अनकिहा वी'(1990), 'रंगमंच दे भिख्सू'(1995), 'कथा-अनंत'(समग्र कहानियाँ)(1995), 'सुणदैं ख़लीफ़ा'(2001), 'पदमा दा पैर'(2009)। एक कहानी संग्रह 'डेड लाइन' हिंदी में तथा एक कहानी संग्रह अंग्रेजी में 'द शॉल्डर बैग एंड अदर स्टोरीज़' (2005)भी प्रकाशित। इसके अतिरिक्त एक उपन्यास 'दस्तावेज़' 1990 में। आत्मकथा 'बंदे अंदर बंदे' (1993) तथा 'आत्ममाया'( 2005) में प्रकाशित। कई पुस्तकों का संपादन जिनमें 'चौथी कूट'(1996), 'नाग लोक'(1998),'दास्तान'(1999), 'मुहब्बतां'(2002), 'गंढां'(2003) तथा 'जुगलबंदियां'(2005) प्रमुख हैं। पंजाबी में मौलिक लेखक के साथ साथ ढेरों पुस्तकों का अन्य भाषाओं से पंजाबी में अनुवाद भी किया जिनमें उर्दू के कहानीकार सुरेन्द्र प्रकाश का कहानी संग्रह 'बाज़गोई' का अनुवाद 'मुड़ उही कहाणी', बंगला कहानीकार महाश्वेता देवी की चुनिंदा कहानियाँ, हिंदी से 'बंदी जीवन'- क्रांतिकारी शुचिंदर नाथ सानियाल की आत्मकथा, प्रेमचन्द का उपन्यास 'गोदान', 'निर्मला', सुरेन्द्र वर्मा का उपन्यास 'मुझे चाँद चाहिए' तथा काशीनाथ सिंह की चुनिंदा कहानियाँ आदि प्रमुख अनुवाद कृतियाँ हैं।

सम्मान : पंजाब साहित्य अकादमी(1982), गुरूनानक देव यूनिवर्सिटी, अमृतसर द्वारा भाई वीर सिंह वारतक पुरस्कार(1986), साहित्य अकादमी, दिल्ली(1992), पंजाबी अकादमी, दिल्ली(1994), पंजाबी साहित्य अकादमी, लुधियाना(1996), कथा सम्मान,कथा संस्थान, दिल्ली(1996-97), सिरोमणि साहित्यकार, भाषा विभाग, पंजाब(2002) तथा साहित्य रत्न, भाषा विभाग, पंजाब(2011)



सम्पर्क : 593, मोता सिंह नगर, जालंधर-144001(पंजाब)

