<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350</id><updated>2012-01-29T11:17:45.161+05:30</updated><category term='पंजाबी लघुकथा : आज तक'/><category term='संपादकीय'/><category term='नई किताबें'/><category term='पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर'/><category term='लेखक से बातचीत'/><category term='पंजाबी उपन्यास'/><category term='स्त्री कथालेखन : चुनिंदा कहानियाँ'/><category term='रेखाचित्र/संस्मरण'/><category term='पंजाबी कहानी : आज तक'/><title type='text'>कथा पंजाब</title><subtitle type='html'>पंजाबी कथा-साहित्य पर केन्द्रित पहली हिंदी ब्लॉग-पत्रिका</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>33</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-3832230845363430090</id><published>2012-01-11T11:36:00.004+05:30</published><updated>2012-01-11T11:41:49.799+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संपादकीय'/><title type='text'>संपादकीय</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-TBKnVwVgdIE/Tw0nMRoaxMI/AAAAAAAAAiA/FwPAvogoQPs/s1600/81.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696252195538388162" style="WIDTH: 193px; CURSOR: hand; HEIGHT: 153px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-TBKnVwVgdIE/Tw0nMRoaxMI/AAAAAAAAAiA/FwPAvogoQPs/s200/81.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;नई आशाओं और नई चुनौतियों का वर्ष – नव वर्ष 2012&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;‘कथा पंजाब’ का यह अंक भी विलम्ब से आपके समक्ष आ रहा है। मित्रो, वर्ष 2011 अपनी खूबियों और खामियों के साथ विदा हो गया और नव वर्ष 2012 नई आशाएँ, नई चुनौतियाँ लेकर हमारे समक्ष है। बीते वर्ष जो कमियाँ-खामियाँ रह गईं, जो कार्य अधूरे रह गए, उन्हें इस नये वर्ष में पूरा करने का संकल्प लेना है, नये सृजन की ओर उन्मुख होना है, ऐसा सृजन जो समाज, देश और विश्व में से घृणा, विद्वेष और अन्याय के काले अँधेरों को खत्म करके प्रेम, विश्वास, सौहार्द और नव-निमार्ण का प्रकाश फैलाये।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;बीते वर्ष 2011 पंजाबी के बहुत ही सशक्त चार लेखक - रामसरूप अणखी, जसवंत सिंह विरदी, गुरमेल मडाहड़ और डॉ स्वर्ण चन्दन – हमारे बीच से विदा हो गए। नाटककार गुरशरण भाजी भी हमसे अलविदा ले गए। इन सभी लेखकों के प्रति ‘कथा पंजाब’ अपनी विनम्र श्रद्धांजलि प्रकट करता है।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;पंजाबी के प्रसिद्ध लेखक बलदेव सिंह को उनके उपन्यास ‘ढाहवां दिल्ली दे किंगरे’ उपन्यास पर भारतीय साहित्य अकादमी, दिल्ली की ओर से वर्ष 2010 के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, यह हम सबके लिए हर्ष और गर्व की बात है। बलदेव सिंह जी का उपन्यास ‘अन्नदाता’ एक ऊँचे स्तर का उपन्यास है। हिन्दी और पंजाबी में इसे लाखों पाठकों ने सराहा है। आशा करता हूँ, ‘ढाहवां दिल्ली दे किंगरे’ का हिन्दी अनुवाद भी हिन्दी के विशाल पाठकों को जल्द उपलब्ध होगा और यह उपन्यास भी उनके ‘अन्नदाता’ उपन्यास की भाँति पाठकों को दिलों में अपनी जगह बनाएगा। ‘कथा पंजाब’ की ओर से बलदेव सिंह जी को बहुत-बहुत बधाई।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;इस अंक में हम विरदी जी को याद करते हुए “पंजाबी कहानी : आज तक” स्तम्भ के अन्तर्गत उन की प्रसिद्ध कहानी “आग” प्रकाशित कर रहे हैं और ‘रेखाचित्र/संस्मरण’ स्तम्भ के अन्तर्गत डॉ. स्वर्ण चन्दन पर हरजीत अटवाल का मार्मिक संस्मरण। साथ ही, ‘कथा पंजाब’ के इस अंक से हम ‘उपन्यास’ स्तम्भ के तहत बलबीर मोमी के चर्चित उपन्यास ‘पीला गुलाब’ का धारावाहिक रूप में प्रकाशन प्रारंभ कर रहे हैं…&lt;br /&gt;आप के सुझावों, आपकी प्रतिक्रियाओं की हमें प्रतीक्षा रहेगी…&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;संपादक - कथा पंजाब&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-3832230845363430090?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/3832230845363430090/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=3832230845363430090&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/3832230845363430090'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/3832230845363430090'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2012/01/blog-post_4683.html' title='संपादकीय'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-TBKnVwVgdIE/Tw0nMRoaxMI/AAAAAAAAAiA/FwPAvogoQPs/s72-c/81.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-4180593296665034306</id><published>2012-01-11T11:24:00.006+05:30</published><updated>2012-01-11T11:35:32.864+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पंजाबी कहानी : आज तक'/><title type='text'>पंजाबी कहानी : आज तक</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-AOUNbBBU46E/Tw0l5dQmjaI/AAAAAAAAAh0/7UjFjdgG5es/s1600/n26.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696250772730580386" style="WIDTH: 165px; CURSOR: hand; HEIGHT: 138px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-AOUNbBBU46E/Tw0l5dQmjaI/AAAAAAAAAh0/7UjFjdgG5es/s200/n26.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#990000;"&gt;पंजाबी कहानी : आज तक(5)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;आग&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000099;"&gt;जसवंत सिंह विरदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जब मैं रात में शहर पहुँचा तो शहर वीरान था। कहीं भी रोशनी नहीं थी। मैंने बिना रोशनी की रात की कल्पना भी नहीं की जा थी। रोशनी रहित रात को देखकर मुझे रात की विपन्नता पर बहुत तरस आया।&lt;br /&gt;'रात फिर भी रात है।' मैंने सोचा, 'पर रात उजली तो हो।'&lt;br /&gt;लेकिन नहीं। शहर का पूरा शरीर रात की गहरी काली चादर में छिपा हुआ था। मेरा सांस घुटने लगा। पर रात से बचकर मैं कहाँ जा सकता था ?... कहाँ जाता?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे सामने सारे शहर की सुनसान काली सड़कें खुली हुई थीं और दरवाजे बन्द थे। शहर भर के दरवाजे बन्द। सड़कों पर चलकर मैं चाहे जहाँ भी जा सकता था, पर मैंने देखा कि हर सड़क एक दूरी तक जाकर किसी एक दरवाजे के सामने दम तोड़ देती है। इस शहर में सड़कों की मंज़िलें भी निश्चित हो गई थीं। मैं चकित हो गया।&lt;br /&gt;मैं बहुत दूर से इस शहर की ख्याति सुनकर आया था। लेकिन अब मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मैंने व्यर्थ में यह सफ़र तय किया।&lt;br /&gt;लेकिन, अब मैं कहाँ जाऊँ ?&lt;br /&gt;रात गहरी हो रही थी और अकेलेपन का सन्नाटा, ठंडी हवा की भाँति मेरे शरीर को बेंधे जा रहा था।&lt;br /&gt;'मुझे कहीं न कहीं जाना चाहिए,' मैंने सोचा, 'सड़क तो मेरी मंज़िल नहीं है।' और मैं तेजी से आगे बढ़कर एक मुहल्ले में दाख़िल हो गया। मेरा ख़याल था कि मैं किसी एक घर के दरवाजे पर दस्तक दूँगा और अतिथि बनने का गौरव प्राप्त करूँगा। पर मेरे सामने जो मुहल्ला सांस ले रहा था, उसमें दरवाजे वाला कोई मकान नहीं था।&lt;br /&gt;''इन मकानों के दरवाजे कहाँ गए ?'' मैंने एक बुजुर्ग़ से पूछा।&lt;br /&gt;''दरवाजों वाले मकान शहर के दूसरी तरफ हैं,'' बूढ़े व्यक्ति ने मुस्करा कर कहा और मुझे अपनी झुग्गी में ले गया। यह झुग्गी एक कमरे का ही सैट थी और बूढ़े ने अपना बिस्तर धरती पर ही बिछाया हुआ था। मुझे यह जगह और मकानों से अधिक सुरक्षित प्रतीत हुई, क्योंकि मैं वहाँ फैल कर बैठ सकता था और जहाँ जी चाहता, सो सकता था, लेट सकता था। किन्तु यदि घर में स्त्रियाँ होंती, बेटियाँ होंती तो हर समय स्कैंडल बनने का खतरा बना रहता।&lt;br /&gt;जवान लड़कियों के बीच उठ-बैठ कर आदमी अपनी मंज़िल भी तो भूल जाता है... पर मेरी मंज़िल ही कहाँ है ? क्या बेकार आदमी की भी कोई मंज़िल होती है ?&lt;br /&gt;बुजुर्ग व्यकित ने झुग्गी के बाहर सरकंडों की बाड़ लगा रखी थी और उसका माल-असबाब कुछ झुग्गी के बाहर और कुछ अन्दर बिखरा पड़ा था। मैंने अंधेरे में दूर तक गौर से देखा। यह स्थान किसी महाराजा का कोई पुराना बाग था, उजड़ा हुआ। इस उजड़े हुए बाग को इन लोगों ने अब आबाद करने का प्रयत्न किया था, निष्फल प्रयत्न। 'कभी यह बाग महाराजा के हास-विलास का क्रीड़ा-स्थल रहा होगा, पर अब यहाँ रोशनी तक नहीं है' - मैंने सोचा।&lt;br /&gt;मुझे इधर-उधर देखते हुए देखकर उस वृद्ध ने कहा, ''इस घर में न आग है, और न औरत।''&lt;br /&gt;''क्यों ?'' मैंने अकस्मात पूछ लिया, आश्चर्य से।&lt;br /&gt;''जिन घरों में आग न जलती हो, उनमें औरत नहीं रह सकती।'' वृद्ध ने सरगोशी में कहा, जैसे कोई तिलस्मी भेद खोल रहा हो...&lt;br /&gt;''इसमें क्या भेद है ?'' मैंने कुछ भी न समझते हुए मूर्खों की भाँति सहज भाव से पूछा।&lt;br /&gt;उसने कहा, ''इसमें भेद की कोई बात नहीं है।''&lt;br /&gt;''कोई भेद तो होगा ही।''&lt;br /&gt;''भेद काहे का ? जिस घर में आग नहीं जलती, उस घर में औरत कैसे रह सकती है ?'' (यह किसने कहा था कि औरत भी एक आग ही है, पर यह आग घर की आग से ही कायम रह सकती है।) आग के बिना घर कैसे उजड़ जाते हैं... इसके बारे में मुझे अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं थी।&lt;br /&gt;अगले ही क्षण मैं उससे पूछ रहा था, ''आप गुजारा कैसे करते हैं ?''&lt;br /&gt;''मांग-तांग कर,'' उसने बेझिझक कहा।&lt;br /&gt;''गुजारा कर लेते हैं ?''&lt;br /&gt;''बड़े मजे से,'' बूढ़े ने कहा, ''बल्कि कोई चिन्ता ही नहीं रही।'' और वह मुस्करा उठा। मुझे लगा जैसे उसके स्वर में व्यंग का तीखापन हो। मैंने सोचा, इसके घर में नहीं तो इसके अन्तर में अवश्य कोई आग जलती होगी - पर उसका सेंक कैसे अनुभव किया जाए।&lt;br /&gt;इस शहर के संबंध में मेरे मन में बहुत उम्दा छवि बनी हुई थी, पर अब मैं इस शहर के संबंध में कुछ और ही शब्दों में सोच रहा था। किसी भी शहर में पहुँचने पर सबसे पहले उसकी रौनक और रोशनी का अहसास होता है। पर कहाँ ?&lt;br /&gt;अगले कुछ पल हम बिलकुल खामोश रहे। उसके बाद के कुछ क्षणों में मैंने महसूस किया कि उस ठिठुरती हुई रात के कंधों पर सवार होकर कुछ स्त्रियों के गीतों का स्वर हमारे पास पहुँच रहा था। गीत के बोल स्पष्ट नहीं थे, पर जब ध्यान से सुना तो एक एक शब्द स्पष्ट हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''ये औरतें कहाँ गा रही हैं ?'' मैंने बूढ़े से पूछा।&lt;br /&gt;''परले घरों में... एक लड़की की शादी है।''&lt;br /&gt;''उस घर में भी आग नहीं है ?''&lt;br /&gt;बुजुर्ग ने कोई उत्तर नहीं दिया। मेरी ओर एकटक देखता रहा। न जाने क्या सोच रहा था। मैं भी तो उसके संबंध में बहुत कुछ सोच रहा था।&lt;br /&gt;''क्या सोच रहे हो ?'' मैंने पूछा।&lt;br /&gt;''गाना सुनो।'' वह बोला और उसने बाहर की ओर इशारा किया। उसके इशारे के साथ ही गीत के शब्द दुबारा स्पष्ट होकर थिरकने लगे-&lt;br /&gt;''दईं दईं वे बाबला ओस घरे, जित्थे अग्ग होवे, शहर रोशन होवे&lt;br /&gt;तेरा पुन्न होवे, तेरा दान होवे...''&lt;br /&gt;(बेटियाँ बाबुल से कह रही हैं कि हमें उस घर में ब्याहना, जहाँ आग हो, शहर में रोशनी हो, तुम्हारा पुन्न होगा, तुम्हारा दान होगा)&lt;br /&gt;''गीत में भी आग की बात ?'' मैंने कहा। परन्तु उसने उत्तर नहीं दिया, सुन्न सा बैठा रहा, आग से रहित।&lt;br /&gt;गायन के स्वर फिर थिरक उठो-&lt;br /&gt;''दिने चानण होवे, रात रोशन होवे...&lt;br /&gt;दईं दईं वे बाबला, ओस घरे&lt;br /&gt;तेरा पुन्न होवे, तेरा दान होवे''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बूढ़ा मुस्कराया। न जाने क्या सोचकर मुस्कराया होगा। और मुस्कराकर उसने न जाने क्या सोचा होगा। मैं भी मुस्कराया, पर मैंने कुछ सोचा नहीं, केवल इतना ही कहा, ''इस शहर वाले आप को आग नहीं देते ?''&lt;br /&gt;''आग केवल बड़े लोगों के घरों में होती है।''&lt;br /&gt;''और रोशनी ?''&lt;br /&gt;''रोशनी पैसे से मिलती है।''&lt;br /&gt;''फिर आप ले क्यों नहीं लेते ?''&lt;br /&gt;''हम छोटे लोग हैं, हमें नहीं मिल सकती।'' और उसने घबरा कर चारों ओर ऐसे देखा जैसे अपने आपको नगण महसूस कर रहा हो। जो व्यक्ति अपने आपको नगण्य महसूस करता है, उसे और कोई यातना नहीं दी जा सकती।&lt;br /&gt;''अब तो देश में लोकतंत्र है और हम सब बराबर हैं,'' मैंने कहा, मानो मैं उसे कोई भेद की बात बता रहा था।&lt;br /&gt;उसने कटुता से उत्तर दिया, ''लोग कहते तो हैं, पर हमें दिखाई नहीं देता... हमारे घरों में ज्यादा अंधेरा है, शायद इसलिए...।''&lt;br /&gt;''आप कोई काम क्यों नहीं करते ?''&lt;br /&gt;''मांगना काम नहीं है क्या ?''&lt;br /&gt;''नहीं।''&lt;br /&gt;''फिर और क्या किया जाए ?'' बूढ़े ने मुझे घूर कर देखा। मैं क्या उत्तर देता।&lt;br /&gt;रात घनी अंधकारपूर्ण थी और वातावरण में अब फिर बोझिल निस्तब्धता फैल गई थी। मैं चाहता था कि उस बुजुर्ग को अपनी योग्यता का प्रमाण दूँ। फिर बातचीत में रात बिता देने का प्रश्न भी था।&lt;br /&gt;मैंने कहा, ''कहते हैं, पिछले जमाने में भी आग सिर्फ़ देवताओं के पास होती थी। केवल देवता ही आग की गरमाहट ले सकते थे और घरों में प्रकाश कर सकते थे।''&lt;br /&gt;''अब भी देवताओं के पास ही है।'' बुजुर्ग ने हामी-सी भरी, तल्ख़ लहजे में।&lt;br /&gt;''पर आग सदा देवताओं के पास नहीं रही,'' मैंने कहा, ''लोगों के एक हितैषी शूरवीर ने आग को देवताओं से छीन कर लोगों में बांट दिया था।''&lt;br /&gt;''उसका क्या नाम था ?''&lt;br /&gt;''प्रोमिथिअस।''&lt;br /&gt;''अपने देश का था ?''&lt;br /&gt;''नहीं, किसी और देश का था, पर उसने आग धरती के लोगों को बांट दी थी।''&lt;br /&gt;''क्या कहने, वाह !'' बूढ़े की आँखों में चमक आ गई, आग जैसी चमक।&lt;br /&gt;''बाद में देवताओं ने उसे पत्थरों और जंजीरों से बांधकर बहुत यातनाएँ दीं।''&lt;br /&gt;''चंडाल कहीं के।'' बूढ़े को प्रचंड ज्वाला की भाँति गुस्सा आ गया।&lt;br /&gt;''पर प्रोमिथिअस आग को तो लोगों में बांट ही चुका था।''&lt;br /&gt;''फिर उसका क्या हुआ ?'' निश्चिंत रहने वाला बूढ़ा अब चिंतित था।&lt;br /&gt;''दिन भर गिद्ध उसका मांस खाते, पर रात को उसके ज़ख्म भर जाते।''&lt;br /&gt;''रात में बड़ी ताकत है।''&lt;br /&gt;''आखिर हरक्यूलीज नाम के एक बलवान व्यक्ति ने उसे देवताओं की कैद से छुड़ा दिया।''&lt;br /&gt;''वाह वाह, भई, वाह वाह !'' बूढ़ा भावातिरेक में उछल-सा पड़ा और लगा जैसे उसकी आँखों की रोशनी से वातावरण चमक उठा हो। उसकी आँखों की इस चमक में मैंने देखा - झुग्गी के एक कोने में एक कपड़े में लपेटी हुई कुछ पोथियाँ रखी हुई थीं। मुझे उस बूढ़े के भिखारी होने पर शक होने लगा।&lt;br /&gt;''तुम्हारे पास कोई बीड़ी-सिगरेट हो तो पिलाओ।'' उसने चैन का सांस लेते हुए कहा।&lt;br /&gt;''मैं नहीं पीता।''&lt;br /&gt;''क्यों ?''&lt;br /&gt;''यों ही... जी नहीं करता।''&lt;br /&gt;''फिर भी...''&lt;br /&gt;''मेरे गुरू ने मना किया है।'' मैंने कहा, ''बल्कि प्रण करवाया है।''&lt;br /&gt;''हूँ...।'' वह उठकर खड़ा हो गया। ''जब हम अपनी धरती छोड़कर आए थे, तब हमने भी प्रण किया था कि जब तक उस धरती को आजाद नहीं करा लेंगे, आग नहीं जलाएँगे।''&lt;br /&gt;''तो यह बात है ?''&lt;br /&gt;''हाँ, पर हम आग का त्याग करके ठंडे हो गए... और धरती बैरियों के पास ही रही। अब भी बैरियों के पास ही है।'' और वह बेचैनी से कहीं दूर एकटक देखने लगा।&lt;br /&gt;मैंने बहुत ही सहज भाव से कहा, ''आपको अपनी धरती छोड़नी नहीं चाहिए थी... वहीं लड़कर मर जाना चाहिए था।''&lt;br /&gt;''हाँ...।'' उसने तेजी से कहा, ''पर हमारे बुजुर्गों ने यह बात नहीं सोची थी।''&lt;br /&gt;''धरती लोगों के पास तभी रह सकती है, जब वह उसकी रक्षा कर सकें।''&lt;br /&gt;''हाँ...आं...'' बूढ़े ने स्वर दीर्घ करते हुए कहा, ''पर अब तो हम बड़े निस्तेज हो गए हैं, भिखमंगे। भिखमंगे को तो कोई एक मुट्ठी अनाज देने को भी तैयार नहीं है, धरती कौन देगा।''&lt;br /&gt;''यह सूरमाओं का काम है।''&lt;br /&gt;''हाँ...आं...'' बूढ़े ने फिर हामी-सी भरी।&lt;br /&gt;''और आपके पास तो आग भी नहीं है।'' मैंने उसे चुनौती दी।&lt;br /&gt;डस समय मुझे उन लड़कियों का गीत याद हो आया जो गीतों में भी आग की, रोशनी की कल्पना कर रही थीं। पर आग थी कहाँ ?&lt;br /&gt;''हाँ...आं...'' वह फिर बोल उठा, ''पर हमारा ख़याल था कि हम अपने अन्दर आग जलाएँगे और सामन्तशाही को उसकी ज्वाला के हवाले कर देंगे।'' उसने एक लम्बा सांस लिया और खामोश होकर बैठ गया।&lt;br /&gt;उस समय वह जो कुछ सोच गया होगा, उसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता। मैं तो केवल इतना ही देख रहा था कि वह कहीं और पहुँच गया था - उस धरती पर जो उसकी अपनी थी, जहाँ रोशनी थी, जहाँ घरों में आग जला करती थी।&lt;br /&gt;मैं चाहता था कि उसे झंझोड़ दूँ, पर मैं चुप ही रहा।&lt;br /&gt;गीत के बोल अभी भी रात की खामोशी के कंधे पर सवार होकर हम तक पहुँच रहे थे।&lt;br /&gt;''दईं वे दईं बाबला ओस घरे&lt;br /&gt;जित्थे अग्ग होवे, शहर रोशन होवे&lt;br /&gt;तेरा पुन्न होवे, तेरा दान होवे...।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''यह गीत हमारी लड़कियों ने गढ़े हैं।'' बूढ़े ने कहा। वह बहुत परेशान था। कितना ? मैं बयान नहीं कर सकता।&lt;br /&gt;इस समय वह न जाने क्या सोच रहा था। पर मैं सोच रहा था कि वह बूढ़ा जमाने से बहुत पीछे रह गया है। इसके पास न कोई हुनर है, न ज्ञान का विरसा, न ही कोई घर-बार। यह सारी उम्र मांग कर खाने के सिवा और कोई काम नहीं कर सकता। रात में उस समय ठंड बहुत ज्यादा थी और मैं यह भी सोच रहा था कि अगर मैं शहर की दूसरी ओर, बड़े मकान वालों के पास पहुँच गया होता तो रात आराम से बिता सकता था। पर फिर यह विचार आया कि शायद वे लोग मेरी खूसट शक्ल-सूरत देखकर दरवाजा ही न खोलते... आजकल मुझ पर कई प्रकार के अपराध भी तो लग रहे हैं।&lt;br /&gt;फिर अगले ही क्षण मैं यह सोच रहा था कि आधे शहर में उजाला है तो आधा शहर क्यों वीरान है ? आखिर क्यों ?&lt;br /&gt;मैं उस बुजुर्ग से कहना चाहता था कि मांग-मांग कर निर्वाह करना तो जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। या है ?&lt;br /&gt;बुजुर्ग कोई पल भर के लिए आँखें खोलकर मुझे एकटक देखता था और मुस्करा कर फिर आँखें बन्द कर लेता था, मानो वह मेरी बात का भेद पा गया हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात आधी से ज्यादा बीत गई थी और उस जाड़े की रात में वह बुजुर्ग मेरे सामने बैठा हुआ था... उसके सांसों की गर्मी मैं महसूस ही नहीं कर रहा था, बल्कि वह मुझे गरमाहट भी दे रही थी। बुजुर्ग की आँखें कभी खुल जाती थीं और कभी बन्द हो जाती थीं। जब उसकी आँखें बन्द होतीं तो मुझे रात की वीरानी का अहसास होता। पर जब खुली होतीं तो ऐसा लगता कि उनकी चमक से कमरे का वातावरण रोशन हो उठा है।