फोन : 0181-2231941

ई मेल : prem_lakeer@yahoo.com


आत्म माया
प्रेम प्रकाश

हिंदी अनुवाद
सुभाष नीरव

‘रुकमणी’ वाली बेनाम बहन
यह कहानी लिखते समय मेरे पास कुछ अनुभव अपना था और अधिकांश मेरे मित्र राजकुमार का था। राजकुमार जिसने मुझे इस कहानी का बहुत सारा मसाला दिया था।
            मेरा अनुभव तो इतना ही था कि मैं अपने गाँव बडगुजरां गया हुआ था। यह सन् 1961-62 के आसपास की बात होगी। शायद यह उन दिनों की बात है जब मैं जालंधर छोड़कर खन्ना में जाकर बसना चाहता था। मेरी मानसिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। अक्सर उदासी का दौरा पड़ा रहता था। मुझे अपना दिन टिकाने के लिए गोली खानी पड़ती थी। मुझे चारों ओर निराशा ही निराशा दिखलाई देती थी। इस आस में बैठा था कि कोई राह अपने आप दिख जाए शायद। गाँव में मैं दिन भर पसीना बहाकर खेती का काम करता था और रात में कोई किताब पढ़ता पढ़ता सो जाता था। या जिस्म इतना थक जाता था कि पता ही नहीं चलता था कि कब किताब हाथ से गिर जाती थी। गोली शाम के वक़्त खाता था। दिन ढलते देखकर मुझे कुछ होने लग पड़ता था।
            उन दिनों में मेरे बच्चे भी मेरे पास थे। पता नहीं किस काम से हमारे दूर के रिश्तेदार की जवान लड़की दरशी हमारे पास रहने आई हुई थी। वह मुझसे कभी अंग्रेजी भी पढ़ लेती थी और साथ ही मुझसे मजाक भी कर लिया करती थी। वह मुझे ‘ओ मास्टर जी’ कहकर बुलाते हुए हँसा करती थी। वैसे मुझे ‘वीर जी’ कहती थी। एक दिन मेरा परिवार खन्ना गया हुआ था। माँ और छोटे भाई की घरवाली बाहर जंगल-पानी के लिए गई हुई थीं। बच्चे भाई वाली बैठक में बैठे पढ़ रहे थे। सर्दियों का मौसम था। दरशी और मैं चूल्हे के आगे बैठे मूंगफली भून भूनकर खा रहे थे। वह अपने मुँह का छिलका फूंक मारकर मेरी ओर फेंक देती और हँस पड़ती। जब वह ऐसा करने से न रुकी तो मैंने उसकी चुटिया के नीचे से गर्दन को पकड़कर हिलाया। वह हँसती रही। लेकिन शरारतें करने से बाज़ न आई। मैंने उसके कंधे पर चिकौटी काटी तो उसने मेरी बांह पर काट ली। फिर मैंने उसकी बगल में चिकौटी भरी तो उसने मेरी गाल पर भर ली। वह जवाबी हमला करके अंदर कमरे में जा घुसी और अपनी बिस्तर में जाकर लेट गई। मैंने ओढ़ी हुई रजाई के अंदर से हाथ डालकर उसके चिकौटी काटी। उसने अचानक अपना हाथ बाहर निकालकर मेरे पेट पर चिकौटी भरी। मैंने रजाई में फिर हाथ डाल तो मेरा हाथ उसकी छाती पर जा पड़ा। वह हँसती रही और हमारे हाथ ये खेल खेलते रहे।
            रात में मैं पशुओं वाले कोठे में सोता था। मैं नांद और रस्से देखकर अपनी चारपाई पर बैठकर लालटेन की रोशनी में किताब पढ़ने लग पड़ा। तब तक बिजली नहीं आई थी। दरशी दूध लेकर आ गई। पहले यह काम मेरी पत्नी किया करती थी। मैंने गिलास पकड़कर दीवार की अल्मारी में रख दिया। वह मेरे सिरहाने की तरफ़ बैठ गई। बोली, “तू इसे पी ले, मुझे गिलास लेकर जाना है।“
            जब मैंने गिलास न उठाया तो वह मेरी बांह पकड़कर गिलास उठवाने लग पड़ी। पता नहीं उसी समय मेरे मन में क्या आया कि मैंने उसको पकड़कर चूम लिया। यह हरकत जब मैं दूसरी बार करने लगा तो वह उठकर खड़ हो गई। बोली, “मैं तेरी बहन लगती हूँ।... कोई देखेगा तो क्या कहेगा ?“
            मैं बिल्कुल ढीला पड़ गया। लेकिन वह गिलास उठाकर जाते समय मेरे सिर का अंगोछा उतार गई। कुछ दिनों बाद वह चली गई। तीन महीनों के अंदर अंदर उसका विवाह हो गया। उसकी मंगनी हो रखी थी। कभी-कभी मेरा दिल करता कि वह खन्ना, समराला, पटियाला, लुधियाना या जालंधर के किसी भी बस-स्टैंड पर अचानक मिल जाए। परंतु वह दोबारा नहीं दिखाई दी।
            कई बरस बाद मेरे मित्र राज कुमार ने मुझसे मेरी यह बात सुनकर अपनी आप-बीती सुनाई। उसका गाँव जालंधर के म्युनिसिलप एरिये में ही है। मैं कभी–कभी उसके गाँव चला जाता था। गर्मियों में शाम के वक्त उसके कच्चे-पक्के कोठे पर बिछी चारपाइयों पर बैठकर बातें करने में बड़ा आनंद आता था। उसकी पंडितानी लकड़ी की सीढ़ी चढ़कर हमारे लिए चाय का लौटा और काँच के दो गिलास ऊपर मुंडेर पर रख जाती थी। हम दोनों के पास अपने अपने ब्रांड की सिगरेटों की एक एक डिब्बी हुआ करती थी। अस्त होते सूरज की धूप को उनकी घनी नीम रोक लिया करती थी। इस तरह कोठे पर बैठकर चाय और सिगरेटें पीते हुए बातें करने में हमें बहुत आनंद आता था।
            राज कुमार ने जो बात सुनाई थी, वह मैं शायद उतने स्वाद से नहीं सुना सकता जितने स्वाद से उसने सुनाई थी, पर अपने शब्दों और अपने अंदाज में मैं सुना रहा हूँ।
            “अभी मेरा विवाह नहीं हुआ था। वैसे मंगनी हो चुकी थी। मैंने उसे देख रखा था। एक रिश्तेदार के घर विवाह में देखी थी। सुंदर लगती थी। हम लोग पाकिस्तान से लुटे-पिटे आए थे। माँ हमारी उधर गुज़र गई थी। बस, भापा जी और हम दोनों भाई थे। भापा जी ने थोड़ी-बहुत दुकान चला ली थी। मैं दसवीं करके कच्ची नौकरी करने लग पड़ा था। मैं आटा गूंध लेता था और सामने तंदूर पर से रोटियाँ लगवा लाता था। दाल-सब्ज़ी भी बना लेता था। सभी रिश्तेदार और गाँव वाले भी मेरे विवाह पर ज़ोर दिए जाते थे।
            “एकबार हमारी मौसी फिल्लौर आई। उसने भापा जी को मना लिया विवाह के लिए।... नहीं, मेरे विवाह के लिए। वह लड़की उसके जेठ के ससुराल से थी। पर मैंने देख नहीं रखी थी। वह बैसाख का पक्का करके चली गई। अब मुझे खुशी भी थी और चिंता भी हुई कि मैं क्या करुँगा। मुझे तो कुछ पता ही नहीं था। एक और बात... अख़बारों, पत्रिकाओं में मर्दानी बीमारियों के विज्ञापनों का मारा हुआ था मैं। जैसे -“क्या आपने अपनी जवानी का खुद ही सत्यानाश किया है ?“, “क्या आप पत्नी के योग्य नहीं रहे ?“, “शीघ्रपतन ?“ और पता नहीं क्या-क्या... लगता कि ये सारी बीमारियाँ मुझे हैं। मैं चोरी छिपे दवाइयाँ खाया करता था। दफ़्तर का एक मित्र ला देता था।
            “लो जी, विवाह से बीसेक दिन पहले मौसी आ गई। पाकिस्तान में जब मेरी माँ जीवित थी, तब भी वही मौसी आकर काम किया करती थी। संग में उसकी इकलौती बेटी होती थी। हम उसे ‘दुलारी’ कहकर बुलाते थे। वह अपने विवाह के बाद करीब तीन महीने तक अपनी ससुराल में रहकर लड़-झगड़कर लौट आई थी। फिर छोड़ने-छुड़ाने का शोर पड़ गया था। सुंदर बहुत थी। पर बोलती बहुत थी। मुँहफट थी। हमारे भापा जी उसको ठीक नहीं समझते थे, पर विवाह के अवसर पर तो उनकी बहुत ज़रूरत थी।
            “वे आईं तो घर में रोटी अच्छी प्रकार से पकने लग पड़ी थी। कपड़े, गहने बनने लग पड़े थे। दोनों ने कमरा और रसोई बांट ली। मैं कोठे पर सोता था। मौसी, दुलारी और छोटा भाई नीचे आँगन में सोते थे। भापा जी पशुओं वाले कोठे के अहाते में सोते थे। एक रात मौका मिलने पर दुलारी ने भी अपना बिस्तर कोठे पर कर लिया। रात को हम बातें करते करते सो जाते। सवेरे हम जल्दी उठकर नीचे आ जाते। एक इतवार को हम देर से जागे। मुझे उसने दूर के कोठे की तरफ़ इशारा करके देखने को कहा। कई कोठे छोड़कर छीबियों के कोठे पर उनका दिल्ली में नौकरी करता लड़का और उसकी नव-ब्याही बीवी मच्छरदानी में पड़े थे। बीवी उठी तो उसने अंगी और चड्ढी पहन रखी थी। पेटीकोट और कमीज़ पहनकर वह नीचे उतर गई। देखकर हम दोनों हैरान रह गए।
            सोमवार को माँ-बेटी दोनों शहर से लौटीं तो उनके पास मच्छरदानियाँ भी थी। भापा जी इस बात पर बड़े नाराज़ हुए। मौसी बोली, “मच्छर बहुत है। और फिर, बहू छत पर कैसे सोएगी ?“
            रात में हमारे दोनों की चारपाइयों पर मच्छरदानियाँ तानकर देखी गईं। फिर वे तनी ही रहने दी गईं। सोते समय दुलारी पहले तो मेरा हाथ ही पकड़ती रही। जैसा कि वह प्रायः बात करते करते पकड़ लिया करती थी। फिर वह लेटी लेटी मेरी मच्छरदानी में आ घुसी। मैं बहुत घबराया। वह मुँह से तो कुछ नहीं बोली, पर मुझे कुछ करने के लिए इशारों से समझाती रही। फिर खुद ही करने लग पड़ी। अंत में हम सफल हो गए। मैं पास हो गया। मुझे बेहद खुशी हुई। फिर पूरा एक सप्ताह मैं इम्तहान ही देता रहा। हर बार मेरे नंबर बढ़ते गए। फिर पहल भी मैं ही करने लग पड़ा था। ऐसे भाई, मैंने ट्रेनिंग ली, बहन से। फिर उस बेचारी के साथ बुरा हुआ। उसको कोई जबरन उठाकर ले गया। शायद, खुद ही किसी के साथ भाग गई। दुबारा उसकी कोई खोज-ख़बर न मिली।“
            मैंने राज कुमार से पूछा था कि तुझे आत्म-ग्लानि नहीं हुई थी, यह सब करते ? तो उसका जवाब था कि यदि तू खुद ऐसी स्थितियों में होता और तुझे यह अवसर मिलता तो पता चलता। कई बार तो आदमी ऐसा करने की हालत में होता ही नहीं। पर मैं भी यह बात हर किसी को नहीं बताता। बुरा लगता है। शरम आती है।
             राज कुमार की बताई यह बात मेरे अंदर बहुत समय तक घूमती रही थी। कभी कभी उसकी पत्नी भी बीच में बोल पड़ती थी, पर उसको उसकी बात कड़वी ही लगा करती थी। फिर मेरी अपनी भी छोटी-सी कहानी थी। परंतु धीरे धीरे जब कहानी तैयार होने लगी तो मेरे सामने दुलारी का दुखांत बहुत बड़ा हो गया था। मैंने उसी को केंद्र में रखकर कहानी लिखी।
            यूँ तो पंजाब के अरोड़ा समाज में अपने मामा, बुआ और मौसी की बेटियों के साथ विवाह करवाने का प्रचलन है। उनके लिए यह प्रेम-प्रसंग कोई अनजानी बात नहीं। परंतु दूसरों के लिए बेशक मौसी की बेटी बहन है, पर उसका स्त्री होने का और अपने मर्द से दूर होने का दुखांत बड़ा है। उसके दुख के सामने मेरी प्रेम कहानी के कोई बड़े अर्थ नहीं। हाँ, यह जीव-विज्ञानियों के लिए गंभीर सवाल अवश्य।
(जारी)

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पंजाबी उपन्यास



बलबीर मोमी अक्तूबर 1982 से कैनेडा में प्रवास कर रहे हैं। वह बेहद सज्जन और मिलनसार इंसान ही नहीं, एक सुलझे हुए समर्थ लेखक भी हैं। प्रवास में रहकर पिछले 19-20 वर्षों से वह निरंतर अपनी माँ-बोली पंजाबी की सेवा, साहित्य सृजन और पत्रकारिता के माध्यम से कर रहे हैं। पाँच कहानी संग्रह [मसालेवाला घोड़ा(1959,1973), जे मैं मर जावां(1965), शीशे दा समुंदर(1968), फुल्ल खिड़े हन(1971)(संपादन), सर दा बुझा(1973)],तीन उपन्यास [जीजा जी(1961), पीला गुलाब(1975) और इक फुल्ल मेरा वी(1986)], दो नाटक [नौकरियाँ ही नौकरियाँ(1960), लौढ़ा वेला (1961) तथा कुछ एकांकी नाटक], एक आत्मकथा - किहो जिहा सी जीवन के अलावा अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मौलिक लेखन के साथ-साथ मोमी जी ने पंजाबी में अनेक पुस्तकों का अनुवाद भी किया है जिनमे प्रमुख हैं – सआदत हसन मंटो की उर्दू कहानियाँ- टोभा  टेक सिंह(1975), नंगियाँ आवाज़ां(1980), अंग्रेज़ी नावल ‘इमिग्रेंट’ का पंजाबी अनुवाद ‘आवासी’(1986), फ़ख्र जमाल के उपन्यास ‘सत गवाचे लोक’ का लिपियंतर(1975), जयकांतन की तमिल कहानियों का हिन्दी से पंजाबी में अनुवाद।

देश –विदेश के अनेक सम्मानों से सम्मानित बलबीर मोमी ब्रैम्पटन (कैनेडा) से प्रकाशित होने वाले
पंजाबी अख़बार ‘ख़बरनामा’ (प्रिंट व नेट एडीशन) के संपादक हैं।



आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यह उपन्यास ‘पीला गुलाब’ भारत-पाक विभाजन की कड़वी यादों को समेटे हुए है। विस्थापितों द्बारा नई धरती पर अपनी जड़ें जमाने का संघर्ष तो है ही, निष्फल प्रेम की कहानी भी कहता है। ‘कथा पंजाब’ में इसका धारावाहिक प्रकाशन करके हम प्रसन्नता अनुभव कर रहे हैं। प्रस्तुत है इस उपन्यास की आठवीं किस्त…

- सुभाष नीरव


पीला गुलाब
बलबीर सिंह मोमी

हिंदी अनुवाद
सुभाष नीरव


15

(प्रथम भाग)
मैं अक्सर सोचता रहता कि मैं कुछ नहीं हूँ। मन के शीशे में मुझे जो कुछ भी दिखाई देता, उसके अनुसार भी मैं अपनी प्रतिभा पर कोई गर्व नहीं करता। मुझे अपने अध्ययन या अनुभव का भी कोई अभिमान नहीं है। मेरे पास ऐसा भी कुछ नहीं है जिसको मैं उपलब्धि का नाम दे सकूँ। मैं यही अनुभव करता हूँ कि मेरा पल्ला खाली है। मेरे पास किसी को देने के लिए कुछ नहीं है। मुक्ति का चेहरा कभी कभी मेरी कल्पना में जब उभरता है तो मैं सोचता हूँ कि वह हू-ब-हू किसी ईरानी युवती जैसी पतली, लम्बी और गोरी हो। उसकी आँखों में स्वीडिश लड़कियों की आँखों जैसी नीली चमक हो। बाल कोई अधिक मेहनत न करने पर मांग निकालकर सादे ढंग से संवरे हुए हों। हाँ, एक गुस्ताख़ लट हवा के झोंके में बेशक कभी कभी उसके गोरे मुख को चूम ले। अलबत्ता चुन्नी को ओढ़ने का ढंग बिलकुल मुसलमानी हो, बायीं बुकल्ल। और जब कभी वह लम्बी गर्दन को घुमाकर तिरछी नज़रों से मुस्कराती हुई मेरी ओर देखे तो उसकी आँखों की मस्त पुतलियाँ भी कमान की तरह घूम जाएँ।
            और दुपट्टा बहुत बारीक अच्छा लगता है। और वह भी हल्के नीले रंग का। क्योंकि नीले रंग में से औरत का रूप इस तरह निखरकर चमकता है जैसे आसमान में चंद्रमा।
            किसी पहाड़ी कोने में मेरा छोटा-सा बंगला हो जिसके पिछवाड़े में तीख़ी खुशबू वाले फूल खिले हों और जब मैं खिड़की खोलकर उधर देखूँ तो खुशबू मेरे इर्द-गिर्द पसर जाए। और बगल वाली गहरी खड्ड में दूर तक चाँदी की तरह चमकता पानी हो। जब सूरज की आखि़री किरणों से नदी का पानी सुर्ख आभा देने लग पड़े तो मुक्ति बांह में बांह डाले एक हाथ से दूर चोटी पर दिखाई देते हमारे छोटे-से बंगले की ओर इशारा करके मुझे अपने संग-संग ले चले और हम तंग पगडंडियों पर गिरते, ढहते एक दूजे का सहारा लिए, शाम के झुटपुटे में वापस अपने छोटे-से बंगले में आ जाएँ।
            मेरे बच्चे सिर्फ़ दो हों। एक लड़की और एक लड़का। उनका रंग गोरा, नक्श तीखे और आकर्षक, आँखें नीली और बाल सुनेहरी हों, और वे शो केसों में रखे जापानी खिलौनों जैसे प्रतीत हों। शाम को जब मैं सैर करने जा रहा होऊँ तो मेरी बच्ची मेरी पेंट पकड़कर कहे, “डैडी, मेरे लिए च्युंगम लेकर आना।” और मुक्ति मेरी टाई दुरस्त करती हुई कहे, “दो पौंड सफ़ेद ऊन भी लेकर आना। सर्दी आने से पहले मैं बच्चों के और आपके स्वेटर बुन दूँ।” मैं मुस्करा कर अपने हाथ की दो उंगलियों से उसकी गाल थपथपाते हुए कहूँ, “ज़रूर लेकर लाऊँगा।”
            फिर एक युग बीत जाए। मेरे चेहरे पर अनुभव के गहरे प्रभाव दिखाई देने लग पड़ें और दूर कहीं बर्फ़ से लदी चोटियों की ओर जाने वाले किसी जिम्मेदार युवक की कार मेरे बंगले के सामने बहार पर आए सेब के पेड़ के नीचे खराब हो जाए। और वह बेबसी में कभी अपनी कार और कभी सेब के पेड़ पर पके हुए फलों को देखता हुआ अंग्रेजी गीत की धुन गुनगुना रहा हो। मेरी स्केयर्ड हार्ट कावनेंट में पढ़ी हुई बेटी उस खूबसूरत नौजवान को अपनी मीठी जुबान में सिर पर खड़ी रात काटने के लिए ‘आपका स्वागत है’ कहती हुई बंगले के अंदर ले आए। और जब रात की रानी अपना घूंघट निकाल ले और मैं ज़िन्दगी के उपन्यास का आखि़री चैप्टर पढ़कर कोलतार की सड़क पर आ जाऊँ और चाँद की किरणें सेब के पेड़ के पत्तों में से छन छनकर आ रही हों तो मैं देखूँ कि एक खूबसूरत अजनबी नौजवान मेरी बेटी के बालों में एक जंगली फूल खोंसता हुआ उसको पके हुए सेब दिखा रहा हो। यह सब देख मुझे ऐसा लगे कि मानो मैं प्राचीन भारतीय सभ्यता का कायल हूँ और पश्चिमीपन से घृणा करने लग पड़ा हूँ। अपनी बेटी का डोला विदा करने के बाद अंदर पलंग पर गिरकर रोने की मेरी इच्छा प्रबल होती प्रतीत हो और मैं गंभीर चित्त होकर पत्थर कदमों से अपने बिस्तर पर चला जाऊँ।
            रात पहाड़ी झरनों, जंगली फूलों, बर्फ़ से लदी सफ़ेद चोटियों, झाड़ियों में छिपे झींगुरों, तारों की रौशनी और बगल वाली गहरी खड्ड के निर्मल जल के नगमों से भीग उठे।
            सवेरे टैक्सी में से उतर कर मेरा बेटा विलायत से आ जाए और चमकती आँखों से अंग्रेजी में कहे -
            “डैडी, मेरी साथिन स्विटजरलैंड की रहने वाली है। स्विटजरलैंड जहाँ घड़ियों के कारखाने और डायरेक्ट डैमोक्रेशी है। हम दोनों ने एकसाथ डॉक्टरी पास की है। महीने भर में हमारी टूरिस्ट वैन जर्मनी से आ जाएगी और फिर हम गरीबों की बस्तियों में जाकर मुफ़्त इलाज करना शुरू कर देंगे।”
            मेरी भावपूर्ण मुस्कान से उनका भविष्य उजला हो जाए, और बाकी बातें वह अपनी मम्मी के लिए सुरक्षित रखते हुए अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ जाए।
            उस शाम मैं काला सूट पहनकर बाहर निकलूँ और सैर करने गया इस प्रकार चलूँ जैसे कोई हनीमून मनाने के लिए जाता है।
            पर यह सबकुछ अभी मेरे दिल में है। दिल से दिमाग तक पहुँचने में समय सेकेंड भर भी नहीं लगता। परंतु यह सेकेंड की सुई मुझे मेरी कल्पना से काट कर एकदम मुझे मेरे गाँव में ले जाती है। कभी यह कल्पना मुझे कालेज के क्लासरूम में ले जाती है, जहाँ प्रोफेसर टंडन अर्थ-शास्त्र के खुश्क विषय पर लेक्चर दे रहा है। मैं इस कल्पना को दिल की तहों में छिप जाने के लिए कहकर सचेत मन के करीब आने की निष्फल कोशिश करता हूँ। मैं सोचता हूँ, मैं कुछ नहीं हूँ। मैं अपनी प्रतिभा पर कोई गर्व नहीं करता। मुझे अपने अध्ययन अथवा अनुभव का भी कोई अभिमान या हौसला नहीं है। मेरे पास उपलब्धि नाम की भी कोई चीज़ नहीं है। मेरी झोली खाली है। मेरे पास किसी को देने के लिए कुछ नहीं है।
(जारी…)