&lt;br /&gt;फिर न जाने कब मेरी आँख लग गई।&lt;br /&gt;मैं प्रकाश की एक किरण और आग की एक चिंगारी के लिए तरस गया था और प्रकाश रहित रात की विपन्नता पर मुझे बहुत तरस आ रहा था, इसलिए रात को सपनों में मैंने सब झुग्गियों में तेज लपलपाती लपटें देखीं। मैंने यह भी देखा कि ये लपटें समूचे शहर को अपनी लपेट में ले रही हैं ।&lt;br /&gt;सवेरे जब मैं जागा तो मुझे मालूम हुआ कि मैं शहर के हाकिमों की हिरासत में हूँ, और रात को सपनों में सब झुग्गियों में लपटों का उठना देखने के अपराध में मुझे सश्रम कैद की सज़ा दी गई है।&lt;br /&gt;000&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;जसवंत सिंह विरदी&lt;br /&gt;जन्म : 7 मई 1934, निधन : 2011&lt;br /&gt;पंजाबी और हिंदी में समान रूप से पढ़े जाने वाले पंजाबी के चर्चित कथाकार। कहानियों के साथ साथ&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-x3EHrfsUCsI/Tw0ldx31amI/AAAAAAAAAho/6X89FrlLsN0/s1600/Jaswant%2Bsingh%2Bvirdi.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696250297227504226" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 146px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-x3EHrfsUCsI/Tw0ldx31amI/AAAAAAAAAho/6X89FrlLsN0/s200/Jaswant%2Bsingh%2Bvirdi.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; लेख, फीचर, नाटक, उपन्यास और बाल साहित्य में भी भरपूर लेखन। पंजाबी में पहले ऐसा कथाकार जिसने पंजाबी में फैंटेंसी विधि से कहानियाँ लिखने का चलन चलाया।&lt;br /&gt;इनकी कहानियों में गाँव, कस्बे और शहर के साधारण लेकिन परिश्रमी लोग तथा निम्न मध्यवर्गीय लोग दृष्टिगोचर होते हैं जो रोज के हालात से लड़ते हैं, गिरते हैं पर हार नहीं मारते। पीड़ पराई(1960), अपणी अपणी सीमा(1968), ग़म का साक(1971), पावर हाउस(1974), नुक्कर वाली गली(1075),ज़िन्दगी(1976), नदी का पाणी(1977), सीस भेट(1977), सड़कां दा दर्द(1971), ख़ून के हस्ताक्षर(1982), बदतमीज लोक(1982), खुल्ले आकाश विच(1986), मेरीयां प्रतिनिधि कहाणियाँ(1987), रब्ब दे पहिये(1988), अध्दी सदी दा फर्क(1990), मेरीयां श्रेष्ठ कहाणियाँ(1990), हमवतनी(1995), तपदी मिट्टी(1995), पुल, तारे तोड़ना, सीस भेट आदि उसकी शाहकार कहानियाँ हैं।&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-4180593296665034306?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/4180593296665034306/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=4180593296665034306&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/4180593296665034306'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/4180593296665034306'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2012/01/blog-post_1805.html' title='पंजाबी कहानी : आज तक'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-AOUNbBBU46E/Tw0l5dQmjaI/AAAAAAAAAh0/7UjFjdgG5es/s72-c/n26.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-1332088953163786555</id><published>2012-01-11T11:16:00.003+05:30</published><updated>2012-01-11T11:22:33.304+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रेखाचित्र/संस्मरण'/><title type='text'>रेखाचित्र/संस्मरण</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;2 सितम्बर 1941 को अमृतसर के गांव बोहरु में जन्में पंजाबी के प्रसिद्ध लेखक डॉ.स्वर्ण चंदन का&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-XSF_HijaDgc/Tw0i8fhuYZI/AAAAAAAAAhc/vjRhewFCBz0/s1600/Dr.Swarn%2BChandan.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696247526343991698" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 140px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-XSF_HijaDgc/Tw0i8fhuYZI/AAAAAAAAAhc/vjRhewFCBz0/s200/Dr.Swarn%2BChandan.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; देहान्त गत वर्ष 7 दिसम्बर 2011 को इंग्लैंड में हृदयाघात से हुआ। कृषि में बी.एससी करने के बाद डॉ. चन्दन यू के चले गए और सन 1964 से वह यू, के. में रह रहे थे। इन्होंने अपनी माँ-बोली पंजाबी में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, यात्रा-संस्मरण, फिल्म –स्क्रिप्ट और आलोचना की कई पुस्तकें लिखीं। मुख्यत: डॉ चन्दन एक कथाकार, उपन्यासकार और आलोचक के रूप में पहचाने जाते हैं । डॉ चन्दन पर उनके मित्र हरजीत अटवाल ने एक बहुत ही मार्मिक संस्मरण पंजाबी में लिखा है जो इधर पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका ‘शबद’ में प्रकाशित हुआ है ,जिसका हिन्दी अनुवाद हम हिन्दी के पाठकों को यहाँ उपलब्ध करा रहे हैं। &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;- सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;डॉ. स्वर्ण चन्दन : एक जेंटलमैन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;हरजीत अटवाल&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम का समय है, झुटपुटा सा। मैं मैलिन रोड के 28 नंबर के बाहर खड़ा हूँ। इस घर के भारी पर्दे अभी गिराये नहीं गए हैं। जालीदार पर्दों के रास्ते एक कोने में टेबललैम्प जलता दिखाई दे रहा है। टेबल लैम्प की सीमित रौशनी में वह एक किताब पर सिर झुकाये बैठा है। शेष कमरे में अँधेरा है और एक चुप सी पसरी दिखाई दे रही है। इसको वह 'सुन्न' कहा करता है। मैं दरवाजे की घंटी बजाता हूँ। घर की बत्तियाँ जलने लगती हैं। वह आकर दरवाज़ा खोलता है। एक ज़ोरदार मुस्कराहट देता हुआ वह मेरे साथ कसकर हाथ मिलाता है। घर के अन्दर घुसते ही सिगरेट का एक रेला मेरे नाक में आ घुसता है। ज़रा और अन्दर प्रवेश करता हूँ तो रसोई में से भुनते मीट की खुशबू आने लगती है। मुझे पता है कि यह मेरे लिए विशेष है। वह हँसता हुआ कहता है -&lt;br /&gt;''लैम चॉप बन रही हैं। मुझे पता है कि भाई को ये पसंद हैं। बस, अभी तैयार हुईं।''&lt;br /&gt;मैं अपनी जैकिट उतार कर एक तरफ टांग देता हूँ और सैटी पर बैठ जाता हूँ। वह बोतल की गर्दन पर हाथ डालते हुए कहता है -&lt;br /&gt;''धीरे की तरफ से आ रहा है ?''&lt;br /&gt;''उसके नये उपन्यास पर फंक्शन था।''&lt;br /&gt;''माईयाव(एक गाली), उसके नावल में क्या होगा।... तुझे भी खाली बर्तन बजाने की आदत पड़ गई है।''(आम पंजाबियों की तरह स्वर्ण चंदन को भी बात बात में ‘माई याव’ की गाली देकर बात करने की लत सी थी)&lt;br /&gt;''भाऊ, आजकल फंक्शन करने इतने आसान नहीं, विवाह रचाने की तरह हैं। तू मेरे आ और मैं तेरे आऊँ।''&lt;br /&gt;''समझता हूँ मैं तेरी बात, पर ये सारे ज़ीरो बन्दे हैं, सारे ही बी-टीम, सी-टीम के प्लेयर हैं। इनके साथ खेलकर अपना स्टैंडर्ड गिराने वाली बात है।''&lt;br /&gt;''भाऊ, बातें तो तेरी ठीक हैं पर अब क्या करें... खेलने की आदत पड़ चुकी है। तगड़ा प्लेयर खेलता नहीं और कमज़ोर के साथ खेलें ना... कैसे प्लेयर हुए?''&lt;br /&gt;बात करते हुए मैं उसकी तरफ देखता हूँ। वह सिगरेट सुलगा लेता है और कहता है -&lt;br /&gt;''तू अब दूर भी बहुत रहता है। तू यहाँ आ जा, दोनों भाई मिलकर कुछ करते हैं। ऐसे बढ़िया साहित्यिक कार्यक्रम करवाएँगे कि वाह-वाह हो जाएगी।''&lt;br /&gt;मैं कुछ नहीं कहता। वह भी जानता है कि लंदन छोड़कर मेरे लिए वुल्वरहैम्पटन जाना संभव नहीं, जबकि वह तो लंदन आ सकता है। पर वह भी अब नहीं आएगा।&lt;br /&gt;वह मेरे लिए एक पटियाला शाही पैग बनाता है और स्वयं के लिए बोतल में से पव्वा भर व्हिस्की डालते हुए कहता है-&lt;br /&gt;''बस एक पव्वा ही... साली...अब पी नहीं जाती।''&lt;br /&gt;हम अपने अपने गिलास छुआकर चियर्स करते हैं। मैं पूछता हूँ-&lt;br /&gt;''कोई मिलने-जुलने आया, कोई फोन वगैरह ?''&lt;br /&gt;''न, कोई नहीं आया माई यावा। न कोई फोन आया, चारों तरफ बाबे नानक वाला अरबद-नरबद धंधूकारा है, सन्नाटा ही सन्नाटा।'' वह उदास-सा होकर कहता है।&lt;br /&gt;इस दृश्य को मैंने लगातार दस-ग्यारह साल देखा। वर्ष में दो या तीन बार। मैं किसी कार्यक्रम में उपस्थिति दर्ज क़रवाने वुल्वरहैम्टन जाता तो रात स्वर्ण चंदन के यहाँ काटता। वह भी मेरी प्रतीक्षा ही कर रहा होता। वुल्वरहैम्पटन के लेखकों ने उसका बॉयकॉट किया हुआ था या उसने उनका। बात तो एक ही है, चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर। लेखकों ने तो उसका बहिष्कार किया ही होगा, पर शहर का कोई गैर-लेखक व्यक्ति भी उसका दोस्त नहीं था। वह दिनभर अकेला रहता। अकेला जागता, अकेला ही सोता। धीरे-धीरे उसने नज़दीक के पॉर्क में बैठने वाले कुछ शराबी-से लोग दोस्त बना लिए थे जो उसको और ज्यादा अकेला कर जाते। उसकी बेटी अलका कभी कभी उसके पास जाकर रह आती और कभी-कभी मैं। बाकी समय वह अकेला ही रहता। हाँ, उसका एक पड़ोसी अमरीक सिंह उसका हालचाल लेता रहता। अमरीक स्वयं एक अनपढ़-सा व्यक्ति था, स्वर्ण चंदन उसका पेपर-वर्क कर दिया करता। बदले में अमरीक की घरवाली कई बार उसको रोटी बनाकर दे जाती। यूँ रोटी की उसको ज़रूरत नहीं होती थी। वह खुद एक बढ़िया रसोइया था। दाल-सब्जी बनाने में कोई भी उसका मुकाबला नहीं कर सकता था। उसको किसी दूसरे की बनी रोटी की ज़रूरत तब पड़ती जब उसने ज्यादा शराब पी ली होती और रोटी बनाने के काबिल न रहता।&lt;br /&gt;मेरा उसके साथ तीस वर्ष से भी अधिक समय का नाता रहा था। वह हर कार्यक्रम मे जेंटलमैन बनकर आता, सूट पहना होता और साथ में मैच करती टाई। ऐनक लगा रखी होती, या फिर वह जेब में से बाहर दिखाई दे रही होती और साथ ही पार्कर का पैन भी। इन तीस वर्षों में मैंने उसके कई रूप देखे और देखे भी बहुत करीब से। उसके स्वभाव का शायद ही कोई पक्ष अनदेखा रह गया हो। फिर भी कहते हैं कि ''दिल दरिया समुन्द्रों डूंघे, कौण दिलां दीयां जाणे !'' हो सकता है, उसके मन की बहुत सारी तहों से मैं अनजान ही होऊँ। तीस साल पहले वह एक दिन अचानक ही मेरे घर मिठाई का डिब्बा लेकर आया था। ये वो दिन थे जब साउथाल की प्रगतिशील लेखक सभा ने विश्व पंजाबी कांफ्रेंस करवाई थी। इस सभा के ओहदेदारों का बहुत मान-सम्मान था। स्वर्ण चंदन इसका अध्यक्ष बनना चाहता था। अध्यक्ष बनने के लिए उसको वोट चाहिए थे। मैं सभा का नया नया सदस्य बना था। इसलिए वह मुझसे मेरी वोट मांगने आया था। उसने इतने प्यार से कहा कि मैं सदा के लिए उसकी वोट बनकर रह गया। अब उसकी मृत्यु के पश्चात भी मेरी वोट उसके हक में भुगत रही है। यह अलग बात है कि उस समय मेरी वोट उसके किसी काम नहीं आई थी क्योंकि उसको किसी ने अध्यक्ष तो क्या बनाना था, उसकी सारी मित्र टोली को ही सभा में से बाहर निकाल दिया गया था।&lt;br /&gt;हमारे सम्पर्क के पहले पन्द्रह वर्षों में हमारा संबंध सीनियर-जूनियर वाला रहा है। मेरी कहानियों की उसने भूरि-भूरि प्रशंसा की, सलाहें भी दीं, पर बदले में उसको अपनी कहानियों की तारीफ़ भी चाहिए थी। मुझे करनी भी पड़ी। वैसे मैं उसको उपन्यासकार ही बढ़िया मानता था। उसकी किसी भी कहानी ने मुझको प्रभावित नहीं किया था। उसके नावल 'नवे रिश्ते' और 'कच्चे घर' मुझे बहुत पसन्द थे। 'कख कान ते दरिया' मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगा था। 'कंजका' भी स्थिति से बाहर का नावल था, पर उसको ये बातें कहे कौन ? कम से कम मैं तो नहीं कह सकता था। उसके समकालीन भी कहने से डरते थे। वह अपनी आलोचना सह नहीं सकता था। उसके उपन्यासों को आलोचकों की ओर से मिलते हुंकारे के कारण उसकी ईगो बड़ी होने लगी थी। भाषा विभाग(पंजाब) का ईनाम मिलने तक उसकी ईगो बिगड़नी शुरू हो गई थी। उसके सख्त और जिद्दी स्वभाव ने इसको और ज्यादा तूल दिया। इस समय तक वह अपने विरुद्ध छोटी-सी बात भी नहीं सुन सकता था।&lt;br /&gt;आरंभ में वह एक अच्छा सामाजिक प्राणी था, परन्तु बेटी की मर्ज़ियों ने उसके स्वभाव में एक बड़ा परिवर्तन कर दिया था। बेटी के घर से चले जाने के कारण उसने सामाजिक लोक राय से डरना बन्द कर दिया था। कोई उसको लेकर क्या कहता है, उसने इसकी परवाह करना छोड़ दिया। पहली पत्नी सुरजीत की मौत उसकी ज़िन्दगी में बहुत बड़ा मोड़ लेकर आई। सुरजीत कौर का किसी हद तक उस पर नियंत्रण था। उस कारण वह घर से जुड़ा हुआ था। पत्नी की मौत ने उसकी नकेलें खोल दीं। दविंदर कौर पहले ही उसके सम्पर्क में आ चुकी थी। उसने अपना घर किराये पर दे दिया और यूनिवर्सिटी में पढ़ते बेटे को एक फ्लैट किस्तों पर ले दिया और स्वयं दिल्ली के लिए चल पड़ा। बेटा बहुत छटपटाया कि पढ़ाई के साथ-साथ फ्लैट की किस्तें कैसे देगा। इसके परिणामस्वरूप बेटे की पढ़ाई पर बहुत असर पड़ा। उसको अपनी डिग्री लेने के लिए दो साल अधिक लग गए। चंदन की इस बात ने उसके बेटे के मन पर गहरा प्रभाव किया जो बाप-बेटे के रिश्तों को खराब बनाने के लिए सारी उम्र काम आया। जब वह दिल्ली के लिए रवाना हो रहा था तो मैंने पूछा-&lt;br /&gt;''डाक्टर साहब, दिल्ली जाकर क्या करोगे ?''&lt;br /&gt;''मैं अब माई याव बड़ा लेखक हूँ, यहाँ अब मेरा क्या काम ?... यहाँ मेरी टक्कर किसके साथ है ? सब मेरे आगे पिछड्डी, निकम्मे !... मेरी कर्मभूमि अब दिल्ली है।''&lt;br /&gt;एक विशेष बात यह कि उसने डॉक्टर बनते ही मित्रों पर रौब डालना आरंभ कर दिया था कि अब उसे डॉक्टर कहा जाए। यदि कोई जूनियर लेखक उसको डॉक्टर साहिब न कहता तो वह उसके गले पड़ जाता। इसी बात पर वह कइयों को लेखक के तौर पर खत्म कर देने की धमकियाँ भी देने लगता। वैसे मुझको उसने अपने अन्तिम वर्षों में डॉक्टर साहिब न कहने की छूट दे दी थी। उसके डॉक्टर कहलवाने के बारे में एक दिलचस्प बात बाद में करेंगे। बहरहाल, वह इतना ज़हीन था कि डॉक्टर बनना, पी.एच.डी. की डिगरी लेना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, जबकि इस डिग्री को लेते समय कई गलत-सही सी ख़बरें भी छपी थीं।&lt;br /&gt;दिल्ली वह बहुत शान से गया था। दिल्ली जाने का उसका प्रमुख कारण किसी न किसी तरह ‘भारतीय साहित्य अकादमी’ का ईनाम लेना था जिसका वह अब अपने आप को हकदार समझने लग पड़ा था। वैसे भी, वह दिल्ली सर कर लेना चाहता था। डा. हरभजन सिंह को वह स्टेज पर से सैद्धान्तिक चुनौती दे चुका था। यही नहीं, वह उसको यूँ ही समझने लगा था। दिल्ली में वह बड़ा लेखक बनकर घूमने लगा। उसके जगह जगह पर लेक्चर होने लगे। सतिंदर सिंह नूर का सूरज उन दिनों में अभी उदय नहीं हुआ था। नूर तो चंदन का चेला बना घूम रहा था, शेष सारी दिल्ली भी। बहुत शीघ्र वह दिल्ली के साहित्यिक हलकों का महत्वपूर्ण अंग बन गया। वह कार्यक्रमों में अध्यक्षताएँ करता, लच्छेदार भाषण देता, वाहवाही लूटता। उसको लगता कि साहित्य अकादमी का ईनाम तो इस बार उसको मिलना ही मिलना है। उसके दोस्त उसके इस सपने को और ज्यादा रंग लगा देते, परन्तु वह यह बात भूल बैठा था कि जहाँ दिल्ली में उसके दोस्त थे, वहीं दुश्मन भी थे। डा. हरभजन सिंह को उसने मंच पर बिठा कर सैद्धान्तिक चुनौती तो दी ही थी, पर एक बार जब वह लंदन आए थे तो अपने घर में से बाहर भी निकाला था। वह उसको यह ईनाम कैसे लेने देता। यूँ भी भारतीय साहित्य अकादमी के ईनाम के लिए पहले ही लेखक कतार में खड़े थे। वे सारे भी तो इस बाहरी व्यक्ति को ईनाम कैसे ले जाने देते। सो, ईनाम वाला सपना लटक गया। इस कारण उसके अन्दर शून्य भरने लगा।&lt;br /&gt;कुछ पुरस्कार न मिलने की रंजिश और ऊपर से उसका स्वभाव, चंदन ने शीघ्र ही अपने रंग दिखलाने आरंभ कर दिए। यहाँ बता दूँ कि चंदन के व्यक्तित्व के दो हिस्से थे। शराब के बग़ैर वह कुछ और होता था, और शराब पीकर कुछ और। शराब पीकर वह कैसा व्यक्ति था, इस बारे में लिखना असाहित्यिक होगा। शराब के बग़ैर भी उसके स्वभाव के दो हिस्से थे। एक तो समझौतावादी चंदन जो कि सहजता से ही किसी भी किस्म की लेन-देन कर सकता था और दूसरा - अड़ियल चंदन, हठी चंदन, अतिभावुक चंदन, वो चंदन जिसे हर समय सींग फंसाकर रखने की आदत थी। अपने स्वभाव के इस चंदन को वह 'चेतू' कहा करता। 'चेतू' उसके उपन्यासों की त्रि-श्रृंखला 'पंजाब सैंताली' का किरदार था। यह उसका आत्मकथात्मक उपन्यास था। जब कभी समझौतावादी चंदन काम न आता तो वह 'चेतू' को बाहर निकाल लेता। एक और पक्ष भी था उसके स्वभाव का कि जो लोग उसको बड़ा लेखक मानते, उनके प्रति उसकी नज़रे-इनायत रहती, जो उसको समकालीन या साधारण लेखक समझते, उनसे वह बहुत नफ़रत करता और आड़े हाथ लेता। जब दिल्ली के लेखकों को शराबी चंदन से वास्ता पड़ा तो वे उसको बड़े लेखक की बजाय आम-सा लेखक और छोटा आदमी समझने लग पड़े। पुरस्कार न मिलने के साथ साथ उसके उपन्यास 'कंजकां' के विषय में दिल्ली के लेखकों द्वारा चुप्पी साध लेने पर चंदन के तेवर बदलने लगे। वह सारी दिल्ली को गालियाँ बकने लगा। गालियाँ उसके स्वभाव का अटूट अंग थीं। दिल्ली के लेखकों ने उसका बायकॉट कर दिया। उसको साहित्यिक कार्यक्रमों बुलाना छोड़ दिया। कभी आ भी जाता तो अध्यक्षता सौंपनी तो दूर की बात, स्टेज पर बोलने के लिए भी उसे आमंत्रित न किया जाता। दोस्तों की किसी महफ़िल में भी न बुलाया जाता। और तो और, एस. बलवन्त का घर उसके बिलकुल निचले फ्लैट में था, वहाँ लेखक मित्र इकट्ठा होते, पर चंदन को शामिल न किया जाता। वह अकेला बैठा किलसता रहता, कुढ़ता रहता, अपने आप में ज़हर घोलता रहता। गुस्से में आकर पागलों जैसा व्यवहार करने लगता। दविंदर कौर उसके संग रहती थी। बदले हुए स्वर्ण चंदन के नतीजे उसको भुगतने पड़ते। दविंदर की दवाओं की मात्रा बढ़ने लगती।&lt;br /&gt;ऐसे हालात में नीम पागल होकर लौटे चंदन को मैं सन् 1994 में मिला। मेरी किताब 'खूह वाला घर'(कहानी संग्रह) पर प्रोग्राम था, मैंने उसको निमंत्रण देने के लिए उसके बेटे के फ्लैट पर फोन किया जहाँ वह ठहरा हुआ था, परन्तु उसने प्रोग्राम में शामिल होने से इन्कार कर दिया। कुछ दिन बाद वह एक अन्य प्रोग्राम पर मिला तो मैंने देखा कि उसकी आँखें बिलकुल खाली थीं। मैंने कारण पूछा तो उसने दिल्ली के बारे में बहुत सारी शिकायतें कर मारीं। इसके बाद हमारी फोन पर कुछेक बातें हुईं। कई महीने बीत गए। दो-एक बार अन्य कार्यक्रमों में मिला। अब वह बहुत ज्यादा मोह दिखलाता, ऐसा मोह पहले कभी नहीं दिखलाया था। एक दिन उसने कहा-&lt;br /&gt;''क्यों न हम माई यावी कोई लेखक सभा बनाएँ। मैं प्रधान और तू सचिव।''&lt;br /&gt;मैं तैयार हो गया। मैं भी लंदन के कई हिस्सों में रहकर साउथाल आ बसने की तैयारी कर रहा था और था भी खाली ही। बाद में शेरजंग जांगली ने मुझे बताया कि लेखक सभा बनाने के लिए वह कइयों को कह चुका था, पर उसके संग मिलने के लिए कोई भी तैयार नहीं था। इन दिनों में साउथाल में कोई लेखक सभा सक्रिय भी नहीं थी। खालिस्तान के दौर के समय लेखकों में हिन्दू-सिक्ख जाग पड़े थे। लेखक सभाएँ खत्म सी हो गई थीं। खैर, हमने पंजाबी लेखक सभा, साउथाल बना ली। साहित्यिक संवाद रचाने प्रारंभ कर दिए जो कि काफी समय से खत्म-से थे। लेखक मित्र हमारे संग जुड़ने लगे। एक दिन चंदन कहने लगा-&lt;br /&gt;''क्यों न हम कुछ और मेंबर भर्ती कर लें ?''