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पंजाबी कहानी : आज तक

>> शनिवार, 16 मार्च 2013



पंजाबी कहानी : आज तक(15)

सुखबीर

जन्म: 9 जुलाई 1925, निधन : 22 फरवरी 2012

पंजाबी कहानी के एक बहु-आयामी लेखक, कवि, कथाकार, उपन्यासकार और सफल अनुवादक। मुम्बई में जन्मे इस लेखक ने पंजाबी में एम.ए. करके कुछ समय पत्रकारिता की, फिर स्कूल और कालेज में अध्यापन किया। फिर, एक स्वतंत्र लेखक के रूप में जीने का निर्णय किया। इनकी रचनाओं में महानगरीय जीवन की विसंगतियों की भरपूर अभिव्यक्ति मिलती है। इनके प्रमुख कहानी संग्रह इस प्रकार हैं - ‘डूबता चढ़ता सूरज’(1957), ‘मिट्टी और मनुख’(1973), ‘कल्लियाँ कारियाँ’(1973), ‘बारी विचला सूरज’(1975), ‘इकाई’(1987), ‘लोरी’(1988), ‘मनुख अते जड़ां’(1988), ‘सज्जे-खब्बे’(1989) और ‘रुकी होई रात’(इक्यावन चुनिंदा कहानियाँ)(2000)।


इकाई
सुखबीर
अनुवाद : सुभाष नीरव

कमरे में कोई भी चीज़ ऐसी नहीं थी जो उसकी दृष्टि को विशेष तौर पर अपनी ओर खींचती। वह जाना-पहचाना कमरा था जिसका एक कोना एक तरफ को बढ़ा हुआ था। शुरू में उसको यह कमरा देखकर अजीब-सा लगा था। उसका चौकोर न होना उसकी नज़र में अखरा था। उसको देखकर हर समय टेढ़ी चारपाई का ख़याल आता था। और जैसे टेढ़ी चारपाई पर सोना बेढ़ंगा-सा लगता है, उस कमरे में बैठकर या फर्श पर बिछे बिस्तर पर लेटकर भी बेढ़ंगा-सा लगता था मानो कोई चीज़ आपका ढांचा बिगाड़ बैठी हो।
            यह अहसास कुछ समय तक ही रहा था।
            फिर, आहिस्ता-आहिस्ता उसको मानो आदत पड़ गई थी। उसको लगा था कि कमरा इस प्रकार की शक्ल का भी हो सकता है। इस शहर में कई इमारतें थीं - तिकौनी अथवा अचौकोर प्लाटों पर बनी हुईं जिनमें कुछ कमरे ऐसे भी थे।
            हाँ, कमरे की किसी भी वस्तु ने उसका ध्यान अपनी ओर नहीं खींचा। वही नित्य-प्रतिदिन दिखाई देने वाली वस्तुएँ थीं। उसमें किल्लियों पर बड़ी सफाई से टंगे हुए कपड़े, नीचे लकड़ी के छोटे-से रैक में बड़े करीने से रखी हुई किताबें, पत्रिकाएँ और अख़बारें। उसी तरफ बढ़े हुए एक कोने में पड़े कुछ बर्तन, डिब्बे और स्टोव, एक साफ़-सुथरी छोटी-सी रसोई और इसी तरह की कुछ अन्य वस्तुएँ। वह बिस्तर पर बैठा हुआ था और सामने शून्य-से में देख रहा था। उस शून्य में हल्की-सी धुंध थी। या कि यह उसकी आँखों की धुंध थी ?  हाँ, उसकी आँखों की ही धुंध थी। और वह धुंध उसके दिमाग में भी थी।
            कुछ समय पहले वह धुंध बहुत सघन थी। राही मिल गया था और उसको जबरन खींचकर शराब के अड्डे पर ले गया था। राही को शराब पीने के लिए साथ चाहिए था। बिना साथ के वह शराब नहीं पी सकता। और शराब पीने के पश्चात् राही ने उसका अधिक देर तक साथ नहीं दिया था। कुछ देर घूमने के बाद एक जगह रुक कर उसने पूछा था, “अब क्या प्रोग्राम है ?“
            “कोई ख़ास नहीं,“ उसने कहा था।
            “अच्छा, तो मैं चलता हूँ। एक ज़रूरी काम है। फिर कब होगी मुलाकात ?“
            “देखो...।“ उसके मुँह से निकला था।
            राही टैक्सी पकड़कर चला गया था।
            उसके चले जाने के बाद वह कुछ देर तक वहीं खड़ा रह गया था। उसको सूझा नहीं कि कहाँ जाए, क्या करे। उसको बेइंतहा अकेलापन महसूस हुआ था। उसको लगा था, वह मानो किसी उजाड़-बियाबान में खड़ा हो। आखि़र उसके कदम अचेत ही अपने कमरे की ओर चल पड़े थे। उसने वहाँ से बस नहीं पकड़ी थी। दिमाग की बोझिल हालत और बेध्यानी में ही वह चलता रहा था और अपने कमरे के सामने पहुँच गया था। कमरे में पहुँचकर उसका डर कुछ कम हुआ था, पर अकेलापन कम नहीं हुआ था। वह और बढ़ गया था।
            कैसा अकेलापन था वह ! सूना और खाली।
            वह कुछ देर उस अकेलेपन में घिरा रहा था।
            पर अब अकेलापन नहीं था। बस, एक शून्य-सा अहसास था - शून्य जो उसके बाहर पसरा हुआ था, जो उसके अंदर भरा हुआ था।
            कमरे में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं थी जो उसकी दृष्टि को ख़ास तौर पर अपनी ओर खींचती।
            रात काफ़ी बीत चुकी थी, पर उसकी आँखों में नींद नहीं थी।
            वह उसी तरह सामने शून्य में देखता रहा। कुछ देर बाद उसको सामने वाली दीवार दिखाई दी - मैली और सीलन भरी, जिस पर से सफे़दी उड़ी हुई और कुछ जगहों पर से पपड़ियाँ उतरी हुईं। उस पर घसमैले रंग के छोटे-बड़े धब्बे थे। और उन धब्बों में एक तरफ जहाँ दीवार का हिस्सा बड़ा साफ़ और सपाट था, एक चित्र टंगा हुआ था।
            पहले तो उसको वह चित्र अन्य धब्बों की भाँति एक धब्बा ही प्रतीत हुआ, पर जब उसकी नज़र उस पर टिकी ही रही तो वह धब्बा न रहा। उसमें से एक शक्ल उभरने लगी। वह शक्ल मानो हिल रही थी। उसकी लकीरें और रंग हिलते हुए परस्पर जुड़ रहे थे।
            अब वह चित्र को एकटक देख रहा था। चित्र ने मानो उसकी नज़र को पूरी तरह से अपनी गिरफ़्त में ले लिया था। परंतु वह स्वयं अभी भी चित्र को पूरी तरह पकड़ नहीं पा रहा था।
            वह जब भी उस चित्र को देखता, वह कुछ देर उसकी पकड़ में न आता। उसके आपस में उलझे हुए रंग ढलकते रहते, आपस में फंसी हुई लकीरें थिरकती रहतीं, और एक चेहरा रह रहकर बदलता हुआ नई शक्ल अख़्तियार करता रहता। अंत में, वह शक्ल एक जगह पर खड़ी हो जाती और उसकी नज़र की पकड़ में आ जाती।
            वह चित्र उसको मुकुल घोष ने दिया था।
            मुकुल ! उसको मुकुल घोष का ख़याल आया और अपने उस अकेलेपन को महसूस करते हुए उसने सोचा, मैं मुकुल की तरफ क्यों नहीं चला गया ? राही के चले जाने के बाद मैं मुकुल की ओर चला गया होता तो अच्छा था। परंतु उस समय ख़याल ही नहीं आया। ख़ैर, अब भी जाया जा सकता है। अब ? नहीं, अब तो रात बहुत हो चुकी है। और मुकुल यहाँ से बहुत दूर है। कम से कम एक घंटा लग जाएगा उस तक पहुँचने में।
            मुकुल ! उसने फिर सोचा और चित्र में उसकी शक्ल देखने लगा। वह चित्र मुकुल का सैल्फ-पोट्रेट था। बड़ा शौक था उसको अपने पोट्रेट बनाने का। वह अपने अनगिनत पोट्रेट बना चुका था। जैसे आदमी ख़ाली काग़ज़ सामने देखकर उस पर लिखने लग पड़े और बार बार अपना नाम लिखे, कुछ इसी प्रकार मुकुल सैल्फ-पोट्रेट बनाया करता था। पर इतने सैल्फ-पोट्रेट बनाने पर भी उसकी तृप्ति नहीं हुई थी। वह हमेशा कहा करता, “इन सैल्फ-पोट्रेटों में मैं स्वयं को पहचानने का जतन कर रहा हूँ, अपने आप को खोजने का यत्न कर रहा हूँ। लेकिन अभी तक मैं अपने आप को पकड़ नहीं सका हूँ।“
            मुकुल से उसकी मुलाकात हुई थी तो पहली ही मुलाकात में वह उसकी ओर खिंच गया था। बड़ी दिलचस्प शख़्सियत थी उसकी। उसका चेहरा भी दिलचस्प था और उसकी बातें भी। वह एक हॉस्टल में रहता था, हॉस्टल के सिरे वाले एक छोटे-से कमरे में। वही उसका स्टुडियो था, बिखरे हुए चित्रों से भरा हुआ। कई शैलियों के चित्र थे वे। उन चित्रों में भी मुकुल अपने आप को खोजने का यत्न कर रहा था और उनका सफ़र तय करता हुआ किसी मंज़िल पर पहुँचना चाह रहा था। “पर मंज़िल है कहाँ ?“ वह कहता।
            “मंज़िल कहीं नहीं है। बस, सफ़र ही सफ़र है।“
            चित्रों का सफ़र ! उसने सोचा। और उन चित्रों में सैल्फ-पोट्रेटों का सफ़र ! मुकुल रात-दिन वह सफ़र तय कर रहा था।
            वह सफ़र तय कर रहा था, पर मंज़िल पर नहीं पहुँचना चाह रहा, क्योंकि - उसके अपने शब्दों में - “जिस दिन मैं मंज़िल पर पहुँच गया, उस दिन खु़दकुशी कर लूँगा। मंज़िल पर पहुँचकर जीने का क्या फायदा ? और क्योंकि मैं खु़दकुशी से डरता हूँ, इसलिए मंज़िल पर पहुँचने से भी डरता हूँ। वैसे यह भी एक हक़ीकत है कि मंज़िल कहीं नहीं है। बस, सफ़र ही सफ़र है।“
            मुकुल को भी वह पहली मुलाकात में अच्छा लगा था और वह उसको अपने कमरे पर ले गया था।
            वहाँ मुकुल के बहुत सारे सैल्फ-पोट्रेट देखकर उसको हैरानी हुई थी। कई शैलियों के पूर्ण-अपूर्ण सैल्फ-पोट्रेट थे जो आपस में एक-दूजे से उतना ही मिलते थे, जितना वे मुकुल के चेहरे से मिलते थे। मुकुल ने बताया था, “इनमें मैंने उस असलियत को पकड़ने का यत्न किया है जो मेरे चेहरे के नक्शों में नहीं, बल्कि नक्शों के उस पार हैं।“