&lt;br /&gt;''डाक्टर साहब, यदि और लेखक भर्ती कर लिए तो आपकी प्रधानगी चली जाएगी और मेरा सचिव पद। ... ऐसे ही काम चलाये चलो।''&lt;br /&gt;''माई याव... बात तो तेरी ठीक है।''&lt;br /&gt;कहकर वह हँसने लगा। हुआ भी यूँ ही। हम तो बल्कि दूसरे लेखकों के लिए उदाहरण बन गए। इंग्लैंड के पंजाबी के पचास लेखकों ने पच्चीस लेखक सभाएँ बना लीं जो अभी भी चल रही हैं। हमारी सभा भी उसके वुल्वरहैम्पटन चले जाने तक चलती रही।&lt;br /&gt;सन् 1994 से पहले हम दोस्त तो थे, पर बहुत करीबी दोस्त नहीं थे। अब हम एक -दूजे के विशेष दोस्त बन चुके थे। दोस्ती कायम रखने के लिए अनकही शर्त थी कि मैं उसको बहुत बड़ा लेखक और आलोचक मानूँ, वह मैं मानता ही था। वह मेरी कहानियाँ सुनकर मुझे सलाह देता, इनकी तारीफ़ करता। हमारी दोस्ती ऐसी जमी कि हम दोनों ने अमेरिका-कैनेडा का दौरा भी एक साथ किया। हर महफ़िल में मैं मजाक में कहता कि मैं अपना आलोचक साथ लिए घूमता हूँ। वह हर महफ़िल में मेरी कहानी कला की प्रशंसा करता। अमेरिका-कैनेडा के सफल दौरे के बाद हमने इंडिया का चक्कर भी लगाया। यहाँ भी उसने मुझे कहानीकार के तौर पर पूरा प्रमोट किया।&lt;br /&gt;इन्हीं दिनों में एक मज़ेदार बात यह हुई कि मैं उपन्यास लिखने के लिए अपने पर तौलने लगा। मैंने सोचा कि नावल लिखकर मैं उसका सरप्राइज़ दूँगा। मैंने नावल लिखा- 'वन वे'। इसे चार बार संशोधित किया अर्थात् चारों बार हाथ से पुन: लिखा। मैं उत्साहित-सा होकर चंदन के पास अपना नावल लेकर गया। उसने पता नहीं नावल कितना पढ़ा, पर दूसरे दिन ही मेरा नावल उठाकर मेरे सामने फेंकता हुआ बोला-&lt;br /&gt;''माई यावे, इसे डस्टबिन में फेंक दे।... तू नावल नहीं लिख सकता। तू कहानीकार है और कहानीकार ही रह। उपन्यास लिखते लिखते कहानी से भी जाएगा... और फिर उपन्यास माई यावे तो मैं लिख ही रहा हूँ।''&lt;br /&gt;मैं अपना सा मुँह लेकर रह गया। उपन्यासकार बनने के सपने को दूर झटक दिया और वह उपन्यास सेल्फ के नीचे दे दिया। साल भर बाद मान सिंह ढींडसा मेरे घर आया तो उसने सलाह दी कि मैं उपन्यास भी लिखूँ। मैंने उसे अपने लिखे हुए उपन्यास के बारे में बताया। उसने कुछ दिन लगाकर मेरा उपन्यास पूरा पढ़ा और बोला कि यह तो बहुत ही बढ़िया उपन्यास है। इस नावल में तो बिलकुल भिन्न इंग्लैंड के दर्शन होते हैं। उस दिन इस बात ने मुझे बहुत उत्साहित किया। मैं तो पहले ही सोच रहा था कि मैं चंदन से अगली पीढ़ी का लेखक हूँ और मेरे अनुभव भी उससे भिन्न हैं, सो मेरा उपन्यास इतना बुरा नहीं होना चाहिए। मैंने उस उपन्यास को एक बार फिर संशोधित किया और छपने के लिए भेज दिया। परन्तु स्वर्ण चंदन को बिलकुल नहीं बताया। इन दिनों में वह वुल्वरहैम्पटन मूव हो चुका था। जब उसको मेरे उपन्यास का पता चला तो उसने मुझसे बोलना बन्द कर दिया। कई महीनों तक हमारे बीच चुप छाई रही। जब मेरा दूसरा उपन्यास 'रेत' आया तो स्वर्ण चंदन दिल का मरीज़ रहने लगा, उसको दिल का आपरेशन करवाना पड़ा। यद्यपि ऐसा होना कुदरती ही था परन्तु दोस्त मज़ाक में कहते कि यह सब मेरे नावल ने करवाया है। अब हमारी पहले जैसी दोस्ती नहीं रही थी। जब भी उसको समय मिलता तो वह मेरे उपन्यास के खिलाफ़ बोलता। स्टेज पर से वह किसी न किसी से मेरे उपन्यास के खिलाफ़ बुलवा देता। फिर मेरा उपन्यास 'सवारी' भी आ गया। अब मैं अपने आप को उपन्यासकार समझने लगा था और स्वर्ण चंदन का समकालीन भी। हम कभी-कभार मिलते। मैं वुल्वरहैम्पटन जाता तो उससे ज़रूर मिलता। हमारे कार्यक्रमों में वह आता भी, पर मेरे उपन्यास की कभी बात न करता। बल्कि मुझे उपन्यासकार ही न मानता। सुरिंदर सीहरे से मिलता तो कहता-&lt;br /&gt;''अपने मित्र माई यावे को कह दे कि नावल लिखना उसके वश की बात नहीं।''&lt;br /&gt;इंडिया से जिंदर आया तो वह एक रात स्वर्ण चंदन के पास भी रहा। जिंदर ने पूरी कोशिश की, पर चंदन ने मुझे उपन्यासकार के तौर पर तस्लीम नहीं किया। एक बार उसने किसी से कहा कि हरजीत नावल में बच्चा है और मैं उसका बाप हूँ। मैंने झट नब्ज़ पकड़ ली और उस दिन फोन पर यह मान लिया कि वह मेरे से बड़ा उपन्यासकार है, मैं तो अभी सीख ही रहा हूँ और वाकई उसके सम्मुख मैं बच्चा हूँ। फिर क्या था, हमारे संबंध सुधर गए, परन्तु फिर भी उसने मेरे उपन्यास 'रेत' को ही उपन्यास माना। इस तरह हम दोनों के बीच फिर से बढ़िया दोस्ती हो गई। अब वह अपने भाषणों में मेरे उपन्यास 'रेत' की तारीफ़ें करने लगा। फिर कुछ देर बाद मेरे उपन्यास 'ब्रिटिश बॉर्न देसी' की उसने जी भरकर तारीफ़ की और उस पर हुए कार्यक्रम में आकर मेरे उपन्यास पर बोला भी। मैंने अपना नया उपन्यास 'अकाल सहाय' उसको पढ़वाया। उसको यह उपन्यास बहुत पसन्द था। अब तक उसने दिल से मुझे अपना समकालीन मान लिया था। कई बार हम दोनों यह बात करके बहुत खुश होते कि इंग्लैंड में सिर्फ़ हम ही दो लेखक हैं, बाकी सब तो घासफूस हैं। जिस प्रकार सभा का वह प्रधान और मैं सचिव, उसी तरह अब उपन्यास में भी। जब कभी हम इकट्ठा होते तो किसी न किसी दोस्त को इंडिया में फोन करते- रामसरूप अणखी या बलदेव सिंह को। फोन करते हुए हम उसको भी अपने बाद तीसरे नंबर का उपन्यासकार मान लेते। अन्दर ही अन्दर उसको बहुत ग़म था कि पिछले समय में आया उसका कोई भी उपन्यास नहीं चला था। उसके उपन्यासों की त्रि-श्रृंखला 'पंजाब सैंताली' आई, पर किसी ने कोई जिक्र तक नहीं किया। ऐसे ही उसके उपन्यास 'समां' के साथ हुआ। इस उपन्यास का तो शायद एक-आध रिव्यू भी लगा हो, वह भी नकारात्मक। इस बात का उसको बहुत ग़म था और यह ग़म उसके अन्तिम दिनों तक रहा।&lt;br /&gt;उसके और दविंदर कौर के मध्य क्या कुछ घटित हुआ, यह एक पृथक और बहुत लम्बी कहानी है। मेरे लिए दोनों ही एक से थे, इसलिए मैंने कभी किसी एक का पक्ष नहीं लिया, पर मैं इतना जानता था कि उस जैसे रफ-टफ व्यक्ति के साथ दविंदर जैसी कोमल औरत का रहना बहुत कठिन था। मैं कई बार कहता-&lt;br /&gt;“डाक्टर साहब, कहाँ आप ये डाक्टरनी के पीछे पड़ गए। आपको तो कोई अनपढ़ सी कम्बोजों की लड़की चाहिए थी। जब दिल करता दो थप्पड़ मार लेते और जब दिल करता, गिरा लेते।''&lt;br /&gt;''बात तो तेरी माई याव ठीक है।''&lt;br /&gt;वह हँसता हुआ कहता।&lt;br /&gt;दविंदर अलहदा होकर वुल्वरहैम्पटन जा बसी थी। स्वर्ण चंदन हेज़ में अपने घर में रहता था। हमारी रोज़ मुलाकातें हुआ करतीं। इन दिनों में ही वह एक्सीडेंट का शिकार हो गया। वह किसी के साथ वैन में जा रहा था। पूरे नशे में था कि अचानक वैन का दरवाजा खुल गया और वह नीचे सड़क पर गिर पड़ा। बहुत चोटें आईं। टांग टूट गई। कई महीने अस्पताल में रहा। लेटे लेटे का शरीर गलने लगा। दविंदर से अलहदगी तो काफी देर की हो चुकी थी। उसने दविंदर को फोन करने शुरू कर दिए कि वह वापस आ जाए। दविंदर नहीं मानी तो वह निरंजन सिंह नूर को फोन करने लग पड़ा। मैंने एक दिन कहा-&lt;br /&gt;''डाक्टर साहब, क्या तुम सच ही दविंदर को वापस चाहते हो कि यूँ ही भावुक से होकर कह देते हो ?''&lt;br /&gt;''साली, बात तो तेरी ठीक है। यूँ ही भावुकपने में फोन हो जाता है।''&lt;br /&gt;उसने सोचते हुए कहा, पर दविंदर को और निरंजन सिंह नूर को फोन करने बन्द नहीं किए। मैंने निरंजन सिंह नूर से कहा भी कि वापस आकर दविंदर बहुत पछताएगी। अस्पताल से घर आकर स्वर्ण चंदन और अधिक अकेला हो गया। बेटा-बेटी तो पहले ही उसके पास कम ही आते थे। ऐसे हालात बनें कि दविंदर वापस आ गई, पर उसकी शर्त थी कि वह लंदन छोड़ कर वुल्वरहैम्पटन चले। उसने लंदन छोड़ दिया। किसी समय वह दविंदर के साथ लंदन छोड़कर दिल्ली गया था और अब वुल्वरहैम्पटन। दिल्ली जाते समय उसने अपना लंदन वाला घर नहीं छोड़ा था और वापस लौट आया था, परन्तु वुल्वरहैम्पटन जाते समय वह अपना घर बेच गया। मैंने जब कहा कि यह घर न बेच तो वह मजाक में कहता कि मजा तो इसी बात में है कि किसी किनारे पर पहुँचकर किश्ती को लौटा दो ताकि पीछे की ओर देखना ही न हो। दिल्ली की भांति ही उसने वुल्वरहैम्पटन में जाकर भी छा जाने की कोशिश की। दिल्ली की तरह ही इस शहर में भी उसका स्वभाव उसके खिलाफ़ खड़ा हो गया और उसको अकेला कर दिया गया। शहर के लेखकों ने उसको बुलाना छोड़ दिया। किसी प्रोग्राम में उसके प्रवेश पर मनाही लगा दी। ‘पंजाबी साहित्य अकादमी’ सी बनाकर उसने दिल को कई किस्म के नकली-से हौसले देने के यत्न किए, पर असफल रहा। अब वुल्वरहैम्पटन या आस पास के शहरों में उसका कोई भी लेखक दोस्त नहीं था। कोई भी उससे मिलने नहीं आता था। सभी उसको विद्वान तो मानते, पर उससे दूर ही रहते।&lt;br /&gt;डाक्टर स्वर्ण चंदन की ज़िन्दगी एक खुली किताब की तरह है। उसने न कभी किसी से कुछ छुपाया था और न ही कभी झूठ बोला था। यदि किसी से नफ़रत करता या प्यार करता तो वह खुलकर बता देता। उसके व्यक्तित्व की एक और विशेषता यह थी कि वह कभी भी किसी के ऊपर पीछे से वार नहीं करता था, अपितु अगले व्यक्ति को ललकार कर कहता था कि मैं आ रहा हूँ। वह समझौते वहीं करता था, जहाँ उसको बहुत ही अधिक ज़रूरत होती। उदाहरण के तौर पर एक बार उसको एक समारोह करवाने के लिए किसी खालिस्तानी की मदद की ज़रूरत पड़ी तो उसको उसने कार्यक्रम की अध्यक्षता भी दे दी। साधारण स्थिति में एक खालिस्तानी ने उसको अपनी एक किताब की भूमिका लिखने के लिए कहा तो उसका जवाब था कि पहले यह लिखकर दे कि खालिस्तान की लहर गलत थी। यद्यपि वह अपने उपन्यास में कामरेडों के खिलाफ़ बोलता रहा है पर वह पक्का मार्क्सवादी था। इसी प्रकार उसने कुछेक समझौते भारतीय साहित्य अकादमी के पुरस्कार पाने के बारे में भी किए थे, पर वहाँ वह सफल नहीं हो सका था। बाद में सतिंदर सिंह नूर जब इंग्लैंड आया तो वह पुरस्कार की खातिर उसका लकड़-बग्घा बनने को तैयार था क्योंकि पंजाबी साहित्य अब उस दौर में शामिल हो चुका था कि भारतीय साहित्य अकादमी के ईनाम नूर के इशारे पर ही दिए जाते। ऐसे समझौते करते समय वह अपने स्वाभिमान वाला दाव भी छिपाकर रखता, बात बनती न देख वह एकदम बदल जाता।&lt;br /&gt;उसके द्वारा दोस्त बनाने और उसके सिगरेट पीने में बहुत समानता थी। वह सिगरेट पीता, कुछ कश खींचकर सिगरेट का फूल काट देता और जब दिल करता, फिर सिगरेट सुलगा लेता। इसी प्रकार वह दोस्ती में करता। कोई दोस्त बनाता, जब दिल करता उससे दूर हट जाता और जब दिल करता, दुबारा नाता जोड़ने की कोशिश करता। उसको हर समय सींग फंसाकर रखने की आदत थी। कोई और लेखक आदि न मिलता तो पड़ोसियों से ही पंगा लिए फिरता। यदि पड़ोसी ही दौड़ जाएँ तो फिर उसका अपना बेटा तो कहीं गया ही नहीं था। ऐसे ही उसका एक और स्वभाव बहुत अजीब था कि जब उसको कोई व्यक्ति पसंद न आता तो वह उसके फोन नंबर पर सफेद स्याही फेर देता। जब उसी व्यक्ति को उसे फोन करने की आवश्यकता महसूस होती तो मुझे फोन करके उसका नंबर मांगता। उसने सबसे अधिक बार सफ़ेद स्याही अपने बेटे के फोन नंबर पर फेरी थी। एक बार मैंने मजाक में कहा-&lt;br /&gt;''डाक्टर साहब, दिखाओ तो ज़रा डायरी, मैं अपना नाम भी देखूँ।''&lt;br /&gt;''ओ माई यावे, तेरा नंबर तो दिल पर उकरा हुआ है जहाँ टिपिकस काम नहीं करती।''&lt;br /&gt;अकेलेपन ने उसके स्वभाव को अतिभावुक बना दिया था। उसका अकेलापन तो पहली पत्नी सुरजीत की मौत के बाद ही शुरू हो गया था, पर वह इस अकेलेपन को अपने से छिटकने की कोशिश करता रहा, कभी विवाह करवाकर, कभी मुम्बई जैसे शहर में रीमा सी तवायफ़ ढूँढ़कर, कभी अपने बेटे के संग रहने की कोशिश करके और कभी साहित्यिक समारोह आयोजित करके। आख़िर अकेलेपन ने उसको पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया। अब वह पिछले पाँच सात साल से बहुत अकेला था। दोस्त उससे दूर भागते थे या वह दोस्तों से। वह कहा करता कि मैं बिना सिर वाले व्यक्ति के साथ बात नहीं कर सकता। अपने उपन्यास 'समां' पर फंक्शन करवाना चाहता था, परन्तु दोस्त इकट्ठे ही नहीं हो सके, बल्कि इसका बहुत विरोध होता रहा। उसके उपन्यासों में एक वक्रता यह होती कि वह पात्र अपने इतने नज़दीक से उठाता कि आसानी से ही पहचाने जाते या उसकी कोशिश होती कि लोग इनको पहचान लें। उपन्यास 'कंजकां' में साउथाल के जाने पहचाने लोग लिए और उनके चेहरे-मोहरे बिलकुल वैसे ही रहने दिए। इसी प्रकार उपन्यास 'समां' में भी। दिल्ली और इंग्लैंड के नामवर चेहरों को लेकर उन्हें विधागत बनाकर पेश कर मारा। दोस्त कहते कि उसने यह उपन्यास अपने मन की आंकाक्षाओं के अधीन लिखा है, जैसे कोई बच्चा वीडियो गेम खेलते समय स्वयं हीरो बन जाता है और विलयनों के नाम अपने विरोधी दोस्तों वाले रख लेता है और चुन चुन कर उन्हें मारता है, ऐसा ही कुछ किया है चंदन ने इस उपन्यास में। मेरा अपना विश्वास है कि एक दिन इस उपन्यास की कद्र ज़रूर होगी।&lt;br /&gt;अपने अकेलेपन का हल खोजने के लिए वह अपने घर के करीब वाले पॉर्क में जाया करता था। पॉर्क में पंजाबी बुजुर्ग़ लोग आकर बैठा करते। अब चंदन भी पिछले कुछ सालों से उनके बीच बैठने लगा था, पर वे सभी अनपढ़ ग्रामीण लोग, हिस्सा डालकर शराब पीते, आपस में 'माँ की, धी की' करते। चंदन उनके साथ ही बोतल में हिस्सा डालने लगा था। चंदन को अपने आप को डाक्टर कहलवाने का शौक था, पर वह उनको किसी तरफ से भी डाक्टर नहीं दिखाई देता था, सो वे लोग चंदन का यह शौक पूरा न करते। अपने इस शौक के लिए उसको उनके लिए व्हिस्की खरीदनी पड़ती। इस तरह उसका अकेलापन और अधिक बढ़ गया।&lt;br /&gt;स्वर्ण चंदन के साथ दोस्ती के तीस वर्ष का सफ़र 'लव एंड हेट' वाला रहा है। बेशक इसमें 'लव' ज्यादा और 'हेट' बहुत कम रही। किसी और के वह कितना काम आया या नहीं, परन्तु मेरे लिए बहुत सहायक रहा। परोक्ष रूप से मुझे लिखने के गुर बताए। यह मैंने उससे ही सीखा कि अपने लेखन को अपना सौ फीसदी देना चाहिए। हर रचना इस तरह लिखो जैसे कि वह आख़िरी हो। मेरी रचनाओं पर उसने भरपूर आलोचना की, सलाहें दीं, परचे पढ़े। मैंने उससे अपने अन्य दोस्तों की किताबों पर भी परचे लिखवाए। कई बार अपने कार्यक्रमों को कामयाब करने के लिए उसकी मदद ली। साहित्य और राजनीति को लेकर भी मैं उसके साथ बात करके अपने दिल को हल्का कर लिया करता। साहित्यिक सांझ के साथ साथ हमारी पारिवारिक सांझ भी थी। हम अपने अपने परिवारों के दुख-सुख भी साझे कर लिया करते। मुझे कोई दुख होता या कोई खुशी मिलती, स्वर्ण चंदन पहले व्यक्तियों में से था, जिसे मैं फोन करता। वह सामाजिक तौर पर एक अच्छा सलाहकार तो नहीं था, परन्तु दूसरे की बात को ध्यान से सुनकर जज्ब कर सकता था।&lt;br /&gt;अपने अड़ियल और सख्त स्वभाव के बारे में वह चेतन था। अपने इस स्वभाव का कारण वह अपने यतीम बचपन को मानता। माता-पिता की मौत के बाद उसको हर किसी ने दुत्कारा था। उसने अपने प्रारंभिक जीवन में नफ़रत ही नफ़रत देखी है। अपनी सारी कहानी उसने अपने त्रि-श्रृंखलीय उपन्यास 'पंजाब सैंताली' में लिखी है। इसका मुख्य पात्र 'चेतू' वह स्वयं ही है। जब भी अपने स्वभाव को लेकर बात करता तो कहता -&lt;br /&gt;''माई यावे, चेतू को हराने की, उसे खत्म करने की लोगों ने बहुत कोशिश की, पर हर वार के साथ चेतू तगड़ा हुआ है। इस चेतू ने ऐसे ही रहना है, यह चेतू सुधरने वाला नहीं।''&lt;br /&gt;जब उसके स्वभाव के कारण नाराज़ हुए लोगों की बात चलती तो वह कहने लगता-&lt;br /&gt;''दोस्तो, यह माई यावा चेतू ऐसा ही है, इसे ऐसे ही कुबूल करो।''&lt;br /&gt;मैं इन गर्मियों में उससे मिलने गया तो तीन दिन उसके पास रहा। अपने अकेलेपन को लेकर उसने बहुत सारी बातें कीं। मैंने कहा-&lt;br /&gt;''भाऊ, तू ये खामखाह की ईगो पाले बैठा है। अच्छा भला तेरा बेटा है और हीरे जैसा पोता है, जाकर उनके बीच रह।''&lt;br /&gt;''तुझे पता है कि अमीं (उसका बेटा) ने एकबार मुझे बास्टर्ड कहा था, भला माई याव, चेतू गाली कैसे खा सकता। मैं यहाँ अकेला ही मर जाऊँगा, पर जाऊँगा नहीं। चेतू को अकेले मरना मंजूर है।''&lt;br /&gt;यह उसकी जिद्द थी और मैं जानता था कि इस जिद्द को वह आख़िर तक पूरा निभाएगा। मैंने कहा -&lt;br /&gt;''और कुछ नहीं तो तू यह घर बेचकर साउथाल में घर ले ले। कम से कम साउथाल में तुम्हारा बेस तो है। वहाँ लोग तुम्हे यहाँ से ज्यादा जानते हैं।''&lt;br /&gt;''बात तो तेरी ठीक है, वहाँ मुश्ताक जैसे, तेरे जैसे मेरे माई याव इस स्वभाव को झेल लेते हैं। मैं करता हूँ कुछ।''&lt;br /&gt;उसने कहा पर कभी आया नहीं। आना इतना सरल भी नहीं था। वुल्वरहैम्पटन वाला घर बेचता और दूसरा खरीदता। इंग्लैंड की बिगड़ती इकोनिमी के कारण आजकल घरों के बिकने की कोई आस नहीं, खास तौर पर मिडलैंड के इलाके में।&lt;br /&gt;एक दिन मैं सवेरे उठा तो वह बैठा सिगरेट पी रहा था और किसी गहरी सोच में गुम हुआ पड़ा था। मैंने पूछा-&lt;br /&gt;''क्या बात है ?''&lt;br /&gt;''सोच रहा हूँ कि माई याव, मैं न भी होऊँ तो क्या फ़र्क़ पड़ता है।... मुझे लगता है कि अब इस दुनिया में मेरा काम खत्म हो चुका है।''&lt;br /&gt;''तुम्हें नहीं लगता कि तुम अपने आप को गलत एस्टीमेट किए जा रहे हो। साहित्य में कभी तुम्हारे नाम के डंके बजते रहे हैं।''&lt;br /&gt;''पर अब तो माई याव कोई नहीं पूछता।''&lt;br /&gt;''सारी उम्र किसको पूछा जाता है। हर लेखक का एक समय होता है। उम्र आती है तो बड़े बड़े फिल्मी हीरो अन्दर बैठ जाते हैं।''&lt;br /&gt;''बात तो तेरी ठीक है, अब मेरे माई याव, 'समां' का समय नहीं नहीं।''&lt;br /&gt;कहते हुए वह हँसने लगा। कुछ देर बाद फिर बोला-&lt;br /&gt;''असल में मेरा किसी भी तरफ समय नहीं रहा, अब देख औरत के साथ का आनन्द लिए कितने साल हो गए।''&lt;br /&gt;''क्यों ? रीमा तो अभी कल ही की बात है।''&lt;br /&gt;''नहीं, छह सात साल हो गए। रीमा ठीक थी, पर थी तो माई याव आखिर वेश्या ही।''&lt;br /&gt;फिर वह बताने लगा कि कैसे दिल्ली में रहते समय वेश्याओं के पास जाया करता था। वह कुछ कहानियाँ दविंदर के बारे में भी सुनाने लगा जिन्हें मैं कई बार सुन चुका था। कुछ देर बातें करते करते वह ग़मगीन सा हो कर बोला-&lt;br /&gt;''कितनी देर हो गई माई याव औरत का आनन्द उठाए, औरत की निकटता को महसूस किए... नंगी औरत का जिस्म देखने को बहुत दिल करता है।''&lt;br /&gt;''बुजुर्गो, पैसे तुम्हारी जेब में है, यह पड़ा है फोन और घुमा लो स्क्रोट सर्विस को...।''&lt;br /&gt;''माई याव, ऐसे नहीं।'' कहते हुए वह बगीचे के अँधेरे की ओर देखने लग पड़ा। मैं सोच रहा था कि सत्तर साल की उम्र में यह कैसी लालसा है।&lt;br /&gt;एक दिन उसका सवेरे सवेरे फोन आया। इतनी सवेरे वह फोन नहीं करता था। मैंने सोचा कि रब खैर करे। उसकी आवाज़ बहुत उदास थी, बोला-&lt;br /&gt;''मैं बहुत अकेला महसूस कर रहा हूँ। माई याव, चारों तरफ एक सुन्न पसरी है, दूर दूर तक। दिल करता है कि पिस्तौल मेरे पास हो और मैं हैमिंग्वे की तरह अपने आप को खत्म कर लूँ।''&lt;br /&gt;''आज सवेरे ही पी ली ?''&lt;br /&gt;''नहीं, आज माई याव, पिये बिना ही उदास हूँ।''&lt;br /&gt;मैंने घंटाभर उससे बातें कीं। कुछ लतीफे सुनाए, दोस्तों की चुगलियाँ कीं। उसका मिज़ाज बदल गया। अगले रोज मैंने फोन किया तो वह बिलकुल ठीक था। उसकी खासियत थी कि जब भी ऐसी रौ में होता तो वह कई दोस्तों को फोन करता और एक सी बातें साझी करता।