            फिर, वह मुकुल के कमरे पर जाने लग पड़ा था।
            एक बार वह गया था तो मुकुल अपना पोट्रेट बनाकर हटा ही था। उसमें झुंझालहट थी क्योंकि वह अपने नक्शों के उस पार की असलियत को पकड़ नहीं सका था।
            परंतु, उस सैल्फ-पोट्रेट ने उसका ध्यान विशेष रूप से खींचा था। उसमें उसको मानो मुकुल की नहीं, अपनी खुद की शक्ल दिखाई दी थी - एक चेहरा, जिसमें उसके चेहरे के टुकड़े परस्पर जुड़े हुए थे।
            “बात बनती बनती रह गई है।“ मुकुल ने चित्र की ओर संकेत करते हुए कहा था।
            उसने आँखों में सवाल भरकर मुकुल की ओर देखा था।
            “यानी कि बात नहीं बनी।“ मुकुल हँसा था मानो उसको खुशी थी कि वह मंज़िल पर नहीं पहुँचा था।
            “बड़ी अजीब बात है मुकुल,“ आखि़र उसने कहा था, “कि इस में तेरी ही नहीं, मुझे अपनी भी शक्ल दिखाई देती है। मानो तूने मेरा पोट्रेट बनाया हो।“
            “सच ?“ मुकुल के मुँह से निकला था और उसने गौर से चित्र को देखा था।
            “क्यों ?  नहीं दिखती ?“
            कुछ देर देखते रहने के बाद मुकुल ने कहा था, “शायद। इसको बनाते समय शायद मेरा अवचेतन तुझे देख रहा होगा। या... या यह भी हो सकता है कि मैंने अपने चेहरे की कुछ चीज़ों को जनरलाइज़ करने का यत्न किया है। यानी कि किसी हद तक यह बताने का यत्न किया है कि यह चेहरा मेरा ही नहीं, आज के दौर में से गुज़र रहे एक आम आदमी का भी है।“
            प्रत्युत्तर में उसने कहा था, “जैसे जैसे मैं इसको देखता हूँ, इसमें से मुझे अपनी ही शक्ल उभरती दीखती है। इसको हमेशा देखते रहने को दिल करता है।“
            “तो फिर तू इसे रख ले और हमेशा देखा करना।“ मुकुल मुस्कराया था।
            “मेरा मतलब यह नहीं था।“ उसको कुछ झिझक महसूस हुई थी।
            “पर मेरा यही मतलब है।“ मुकुल हँसा था और उसने चित्र उसको दे दिया था।
            उसने चित्र को फ्रेम करवा लिया था और घर लाकर दीवार पर टांग दिया था।
            यह उस चित्र के कारण ही था कि उसका गरीब-सा कमरा एकबार तो बड़ा अहम बन गया था। वैसे उसको यह भी लगा था कि वह चित्र उस जैसे कमरे में टांगा जाने वाला नहीं था। उसे तो किसी बहुत सुंदर कमरे का शिंगार होना चाहिए था। पर कुछ अरसे बाद वह उसको उस कमरे का एक हिस्सा प्रतीत होने लग पड़ा था। मानो वह खुद उस कमरे का एक हिस्सा बना हुआ था। बस, अंतर था तो इतना कि वह चित्र कमरे की अन्य वस्तुओं की तरह साधारण-सा नहीं लगता था।
            वह कमरे में बैठा होता, तो कई बार कितनी कितनी देर तक चित्र को देखता रहता। उसमें अपने आप को खोजने का, उसको पकड़ने का यत्न करता रहता। किसी वक़्त उसमें से मुकुल की शक्ल का भ्रम पैदा होता, पर उसी समय वह शक्ल बिखर जाती और उसकी अपनी शक्ल बनने लगती।
            एकबार भुरभुरी दीवार में लगा कील उखड़ जाने पर चित्र नीचे गिर पड़ा था तो उसका काँच टूट गया था। उसमें दो तरेड़ें पड़ गई थीं। काँच के तीन टुकड़े हो गए थे, पर वे फ्रेम में से निकले नहीं थे।
            उसने दूसरी जगह पर कील गाड़कर उस चित्र को टांग दिया था।
            फिर, जब उसने देखा था, तो उसको काँच के नहीं, अपितु चित्र वाले चेहरे के तीन टुकड़े हो गए प्रतीत हुए थे। वो चेहरा जो कई टुकड़ों में जुड़ा हुआ था, तीन टुकड़ों में टूट गया था।
            तब एकटक देखते हुए उसको चित्र में अपनी शक्ल कहीं अधिक साफ़ दिखने लगी थी। अब उसका चेहरा कई टुकड़ों की अपेक्षा सिर्फ़ तीन टुकड़ों में टूटा हुआ था। चेहरे के तीन टुकड़े ! उसने सोचा था। या तीन टुकड़ों वाला चेहरा ! इनमें से एक टुकड़ा है जो वर्तमान है। एक टुकड़ा भूतकाल है। और तीसरा टुकड़ा भविष्य है। “वाह !“ उसके मुँह से निकला था। यह तो एक नया विश्लेषण हो गया इस पोट्रेट का। कितना सुंदर विचार सूझा है ! मुकुल को बताना चाहिए। बड़ा खुश होगा यह विचार सुनकर। काल के तीन खंडों में विभाजित चेहरा। टूटा हुआ, पर जुड़ा हुआ। ज़िन्दगी की चैखट में जड़ा होने के कारण जुड़ा हुआ।
            उस वक़्त चित्र को देखते हुए उसको ख़याल आया कि कहीं उसका चेहरा सचमुच ही इस तरह टूटा हुआ न हो। उसने दोनों हाथ चेहरे पर फेरे, पर कुछ पता न लगा। तब उसने शीशा उठाया और उसमें देखने लगा। शीशे का पानी कुछ जगहों से उतरा हुआ था। वैसे भी शीशा साफ़ नहीं था। शराब के नशे के कारण उसकी नज़र भी साफ़ नहीं थी। उसको अपना चेहरा साफ़ तौर पर न दिखाई दिया तो उसने शीशा रख दिया और सोचा - अब यह नया ही लाना पड़ेगा। पहले भी कईबार नया लाने के बारे में सोचा है, पर अब तो नया लाना ही पड़ेगा। यूँ अन्य भी कई चीज़ें हैं जो नई लाने वाली हैं। तौलिया, जो पुराना होकर जगह जगह से फट चुका है, बूट जिनमें अब और मरम्मत नहीं हो सकती। बिस्तरे की एकमात्र घिसी हुई चादर जो.... और हाँ, बेदी का नावल -‘एक चादर मैली-सी’। कितना दिल होता है इस नावल को पढ़ने का! एकबार लेखकों की बैठक में इसे बेदी के मुँह से सुना था। पर बेदी ने सुनाते समय कई बार रो कर नावल का मज़ा ही खराब कर दिया था। रोना तो सुनने वालों को चाहिए था। बेदी भला क्यों रोया ? अजीब बात नहीं है कि इतने धैर्य से लिखने वाला आदमी सुनाते समय स्वयं रो पड़ता है ! लिखते समय भी ज़रूर रो रोकर लिखता होगा। पर उसकी लेखनी में यह रोना कहीं बहुत नीचे छिपा होता है। मजाल है कि उसका एक फिकरा भी भावुक प्रतीत हो। ऐसे ज़ब्त से लिखना बेदी का ही काम है। और आजकल सिक्ख उसके पीछे पड़े हुए हैं। नावल में सिक्खों के बारह बजने को लेकर एक लतीफ़ा है जो सिक्खों के हक में जाता है। पर सिक्ख उसको समझ नहीं सके और बेदी पर मुकदमा करने को फिरते हैं। किसी दिन चलकर बेदी से सिक्खों के बारे में कोई लतीफ़ा सुनना चाहिए। बड़ा करारा लतीफ़ा सुनाएगा। दरअसल, बेदी के अंदर कोई बड़ी गहरी तल्ख़ी छिपी हुई है जिस कारण वह ऐसा लतीफ़ेबाज़ है। उस तल्ख़ी को लतीफ़ों के माध्यम से बाहर निकालकर वह हल्का हो जाता है। पर लेखक के तौर पर कितना गहन-गंभीर है ! उसका हुनर... लो, यह बेदी भी किधर ले चला है।
            वह बेदी और अपने आप पर हल्का-सा मुस्कराया और फिर सोचने लगा कि क्या सोच रहा था। उसे कुछ याद न आया। तब उसके सामने फिर दीवार वाला चित्र उभरा और उसके एक टुकड़े को वह एकटक देखने लगा। यह टुकड़ा, उसने मन में कहा, चेहरे के वर्तमान का टुकड़ा है। वर्तमान का चेहरा। सड़कों की गर्दिश का चेहरा। इस शहर की भीड़ का चेहरा। बग़ैर आँखों वाली भीड़ जो शहर में बिखरी पड़ी है, भाग-दौड़ रही है और शहर की हदों में फंसी पड़ी है। यह शहर जो वर्तमान है, इस शहर में से निकला नहीं जा रहा। ज़िन्दगी इस शहर में फंसी हुई है। हाँ, यह वर्तमान का चेहरा, इस शहर में फंसा हुआ चेहरा है। अपने गाँव से टूटा हुआ, खेतों से और गाँव वाले घर से बिछुड़ा हुआ...
            उसको अपना गाँव दिखाई दिया - बहुत दूर। और उस गाँव में अपना घर दिखा, और अपना परिवार। माँ, पिता और दोनों बहनें और छोटा भाई। भूरी भैंस और काली बकरी। तीन, सवा तीन बरस हो गए थे घर को छोड़े, घरवालों से बिछुड़े और वह गाँव नहीं जा सका था। वह शहर में फंसा हुआ था और निकल नहीं पा रहा था। इस शहर में आकर उसका चेहरा मानो फ्रेम के कारण जुड़ा हुआ था। उसको स्मरण हो आया कि बहुत पहले उसने कहीं पढ़ा था - होटल में बैठे एक आदमी के बारे में जो इस तरह उदास बैठा हुआ था कि उसके चेहरे से उसकी नज़र टूटी हुई थी, नज़र से उसकी सोचें टूटी हुई थीं और सोचों से...। तब इस बात को वह पूरी तरह समझ नहीं पाया था। पर यहाँ आकर, इस शहर में आकर यह बात इतनी अच्छी तरह समझ में आई थी कि उस चेहरे को वह कई बार अपने ख़यालों में देखा करता था। इस शहर में आकर उसका चेहरा कई चेहरों का बना था - क्लर्क का चेहरा, बेकार आदमी का चेहरा, उस मंगते का चेहरा जो वह बन नहीं सका था, और भूख का चेहरा और फिल्म डायरेक्टर के चौथे असिसटेंट का चेहरा,  और एक असफल कहानीकार का चेहरा।...
            हाँ, यही भिन्न-भिन्न चेहरे हैं, उसने सोचा, जिनके टुकड़ों को जोड़कर मुकुल सैल्फ-पोट्रेट बनाता है। मानो उसके इस सैल्फ-पोट्रेट के अंदर कई टुकड़े हैं, पर नहीं, अब तो वे सिर्फ़ तीन ही टुकड़े हैं। एक टुकड़ा जो वर्तमान है। दूसरा टुकड़ा जो भूतकाल है - ज़िन्दगी के बीते हुए वर्षों का चेहरा। ज़िन्दगी के बीते हुए बरस...।
            उसने उस टुकड़े की ओर देखते हुए कहीं पीछे की ओर देखा - अपनी ज़िन्दगी के बीते हुए वर्षों को। वे धुंधल-से लगे। उसने उनको स्पष्ट देखने के लिए अपने दिमाग पर ज़ोर डाला। लेकिन उसके सामने जो धुंध थी, उसमें वे वर्ष साफ़ दिखाई न दिए। उसने सोचा, इन वर्षों में मेरा चेहरा कैसा रहा होगा ? वह उसकी कल्पना न कर सका। तब उसने अपनी किसी पुरानी फोटो को सामने लाने का यत्न किया। कालेज के दिनों की एक फोटो उसके सामने आई जो उसके ‘आइडेंटिटी कार्ड’ पर लगी हुई थी। कालेज में उसका वह पहला साल था और अन्तिम भी। आगे की कालेज की पढ़ाई उससे छूट गई थी। परंतु वह एक वर्ष उसकी ज़िन्दगी का कैसा वर्ष था। तब वह आज जैसा नहीं था। तब का चेहरा, वह अपने आइडेंटिटी कार्ड वाले चेहरे के सामने लाया तो उसके साथ ही एक और चेहरा उसके सामने आ गया -तृप्ता, नहीं तृप्ति का चेहरा। ‘तृप्ता’ उसको कुछ अजीब-सा लगता था। वह उसके बारे में जब भी सोचता, मन में ‘तृप्ति’ कहकर ही सोचता। वह उसको बेइंतहा अच्छी लगती थी। वह सारा दिन उसके बारे में सोचता रहता, पर उसके साथ कभी बात करने का साहस नहीं कर सका था। वह बस यही सोचता था कि कभी अवसर मिला तो अपने आप बात हो जाएगी। आखि़र, एक बार जब उसने तृप्ति को किसी अन्य लड़के के साथ, वही जगमोहन के साथ जो कालेज में सबसे अधिक शौकीन और लोफर लड़का था, पॉर्क के एक कोने में हँस-हँस कर बातें करते देखा था तो उसको लगा था कि तृप्ति काँच की एक लड़की थी जो उसी क्षण टूटकर चूर-चूर हो गई थी और उसके अनगिनत टुकड़े उसकी ज़िन्दगी में धंस गए थे। उनकी चुभन आज भी बाकी थी। उस समय उसको अपना चेहरा बहुत तुच्छ प्रतीत हुआ था। वैसे कितने तीखे नयन-नक्श थे उसके। गोरा रंग था, भूरे बाल। बिलकुल उसकी माँ का चेहरा लगता था - सुंदर और कोमल, लड़कियों जैसा। स्कूल के नाटकों में उसने कई बार लड़की का रोल किया था। फिर उसकी दाढ़ी आ गई - भूरे, मुलायम, घुंघराले बाल। और उस दाढ़ी की वजह से उसका चेहरा कुछ और ही बन गया था। वैसे भी, उसका चेहरा भर गया था और बड़ा मर्दाना प्रतीत होने लगा था। पर इस शहर में आकर उसने दाढ़ी और केश कटवा डाले थे। “यहाँ तो अपने आप को संभालना ही कठिन है, दाढ़ी-केश कौन संभाले ?“ उसने कहा था। फिर एक बार हालात ऐसे बन गए थे कि दाढ़ी बढ़ने लगी तो बढ़ती ही रही थी। वह कटवा नहीं सका था। बेकारी का वो बहुत कठिन दौर था। वैसे उन दिनों दाढ़ी रखने का उसको कुछ लाभ ही हुआ था। अंदर की ओर धंसा और पिचका चेहरा जो बहुत ही कमज़ोर-सा लगता था, दाढ़ी के कारण कुछ रौबदार बन गया था। उसे खुद को भी लगता था कि वह इतना कमज़ोर तो नहीं हुआ था। फिर एक बार जब चौथे असिसटेंट डायरेक्टर के तौर पर सत्तर रुपये की नौकरी कर रहा था, तो फिल्म में एक छोटा-सा रोल मिलने पर उसको दाढ़ी कटवानी पड़ी थी। उस रोल में मुश्किल से 15 सेकेंड का काम था उसका। और उसके 250 रुपये मिले थे उसको। बाद में उसी पात्र के रूप में फिल्म में आगे चलकर उसको एक बार फिर रोल मिला था। डायरेक्टर ने उसके काम की बहुत प्रशंसा की थी। तब उसको एक आस बंधी थी कि यदि फिल्म चल गई तो उस रोल की वजह से उसको दूसरी फिल्मों में भी काम मिलने लगेगा। परंतु, फिल्म जब रिलीज़ हुई तो उसका रोल कहीं नहीं था। एडिटिंग के वक़्त वो पात्र ही फिल्म में से निकाल दिया गया था। वैसे, फिल्म चली भी नहीं थी। फिल्म नहीं चली थी तो उसका डायरेक्टर भी नहीं चला था। उसके बाद उसको कोई फिल्म नहीं मिली थी। सो, उसके साथ चौथे असिसटेंट के रूप में उसकी नौकरी भी जाती रही थी। तब फिर वही सड़कों की गर्दिश थी।
            एक बात से वह खुश था कि उसको शीघ्र ही फिल्म-लाइन से छुटकारा मिल गया था, नहीं तो वह सालोंसाल उसमें फंसा रहता और वर्तमान में फंसा किसी उम्मीद में भविष्य की ओर देखता रहता। फिल्म-लाइन में भविष्य कितना सुनहरा और शानदार दिखाई दिया करता था।
            अब वह पीछे की ओर नहीं, आगे की ओर देख रहा था - आगे अपने भविष्य की ओर। फिल्मी ज़िन्दगी वाले भविष्य की ओर नहीं, अपनी अब की ज़िन्दगी के भविष्य की ओर।
            पर भविष्य उसको अँधेरा दिख रहा था।
            भविष्य के उस अँधेरे में उसने अपना चेहरा देखना चाहा, पर वह दिखाई न दिया।
            भविष्य का चेहरा ! उसने सोचा और सामने चित्र की ओर देखा। उसके एक टुकड़े को वह देर तक देखता रहा, पर उसमें से भी अपना भविष्य का चेहरा न देख सका।
            शायद कुछ लोगों का भविष्य होता ही नहीं। उसने सोचा।
            कुछ देर बाद उसको अपनी आँखें बोझिल होती प्रतीत हुईं। उनमें नींद थी और थकान थी। पर वह चित्र की ओर एक टक देखता रहा। उसकी आँखें मुंदने लग पड़ीं। आखि़र, वह लेट गया और उसको नींद आ गई।
            सोये हुए उसने जैसे सपने में देखा, चित्र के टूटे हुए काँच की जगह नया साबुत काँच लगा हुआ था। और वह कई टुकड़ों वाला चेहरा भी मानो साबुत हो गया था। मुकुल के बनाए चेहरे से वह बिलकुल ही भिन्न चेहरा प्रतीत हो रहा था। और वह चेहरा - उसने झट पहचान लिया - उसकी माँ का चेहरा था। बिलकुल माँ का चेहरा। पर तब उसने देखा - माँ की आँखों में आँसू थे। और उसके होंठों पर जो चिर-मुस्कान होती थी, वह गायब थी। उस मुस्कराहट के बिना, उसको लगा, वह चेहरा उसकी माँ का नहीं था। वह कोई बेहद पराया चेहरा था।
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नोट : किसी तकनीकी खराबी के कारण मार्च 13 अंक का अगला मैटर अर्थात प्रेम प्रकाश की आत्मकथा 'आत्ममाया' और बलबीर सिंह मोमी के उपन्यास 'पीला गुलाब' की अगली किस्त पुरानी पोस्ट में चली गई हैं… इन्हें पढ़ने के इच्छुक पाठक कृप्या 'पिछ्ली पोस्ट' को क्लिक कर वहाँ पहुँच सकते हैं।