&lt;br /&gt;उसके निधन के दो दिन पहले मैं उसके पास ठहरा था। मैं अचानक गया था। मुझे देखकर वह बहुत खुश हुआ। हमने ढेर सारी बातें कीं। वह अपने पोते अनीश की बातें बड़े चाव से सुना रहा था और साथ ही साथ अपने बेटे को गालियाँ दिए जा रहा था। मैंने कहा-&lt;br /&gt;''बुजुर्गो, मेरी बात मानो, यह घर बेचकर वापस हेज़ आ जाओ, अपने बेटे के घर के नज़दीक घर ले लो। कम से कम पोता तो तुम्हें प्यार करता ही है।''&lt;br /&gt;''हाँ, अनीश मुझे बहुत चाहता है, पर इस माई यावे चेतू का क्या करूँ। मेरे अन्दर का चेतू नहीं मानता।''&lt;br /&gt;कहकर वह हँसने लगा। फिर बातें करते करते वह अचानक चुप हो गया मानो कुछ याद आ गया हो। कुछ देर बाद वह गुस्से में आते हुए बोला-&lt;br /&gt;''तुझे याद है जब मैं माई याव वैन में से गिर पड़ा था।''&lt;br /&gt;''हाँ, यह तो बारह-तेरह साल पहले की बात है।''&lt;br /&gt;''बिलकुल। पर तूने इसकी कहीं भी माई याव ख़बर नहीं भेजी, याद है ?''&lt;br /&gt;''बुजुर्गो, मैंने तो इस कारण अखबारों को ख़बर नहीं भेजी थी कि लोग हँसेंगे कि स्वर्ण चंदन शराबी होकर वैन में से गिर पड़ा।''&lt;br /&gt;''लोगों को माई याव ख़बर में से शराब की स्मैल आ जाती ?''&lt;br /&gt;''और नहीं तो लोग ये सोचते कि स्वर्ण चंदन सिगरेट लगाते समय गिर गया ?''&lt;br /&gt;कहते हुए मैं हँसने लगा। वह भी हँस पड़ा। फिर बोला-&lt;br /&gt;''मेरे मरने की माई याव, ख़बर ज़रूर सबको भेजना।''&lt;br /&gt;''बुजुर्गो, क्या पैसीमिस्टिक सी बातें किए जा रहे हो।''&lt;br /&gt;मैंने खीझते हुए कहा। उसने अपनी ग़ज़लों वाली कॉपी उठा ली और नई ग़ज़लें सुनाने लगा। कोई कोई शेर अच्छा था, पर मैं सभी शेरों पर ही दाद देता रहा। यह शनिवार की बात है। इतवार मैं दस बजे तक उसके साथ रहा। इतवार रात को मैं घर पहुँचा तो उसका फोन आ गया और वह फिर वही मरने के बाद अखबारों को ख़बर देने वाली बातें करने लग पड़ा। मैंने बात को दूसरी तरफ लगाया तो उसने फोन रख दिया। सोमवार सवेरे ही उसका फोन आ गया और कहने लगा-&lt;br /&gt;''ले मेरे भाई, आज मैंने माई याव फ़ैसला कर लिया... सोचा कि इस बारे में सबसे पहले तुझे ही बताऊँ।''&lt;br /&gt;''कैसा फ़ैसला ?''&lt;br /&gt;''मैंने माई याव चेतू को क़त्ल कर देने का फ़ैसला कर दिया। यह मुझे बहुत सारे काम नहीं करने देता। मैंने तय कर लिया है कि यह घर बेचकर मैं अमनदीप के घर के नज़दीक घर ले लूँगा और अमनदीप से कहूँगा कि बेटा, जितनी चाहे गालियाँ मुझे निकाल, जितने मर्जी धक्के मार, पर मैं तेरा बाप हूँ।&lt;br /&gt;कहते हुए उसका गला भर आया। मैंने कहा-&lt;br /&gt;''बुजुर्गो, तुम यूँ ही चेतू के गुलाम बने जाते हो, यह फैसला तो तुम्हें बहुत पहले ले लेना चाहिए था।''&lt;br /&gt;ऐसे फ़ैसल वह पहले भी कई बार ले चुका था, पर चेतू को मारने वाली बात पहली बार कर रहा था। मंगलवार सवेरे फोन आया। वह बहुत खुश था। बताने लगा-&lt;br /&gt;''ले भई छोटे भाई, मेरी अमनदीप से बात हो गई है। वह कहता है कि डैड हमारे पास आ जाओ, हमारे पास रहो। जब तुम्हारा घर बिक जाएगा तो अपना ले लेना। मैं बहुत खुश हूँ। मैं माई याव, आज ही हेज़ पहुँच जाऊँगा।''&lt;br /&gt;उसकी बात में दृढ़ता थी। मैं बहुत खुश हुआ। मुझे प्रतीत होने लगा कि आज शाम तक वह हेज़ पहुँच जाएगा। कल वह ज़रूर मुझे फोन करेगा।&lt;br /&gt;बुधवार की शाम थी। मेरे घर में कुछ मेहमान आए हुए थे। अचानक फोन की घंटी बजी। फोन अमनदीप का था। वह बोला-&lt;br /&gt;''अंकल, डैड चल बसे।''&lt;br /&gt;''ओ माई गॉड ! वो कैसे ?''&lt;br /&gt;''कल कहते थे कि मैं आ रहा हूँ। फिर कहने लगे कि आज मेरे से कार नहीं चल रही। मैंने कहा कि टैक्सी लेकर आ जाओ क्योंकि मेरे भी घुटने का कल आपरेशन हुआ है। वह कहते थे कि टैक्सी पर नहीं, मैं कल आ जाऊँगा। आज सुबह से हम फोन किए जा रहे थे पर वह उठा नहीं रहे थे। हमने पड़ोसी अमरीक सिंह से कहा कि जाकर देख आए। अमरीक के पास घर की चाबी थी, उसने जाकर देखा तो डैड तो पूरे हो चुके थे। रात में ही कहीं दिल का दौरा पड़ गया लगता है।''&lt;br /&gt;कहते हुए अमनदीप रोने लगा। मैं समझ गया था कि स्वर्ण चंदन चेतू को मारने की कोशिश करता करता ही मर गया होगा।&lt;br /&gt;दो वर्ष पहले जब मेरे पिता जी का निधन हुआ तो मैं पिताजी को अन्तिम सफ़र के लिए तैयार करते हुए स्नान करवा रहा था। उसी समय स्वर्ण चंदन का फोन आ गया था। मैंने बताया तो वह बहुत उदास हो गया। एक साल पहले जब मैं अपने छोटे भाई को उसके आख़िरी सफ़र के लिए तैयार करके वापस लौटा स्वर्ण चंदन का फिर फोन आ गया। मैं बात करते हुए रोने लगा। वह भी रो रहा था और अचानक बोल उठा-&lt;br /&gt;''माई याव, मुझे भी नहलाएगा कि नहीं ?''&lt;br /&gt;मैंने उसके बेटे अमनदीप को संग लेकर स्वर्ण चंदन को अन्तिम स्नान कराया। उसे सूट पहनाया, टाई लगाई और जेब में ऐनक रखी और पार्कर का पेन भी, लाल रंग की पगड़ी बांधी... आख़िर एक जेंटलमैन को अपने आख़िरी सफ़र पर निकलना था।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-1332088953163786555?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/1332088953163786555/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=1332088953163786555&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/1332088953163786555'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/1332088953163786555'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2012/01/blog-post_11.html' title='रेखाचित्र/संस्मरण'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-XSF_HijaDgc/Tw0i8fhuYZI/AAAAAAAAAhc/vjRhewFCBz0/s72-c/Dr.Swarn%2BChandan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-4445259837586970304</id><published>2012-01-11T10:58:00.007+05:30</published><updated>2012-01-11T21:51:57.417+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पंजाबी उपन्यास'/><title type='text'>पंजाबी उपन्यास</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-c9CzrjtTG_o/Tw0fuxAv40I/AAAAAAAAAgs/PQ7XuuviKqw/s1600/QADN55CAD7GDYZCA95S3RRCAICC7YSCA3MQPEMCABQ6PK3CAO0WLPHCAI4W21ZCA03XO9RCA1X4I14CA2SDFNNCAEFNWAKCARSAHDVCAZG6J76CAK62YDRCANYI5AVCAPFA6XACAVI5024CA93D108.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696243991984464706" style="WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 113px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-c9CzrjtTG_o/Tw0fuxAv40I/AAAAAAAAAgs/PQ7XuuviKqw/s200/QADN55CAD7GDYZCA95S3RRCAICC7YSCA3MQPEMCABQ6PK3CAO0WLPHCAI4W21ZCA03XO9RCA1X4I14CA2SDFNNCAEFNWAKCARSAHDVCAZG6J76CAK62YDRCANYI5AVCAPFA6XACAVI5024CA93D108.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;पंजाबी के विद्बान लेखक बलबीर सिंह मोमी के विषय में जानकारी, विदेश यात्रा पर ब्रैम्पटन (कैनेडा&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-4C4UoTz7kCE/Tw0gJWws4cI/AAAAAAAAAhE/LIRnc5mnGAY/s1600/%25E0%25A4%25AC%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25AC%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2580.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696244448794304962" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-4C4UoTz7kCE/Tw0gJWws4cI/AAAAAAAAAhE/LIRnc5mnGAY/s200/%25E0%25A4%25AC%25E0%25A4%25B2%25E0%25A4%25AC%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25AE%25E0%25A5%2580.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;) गए हिंदी के प्रख्यात लेखक-कवि रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' द्वारा मुझे दिसम्बर 2011 में मिली। बलबीर मोमी अक्तूबर 1982 से कैनेडा में प्रवास कर रहे हैं। वह बेहद सज्जन और मिलनसार इंसान ही नहीं, एक सुलझे हुए समर्थ लेखक भी हैं। प्रवास में रहकर पिछले 19-20 वर्षों से वह निरंतर अपनी माँ-बोली पंजाबी की सेवा, साहित्य सृजन और पत्रकारिता के माध्यम से कर रहे हैं। पाँच कहानी संग्रह [मसालेवाला घोड़ा(1959,1973), जे मैं मर जावां(1965), शीशे दा समुंदर(1968), फुल्ल खिड़े हन(1971)(संपादन), सर दा बुझा(1973)],तीन उपन्यास [जीजा जी(1961), पीला गुलाब(1975) और इक फुल्ल मेरा वी(1986)], दो नाटक [नौकरियाँ ही नौकरियाँ(1960), लौढ़ा वेला (1961) तथा कुछ एकांकी नाटक], एक आत्मकथा - किहो जिहा सी जीवन के अलावा अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मौलिक लेखन के साथ-साथ बलबीर मोमी ने पंजाबी में अनेक पुस्तकों का अनुवाद भी किया है जिनमे प्रमुख हैं – सआदत हसन मंटो की उर्दू कहानियाँ- टोभा टेक सिंह(1975), नंगियाँ आवाज़ां(1980), अंग्रेज़ी नावल ‘इमिग्रेंट’ का पंजाबी अनुवाद ‘आवासी’(1986), फ़ख्र जमाल के उपन्यास ‘सत गवाचे लोक’ का लिपियंतर(1975), जयकांतन की तमिल कहानियों का हिन्दी से पंजाबी में अनुवाद।&lt;br /&gt;देश –विदेश के अनेक सम्मानों से सम्मानित डॉ. बलबीर मोमी ब्रैम्पटन (कैनेडा) से प्रकाशित होने वाले पंजाबी अख़बार ‘ख़बरनामा’ (प्रिंट व नेट एडीशन) के संपादक हैं।&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-O2yUftxbpmE/Tw0gaccHZHI/AAAAAAAAAhQ/aBOeOIrougc/s1600/peela%2Bgulaab.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5696244742376350834" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 132px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-O2yUftxbpmE/Tw0gaccHZHI/AAAAAAAAAhQ/aBOeOIrougc/s200/peela%2Bgulaab.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यह उपन्यास ‘पीला गुलाब’ भारत-पाक विभाजन की कड़वी यादों को समेटे हुए है। विस्थापितों द्बारा नई धरती पर अपनी जड़ें जमाने का संघर्ष तो है ही, निष्फल प्रेम की कहानी भी कहता है। ‘कथा पंजाब’ में इसका धारावाहिक प्रकाशन करके हम प्रसन्नता अनुभव कर रहे हैं। &lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;- सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;पीला गुलाब&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;बलबीर सिंह मोमी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;हिंदी अनुवाद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीते दिनों की शूल तो जनती है शूल ही&lt;br /&gt;बीते दिनों के फूल भी देते हैं ग़म जगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वह पीला गुलाब तोड़ने लगा तो न जाने उसकी आँखों में क्या आया, जिससे उसकी आँखें परिचित थीं और दोस्त भी। उसका हाथ एकाएक पीछे हट गया। अब अधिक समय नष्ट करने का कोई लाभ नहीं। उसने पुन: एक बार सजी हुई कोठी के ड्राइंग रूम की ओर देखा और फिर तेजी के साथ सड़क पर आ गया। लॉन में अभी भी फूल मुस्करा रहे थे। दिन छिप चला था और धीमे धीमे अँधेरा पसरने लगा था। पंछी अपने सफ़रों से अपने घरों की ओर लौट रहे थे, जहाँ सघन वृक्षों में उनके घोंसले उनका इंतज़ार कर रहे थे। घड़ियाल समय की गति के निरंतर चलते रहने की सूचना दे रहे थे, पर समय तो घड़ी में से निकल चुका था। यादें, फरियादें, परेशानियों के ज्वार-भाटे चढ़ते आ रहे थे। उसका सफ़र करीब पहुँचकर भी अभी लम्बा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह चलता रहा, चलता रहा। कई जंगलों-बियाबानों, नदियों, नहरों, खेतों, चरागाहों, बादल, सूरज और तारों को पार करके वहाँ पहुँचना था। वर्षों का सफ़र था जिसे अब महीनों, दिनों और पलों में खत्म करना था - और गुलाब ने सोचा कि आख़िर ज़िन्दगी का यथार्थ क्या था ? मानवीय सच कहाँ थे ? वफ़ा को जाने वाली सारी पगडंडियाँ क्यों बेवफ़ाई के जंगलों में से गुजर कर जाती थीं। और उसका पिछला सारा जीवन उसकी आँखों के सामने आ गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में मुझे अच्छी जूती और अच्छे बूट पहनने का बहुत शौक था। यह इच्छा इसलिए भी बड़ी तीव्र थी कि अक्सर मुझे नंगे पैर ही रहना पड़ता था, क्योंकि जो जूती या बूट घरवाले लेकर देते, उन्हें मैं प्राय: स्कूल पढ़ने गया अथवा नहर में नहाने गया भूल आता था।&lt;br /&gt;अच्छी जूती के साथ साथ मुझे बढ़िया कपड़े पहनने का भी बहुत शौक था। इकलौता और सुशील बेटा होने के कारण मुझे अच्छे कपड़े पहनने को मिलते रहते थे, पर पुराने कपड़ों से भी मेरा इश्क था। पुराने कपड़े पहनकर मुझे नये कपड़ों से कम खुशी महसूस नहीं होती थी। पुराने कपड़ों की तो शरीर से मित्रता हो जाती थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि सर्दियों की ठंड से बचने के लिए मेरी माँ मुझे पलश का लाल कोट कोट ज़रूर पहनवा देती थी जो कि उसने बर्मा से बेघर होकर आए एक परिवार से कपड़ा खरीदकर बनवाया था। पाँचवी जमात तक मुझे 'लूण-मिर्च' का झग्गा और लट्ठे की सलवार ही मिलती रही।&lt;br /&gt;अच्छे सूट-बूट के आलवा, मुझे सैर करने, नहर में नहाने, गुल्ली डंडा खेलने, पशु चराने, बागों में से आड़ू, जामुन, संतरे, अमरूद और आम तोड़ने का भी बहुत शौक था। हमारा अपना भी बाग था जिसमें हमारे अपने ताया से सांझ थी। अंगूरों की बेलें, मिट्ठे, निम्बू और शकरगंदी साझे में बोई जाती थी। जब भी दांव लगता, मैं ये चीज़ें ज़रूर तोड़ लाता।&lt;br /&gt;उन दिनों में ताया को नई नई सब्ज़ियाँ बोने का भी बहुत शौक था जैसे - हल्दी की गांठें, आलू, कचालू और अरबी। मैं तिनकों से ज़मीन खुरच कर हल्की की गांठें ज़रूर उखाड़ता।&lt;br /&gt;हमारे खेतों के समीप सरकारी डाक बंगला था जहाँ कई प्रकार के फूल होते थे। माली की मेरे बापू से यारी थी। इसलिए कुछ फूल मुझे माली स्वयं दे देता और कुछ फूल मैं आँख बचाकर खुद तोड़ लेता।&lt;br /&gt;हमारे गाँव के पास से एक नहर बहती थी। तीजें इस नहर के किनारे ही लगा करती थीं। नहर में मेरे डुबाव पानी था। लेकिन नहाने के लिए मेरा मन बड़ा उतावला रहता। डुबकियाँ मारने, छलांगे लगाने और उल्टा होकर तैरने के लिए मैं मज़बूर था। मुझे तैरना नहीं आता था।&lt;br /&gt;आख़िर मैंने एक दिन अपने बापू से कहा और उसने मुझे कई दिनों की मेहनत के बाद तैरना सिखा दिया और फिर मैं अभ्यास के लिए नहर के किनारे किनारे बहते पानी की दिशा में तैरने लगा। जब साँसें फूलने लगतीं तो किनारे की ओर आ जाता। धीरे धीरे मैं चढ़ते पानियों का तैराक भी बन गया, उल्टे होकर तैरना भी सीख गया। गोता लगाकर कहीं का कहीं जा निकलता। काफी देर तक नाक और मुँह बन्द करके पानी के नीचे बैठा रहता।&lt;br /&gt;और, एक दिन क्या हुआ ?&lt;br /&gt;मैं अपने खेत की ओर जा रहा था। क्या देखा कि कुछ लड़के हमारे तरबूज तोड़ रहे थे। मुझे देखकर वे भागने लगे। किसी ने तरबूज हाथ में पकड़ा और किसी ने पैली में ही फेंक दिया। वे आगे आगे और मैं पीछे पीछे। वे गिनती में अधिक थे और मैं अकेला था। वे कदकाठी और ज़ोर में भी मुझसे तगड़े थे, परन्तु मेरे अन्दर अपने मालिक होने का रौब था, शक्ति भी थी और उनमें अपनी चोरी का भय। उनमें से कुछ मेरे परिचित भी थे और दोस्त भी, परन्तु जब मैं उनके पीछे दौड़ने लगा तो वे उस वक्त मेरे दोस्त नहीं थे।&lt;br /&gt;वे नहर में कूद गए और जैसे तैसे ज़ोर ज़ोर से बांहें मारते दूसरे किनारे जा लगे और नहर के उस पार ढोर चराते अपने साथ के लड़कों में जा मिले। मैं गुस्से में भरा नहर के इस पार खड़ा था। मेरे से दो दो, चार चार साल की बड़ी उम्र के मेरे चोर नहर के उस पार पहुँचकर चरवाहों के साथ जा मिले थे। मैं अभी इस नहर को तैरकर परली पार नहीं पहुँच सकता था। यह नहर अधबीच में जाकर मेरे बापू के कद से भी ज्यादा डुबाऊ थी। इसमें पैर लगने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। मैंने इस नहर को भी पार करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।&lt;br /&gt;उसी दिन शाम को जब नहर पर गया तो मौसम ठंडा था। आकाश में बादल थे। परले किनारे की हरी घास पर एक पठान नमाज पढ़ रहा था।&lt;br /&gt;मैंने तेजी से कपड़े उतारे और नहर में छलांग लगा दी। छलांग मैंने दूर से दौड़ते हुए आकर लगाई थी ताकि पानी में दूर तक बिना तैरे ही जा सकूँ। और मैं लगा हाथ-पैर मारने। अधबीच में पहुँचते ही मेरे हाथ-पैर फूल गए। साँस चढ़ गया। मुँह और नाक कभी पानी में चले जाते और मैं फिर ज़ोर मारकर साँस लेने के लिए मुँह को बाहर निकालता। दूसरी ओर का किनारा दूर था। इस ओर का किनारा उससे भी दूर। न मैं आगे पहुँच सकता था और न मैं पीछे मुड़ सकता था। मेरी माँ को मेरे डूबने का अक्सर ही भय सताता रहता था। नहर में नहाने मैं चोरी चोरी जाया करता था। परन्तु पिछले साल मेरे हमारे गाँव के नाइयों का लड़का जो मेरी उम्र का ही था, डूबकर मर गया था। मैं अब डूबने भी लगा था और मरने भी। मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया और मैं हिम्मत हार बैठा। पानी का एक भंवर-सा आया और फिर मुझे कुछ पता नहीं।&lt;br /&gt;जब होश आया तो मैं परले किनारे पर था और पठान मुझे अपने घुटनों पर पेट के बल उल्टा लिटाकर मेरे मुँह में से पानी निकाल रहा था। काफी देर तक मैं वहाँ पड़ा रहा। मेरे कपड़े अब उस पार पड़े थे जहाँ मैं वापस तैर कर नहीं जा सकता था। पठान की नमाज में जहाँ मेरे डूबने से विघ्न पैदा हुआ था, वहीं उसने मुझे बचाकर अल्ला ताला की दरगाह में एक पुण्य का काम भी किया था।&lt;br /&gt;इतने में हमारे गाँव का चरवाहा नहर के परले वाले किनारे पर आया। मैंने उसको आवाज़ लगाकर मेरे कपड़े लेकर पुल तक लाने के लिए कहा। चरवाहा मेरे कपड़े उठाकर खतानों में से ढोर-डंगरों को हांकता-हांकता पुल तक पहुँच गया। मैं दौड़कर उससे पहले ही पुल पर पहुँच उसकी ओर बढ़ा और अपने कपड़े लेकर उससे मिन्नतें करने लगा कि घर में जाकर वह मेरी माँ को न बताये कि मैं आज नहर में डूब चला था। यदि उसको पता चल गया तो वह मुझे मुर्गों वाले दड़बे में बन्द कर देगी।&lt;br /&gt;हाँ तो, मुझे मुर्गों का भी बहुत शौक था। मुर्गे लड़वाने का नहीं, मुर्गे पालने का, चूजे निकलवाने का। हमारे गाँव में एक मास्टर था जो हमें पढ़ाता भी था और हमारी नज़रों में वह पूरे गाँव से कुछ आगे भी था। एक तो वह कुछ पढ़ा-लिखा था, दूसरा वह हमारा मास्टर था। तीसरा उसके कपड़े धोबी द्वारा धुले और इस्तरी किए होते थे। चौथा, वह कोई न कोई काम ज़रूर करता रहता था जिससे वह गाँव के लोगों की नज़रें अपनी ओर खींचे रखता था।&lt;br /&gt;एक बार वह मिलेट्री में से नीलाम हुआ एक पुराना मोटर साइकिल उठा लाया। वह सारे दिन में मुश्किल से एक बार ही स्टार्ट होता और उसमें से धुआँ निकलता और घर्र...घर्र की आवाज़ आती तो हम इतने में ही बहुत खुश होते। जब मोटर साइकिल स्टार्ट न होता तो मास्टर हमें धक्के लगाने के लिए कहता। हम कई बार घंटों उसके मोटर साइकिल को धक्के मारते रहते। वह मौज से ऊपर बैठा रहता। हम इतनी बात पर ही खुश होते रहते और इस तरह वह हमें पूरे गाँव से अनौखा, बड़ा और सयाना लगता रहता।