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‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश

‘अनुवाद घर’ को समकालीन पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट कृतियों की तलाश है। कथा-कहानी, उपन्यास, आत्मकथा, शब्दचित्र आदि से जुड़ी कृतियों का हिंदी अनुवाद हम ‘अनुवाद घर’ पर धारावाहिक प्रकाशित करना चाहते हैं। इच्छुक लेखक, प्रकाशक ‘टर्म्स एंड कंडीशन्स’ जानने के लिए हमें मेल करें। हमारा मेल आई डी है- anuvadghar@gmail.com

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव

छांग्या-रुक्ख (दलित आत्मकथा)- लेखक : बलबीर माधोपुरी अनुवादक : सुभाष नीरव
वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, मूल्य : 300 रुपये

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

पंजाबी की चर्चित लघुकथाएं(लघुकथा संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
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रेत (उपन्यास)- हरजीत अटवाल, अनुवादक : सुभाष नीरव

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यूनीस्टार बुक्स प्रायवेट लि0, एस सी ओ, 26-27, सेक्टर 31-ए, चण्डीगढ़-160022, मूल्य : 400 रुपये

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव

पाये से बंधा हुआ काल(कहानी संग्रह)-जतिंदर सिंह हांस, अनुवादक : सुभाष नीरव
नीरज बुक सेंटर, सी-32, आर्या नगर सोसायटी, पटपड़गंज, दिल्ली-110032, मूल्य : 150 रुपये

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह) संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव

कथा पंजाब(खंड-2)(कहानी संग्रह)  संपादक- हरभजन सिंह, अनुवादक- सुभाष नीरव
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कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ(संपादन-जसवंत सिंह विरदी), हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, वर्ष 1998, 2004, मूल्य :35 रुपये

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव

काला दौर (कहानी संग्रह)- संपादन व अनुवाद : सुभाष नीरव
आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-1100-6, मूल्य : 125 रुपये

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव

ज़ख़्म, दर्द और पाप(पंजाबी कथाकर जिंदर की चुनिंदा कहानियाँ), संपादक व अनुवादक : सुभाष नीरव
प्रकाशन वर्ष : 2011, शिव प्रकाशन, जालंधर(पंजाब)

पंजाबी की साहित्यिक कृतियों के हिन्दी प्रकाशन की पहली ब्लॉग पत्रिका - "अनुवाद घर"

"अनुवाद घर" में माह के प्रथम और द्वितीय सप्ताह में मंगलवार को पढ़ें - डॉ एस तरसेम की पुस्तक "धृतराष्ट्र" (एक नेत्रहीन लेखक की आत्मकथा) का धारावाहिक प्रकाशन…

समकालीन पंजाबी साहित्य की अन्य श्रेष्ठ कृतियों का भी धारावाहिक प्रकाशन शीघ्र ही आरंभ होगा…

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'कथा पंजाब’ के स्तम्भ ‘नई किताबें’ के अन्तर्गत पंजाबी की पुस्तकों के केवल हिन्दी संस्करण की ही समीक्षा प्रकाशित की जाएगी। लेखकों से अनुरोध है कि वे अपनी हिन्दी में अनूदित पुस्तकों की ही दो प्रतियाँ (कविता संग्रहों को छोड़कर) निम्न पते पर डाक से भिजवाएँ :
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