&lt;br /&gt;फिर वह तवे वाला बाजा ले आया। सारा गाँव तो रहा एक तरफ, आसपास के गाँवों में से भी लोग तवे सुनने के लिए उसके घर आधी-आधी रात तक बैठे रहते। गर्मियों में वह बाजा कोठे पर लगाता और हम नीचे बाज़ार में जाकर सुनते। मुझे यह बाजा सुनने का भी बहुत शौक था।&lt;br /&gt;'कंध टप्प के गुलाबी फुल्ल तोड़िया&lt;br /&gt;आश्कां के बाग विचों...'&lt;br /&gt;यह रिकार्ड वह बहुत बजाता और मुझे यह पूरा का पूरा जबानी याद हो गया। फिर इस मास्टर ने डेयरी खोल ली। एक मशीन में दूध डालकर मशीन को चारा काटने वाली मशीन की तरह घूमाता तो झट से मक्खन बाहर आ जाता। मुझे यह मशीन देखने का भी बहुत शौक था। अपितु मैं चाहता था कि ऐसी मशीन हमारे घर में भी हो और मेरी माँ को सवेरे-सवेरे उठकर देर तक भैंसों का दूध चाटी में न बिलौना पड़े।&lt;br /&gt;अब यह मास्टर कहीं से तिलोरें ले आया था। ये बहुत सुन्दर थीं। इनका कद तो मुर्गी जितना था, चाल तीतरों जैसी और चित-कबरे रंग में बहुत ही सुन्दर लगती थीं। मास्टर कहता था कि यदि ये अंडे देने पर आएँ तो दिए ही जाती हैं। मैं अक्सर सवेरे ये तिलोरें देखने के लिए उसके घर जा पहुँचता।&lt;br /&gt;हाँ, मुझे मुर्गे रखने और अंडों से चूजे निकलवाने का शौक तो बहुत ही ज्यादा था। मुझे चूजे मुर्गों से भी अधिक प्यारे लगे थे। एक बार मेरी माँ ने मुर्गी के नीचे अंडे रख दिए। मैं माँ से छिपकर रोज अंडे उठा उठाकर देखता कि इनमें अभी चूजा बोलने लगा था कि नहीं।&lt;br /&gt;मुझे बिल्लियाँ पालने का शौक मुर्गों से भी अधिक था। मुझे अधिक रंगों वाली बिल्ली बहुत पसंद थी। बिल्ली भी वह जो मेरे साथ सोये और मेरी गोद में बैठे। मेरे इस शौक को पूरा करने के लिए बापू ने जब मंडी में आढतियों के घर बिल्ली ब्याई तो एक बच्चा लाकर दिया। बिल्ली का यह खूबसूरत बच्चा मेरा सबसे बड़ा दोस्त था। मैं स्कूल जाता पर मेरा ध्यान उस बिल्ली के बच्चे में होता। मैं दूध पिला कर उसका पेट भरे रखता। मेरा मन करता कि जल्दी से जल्दी यह बड़ा हो जाए। इतना बड़ा कि सारी दुनिया के बिल्लियों-बिल्लों का मुकाबला किया जाए और यह बिल्ला उनमें पहले नंबर पर आए।&lt;br /&gt;मैंने एक छोटी-सी ढोलकी भी घर में रखी हुई थी। यह ढोलकी मुझे बापू ने 'सच्चे सौदे' की अमावस पर लाकर दी थी। हर अमावस पर ढाडी आते थे और मैं अपने बापू के साथ जब अमावस नहाने जाता तो दीवान में ढाडियों को बड़े शौक से सुनता और फिर वही 'शबद' अपनी ढोलकी पर गा गाकर अपने बिल्ले को गोद में बिठाकर सुनाता। एक बार दीवान में ढाडियों ने शबद सुनाया –&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'चलो सिंघो रल दरशन करिये&lt;br /&gt;गुरू गोबिन्द सिंघ आए ने...।'&lt;br /&gt;(चलो सिंहों, मिलकर दर्शन करें, गुरू गोबिन्दर सिंह आए हैं)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं घर आकर बिल्ले को गोद में बिठाकर कहा-&lt;br /&gt;'नीला घोड़ा,बांका जोड़ा,&lt;br /&gt;हथ विच बाज सुहाए ने।&lt;br /&gt;चल बिलिया रल दर्शन करिये&lt;br /&gt;गुरू गोबिन्द सिंह आए ने।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर मेरी माँ का ख़याल था कि यह बिल्ला जैसे-जैसे बड़ा होता जा रहा है, हमारी मुर्गियों और चूजों की खैर नहीं। मैं चूजों को बिल्ले पर चढ़ाकर सवारी कराता।&lt;br /&gt;चूजों और बिल्ले की दोस्ती इतनी बढ़ गई कि मजाल थी कि कोई बाहर का बिल्ला या कुत्ता चूजों की ओर झपटता। हाँ, एक बार चील अवश्य हमारे चूजों को उठाकर ले गई थी। तब से बिल्ला अब आसमान की ओर भी ध्यान रखता।&lt;br /&gt;एक हमारा डब्बू था। इस बिल्ले की डब्बू के साथ भी गहरी दोस्ती थी। डब्बू बापू का कुत्ता था। मैं डब्बू को इतना पसंद नहीं करता था। डब्बू को हर चीज़ मुँह में डालने की आदत थी। एक बार डब्बू ने मेरी रोटी जूठी कर दी। मैं डंगरों वाली कोठरी में से फावड़ा उठा लाया और जब वह आराम से सो रहा था, मैंने डब्बू के सिर में वह फावड़ा दे मारा। डब्बू मर गया था और मैं डरकर घर से भाग गया। डब्बू के मरने पर बापू की पिटाई का भय मुझे बहुत परेशान कर रहा था।&lt;br /&gt;रात को अँधेरे में मैं घर लौटा तो डब्बू अच्छा-भला था, पर कुछ सुस्त था।&lt;br /&gt;मैं माँ से छिपाकर डब्बू को बहुत सारी रोटियाँ डालीं और हाथ जोड़कर उससे अपनी गलती और ज्यादती की माफ़ी मांगी। मुझे घरवालों ने बहुत डरा रखा था कि बेजबान पशु को मारने का बहुत ही पाप लगता है।&lt;br /&gt;डब्बू बापू का कुत्ता था और मेरा मन करता था, पतली कमर और पतली टांगों वाले शिकारी कुत्तों के लिए।&lt;br /&gt;हमारे गाँव में मेहरों के पास ऐसे कुत्ते थे जिनसे वह अक्सर खरगोश का शिकार किया करते। मैं कई बार माँ से चोरी इन शिकारियों के साथ शिकार खेलने गया था। तीतरों, बटेरों, रोड़ुओं और भट्टिरों का शिकार वे भगवे से करते या फिर उन बटेरों और तीतरों से जो उन्होंने पाल रखे थे। पैली के एक तरफ जाल लगाकर और फिर भगवे डालकर या बटेरे बुलाकर वे शिकार को फंसा लेते।&lt;br /&gt;मैं दिनभर उनके साथ दिहाड़ी तोड़ता परन्तु मुझे ये महरे पता नहीं बच्चा समझकर शिकार में से कोई हिस्सा न देते, और मैं लौटते हुए छोटी नहर के घाट पर से छोटी छोटी मछलियाँ पकड़कर झोली भर लाता और माँ उनको देखकर गालियाँ निकालती, पाप का भय दिखाती और बाहर बाज़ार या पोखर में ये छोटी छोटी मछलियाँ फिकवा देती।&lt;br /&gt;डब्बू बाप का कुत्ता था और बापू ने मुझे समझाया था कि शिकारी कुत्ते पालना नीची जाति के लोगों का काम था और मुझे इस तरह के ख़याल छोड़ देने चाहिएँ।&lt;br /&gt;मुझे ये ख़याल छोड़ देने चाहिएँ या नहीं, इस बात का पता मुझे काफी समय तक नहीं लगा। पर मुझे शिकार के ख़याल से, कुत्ते, बिल्ले और चूजों को प्यार करने से, नहर में गोते लगाने, ताया के खेत में से हल्दी के बूटे उखाड़ने, बाग में से चोरी से आड़ू तोड़ने से कोई भी न रोक सका। और एक दिन स्कूल से छुट्टी होते ही हम बहुत सारे लड़के बाग में आड़ू तोड़ने चल गए। कुछ लड़के बड़े गेट की ओर से गए जहाँ से उन्होंने माली से कुछ आड़ू पैसे देकर खरीदने थे।&lt;br /&gt;हम उस पाड़ की तरफ चले गए जहाँ बाग को पानी लगाने के लिए खाल अन्दर आता था। वहाँ से अन्दर घुसकर हमने कुछ नीचे गिरे आड़ू उठाए और कुछ पेड़ों से लगे आड़ू तोड़कर जेबें भर लीं।&lt;br /&gt;पता उस समय ही चला जब माली ने आकर रंगे हाथ हमें पकड़ लिया। सभी को डांटा-फटकारा।&lt;br /&gt;मुझसे पूछा, ''तू किसका लड़का है ?''&lt;br /&gt;''जत्थेदार का।'' मैंने कहा।&lt;br /&gt;उसने मुझे भविष्य में यह काम न करने की चेतावनी देकर छोड़ दिया और मेरे पास से आड़ू भी नहीं छीने। मैंने वे आड़ू बाग में ही फेंक दिए। मारे डर के मेरी जान काँप रही थी कि माली बापू को इस चोरी के बारे में अवश्य बताएगा।&lt;br /&gt;जब मैं घर पहुँचा तो माँ ने हुक्म दिया-&lt;br /&gt;''जा, अपने बापू की रोटी खेत में दे आ। कामगर कहीं भाग गया है और तेरे बापू को रात में पानी भी लगाना है। तू अपने बापू के साथ नाके पक्के करवाने में हाथ भी बंटाना।''&lt;br /&gt;हमारा खेत नहर के साथ लगता होने के कारण मोघे के पानी के तेज़ बहाव से कोई-कोई रोक बह जाती या नाली टूट जाती तो अकेले आदमी के लिए दोबारा रोक को पक्का करना आसान काम नहीं था। मुझे याद है कि कई बार बहती जाती रोक में बापू मुझे बिठाकर फावड़े से आसपास की खाल की मिट्टी निकालकर डाले जाता था और जब मुँह पूरी तरह बन्द हो जाता तो मैं बीच में से उठ खड़ा होता। इसलिए पानी लगाना, नाके पक्के करना और मोघे तक चक्कर लगाना, ये सभी काम कठिन थे। मुझे पानी मोड़ने के काम से अधिक प्यार नहीं था। मैं जानता था कि बापू की खेत में रोटी ले जाने का अर्थ था, सारी रात बापू के साथ पानी लगवाना। मैं रूठ गया और जिद्द पकड़ बैठा कि मैं बापू की रोटी खेत में लेकर नहीं जाऊँगा।&lt;br /&gt;मेरी माँ ने मुझे बहुत समझाया, बहुत मिन्नतें कीं, कई लालच दिए, पर मैं कहाँ मानने वाला था। जब मिन्नतें कर करके माँ हार गई तो मैंने कहा-&lt;br /&gt;''एक शर्त पर मैं बापू की रोटी खेत में ले जाऊँगा।''&lt;br /&gt;''वो क्या ?'' माँ ने पूछा।&lt;br /&gt;''मुझे कुम्हारों का गधा ला दे, उस पर चढ़कर रोटी लेकर जाऊँगा।''&lt;br /&gt;''मरजाणे, मिरासियों के यहाँ पैदा होना था, रे कामचोर ! घोड़ी से गिरा बंदा तो बच जाता है, खोती से गिरा नहीं बचता।''&lt;br /&gt;पता नहीं, माँ ने मुझे कितनी गालियाँ दीं। वह कब मान सकती थी कि मैं कुम्हारों के गधे पर चढ़कर रोटी लेकर खेत में जाऊँ।&lt;br /&gt;दरअसल, कुम्हारों का बशीरा मेरा यार था और उसके साथ मिलकर मुझे गधे की सवारी करना आ गया था। बग़ैर काठी वाले गधे पर चढ़ना, ऊँठ, घोड़ी, हाथी या पहाड़ पर चढ़ने से भी कठिन था। यह बात केवल उस पर चढ़ने वाला ही जान सकता है।&lt;br /&gt;कुछ देर बाद माँ का गुस्सा कुछ कम हो गया तो वह कहने लगी, ''खोते पर चढ़कर रोटी तो तू दे आएगा, पर तुझे पता नहीं रोटियाँ अपवित्तर हो जाएँगी।''&lt;br /&gt;''मैं रोटियों वाला कपड़ा एक हाथ में पकड़कर ऊँचा करके रखूँगा, खोते के साथ लगने नहीं दूँगा।''&lt;br /&gt;''अच्छा, फिर जा, खोता मांग ला।''&lt;br /&gt;माँ के कहने भर की देर थी कि मैं कुम्हारों के घर से गधा खोलकर उसके मुँह में झब्बू देकर अपने घर ले आया।&lt;br /&gt;माँ ने रोटियाँ कपड़े में बाँधीं। मेरे हाथ धुलाए और मैं उछलकर गधे पर चढ़ बैठा और रोटियों वाला कपड़ा एक हाथ से ऊँचा करके पकड़ लिया और दूसरे हाथ से झब्बू वाला रस्सा और गधे की बगलों में ऐड़ियाँ मारकर उसे भगा लिया।&lt;br /&gt;जब गाँव की सीमा पार कर गधा बड़े अस्तबल के पास से गुजरा तो आगे बड़ा खाल पानी से भरा बह रहा था। यह खाल इतना चौड़ा ज़रूर था कि यदि आदमी खाली हाथ हो तो छलांग लगा कर उसे पार कर सकता था और छलांग भी पीछे से दौड़ते हुए आकर लगानी पड़ती थी।&lt;br /&gt;मैं मुश्किल में फंस गया। गधे को बहुत ऐड़ियाँ मारीं, झब्बू वाला रस्सा भी खींचा, पर गधा था कि खाल में घुसने का नाम ही नहीं लेता था। यूँ तो नहीं कहावत बनी थी कि गधे का अड़ियलपन बुरा होता है। दूसरा हाथ ऊँचा उठाकर मैंने रोटियों वाला कपड़ा पकड़ा हुआ था कि कहीं रोटियाँ गधे की कमर से लग कर अपवित्र न हो जाएँ।&lt;br /&gt;फिर गधे को पीछे से भगाकर खाल को फाँदने के बारे में मैंने सोचा। मुझे उम्मीद थी कि एक ही छलांग में गधा खाल पार कर जाएगा। यदि मैं गधे पर से उतर कर खाल पार करता तो एक तो दुबारा गधे पर एक हाथ में रोटी वाला कपड़ा पकड़े उस पर चढ़ना कठिन था और दूसरा गधे के भाग जाने पर दुबारा बैठने न देने तथा रोटियों का गधे से छूकर अपवित्र होने का बड़ा डर था।&lt;br /&gt;ख़ैर ! मैं गधे को पीछे से भगाकर लाया और रोटियों वाला कपड़ा हाथ में ऊपर उठाए रखा। दूसरे हाथ से झब्बू को थोड़ा सा खुला छोड़ते हुए गधे द्वारा खाल फाँद जाने की आस रख मैंने उसकी कमर में ज़ोर से ऐड़ी मारी। गधा तो छलांग लगाकर खाल पार कर गया, पर मेरे हाथ से झब्बू वाला रस्सा छूट गया और मैं भरे हुए खाल में जा गिरा। मैंने रोटी वाला कपड़ा अभी भी दायें हाथ में ऊपर उठा रखा था।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;(जारी…)&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-4445259837586970304?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/4445259837586970304/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=4445259837586970304&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/4445259837586970304'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/4445259837586970304'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='पंजाबी उपन्यास'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' 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डॉ. सतिंदर सिंह नूर हमें अलविदा कह गए। वह नेट पर ब्लॉग के रूप में मेरे पंजाबी अनुवाद कर्म को लेकर बेहद खुश थे। वह अक्सर जब कभी भी मुझे मिलते, न केवल मेरी पीठ थपथपाते, मुझे प्रोत्साहित भी करते। लेकिन वह महान शख्सियत अब हमारे बीच नहीं हैं। उनका काम, उनका साहित्य और उनकी यादें ही हमारे पास शेष हैं। उनको मेरी और कथा पंजाब परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धाजंलि!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अंक में आप पढेंगे - &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“पंजाबी कहानी : आज तक”&lt;/span&gt; स्तम्भ के अन्तर्गत पंजाबी के वरिष्ठ लेखक सुजान सिंह की प्रसिद्ध कहानी “कुल्फी”, &lt;span style="color:#000099;"&gt;''पंजाबी लघुकथा : आज तक''&lt;/span&gt; के अन्तर्गत (स्व.) जगदीश अरमानी जी की पाँच चुनिंदा लघुकथाएं और &lt;span style="color:#990000;"&gt;“पंजाबी कहानी : नये हस्ताक्षर”&lt;/span&gt; के अन्तर्गत जिंदर की पंजाब विभाजन के दर्द को लेकर लिखी एक सशक्त कहानी “ज़ख़्म” का हिंदी अनुवाद...&lt;br /&gt;आप की प्रतिक्रियाओं की हमें प्रतीक्षा रहेगी…&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;संपादक - कथा पंजाब&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-509995349418216362?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/509995349418216362/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=509995349418216362&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/509995349418216362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/509995349418216362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2011/06/blog-post_9631.html' title='संपादकीय'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-zivqcaL2iDI/Tf48roVG3WI/AAAAAAAAAc4/T5sJM-ilrsc/s72-c/imagesCASBX9AC.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-2241402786666442330</id><published>2011-06-19T23:32:00.005+05:30</published><updated>2011-06-19T23:42:40.131+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पंजाबी कहानी : आज तक'/><title type='text'>पंजाबी कहानी : आज तक</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-I3OxstIZ8cw/Tf46kkswKCI/AAAAAAAAAco/vwzPfMqS_90/s1600/imagesCAKDT2DM.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5619993785006041122" style="WIDTH: 192px; CURSOR: hand; HEIGHT: 128px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-I3OxstIZ8cw/Tf46kkswKCI/AAAAAAAAAco/vwzPfMqS_90/s200/imagesCAKDT2DM.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;पंजाबी कहानी : आज तक(4)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#000099;"&gt;कुल्फ़ी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुजान सिंह&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महीना खत्म होने पर था, पर खत्म होने में नहीं आता था। सोच रहा था कि महीने के प्रथम पन्द्रह दिन कैसे झटपट खत्म हो जाते हैं और तनख्वाह भी उन्हीं पन्द्रह दिनों के साथ ही कैसे गायब हो जाती है। मुझे पट्ठे की चटाई चुभ रही थी। करवट बदलकर पीठ पर हाथ फेरा तो चटाई के निशान पीठ पर उभर आए थे।&lt;br /&gt;''मलाई वाली कुल्फ़ी !'' ठंडी-सर्द आवाज़ में कुल्फ़ी वाले ने हाँक लगाई। उसकी आवाज़ कितनी ही देर मेरे कानों में गूँजती रही। दूध जैसी सफ़ेद कुल्फ़ी साकार मेरी आँखों के सामने नाचने लगी। मेरे मुँह में पानी आ गया। लेकिन मैं बेबस था। पैसे की तंगी हवालात की तंगी से भी बड़ी होती है। अपने दिल की चाह से बचने के लिए मैंने 'कुल्फ़ी' शब्द की उत्पत्ति पर विचार करने की आड़ ले ली। 'कुल्फ़' का अर्थ होता है- ताला, सुनारों ने गहनों में इसको लगाकर 'कुल्फ़' से 'कुल्फ़ी' बना दिया। कुल्फ़ी को भी टीन के सांचों में बन्द करके जमाया जाता है, इसलिए कुल्फ़ी। और इस प्रकार धीरे-धीरे पता नहीं कब, नींद ने इस कुल्फ़ी से मुझे मुक्ति दिला दी।&lt;br /&gt;मेरी दोपहर की नींद अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि मेरे छोटे बेटे ने मुझे झंझोड़कर जगा ही दिया। मैं खीझा हुआ था, पर बेटे की तोतली आवाज़ ने मुझे शान्त कर दिया।&lt;br /&gt;''दा जी, कितनी आवाज़ें लगाईं, तुम जागते ई नहीं।''&lt;br /&gt;''हाँ-हाँ, तू क्या कहता है, बता भी।'' मैंने कुछ उतावला होकर पूछा।&lt;br /&gt;''एक तका दे दो, दा जी!''&lt;br /&gt;पर टका मेरे पास था ही नहीं। मेरे पास आज कुछ भी नहीं था। जून माह की छब्बीस तारीख़ थी। घर का खर्च, बाज़ार की उधार की साख पर बमुश्किल चल रहा था।&lt;br /&gt;''तका दो भी न दा जी।''&lt;br /&gt;बाहर मुरमुरे वाला ऊँची आवाज़ में हमारे दरवाजे के आगे हाँक लगा रहा था।&lt;br /&gt;कोई उत्तर सोचने की खातिर समय निकालने के लिए मैंने कहा, ''काका, तू टके का क्या करेगा ?''&lt;br /&gt;''खर्चूंगा, और मैंने क्या करना है तके का ?''&lt;br /&gt;मुझे पता है, पहली जंग के बाद बहुत मंहगाई हो गई थी, हमे धेला खर्च करने के लिए मिलता था और धेले के मसद्दी राम से लाए हुए छोले खत्म होने में ही नहीं आते थे। अब तो एक आना में भी उतने छोले नहीं मिल सकते थे और मेरी आमदनी, मेरे पिता की आमदनी के पासंग भी नहीं थी, हालांकि मेरी पढ़ाई मेरे पिता से कई गुणा अधिक थी। मैं दुनिया की आर्थिक स्थिति और इस स्थिति को बनाये रखने वाले धन-कुबेरों पर विचार करने लग पड़ा।&lt;br /&gt;बाहर से पुन: 'मुरमुरा छोले' की हाँक गूँजी और साथ ही बेटे ने कहा, ''तका दो भी न, दा जी।''&lt;br /&gt;''टका खराब होता है।'' मैंने हालात से पैदा हुई बदहवासी में कहा।&lt;br /&gt;''हूँ, तका भी कहीं खलाब होता है, दा जी ? तके का मुलमु्ला आता है।''&lt;br /&gt;''मुरमुरा खराब होता है।'' मैंने कहा और बाकी की बात अभी मेरे मुँह में ही थी कि बेटे ने कहा, ''मुलमुला तो मीता होता है।''&lt;br /&gt;इस दलील का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। मैं भी मीठे का लोभी हूँ। पर फिर भी मैंने अपनी कोरी होशियारी जताते हुए कहा, ''मुरमुरे से खाँसी लग जाती है, बच्चू।''&lt;br /&gt;''तुम तका दे दो। मुझे नहीं लगती खाँसी।''&lt;br /&gt;लड़का मचलता प्रतीत होता था। टका मेरे पास था ही नहीं। मैंने बेटे को टालने के लिए पता नहीं क्यों उसको कह दिया, शायद बड़ा लालच देकर भुलाने के लिए -&lt;br /&gt;''मुरमुरा गन्दा होता है ! हम शाम को बाज़ार से कुल्फ़ी खाएँगे।''&lt;br /&gt;मुरमुरे-छोले वाला अब टल चुका था। बेटा मेरी आशा के विपरीत कुल्फ़ी खाने के लिए मान गया था। समझा, बला टली। मैंने सोचा, कहीं कोई और छाबड़ीवाला न आ जाए। सो, मैं कपड़े पहनकर कड़कती धूप में बाहर निकल गया और सड़कों पर समय क़त्ल करता रहा। कीमती समय मैं एक टके की मांग से बचने के लिए नष्ट करता रहा था।&lt;br /&gt;मैं अपने मालिक से क्यों नहीं कहता कि मेरा इतने में गुजारा नहीं होता। पर सुनेगा कौन ? अकेले व्यक्ति की आवाज़ चाहे कितनी ही ऊँची क्यों न हो, सुनी नहीं जाती। ज़रूरतमंद इकट्ठे हो नहीं सकते। अगर हो जाएँ तो उन्हें इकट्ठा रहने नहीं दिया जाता ताकि सब मिलकर मांग न करें। मांग करने पर कई बार नौकरी से जवाब मिल जाता है। मैं डर गया। बेरोजगारी के भयानक भविष्य ने मुझे कंपा दिया। कायरों की भाँति मैं सदैव चुप रहा था और अब भी चुप रहने का ही मैंने फैसला किया।&lt;br /&gt;शाम को यह समझकर कि बेटा जल्दी सो जाता है, मैं दबे पांव घर पहुँचा। आवाज़ नहीं लगाई, केवल कुण्डा ही खटखटाया। ऊपर से आवाज़ आई, ''दा जी, आ लहा हूँ।'' और कुछ ही देर में बेटे ने आकर दरवाज़ा खोला।&lt;br /&gt;''दा जी, कुल्फी खाने जाओगे ?'' उसने आशा भरी आवाज़ में पूछा।&lt;br /&gt;''ऊपर चल, ऊपर।'' मैंने कहा।&lt;br /&gt;बेटा निराश होकर आगे आगे चल पड़ा। चारपाई पर बैठकर बेटे को गोद में लेकर मैंने प्यार से कहा, ''अब तो रात हो गई है, कुल्फ़ी कल खाएंगे।''&lt;br /&gt;आशा के विपरीत बेटा चुप रहा। कितनी ही देर आसमान की ओर देखता कुछ सोचता रहा। फिर बोला, ''दा जी... ताले(तारे) लुपये(रुपये) होते हैं न, बला(बड़ा) भाई कहता था, ताले लुपये होते हैं, तो दा जी साले(सारे) लुपये हमाले कोठे पे क्यों नहीं गिल पड़ते ?''&lt;br /&gt;मैंने यह कहकर कि 'तारे रुपये नहीं होते' मानो उसके स्वर्ग को ढाह दिया। वह चारपाई पर लेट गया और आसमान की ओर देखते देखते आख़िर सो ही गया।&lt;br /&gt;दूसरे दिन काम पर मैं अपने साथियों से कुछ मांगने की कोशिश करता रहा, पर हिम्मत नहीं हो रही थी। मांगना बहुत ही कठिन काम है। मौत जितना दु:ख होता है मांगने में।&lt;br /&gt;आख़िर एक साथी से मैंने तीन रुपये ले ही लिए। जब घर आया तो बेटा दोपहर की नींद ले रहा था। रोटी खिलाते समय पत्नी ने तीन रुपये झटक लिए। आधा मन लकड़ियाँ, शाम की सब्ज़ी, नमक, तेल आदि में बेटे के जागने से पहले तीन रुपये खत्म हो गए। मैंने कहा कि बेटे को कुल्फ़ी खिलानी है, पर उसने कह दिया, ''इसे बड़ा याद रहता है। मैं टका दे दूँगी मुरमुरे के लिए।''&lt;br /&gt;बेटे ने जागते ही कुल्फ़ी मांगी। चीख़-पुकार मच गई। कल वाला मुरमुरा और टका मंजूर नहीं था। आख़िर शाम को कुल्फ़ी खिलाने का वायदा करके छुटकारा पाया और बेटे ने टका मेरे से जमा करवा दिया। शाम से पहले ही मैं किसी से मिलने का बहाना करके बाहर निकल गया और फिर देर रात घर में घुसा। बेटे को सोया देख मैंने राहत की साँस ली। रोटी खिलाते हुए पत्नी ने बताया कि बेटा बहुत देर तक मेरा इंतज़ार करता रहा था। मैं बेटे के संग लेटकर बहुत बेचैन रहा। नींद आ ही नहीं रही थी, पर आख़िर पता नहीं कब आ गई। नींद तो कहते हैं कि कांटों पर भी आ जाती है।&lt;br /&gt;आधी रात के बाद का समय था। बेटा सोया हुआ कुछ बेचैन प्रतीत होता था। उसने दो तीन बार पेट पर टांगें मारी थीं। अब उसने बांह उलटाकर मेरे मुँह पर मारी। जाग तो मैं पहले ही रहा था, अब चेतन हो गया। बेटा कुछ बुदबुदाया। मेरी समझ में कुछ न आया। फिर वह ज़ोर-ज़ोर से बुदबुदाया 'कुल्फ़ी... कुल्फी दा... जी, कुल्फी।'' मैं विह्वल हो उठा। ''जाग रहे हो,'' पत्नी ने कहा और यह जानकर कि मैं जाग रहा हूँ, उसने कहना जारी रखा, ''कमबख्त, सोये सोये भी कुल्फ़ी मांगता है।'' मेरे ऊपर मानो बिजली गिर पड़ी थी। मैं चुप रहा और बेटा भी चुप हो गया।&lt;br /&gt;सुबह उठकर बेटे ने कुल्फ़ी की कोई मांग नहीं की। मेरे काम से लौटकर आने पर भी उसने मुझसे कुछ नहीं मांगा। रोटी खाकर मैं दोपहर की नींद लेने के लिए लेट गया, उसी चुभने वाली चटाई पर और उधार न ले सकने की असफलता पर झुंझलाता रहा।&lt;br /&gt;फिर मुझे नींद आ गई। मैं अभी अर्द्धनिद्रा में ही था कि गली में किसी कुल्फ़ी वाले ने हाँक लगाई, ''ठंडी कुल्फ़ी ! मज़ेदार कुल्फ़ी!'' मैं जाग गया। बेटा मेरे करीब रबड़ की फटी हुई बत्तख से खेल रहा था। दूसरी आवाज़ पर उसके कान ख़ड़े हो गए। बत्तख को फेंक कर वह दौड़ पड़ा। दरवाज़े के पास जाकर वह खड़े होकर बाहर देखने लगा। मैंने सोचा, अब वह मुझे जगाने आएगा, पर वह वहीं खड़ा रहा। फिर वह बाहर की ओर चल दिया। मैं चुपचाप उठकर दरवाज़े की ओट में जा खड़ा हुआ। कुल्फ़ी वाला सामने शाह जी के लड़के को कुल्फ़ी निकालकर देने के काम में लगा था। यह लड़का गली का बलवान लड़का था और अपने से छोटे लड़कों को हमेशा पीटा करता था। यह कोई आठ बरस का था और हमारे बेटे से करीब तीन साल बड़ा था। मेरा बेटा सिपाहियों की तरह टांगे फैलाये कमर के पीछे हाथ बांधे खड़ा था। कुल्फ़ी की तरफ वह गौर से देख रहा था। लेकिन उसने कुल्फीवाले से कुल्फ़ी नहीं मांगी थी। जैसे ही कुल्फ़ीवाले ने शाह के लड़के के हाथ में कुल्फ़ी की प्लेट रखी, मेरा बेटा झपटकर उस पर पड़ा। वो गिरी प्लेट, वो गई कुल्फ़ी, फलूदा और चम्मच और नाली में गिरा शाह का लड़का। किसी विजेता की तरह मेरा बेटा उसकी ओर देखता रहा। शाह का लड़का गुस्से में उठा, कुल्फ़ी का हुआ नुकसान और अपनी हेठी जैसे उसमें नया जोश भर रही थी। जैसे ही वह उठा, मेरे बेटे ने फिर उसको ऐसी ठोकर मारी कि वह फिर मोरी में जा गिरा और चीखने-चिल्लाने लगा। कुल्फ़ी वाला बेटे की ओर चांटा मारने के लिए बढ़ा। मैंने दौड़कर बेटे को उठा लिया। कुल्फ़ी वाले ने शाह के लड़के को उठाया। शाहनी जो किसी का उलाहना नहीं सुनती थी, आज हमारे घर उलाहना देने आई। मेरे बेटे का शरीर तप रहा था। पत्नी ने कहा, ''आ गया कमबख्त ! तू अब उलाहने भी लाने लगा ?'' और मारने के लिए उसने चांटा उठाया। मैंने कहा, ''कुछ बाँट पगली ! कायर बाप के घर बहादुर बेटा पैदा हुआ है !''&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-67Nr6s8sMeE/Tf465e4D2ZI/AAAAAAAAAcw/dzpvAnOF50I/s1600/Sujan_Singh.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5619994144220109202" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 99px; CURSOR: hand; HEIGHT: 137px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-67Nr6s8sMeE/Tf465e4D2ZI/AAAAAAAAAcw/dzpvAnOF50I/s200/Sujan_Singh.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;सुजान सिंह (1903 - 1993)&lt;br /&gt;पंजाबी के विख्यात और अग्रणी कथाकार।&lt;br /&gt;कहानी संग्रह - 'दुख सुख तों पिछों', 'सभ रंग', 'नरकां दे देवते', 'मनुख ते पशु', 'डेढ़ आदमी', 'सवाल जवाब', 'पत्तण ते सरां, शहर ते गरां'।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-2241402786666442330?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/2241402786666442330/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=2241402786666442330&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/2241402786666442330'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/2241402786666442330'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2011/06/blog-post_9983.html' title='पंजाबी कहानी : आज तक'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-I3OxstIZ8cw/Tf46kkswKCI/AAAAAAAAAco/vwzPfMqS_90/s72-c/imagesCAKDT2DM.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-473080391587905310</id><published>2011-06-19T23:08:00.006+05:30</published><updated>2011-06-20T10:23:04.304+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर'/><title type='text'>पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-7zWt-inxawY/Tf7R-RtZcOI/AAAAAAAAAdA/bA_zUjgqFF8/s1600/6b1a899d3a59765c.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5620160252840866018" style="WIDTH: 145px; CURSOR: hand; HEIGHT: 103px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-7zWt-inxawY/Tf7R-RtZcOI/AAAAAAAAAdA/bA_zUjgqFF8/s200/6b1a899d3a59765c.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर(3)&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;ज़ख्म &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;जिंदर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मुझे तो इतनी दूर से ठीक से नहीं दिखता।'' ताया जी ने अपनी छड़ी पकड़कर उठते हुए कहा था। वह टी.वी. से करीब दो फुट दूर, बिलकुल सामने, पैरों के बल जा बैठे थे। मैं स्वयं कुर्सी उठाकर उनके पास ले गया था। जबरन उन्हें कुर्सी पर बिठाया था। वह अपनी ही धुन पर सवार कहे जा रहे थे, ''कोई नहीं... कोई नहीं... मैं ऐसे ही बैठा करता हूँ। फिलम सोहणी है। मुझे ठीक से देखने दे। मैं कौन सा बाहरी बन्दा हूँ। मेरा अपना घर है, मैं जैसे मर्जी बैठूँ।''&lt;br /&gt;मैंने कहा था, ''फिल्म का क्या है। मैं फिर शुरू से लगा देता हूँ।''&lt;br /&gt;ड्राइंगरूम में पड़ा बत्तीस इंची एल.सी.डी. हमसे दसेक फुट की दूरी पर था। हम भी मेज़-सोफ़ा खींचकर उनके पास आ बैठे थे।&lt;br /&gt;वह माथे पर हाथ की छतरी बनाकर एकाग्रचित्त-से फिल्म देख रहे थे। उन्होंने दायीं लात बायीं लात पर रखी हुई थी। उन्होंने धोती पहन रखी थी। वह बार बार टखने के ऊपर वाली जगह पर खाज कर रहे थे। फिर वह टखने के ऊपर खाज करते करते अपना हाथ घुटने के नीचे के गड्ढ़े पर ले आए तो मैं उनका ज़ख्म देखकर अचम्भित रह गया था। टखने के पास का ज़ख्म तो मैंने जब वह आकर बैठे ही थे, तभी देख लिया था। शायद, पहले भी कभी देखा होगा, पूरी तरह याद नहीं। पर यह ज़ख्म इतना बड़ा और गहरा होगा, मुझे इस बात का पता नहीं था। जैसे शहतूत के दरख्त के तने में कोटर-सा बना होता है, नीचे से लेकर ऊपर टहनियों तक, ठीक वैसा ही उनका यह ज़ख्म था। कई जगहों से मवाद जैसा कुछ कुछ रिस रहा था। मुझे घिन्न-सी आई थी। शायद, मेरे साथ बैठे दोस्तों को भी आई होगी। फिर मैंने सोचा था कि क्या मालूम उनका इस तरफ़ ध्यान गया ही न हो। मेरी नज़रें ही उस पर केन्द्रित हुई हों। मैं खुद चाहता था कि वे उनके ज़ख्म को न देखें।&lt;br /&gt;उन्होंने अपनी धोती को फिर से टखने तक फैला लिया था, इस डर से कि कहीं कोई मक्खी न आ बैठे। चारों ओर से बेफिक्र वह फिल्म देखने में मदमस्त थे। उन्हें पता ही नहीं लगा था कि कैमरामैन ने कब उनके कुर्ते पर माइक चिपका दिया था।&lt;br /&gt;हमने दो घंटों तक उनका इंतज़ार किया था। कई छोटे-छोटे पैग सिप किए थे। हम यानी चार दोस्त। मैं उर्फ़ जगमोहन गोगना, मानव शास्त्र का प्रोफ़ेसर, स्टेट युनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयार्क, बिनघंटन से, समाज शास्त्र विभाग का हैड प्रो. खालिद जावेद, सिंगापुर की नेशनल युनिवर्सिटी से, डा.जसपाल कलेर जिसने पुरातन एशियन इतिहास पर कई शोध पत्र लिखे थे और दिल्ली से आया कैमरामैन हरि भटनागर।&lt;br /&gt;प्रो. जावेद का गाँव कसूर के करीब पड़ता था। उसके माँ-बाप नूरमहल से उजड़कर उधर पाकिस्तान में चले गए थे। उसकी दो चाचियाँ, तीन बुआ मारी गई थीं। उसकी एक चाची ने बताया था कि बच्चों को बचाने की खातिर उन्हें पिछली कोठरी में बन्द कर दिया गया था। उनके इन बारह बच्चों के विषय में कुछ भी पता नहीं चला था कि वे जिन्दा थे या क़त्ल कर दिए गए थे। उसके बाबा का कहना था कि शायद किसी ने तरस खाकर बच्चों को न मारा हो, उनका धर्म बदल दिया हो। उसके बाबा ने दो वर्ष बाद अपने घर में रहने वाले के नाम एक ख़त लिखकर भेजा था जिसमें इन बच्चों के बारे में पूछा गया था। परन्तु प्रत्युत्तर में उसे कोई जवाब नहीं मिला था।&lt;br /&gt;अब जावेद इन बच्चों की तलाश में मेरे संग आया था। उसे यकीन था कि इनमें से कोई न कोई अवश्य ही जीवित होगा। अगर आठ वर्षीय रज़ा जीवित हुआ तो उससे बहुत कुछ पता चल सकता था।&lt;br /&gt;''उसे कहते हैं नूरमहल की सराय,'' मैंने सामने की ओर देखते हुए बताया था।&lt;br /&gt;प्रो. जावेद कार से उतरा था। उसने बड़ी हसरत भरी निगाहों से सराय की ओर देखा था। कहा था, ''अब तुम मेरे पीछे-पीछे आओ। मैं अपने बुजुर्ग़ों का घर खुद ही खोज लूँगा।'' वह मुझसे आगे होकर चल पड़ा था। दो एक पल के लिए वह दुविधा में पड़ा था। ''बाज़ार को दो रास्ते जाते हैं। एक अड्डे की तरफ से, दूसरा अड्डे और सराय के बीच से होकर। यह रास्ता ठीक रहेगा।'' वह बायीं ओर मुड़ा था। मैंने उसे रोका था, ''आगे वाला राह भी ठीक रहेगा।''&lt;br /&gt;''न, प्लीज़ मुझे डिस्टर्ब न करो। मैं अपने कदमों की गिनती कर रहा हूँ।'' फिर, उसने बताना आरंभ किया था, ''यहाँ से सैंतालीस कदम आगे जाकर दायें हाथ मुड़ना है। फिर एक सौ तेईस कदम पर बरगद का पेड़ आएगा। बरगद के नीचे ललारी(रंगसाज) बैठा होगा। शायद, अब वह न हो। वहाँ से बायें हाथ मुड़ना है। पिचासी कदम आगे जाकर बायीं ओर मुड़ेंगे। बाज़ार खत्म हो जाएगा। दस कदम पर चढ़ाई आएगी। पन्द्रह कदम नीचे की ओर जाना पड़ेगा। फिर बायें हाथ मुड़ेंगे। बावन कदम चलकर कुइयाँ आएगी। यहाँ से बारह कदम पर बायीं तरफ मेरे बड़े-बुजुर्ग़ों का कभी घर हुआ करता था।''&lt;br /&gt;हम ठीक उस घर के सामने पहुँच गए थे। मैंने उसे छेड़ा था, ''बड़ा हिसाब रखा है।''&lt;br /&gt;''ये हिसाब मैंने नहीं रखा। मेरे ग्रेंड फॉदर ने रखा हुआ था। वे दूसरे-चौथे दिन अपने घर को याद करते रहते थे। ये मेरे बुजुर्ग़ों की जड़ें हैं। मुझे लगता है कि शायद मेरी भी यहाँ जड़ें हैं। फिजी में भारतीय सोचते हैं कि जहाँ उनके बुजुर्ग़ों का नाड़ू नपा होता है, वहीं उनकी जड़ें होती हैं। इस बात की समझ मुझे अब आई है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी उससे मुलाकात ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी, इंग्लैंड में एक सेमिनार के दौरान हुई थी। इस सेमिनार का विषय था - 'इंडो पाक विभाजन में नेहरू और जिन्ना का रोल : साइको-एनालैटिक अध्ययन।' जिस होटल में हमें ठहराया गया था, उसमें मेरा कमरा प्रो. जावेद के साथ लगता था। दो तीन मुलाकातों के बाद हम आपस में घुल मिल गए थे। हमें लगा ही नहीं था कि हम पहली बार मिले थे। हमने अपनी भाषा में बातें की थीं। जब मैंने उसे अपने शहर नूरमहल के बारे में बताया था तो उसने कितनी ही देर तक मुझे अपने आलिंगन में लिए रखा था। फिर मेरा हाथ दबाते हुए कहा था, ''मुझे अपने बुजुर्ग़ों की भूमि का बंदा मिल गया। शायद मेरा काम आसान हो जाए।'' मेरे द्वारा कई बार पूछे जाने पर भी उसने अपने काम के विषय में कुछ नहीं बताया था। बस, इतना कहा था, ''जिगरा रख, मुझे तो अब हर रोज़ तेरी संगत करनी है।'' शीघ्र ही, हमारे संग डा. कलेर भी आ मिला था।&lt;br /&gt;यह सेमिनार एक सप्ताह का था।&lt;br /&gt;तीसरे दिन दूसरे सत्र में कांग्रेस अध्यक्ष कृपलानी का कांग्रेस अधिवेशन में दिया गया भाषण बहस का मुद्दा बना था- ''मैं कुछ दंगा-पीड़ित इलाकों से होकर आया हूँ। एक जगह मैंने एक कुऑं देखा जिसमें औरतों ने अपने बच्चों सहित छलांग लगाकर अपनी जान बचाई थी। एक अन्य स्थान पर एक मंदिर में लोगों ने इसी वजह से पचास जवान औरतों को मार दिया था। एक घर में मैंने हड्डियों के ढेर देखे जहाँ 107 व्यक्तियों जिनमें अधिकतर स्त्रियाँ और बच्चे थे, को हमलावरों ने घेर कर एक घर में बन्द कर दिया था, फिर उन्हें ज़िन्दा जला दिया। कुछ मेंबरों ने हम पर आरोप लगाया कि हमने डर कर यह फ़ैसला किया है। मैं इस सच को स्वीकार करता हूँ, पर उस अर्थ में नहीं जिसमें यह आरोप लगाया गया है। यह डर प्राणहानि का या विधवाओं और अनाथों के रुदन का या अनेक घरों के जलाये जाने का नहीं है। डर यह है कि हम ऐसा ही करते रहे, एक-दूजे से बदला लेते रहे, अपमान पर अपमान करते रहे तो आख़िर हमारी स्थिति मानवभक्षियों जैसी और उससे भी बुरी हो जाएगी। इन दुखद परिस्थितियों में मैंने भारत विभाजन का समर्थन किया है।''&lt;br /&gt;जर्मनी से आए डा. स्पैनसर ने किसी पुस्तक में से पटेल के विचार पढ़कर सुनाए थे, ''कांग्रेस पाकिस्तान के विरुद्ध है, फिर भी सदन के सामने जो प्रस्ताव है, इस विभाजन को स्वीकार करता है। महासमिति इसे पसन्द करे या न करे, असल में पंजाब और बंगाल, दोनों में पहले से ही पाकिस्तान मौजूद है। ऐसी परिस्थिति में मैं असली पाकिस्तान को ज्यादा पसन्द करूँगा, क्योंकि फिर उन लोगों की जिम्मेवारी का कुछ ख़याल रहेगा।''&lt;br /&gt;प्रो. जावेद अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया था। उसने समय लेकर अपनी बात आरंभ की थी, ''मैं सबूत पेश कर सकता हूँ कि कायदे-आजम जिन्ना आख़िर तक पाकिस्तान नहीं चाहते थे। कैबिनेट मिशन की योजना के संबंध में 2 जून 1947 को जिन्ना माउंटबेटन से मिलने गए थे। कांग्रेस ने इस योजना को पहले ही मान लिया था। जिन्ना ने नहीं। माउंटबेटन ने कहा था- इस तरह तो आप अपना पाकिस्तान हमेशा के लिए खो देंगे। इस पर जिन्ना ने एक पंक्ति में जवाब दिया था- 'जो होना है, वही होगा।' कितनी महत्वपूर्ण बात थी कि कायदे-आजम इतिहास के इस अति महत्वपूर्ण और फ़ैसलाकुन पल में भी कोई अहम फ़ैसला लेने से पीछे हट रहे थे।''&lt;br /&gt;डा. जावेद के विचारों और तथ्यों ने एक बार तो हॉल में सन्नाटा पैदा कर दिया था। वहाँ बैठे विद्वानों के मनों में यह प्रश्न हलचल मचाने लगा था कि क्या प्रो. जावेद ऐसा पहला मुसलमान था जिसने पाकिस्तान बनने का विरोध किया है या उसके अन्दर यह बात घर कर गई थी कि कायदे-आजम पाकिस्तान नहीं चाहते थे। इसी बात ने सभी का ध्यान खींच लिया था। कइयों ने उठकर उसकी तरफ ख़ासतौर पर देखा भी था।&lt;br /&gt;बाद में, किसी विद्वान ने कहना शुरू किया था, ''मैं प्रो. जावेद की बात से सहमत नहीं हूँ। 22-24 मार्च 1940 को लाहौर में मुस्लिम लीग का 27वाँ ऐतिहासिक सैशन हुआ जिसमें कायदे आजम जिन्ना ने कहा था- हिंदू और मुसलमान दो भिन्न-भिन्न धार्मिक दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाज और भिन्न-भिन्न संस्कृति वाले हैं। वे न परस्पर शादी-ब्याह कर सकते हैं, न संग बैठकर खाना खा सकते हैं। असल में, ये दो अलग-अलग सभ्यताएँ हैं जो विरोधी विचारधाराओं और भावनाओं पर आधारित हैं। उनके महाकाव्य अलग हैं। उनके नायक अलग हैं और कथायें भी अलग हैं। प्राय: एक का नायक दूसरे के लिए खलनायक है। इसी तरह उनकी हार और जीत भी अलग है...।''&lt;br /&gt;समय पूरा हो जाने के कारण वह विद्वान अपनी बात पूरी नहीं कर सका था।&lt;br /&gt;इस सत्र में बहुत ही विचारोत्तेजक बातें हुई थीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात में महफ़िल मेरे कमरे में सजी थी। हम चाहते थे कि इंडो-पाक विभाजन को छोड़कर कुछ अन्य बातें करें। लेकिन डा. कलेर ने डा. स्पैनसर को बुला लिया था। डा. कलेर ने कहा था, ''दोस्तो, अब हम ऑफ द रिकार्ड बातें करेंगे।''&lt;br /&gt;कुछ समय बाद ही हमने सेमिनार से भी अधिक गंभीर बातें की थीं।&lt;br /&gt;डा. स्पैनसर ने चुन चुन कर शब्दों में बताया था, ''मेरा अब तक का अनुभव यही बताता है कि तुम एशियन लोग तथ्यों को तोड़-मरोड़कर बताते हो। अपने ऊपर कोई दोष नहीं लेते। यही कारण है कि कोई भी बात निखर कर सामने नहीं आती। मैं ही नहीं, जो भी व्यक्ति इंडो-पाक विभाजन के समय की स्थितियों की छानबीन करेगा, उसे ज़ख्म ही ज़ख्म दिखाई देंगे। ये अभी कई वर्षों तक हरे ही रहेंगे। और हरे ज़ख्म बहुत तंग किया करते हैं।... अब मैं अपनी बात महात्मा गांधी से शुरू करता हूँ। उन दिनों उनकी उम्र 78 वर्ष की थी। नेहरू और सरदार पटेल ने भारत-पाक विभाजन को स्वीकार कर लिया था। इस संबंध में उन्होंने गांधी को एक तरफ रखा था। जब गांधी को पता लगा तो वह संकट में फंस गए। वह जानते थे कि पार्टी पर सरदार पटेल की पकड़ मज़बूत है। नेहरू की जनता पर। यदि गांधी उन दोनों का खुलकर विरोध करते तो गांधी, कांग्रेस और भारत की आज़ादी - तीनों की स्थिति बहुत संकटमय हो सकती थी। दूसरी बड़ी बात, उनमें अब पहले जितनी शक्ति भी नहीं रही थी।&lt;br /&gt;डा. कलेर ने डा. स्पैनसर को टोका था, ''गांधी जी ने तो अंग्रेजों को यह भी कहा था कि तुम हमें ईश्वर के भरोसे छोड़ दो। बरबादी में छोड़ दो। हम आपस में तय कर लेंगे, पर तुम चले जाओ।''&lt;br /&gt;''गांधी ने माउंटबेटन के साथ दूसरी मुलाकात में ही कह दिया था कि जिन्ना और मुस्लिम लीग को केन्द्र में सरकार बनाने दी जाए। जिन्ना देश के प्रधानमंत्री बनें और जैसे चाहें, देश को चलाएं। इस पर माउंटबेटन ने पूछा था - जिन्ना पर इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी। गांधी ने उत्तर दिया था- फिर यही, वही कपटी गांधी।''&lt;br /&gt;''पर पटेल और नेहरू यह नहीं चाहते थे।''&lt;br /&gt;''विभाजन की योजना वी. पी.मेनन ने तैयार की - उच्चकुलीन हिंदु ने, मुस्लिम लीग से छिपा कर।''&lt;br /&gt;''हाँ, गांधी जी ने कहा था, मैं मानता हूँ। पर जैसा कि मैंने सेमिनार में भी कहा था और प्रो. जावेद ने भी इस बात पर ज़ोर दिया था कि जिन्ना भारत-पाक विभाजन के लिए जिम्मेदार नहीं थे, मैं अब भी अपने विचारों पर ज्यों का त्यों खड़ा हूँ। सभी स्कॉलर तथ्यों को ऐतिहासिक तथ्यों से जोड़कर देखा करते हैं। मैंने एक दूसरी दिशा से भी सोचना प्रारंभ किया है। शायद मैं सही होऊँ। यह है मानव जीन्स। जिन्ना के परिवारवाले दो पीढ़ी पहले हिंदू थे। क्या कहीं न कहीं उनके रक्त में हिंदू धर्म नहीं समाया हुआ था ? जिन्ना ने न कभी हिंदू धर्म पर और न ही हिंदुओं के ख़िलाफ़ अपशब्द कहे थे। जितनी इज्ज़त वह तिलक और गोखले को देते थे, उतनी किसी मुसलमान को नहीं।''&lt;br /&gt;एक बार तो सभी के मुँह पर ताले लग गए थे।&lt;br /&gt;शीघ्र ही, प्रो. जावेद ने कमांड अपने हाथ में ले ली थी, ''यारो, बात तो इतनी सी थी कि यदि इस बात को कांग्रेस एक बार भी मान लेती कि जिन्ना और मुस्लिम लीग मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं, तो शायद बात इतनी न बढ़ती। हमारा इतिहास कुछ और ही होता।''&lt;br /&gt;डा. कलेर ने इतिहास का एक और पन्ना खोल दिया था, ''चलो, इस्लाम धर्म से ही शुरू कर लो। मुहम्मद इकबाल ने एकबार कहा था कि इतिहास में संकट के समय इस्लाम ने मुसलमानों की रक्षा की है। न कि मुसलमानों ने इस्लाम की। यदि तुम अपना ध्यान इस्लाम पर केन्द्रित करो और उसमें समाहित उज्जवल विचारधारा से प्रेरणा लो तो तुम्हारी बिखरी हुई शक्ति पुन: एकत्र हो जाएगी। मैं उनकी इस बात से सहमत भी हूँ और नहीं भी। तुम पूछो- नहीं कैसे? हिंदुस्तान के लगभग सभी मुसलमानों की सबसे अहम समस्या यही थी कि उनका धर्म विदेशी था। उनके धार्मिक फैसले किसी न किसी रूप में तुर्की अथवा अन्य स्थानों से प्रभावित होते थे। इससे भी बड़ी बात यह थी कि उन्हें असली मुसलमान नहीं माना जाता था। इस्लाम अरबी धर्म है। जो अरबी नहीं है, पर मुसलमान है, वह परिवर्तित है। यहाँ मुसलमानों की ऐसी स्थिति थी कि एक तरफ उनकी मातृभूमि थी, जहाँ वे जन्मे-पले थे, दूसरी तरफ उनकी आस्था थी जिसका सबकुछ अरब में था। जब विदेशी मुसलमान इंडिया में आए तो वे अपने संग औरतें और बच्चे नहीं लाए थे। यहाँ एक अजीब किस्म का इस्लामी राज फैला। कई स्तरों पर यह भिन्न-भिन्न रूपों में देश के मूल निवासियों के साथ जुड़ा हुआ था।''&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने साधारण से कुछ ऊँची आवाज़ में कहा था, ''इंडिया में जितने भी मुगल बादशाह, संत, सूफ़ी रहे, किसी ने भी बाहर के खलीफ़ा या पाशा के प्रति अपनी श्रद्धा या सरोकार नहीं रखा था। मुझे इसका एक भी उदाहरण कहीं नहीं मिलता। इस देश के हिंदू भी बाहर से आए थे। मुसलमान भी। उनके लिए यह धरती उनकी मातृभूमि है। हमारे लिए लगभग वैसी ही। इंडिया में इतने वर्ष इकट्ठे रहने से सारा खून बदल गया था। हमारे चेहरे भी बदलकर एक जैसे हो गए थे। मुसलमानों ने हिंदुओं के अनेक रीति-रिवाज़ अपना लिए थे। हिंदुओं ने मुसलमानों के। दोनों परस्पर इतना घुलमिल गए थे कि उन्होंने एक नई भाषा बना ली थी जिसका नाम उर्दू है। न यह हिंदुओं की भाषा है, न मुसलमानों की।''&lt;br /&gt;डा. स्पैनसर ने पूछा था, ''फिर गलती कहाँ हुई थी ?''&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने सीधे ही मेरी ओर देखा था मानो कह रहा हो कि अब चुप बैठने से काम नहीं चलेगा, कुछ बोलना ही होगा। मैंने अपनी बात यहाँ से आरंभ की थी, ''डा. स्पैनसर, अपनी बात सिद्ध करने के लिए मुझे पीछे जाना पड़ रहा है। तीन मार्च 1707 को औरंगजेब की मृत्यु हुई। यहीं से मुगल सल्तनत की डाउनफॉल शुरू हो गई। औरंगजेब के चौथे पुत्र मुहम्मद शाह के बाद इंडिया के टुकड़े होने लगे। 9 अगस्त 1765 क्लाइव इलाहाबाद में शाह आलम से मिला। शाह आलम ने एक शाही फरमान जारी करके बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी कम्पनी को दे दी। यह मुगल सल्तनत के ताबूत में पहला कील था। कार्नवालिस ने परमानेंट सैटलमेंट की नीति लागू की तो मुसलमान जमींदारों का आर्थिक आधार छिन्न-भिन्न होने लगा। हिंदू पहले ही कम्पनी में नौकरियाँ करते थे, उन्होंने अवसर का लाभ उठाया। अंग्रेजी शिक्षा और सरकारी नौकरियों में पिछड़ते हुए मुसलमान धीरे-धीरे उद्योगों, बैंकों, शेयर बाजारों, व्यापार आदि यानी कि हर तरफ़ से पिछड़ने लगे। उनका आत्मगौरव और आत्मविश्वास भी खत्म हो गया। उनका गौरवशाली अतीत, शानो-शौकत और उनके महान बादशाह उनके लिए बीते दिनों की बात हो गई थी।''&lt;br /&gt;मैं सामने बैठे प्रो. जावेद की प्रतिक्रिया जानने के लिए रुका तो उसने बात को आगे बढ़ाने के लिए मुझे इशारा किया था। मैं फिर शुरू हो गया था, ''वारेन हेस्टिंगज़ ने एक बार कम्पनी को चिट्ठी लिखी थी कि भारत की परम्पराएँ - हिंदू और मुस्लिम दोनों बहुत मज़बूत, प्रभावशाली और प्राचीन हैं। अंग्रेजों को सामाजिक और न्यायिक कारणों से किसी भी स्थिति में दख़ल नहीं देना चाहिए। 1857 की असफलता के बाद हिंदू और मुसलमान अलग-अलग धर्मों, सम्प्रदायों और राष्ट्रीयताओं में देखे जाने लगे। ऐसा पहले कुछ नहीं था। देखने वाली बात यह भी थी कि 1857 की असफलताओं के पश्चात बदले हुए हालातों वे स्वयं को नई तरह के अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में देख रहे थे। हालाँकि वे पहले भी अल्पसंख्यक थे पर उनके पास राजनीतिक सत्ता और पावर थी। अब वे सत्ताहीन और पराजित हो गए थे। बौद्धिकता सैयद अहमद से शुरू हुई थी। अहमद ने ही अंग्रेज सरकार को बताया कि अंग्रेजों को हिंदू और मुसलमान सिपाहियों की अलग-अलग रेजीमेंट रखनी चाहिएँ। जिससे वे दोनों एक दूसरे से भावनात्मक रूप में जुड़ न सकें। एक को दबाने के लिए दूसरे को इस्तेमाल किया जा सके। अहमद के विचार उसकी पुस्तक 'कॉजिज ऑफ इंडियन रिवोल्ट' में दर्ज हैं जिसकी 500 प्रतियाँ छपी थीं। 498 प्रतियाँ इंग्लैंड में संसद सदस्यों और अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों को भेजी गईं। अमीर अली ने 1910 में मुस्लिम लीग की लंदन में शाखा खोली। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के अंग्रेज प्रिंसीपल मिस्टर बेक ने मुसलमानों को उकसाया।''&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने बीच में टोकते हुए और खीझते हुए कहा था, ''पता नहीं हमारे बीच से धर्म मनफ़ी क्यों नहीं होता। मैं स्वयं इसका शिकार हूँ। डा. गोगना भी। मेरी समझ में नहीं आता या डा. गोगना को जानबूझकर सावरकर की पुस्तक 'द इंडीयन वार आफ़ इंडीपेंडेंस 1857' क्यों भूल गई। इस पुस्तक ने हिंदू-मुसलमानों में दरार की शुरूआत की थी।''&lt;br /&gt;मैंने कहा था, ''सॉरी, मैं भूल गया। मैं अपनी बात इन शब्दों के साथ खत्म करता हूँ कि यह लड़ाई उच्च वर्ग जिनमें मनसबदार, जागीरदार, जमींदार आदि थे, की थी। ना कि गरीब वर्ग की क्योंकि इसमें यदि किसी ने अपनी जान माल का नुकसान कराया था तो वह गरीब वर्ग ही था।''&lt;br /&gt;डा. स्पैनसर हमारी बातों से उकता गया था। इसलिए उसने उठते हुए कहा था, ''अब सो जाओ। बाकी बातें कल करेंगे।''&lt;br /&gt;डा. स्पैनसर के जाने के बाद हमने इंडो-पाक दोस्ती के नाम के जाम टकराये थे।&lt;br /&gt;मैंने बल देकर कहा था, ''हमें यह बात मानकर चलना चाहिए कि विभाजन को भूलना कठिन है। लेकिन इसे याद रखना और भी खतरनाक है।''&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने मेरी ओर गुस्से में देखते हुए कहा था, ''जिनके संग बीती है, उनसे पूछकर देखो। वे अभी जीवित हैं। उनके पास अपनी यादें हैं। बँटवारे के इतिहास की यादें। पीछे छूट गए अपने घरों की यादें। उनके किस्से-कहानियाँ सुनो। इन किस्सों, कहानियों से बहुत कुछ जाना जा सकता है।''&lt;br /&gt;डा. कलेर ने उससे पूछा था, ''विभाजन के किस्से, कहानियों को खोजना हमारे लिए कितना फायदेमंद है ?''&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने मेज़ पर मुक्का मारते हुए कहा था, ''बहुत ही महत्वपूर्ण है। एशियन लोगों की सायकी को समझने के लिए किस्से-कहानियों की बहुत अहमियत है। किसी भी शख्स को मिल लो, वह अपनी आपबीती सुनाने के लिए कोई कहानी अवश्य ही सुनाएगा। इसके बगैर वह अपनी बात बता ही नहीं सकता। दूसरी बात मेरे दोस्त, तुम यह बात क्यों भूल जाते हो कि हमने कितना कुछ गंवाया है। जब रेशमा पहली बार इंडिया गई थी तो वह प्राइम मिनिस्टर इंदिरा गांधी से मिली थी। इंदिरा गांधी ने उससे पूछा था- मेरे लायक कोई काम बताओ। रेशमा ने झट से कहा था - मैंडम, आप यह बार्डर खोल दो। हम तो उधर चले गए हैं, पर हमारे पीर-बाबा तो इधर हैं। फौजी हमें उनकी मजार पर जाने नहीं देते। हम गाना गाएँ और पीर-बाबाओं को न सुनाएँ, तो गाने का क्या फायदा। कितना बड़ा सच कहा था रेशमा ने ! हमारी यादें तो इंडिया में ही हैं। हमारे धार्मिक स्थान अजमेर शरीफ़, बिहार शरीफ़, निजामुद्दीन, दुनिया की मशहूर इमारतें जैसे ताजमहल, जामा मस्जिद, लाल किला, फतहपुर सीकरी यहीं रह गईं। हमने यह सब कुछ गंवाया है। बताओ, तुमने क्या खोया है। हमारे अपने खानदान की कब्रें इंडिया में हैं। मेरे बाबा जी को जब नूरमहल याद आता था या कोई बात चलती थी तो वह अक्सर कहते थे- हमारे देश में ऐसा होता था। हम अपने देश में ऐसा करते थे। उन्होंने कभी इंडिया का नाम नहीं लिया था। कभी पाकिस्तान का नाम नहीं लिया था। उनकी स्मृतियों में तो उनकी जन्मभूमि बसी थी। इसका धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं था। एक बात और देखने वाली है कि बँटवारे की खामोशियाँ कई तरह की हैं। सितम की बात तो देखो, विभाजन के समय से संबंधित कोई स्मारक नहीं बना। दोस्तो, हमारा एक ही कल्चर है। पंजाबी कल्चर। कोई तो काम करो। यूँ ही चुप बैठकर कुछ नहीं होगा। कम से कम मेरे परिवार के बच्चों को ही खोजने में मेरी मदद करो। शायद, उनमें से कोई जिन्दा हो।''&lt;br /&gt;डा. कलेर ने पूछा था, ''तुम निज के बारे में क्यों सोचते हो ?''&lt;br /&gt;प्रो. जावेद का जवाब था, ''निज से ही तो बात आगे चलती है। शायद इसके साथ कई अन्य बच्चों का पता लग जाए।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कैमरामैन को ताया जी के बारे में बताया था, ''ये मेरे ताया जी हैं। मेरे भापा जी के साथ नूरमहल 'जगदम्बे ज्वैलर्स' में काम किया करते थे। इनका गाँव 'नवां गाँव' शौकिया है। सारा परिवार अमेरिका और कैनेडा बैठा है। यह पीछे अकेले हैं। कई बार वीज़ा के लिए अप्लाई किया, पर नरेन्द्र मोदी की तरह अंग्रेजों ने इनके पासपोर्ट पर हमेशा रिफ्यूज की स्टैम्प लगा दी...।''&lt;br /&gt;उन्होंने बीच में ही टोककर कहा था, ''अब बस भी कर। पहले पैग डाल। मुझे फिल्म देखने दे।''&lt;br /&gt;मुझे उनके पैग का अंदाजा था। फिर भी मैंने पढ़े-लिखों वाला पैग बनाया था। उन्होंने अपनी नज़रें टी.वी. के स्क्रीन पर टिकाये रखी थीं। एक ही साँस में गिलास खाली कर दिया था। उन्होंने किसी की तरफ देखा नहीं था।&lt;br /&gt;मैंने उनके कान के पास अपना मुँह ले जाकर अपने दोस्तों के बारे में बताया था। मैं कुछ पूछने ही लगा था कि उन्होंने होंठों पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया था।&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने अजय भारद्वाज की फिल्म 'रब्बा, अब क्या करें' वहाँ से लगाई थी जहाँ मालेरकोटले के समीप के गाँव के एक अपटूडेट सरदार ने बताना आरंभ किया था, ''उन दिनों मैं यहाँ खड़ा हुआ करता था। वो सामने से मैंने मुसलमानों के परिवारों को टोलियों में और अकेले-अकेले भी जाते देखा था। एक दिन एक औरत जा रही थी। उसके सिर पर ट्रंक रखा था। गोद में बच्चा उठा रखा था। हमारे गाँव का जमना उसके पीछे दौड़ा था। जब जमना औरत के करीब पहुँच गया तो उस औरत ने ट्रंक फेंक दिया था। वह अंधाधुंध दौड़ पड़ी थी। जमना को पीछा करते देख औरत ने अपना बच्चा भी फेंक दिया था। जमना ने पहले बच्चे को उठाया था, फिर ट्रंक। गाँव के पास आकर उसने बच्चे को टांगों से पकड़कर घुमाते हुए उसका सिर शीशम के पेड़ में दे मारा था। गाँव वालों ने इसे पुण्य का काम कहा था। जमना को दूध पिलाया था। फिर मैंने इस जमना को आख़िरी उम्र में कुत्ते की मौत मरते देखा था। उसके सिर में कीड़े पड़ गए थे।''&lt;br /&gt;ताया जी के कहने पर प्रो. जावेद ने दो बार रिवाइंड करके फिल्म चलाई थी।&lt;br /&gt;डा. कलेर ने रिमोट कंट्रोल से आवाज़ तेज कर दी थी।&lt;br /&gt;ताया जी उठकर खड़े हो गए थे। मानो उनके पैरों तले किसी ने आग के अंगारे रख दिए हो। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर ऊपर की ओर देखा था और मरी-सी आवाज़ में कहा था, ''रे रब्बा ! ये तूने क्या क्या रंग दिखाये थे।''&lt;br /&gt;उनका शरीर भीगी हुई बकरी की भाँति कांपा था। उन्होंने हमारी तरफ एक अजनबी की तरह देखा था। मुझे लगा था कि अधिक उम्र होने के कारण वह कमज़ोर हो गए थे। मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ था कि मुझे इतनी जल्दी ऐसी भावुक किस्म की फिल्म नहीं दिखानी चाहिए थी।''&lt;br /&gt;उन्होंने कहा था, ''बेटा, मुझे गाँव छोड़ आ। मुझे दिखाई देना बन्द होता जा रहा है।''&lt;br /&gt;उन्हें सामान्य करने के लिए मैंने एक और पैग बनाकर दिया था। उन्होंने गर्दन झुकाये ही गिलास खाली करके मेरी तरफ बढ़ा दिया था। कहा था, ''मेरा गिलास भर दे।''&lt;br /&gt;डा. कलेर ने मुझे इशारा किया था कि मैं उन्हें और पैग न दूँ। व्हिस्की तेज थी। यह ताया जी के पैर उठा सकती थी। फिर वह बोलने योग्य नहीं रह सकते थे।&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने मेरे हाथ से बोतल ले ली थी और गिलास भर कर ताया जी को पकड़ा दिया था।&lt;br /&gt;ताया जी चुप थे।&lt;br /&gt;हमें उनकी चुप अखरी थी।&lt;br /&gt;मैं उन्हें बातों में लगाने के लिए अपने भापा जी की बातें छेड़ बैठा था। वह भापा जी के हमउम्र थे। उन दोनों ने एक ही दुकान पर चालीस वर्ष काम किया था। हमारे परिवारों का आपस में आना जाना था। बहुत ही ज्यादा। यद्यपि वह भापा जी से उम्र में बड़े थे, पर वह भापा जी को अपना गुरू मानते थे क्योंकि उन्होंने भापा जी से सुनार का काम सीखा था। एक बार जब मोरारजी देसाई ने नई गोल्ड पॉलिसी लागू की थी तो सराफों के काम बन्द होने की कगार पर आ गए थे। पकड़ा-पकड़ाई चल रही थी। उन्हीं दिनों 'जगदम्बे ज्वैलर्स' वाले अपनी दुकान नूरमहल से हटा कर ताया जी के गाँव में ले आए थे। सभी कारीगर यहाँ आ गए थे। दो साल ताया जी के चौबारे में टूमें बनाने का काम चलाया था। इन दिनों में उनकें और भापा जी के बीच रिश्ते और अधिक गहरे हो गए थे। भापा जी रात को भी वहीं रुक जाते थे। अब हालांकि भापा जी इस दुनिया में नहीं रहे थे, पर ताया जी जब भी नूरमहल आते, हमारे घर का चक्कर अवश्य लगाते थे। हमारे दुख-सुख में शामिल होते थे।&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने उन्हें छेड़ने के लिए मुझे इशारा किया था।&lt;br /&gt;उनके चेहरे पर एक अजीब तरह की घबराहट, दुख और खामोशी के भाव थे। उन्होंने मेरी तरफ मुँह घुमाकर पूछा था, ''बेटा, कब आया स्पेन से ?''&lt;br /&gt;''पाँच दिन पहले। मैंने आपको बताया तो था।''&lt;br /&gt;''मुझे याद नहीं रहा। वापस कब जाना है ?''&lt;br /&gt;''तीन हफ्तों बाद।''&lt;br /&gt;''मुझे किसलिए बुलाया था ?''&lt;br /&gt;''आप मेरे ताया जी हो। मैं आपको क्यों नहीं बुला सकता।'' मैंने एक बार फिर उनके घुटनों को हाथ लगाया था। प्रत्युत्तर में उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया था।&lt;br /&gt;''बारह बच्चों वाली वो कहानी सुनाओ, जो आपने भापा जी के साथ शराब पीते हुए सुनाई थी।''&lt;br /&gt;''पहले मुझे एक और पैग डाल कर दे। गिलास भर दे। लबालब। मैं सच बोलने लायक तो हो जाऊँ... बेटा, इस फिल्म की कहानी तो कुछ भी नहीं। मैंने इससे बड़ा पाप होता अपनी आँखों से देखा था। पाप। अनर्थ। ये देख मेरा जख्म। पिछले तीस सालों से इसमें रत्तीभर भी फ़र्क नहीं पड़ा। मैंने देसी दवा-दारू बहुत की। अंग्रेजी इलाज भी करवाया। लड़कों ने लाखों रुपये खर्च कर दिए। जोकें लगवाईं, पर ये बारह जख्म नहीं भरे। ये भरने वाले भी नहीं। एक बार इसमें कीड़े पड़ गए थे। मैंने तीन दिन उन्हें कुछ नहीं कहा था। मरे हुए बच्चे मुझे दिखाई देते थे। चौथे दिन जब मैं दर्द से बेहोश होने वाला था, तो तेरी ताई ने फिनाइल में डूबा फाहा इसमें आगे करके धकेला था।... मैं अपने किए की सज़ा भुगत रहा हूँ। अभी और पता नहीं, कितनी भुगतनी है।''&lt;br /&gt;प्रो. जावेद, डा. कलेर और कैमरामैन कभी मेरे मुँह की ओर और कभी ताया जी के मुँह की ओर देख रहे थे।&lt;br /&gt;मैंने उन्हें छेड़ा था, ''बीच की बात तो बताओ।''&lt;br /&gt;उन्होंने कहा था, ''बेटा, सच बताना बहुत कठिन होता है। बहुत सारे सच तो बन्दे के साथ ही मर जाते हैं। वह इतने बुरे काम करता है कि किसी को बता ही नहीं सकता। मेरी आँखों से देखा गया सच भी ऐसा ही था। बताने को मेरा हौसला नहीं पड़ता। पहले एक पैग और दो।''&lt;br /&gt;मैंने व्हिस्की का गिलास भर दिया था और एल.सी.डी. की आवाज़ नाममात्र कर दी थी।&lt;br /&gt;उन्होंने बताया था, ''दंगा हुआ तो आसपास के गाँवों में लूटमार शुरू हो गई थी। नूरमहल में बहुत सारे मुसलमान रहते थे। जो तगड़े थे, रातोंरात निकल गए थे। गरीब-कमज़ोर फंस गए थे। मैं, सुरजन और करतारा लूटने के लिए नूरमहल गए थे। हमने कई घरों में से चीज़ें इकट्ठी कर ली थीं। फिर हमारे साथ जोगा भी आ मिला था। उसका घर बिलगे की ओर जाने वाली राह में पड़ता है। हम एक घर में घुसे तो वहाँ एक बन्द कमरे में कई बच्चे थे। दो से लेकर आठ साल की उम्र के। वे सहमे और डरे हुए थे। वे 'अम्मा कहाँ हो, अम्मा कहाँ हो' पूछ रहे थे। हम सोच में पड़ गए कि इनका क्या करें। घर में कोई सयाना बंदा नहीं था। घर वस्तुओं से भरा पड़ा था। हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि हम यहाँ से क्या-क्या उठायें। हम इसी दुविधा में सोचते हुए बाहर गली में आकर खड़े हो गए थे। पाँच-सात मिनट बाद हमें पंडित बिशन दास आता हुआ दिखाई दिया था। वह पास आया तो सुरजन ने उसको बच्चों के बारे में बताया। उसने हमें कहा कि हम उन बच्चों का काम तमाम कर दें। सपौलों को जीवित नहीं रखना चाहिए। उसने इस काम के लिए मुझे दस रुपये दिए थे। हम 'ना-ना' करते रहे थे। हमारे में से किसी का भी उन्हें मारने का साहस नहीं हो रहा था। बिशनदास ने मुसलमानों द्वारा हिंदुओं और सिक्खों के क़त्लेआम की अनेक घटनाएँ सुनाई थीं। तभी, ज्वाला सिंह भी आ गया था। उसने हमें हल्लाशेरी दी थी। हम तीनों ने बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह हाँक लिया था। शहर से बाहर नकोदर की तरफ आबे के पास ले आए थे। ज्वाला और जोगे ने बड़ा-सा गड्ढ़ा खोदा था। हमने एक एक करके बच्चों को गड्ढ़े में धकेला था। मैंने गिनती की थी। बारह बच्चे थे। बच्चों ने चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया था। मैंने कानों में उंगलियाँ डाल ली थीं। आँखें बन्द कर ली थीं। मुझे तो कंपकंपी शुरू हो गई थी। ज्वाला और जोगे ने जिन्दा बच्चों को दफ़न कर दिया था। मैं तो दस रुपये फेंक कर बेतहाशा गाँव की ओर दौड़ आया था।'' उन्होंने आँखें बन्द कर ली थीं। मुँह में कितनी देर बड़बड़ाते रहे थे और फिर मानो अपनी खोई हुई शक्ति को एकत्र कर रहे हों, ऐसा उन्होंने किया था। वह पहले से अधिक ऊँची आवाज़ में बोले थे, ''मैं अपने जिन्दा रहते ये ज़ख्म भरने नहीं दूँगा। ये जख्म रिसते रहने चाहिएँ। इनमें बार बार कीड़े पड़ने चाहिएँ। मैं तो जमना से भी ज्यादा खराब मौत मरना चाहता हूँ।''&lt;br /&gt;उन्होंने बोतल उठाई थी और अपने कच्चे जख्मों पर आए खुरंडों को नाखूनों से उखाड़कर उन पर शराब उंडेलनी शुरू कर दी थी।&lt;br /&gt;हमारे में इतनी शक्ति नहीं रही थी कि हम उन्हें रोक सकें।&lt;br /&gt;प्रो. जावेद ने जेब में से रूमाल निकाल कर आँखें पोंछ ली थीं। हरि भटनागर से वीडियो कैमरा छीन लिया था। कैसेट निकाल कर बाहर गटर में फेंक दी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-8Cu3FYDEOGc/Tf41I_qlvAI/AAAAAAAAAcY/kestZEWANJk/s1600/Jinder%2B1.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5619987813650250754" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-8Cu3FYDEOGc/Tf41I_qlvAI/AAAAAAAAAcY/kestZEWANJk/s200/Jinder%2B1.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;जिन्दर&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; : समकालीन पंजाबी कहानी में एक बहुचर्चित और स्थापित नाम।&lt;br /&gt;जन्म : 2 फरवरी 1954, शिक्षा : एम ए (अंग्रेजी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मै, कहानी ते उह(1990)'', ''तुसी नीं समझ सकदे''(1996, 1999, 2007), ''नहीं, मैं नहीं''(2000, 2004), ''बिना वज़ह तां नहीं''(2004) तथा ''ज़ख्म''(2010) - पाँच कहानी संग्रह पंजाबी में तथा दो कहानी संग्रह ''तुम नहीं समझ सकते''(1997) और ''ज़ख्म, दर्द और पाप''(2011) हिंदी में प्रकाशित। इसके अतिरिक्त दो रेखाचित्र ''कवासी रोटी''(1998) और ''जे इह सच है तां''(2004) प्रकाशित।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकांश कहानियों का हिंदी, तेलगू, बंगला, मराठी, शाहमुखी लिपि(पाकिस्तान), अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संप्रति : पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका 'शबद' का संपादन ।&lt;br /&gt;सम्पर्क : 984, माडल हाउस, निकट-सुरिंदर वैल्डिंग वक्र्स&lt;br /&gt;जालंधर-144003(पंजाब)&lt;br /&gt;मोबाइल : 098148 03254&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-473080391587905310?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/473080391587905310/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=473080391587905310&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/473080391587905310'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/473080391587905310'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2011/06/blog-post_19.html' title='पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' 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border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;पंजाबी लघुकथा : आज तक(8)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;'पंजाबी लघुकथा : आज तक' के अन्तर्गत अब तक आप पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के कथाकार भूपिंदर सिंह, हमदर्दवीर नौशहरवी, दर्शन मितवा, (स्व.)शरन मक्कड, सुलक्खन मीत, श्याम सुन्दर अग्रवाल और डॉ. श्यामसुन्दर दीप्ति की चुनिंदा लघुकथाएं आप पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत हैं- (स्व.) जगदीश अरमानी की पाँच पंजाबी लघुकथाओं का हिंदी अनुवाद। जगदीश अरमानी पंजाबी लघुकथा के अग्रणी एवं बहुचर्चित लेखक रहे हैं। पंजाबी लघुकथा के आरंभिक दौर के लेखकों में इनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। इन्होंने पंजाबी साहित्य को चार कहानी संग्रह (धुआं और बादल, धुंध और रोशनी, जोगी मंगे दानु और प्रतिबिम्ब) तथा दो लघुकथा संग्रह (कूड़े फिरै प्रधानु, इक्कसवीं सदी) दिए।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;-सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;संपादक : कथा पंजाब&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;जगदीश अरमानी की पाँच लघुकथाएं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(1) &lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;कमानीदार चाकू&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर की हवा बड़ी खराब थी। इतनी खराब कि किसी भी वक्त क़ोई भी घटना घट सकती थी। आगजनी, खून-खराबे और लूटमार की घटनायें आम हो रही थीं।&lt;br /&gt;वह जब भी घर से निकलता, उसकी पत्नी उसके सही-सलामत घर लौटने की सौ-सौ मन्नतें मांगती। जब तक वह घर न लौट आता, उसकी पत्नी को चैन न पड़ता। उसका एक पैर घर के भीतर और दूसरा बाहर होता।&lt;br /&gt;वह जब भी घर से बाहर निकलता, अपनी जेब में कमानीदार चाकू रखता और सोचता -अगर कोई बुरा आदमी मेरे हत्थे चढ़ गया तो उसकी आतें निकालकर रख दूंगा।&lt;br /&gt;वह सोचते हुए चला जा रहा था। अचानक बाज़ार का एक मोड़ आने पर उसका स्कूटर किर्र... किर्र करता हुए सड़क पर फिसल गया।&lt;br /&gt;दूसरे सम्प्रदाय के दो अधेड़ आदमी उसकी ओर दौड़े-दौड़े आए। वह डर गया, परन्तु हिम्मत करके फौरन उठा। शरीर पर कई जगह आई खरोंचों की परवाह किए बगैर उसने फुर्ती से अपना हाथ अपनी जेब में डाला, पर वहाँ कुछ नहीं था।&lt;br /&gt;''बेटा, चोट तो नहीं लगी ?'' एक ने उससे पूछा।&lt;br /&gt;''नहीं।'' उसने धीरे से कहा और स्कूटर को खड़ा करके स्टार्ट करने लगा।&lt;br /&gt;''बेटा, तेरा चाकू।'' दूसरे आदमी ने कुछ ही दूरी पर गिरे उसके चाकू को उठाकर पकड़ाते हुए कहा।&lt;br /&gt;उसने पलभर उन दोनों की ओर देखा। नज़रें झुकाकर चाकू पकडा और तेज़ी से स्कूटर दौड़ा लिया।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(2) &lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;मुर्दाघाट पर खड़ा आदमी&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;कड़ी जैसे तीन जवान आज गोलियों से भून दिए गए। सारे शहर में हाहाकार मचा हुआ था।&lt;br /&gt;तीनों की लाशें पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल लाई गईं। पोस्टमार्टम के कमरे के बाहर भारी भीड़ जुट गई थी।&lt;br /&gt;कमरे के दरवाजे पर संतरी खड़ा था। वह किसी को अन्दर नहीं जाने देता था। फिर भी कुछ लोग कमरे के अन्दर जा रहे थे और कुछ लोग बाहर आ रहे थे।&lt;br /&gt;सतभराई दरवाज़े के पास दीवार से लगी खड़ी थी। वह न जिन्दों में थी, न मरों में।&lt;br /&gt;मैंने उसकी हालत देखकर गेट पर खड़े संतरी से कहा, ''इस बेचारी को भी एक मिनट के लिए अन्दर चले जाने दो। अपने बेटे को पलभर देख लेगी।''&lt;br /&gt;''सरदार जी !'' उसने बड़ी हिकारत भरी नज़र से मेरी ओर देखते हुए पूछा, ''वह तुम्हारी क्या लगती है ? तुम क्यों उसकी सिफारिश कर रहे हो ?''&lt;br /&gt;''नहीं, मेरी तो कुछ भी नहीं लगती। मैं तो केवल मानवीय नाते से आपसे विनती कर रहा हूँ।'' मैंने कहा।&lt;br /&gt;''तो फिर वह खुद कहे।''&lt;br /&gt;सतभराई दीवार से लगी सुन रही थी। वह दीवार से हटकर थोड़ा आगे आ गई। मैं ज़रा पीछे हट गया।&lt;br /&gt;''माई, तेरा लड़का मारा गया है ?'' उसने पूछा।&lt;br /&gt;''हाँ।'' माई ने सिर हिलाकर हामी भरी।&lt;br /&gt;''तो माई, यह बता,'' उसने गुस्से से कहा, ''तुमने लड़के के क्रियाकर्म पर कुछ नहीं खर्च करना ? लकड़ी पर नहीं खर्च करेगी या कफन नहीं बनवाएगी ? बता, क्या नहीं करेगी ? अगर सब कुछ करेगी तो माई, फिर हमारा हक क्यों मारती है ?''&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(3) &lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;एक लड़की, एक कहानीकार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह जब भी कोई कहानी लिखता, परखने के लिए वह अपनी कहानी उस लड़की को थमा देता। लड़की जैसे उसकी कहानियों का मापदंड थी। लड़की जैसे उसकी सबसे बड़ी आलोचक थी। अगर लड़की उसकी कहानी पढ़ते-पढ़ते रो पड़ती या सिससियाँ भरने लगती तो वह सोचता, उसकी लिखी कहानी सफल है। अगर ऐसा न होता तो वह अपनी कहानी को सफल न मानता। वह उसी वक्त उस लड़की से अपनी कहानी वापस लेता और कहानी को फिर से दुरस्त करने लग जाता या फिर नये सिरे से कहानी लिखने बैठ जाता या फिर फाड़कर फेंक देता।&lt;br /&gt;लेकिन आज जब उसने अपनी ताज़ा लिखी कहानी उस लड़की को पढ़ने के लिए दी तो वह पढ़कर न तो रोई, न ही उसने कोई आँसू बहाया, बल्कि वह आज उसकी कहानी पढ़कर हँस पड़ी। हँसी भी इतना कि चुप होने पर ही न आती थी। हँसी जैसे उससे रोके रुक नहीं रही थी।&lt;br /&gt;कहानीकार लड़की की हँसी देखकर शर्मसार हो उठा। उसको कहानी में कोई बहुत बड़ी खामी नज़र आई। बहुत बड़ी कमी महसूस हुई। उसने सोचा, कहानी का प्रभाव तो बहुत दर्दनाक था, फिर लड़की किस बात पर हँसे जा रही है। उसने लड़की से हँसी का कारण पूछा। लड़की ने बमुश्किल हँसी रोकते हुए कहा, ''कहानीकार महोदय, और कब तक तुम लोगों के दु:ख बयान करते रहोगे। लोग तो पहले ही बेहद दु:खी हुए पड़े हैं। अब कोई इनके दु:ख हरने की भी बात करो!''&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(4) &lt;span style="font-size:130%;color:#000099;"&gt;चुग्गा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आसमान आज पूरी तरह झुका हुआ था। बारिश थी कि थमने का नाम ही नहीं ले रही थी।&lt;br /&gt;परन्तु मानव कल्याण मंत्री के अन्दर एक कसक उठ रही थी। कलेजे में आग मची थी।&lt;br /&gt;मंत्रालय से निकलने के बाद उन्होंने अपनी जिप्सी का मुँह प्रेम सिंह के पोल्ट्रीफार्म की ओर घुमा दिया।&lt;br /&gt;''क्यों ? क्या बात है ?'' मंत्री साहब के वहाँ पहुँचते ही प्रेम सिंह बोला, ''आज तो मेरे यार का चेहरा भी उतरा हुआ है।''&lt;br /&gt;''हाँ,'' मंत्री साहब ने ठंडी साँस भरते हुए कहा, ''यार, अपना तो समझो पत्ता ही कट जाना है। मुख्यमंत्री साहब ने आज दूसरी बार डांट पिला दी है।''&lt;br /&gt;''अच्छा ! कैसे ?'' प्रेम सिंह ने चिंता प्रकट की।&lt;br /&gt;''यार, हमारी सरकार का सब ओर से विरोध हो रहा है। सरकारी कर्मचारी भत्ता बढ़ाये जाने के लिए हड़ताल पर हड़ताल किए जा रहे हैं। विरोधी दल बंद पर बंद का आह्वान किए जा रहे हैं। प्रैस अलग हर बात को उछाल रहा है। यहाँ तक कि सारा बुद्धिजीवी वर्ग भी हमारे विरोध में ही खड़ा हुआ है। मैं कहता हूँ यार, इस सबके लिए मैं अकेला तो जिम्मेदार नहीं। परन्तु, मुख्यमंत्री साहब हैं कि वह सारा दोष मेरे गले ही मढ़ रहे हैं।''&lt;br /&gt;''अच्छा, तो यह बात है, बस। मैंने सोचा शायद कोई बहुत बड़ी घटना घट गई है।'' प्रेम सिंह ने हँसते-हँसते कहा।&lt;br /&gt;''अरे, तुझे यह मामूली बात लगती है !'' मंत्री साहब बोले।&lt;br /&gt;''लो ! और नहीं तो क्या ? अच्छा, चल, पहले यह फीड का बर्तन उठा। ज़रा मुर्गे-मुर्गियों को दाना डाल आएँ। फिर आकर इसका कोई उपाय सोचते हैं।''&lt;br /&gt;''यार ! कुछ तो शर्म कर। अभी तो मैं पूरा मंत्री हूँ। तेरा नौकर तो नहीं।''&lt;br /&gt;''ओह, सॉरी! मैं खुद ही उठा लेता हूँ।'' प्रेम सिंह ने फीड का बर्तन उठाते हुए कहा, ''चल!''&lt;br /&gt;दोनों मुर्गीखाने की ओर चल दिए। प्रेम सिंह के हाथों में फीड का बर्तन देखकर सारी मुर्गे-मुर्गियाँ उसकी ओर दौड़ पड़ीं।&lt;br /&gt;''क्यों ? देखा तुमने तमाशा!'' प्रेम सिंह ने मंत्री साहब से कहा, ''यार, अगर तू किसी को कुछ दे ही नहीं, तो बता, तेरे पास कोई क्यों आए।''&lt;br /&gt;मंत्री साहब को जैसे कुछ सूझ गया। उन्होंने तुरन्त प्रेम सिंह के हाथों में से फीड का बर्तन छीना और मुर्गे-मुर्गियों को चुग्गा डालना शुरू कर दिया।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(5) &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आधा आदमी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''तुम्हें यहाँ नौकरी मिल सकती है।''&lt;br /&gt;''अच्छा! बहुत बहुत शुक्रिया!''&lt;br /&gt;''पर एक शर्त है।''&lt;br /&gt;''बताओ, बताओ। कौन सी शर्त ?''&lt;br /&gt;''तुम्हें तनख्वाह आधी मिलेगी।''&lt;br /&gt;''वह क्यों ?''&lt;br /&gt;''तुम्हारा एक हाथ और एक पैर नहीं है। तुम काम तो आधे आदमी का ही करोगे।''&lt;br /&gt;एक चुप्पी।&lt;br /&gt;''क्यों ? बोलो फिर मंजूर है ?''&lt;br /&gt;''हाँ, एक शर्त पर।''&lt;br /&gt;''कौन सी ?''&lt;br /&gt;''कृपा करके पहले मेरा पेट आधा काट दो।''&lt;br /&gt;00&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-6936829419124883983?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/6936829419124883983/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=6936829419124883983&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/6936829419124883983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/6936829419124883983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='पंजाबी लघुकथा : आज तक'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-EYwAvhhZkGo/Tf4yYojs-OI/AAAAAAAAAcI/ZDrpg94jmmc/s72-c/105b3ff9389845dc.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-459369583734309734</id><published>2010-11-19T17:11:00.005+05:30</published><updated>2010-11-19T17:54:35.398+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर'/><title type='text'>पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZjClih4iI/AAAAAAAAAZI/2_hwbzbMj7A/s1600/imagesCAFY9L5F.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5541225287613800994" style="WIDTH: 129px; CURSOR: hand; HEIGHT: 130px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZjClih4iI/AAAAAAAAAZI/2_hwbzbMj7A/s200/imagesCAFY9L5F.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#990000;"&gt;पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर(2)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;खुशबू&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;तलविंदर सिंह&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कान्फ्रेंस के दौरान मुझे किसी ने बताया कि हनीफा बीबी मुझे खोजती घूम रही है। मैं भी उसे ढूँढ़ रहा था। सोच रहा था कि अब दोपहर के खाने के समय ही मुलाकात होगी, पर अचानक किसी ने पीछे से आकर मेरे कंधे पर आहिस्ता से धौल जमाई। मैंने पलट कर देखा तो पैंसठ-छियासठ साल की, कसी कदकाठी वाली एक औरत मुस्करा रही थी। उसके गोरे चेहरे पर सुनहरे फ्रेम वाली ऐनक खूब फब रही थी। बोली, ''तू सुरिंदर ही है न?''&lt;br /&gt;मैंने सिर हिलाया, ''आप...?''&lt;br /&gt;''हाँ वही।'' उसने जवाब दिया, ''उठकर बाहर आ जा।''&lt;br /&gt;मैं उठकर उसके पीछे-पीछे बाहर आ गया। ऑडीटोरियम की सीढ़ियों के करीब खड़े होकर वह बोली, ''आ गले मिल।'' और उसने मुझे अपनी बांहों में कसकर प्यार दिया। ''चलते वक्त से ख्वाहिश थी मेरी, तुझसे मिलने की। तेरी चिट्ठियों ने तो मोल ही खरीद लिया मुझे, और तेरा वह लेख...।''&lt;br /&gt;''मैंने भी आपका नावल पढ़ा। उर्दू अक्षरों में पंजाबी पढ़ते समय जोर तो बहुत लगा, पर एक बार तो हिल गया मैं।''&lt;br /&gt;''इसका मतलब अच्छा लगा तुझे।'' वह बोली।&lt;br /&gt;''बहुत बढ़िया। मुझे लगा, इसकी कहानी आपके निजी जीवन से जुड़ी हुई है, तभी तो विवरण इतने सजीव हैं।'' मैंने कहा।&lt;br /&gt;''तू बता, अपने असली जीवन से कैसे टूट सकता है बंदा? जिसको जिया, झेला, भोगा वह...वह हमारी लिखत में तो आएगा ही, कि नहीं?'' वह कह रही थी और मैं सहमति में सिर हिला रहा था।&lt;br /&gt;''चल, ज़रा भीड़ से दूर हटें। कहीं चाय नहीं मिल सकती बढ़िया सी?''&lt;br /&gt;''मुझे चंडीगढ़ की अधिक जानकारी नहीं। पर आओ नीचे चलें, कोई राह खोजते हैं...।'' सीढ़ियाँ उतर कर हम नीचे आ गये। वह मेरे साथ ऐसे चलने लगी मानो बरसों से परिचित थी। मुझे भी लगा जैसे हम पहले अनेक बार मिल चुके हों। मैंने इधर-उधर देखा, पर कोई मनपसन्द जगह नज़र नहीं आयी। मेरी उलझन को समझकर वह बोली, ''चल यहाँ से भी निकल, कहीं और चलें।''&lt;br /&gt;चाय के दो कपों के लिए मैंने कई किलोमीटर कार घुमाई। उसका करीब होना मुझे अच्छा लग रहा था। आसपास की इमारतों को देखती वह कई प्रश्न पूछती रही, जिनका उत्तर मैं अपनी जानकारी के अनुसार देता रहा।&lt;br /&gt;''मैं आपको दीदी कहकर बुलाऊँ?'' उसके अपनत्व में घिरते हुए मैंने पूछा।&lt;br /&gt;''अगर बहन जी कहते हुए तुझे जोर पड़ता है तो मौसी-बुआ कुछ भी कह ले, पर दीदी-शीदी बिलकुल नहीं।'' उसने हँसकर उत्तर दिया।&lt;br /&gt;दोपहर के खाने के वक्त भी वह मेरे करीब रही। अगली बैठक में मेरे पास बैठी। रात में उसने स्टेज पर से बेहद सोज़भरी आवाज में एक ग़ज़ल सुनाई। सुनकर मैं दंग रह गया। खूब तालियाँ बजीं।&lt;br /&gt;स्टेज से उतरी तो मैंने मुबारकबाद दी, ''आपकी आवाज में तो जादू है।''&lt;br /&gt;जवाब में वह सिर्फ मुस्करायी।&lt;br /&gt;रात में उसके रहने का इन्तजाम होटल में था। मुझे अपने दोस्त के साथ जाना था। बिछुड़ते वक्त मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर उसने कहा, ''एक दिन मेरे लिए थोड़ा कष्ट झेल। मुझे अमृतसर दरबार साहिब और मेरा गाँव अटारी दिखा दे।''&lt;br /&gt;''मुझे कोई उज्र नहीं। मेरे लिए तो यह गर्व की बात है।'' मैंने कहा।&lt;br /&gt;''सवेरे होटल में आ जाना। वहीं से सीधे निकलेंगे और शाम को वापस।''&lt;br /&gt;''ठीक है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवेरे कार अमृतसर के रास्ते पर दौड़ रही थी। एक दिन की मुलाकात ने मीलों लम्बा सफ़र तय कर लिया था। उसे और कुरेदने के ख्याल से मैंने पूछा, ''मुझे लगता है, आप अपने नावल 'इन्तहा' की नायिका सरगम खुद ही हो।''&lt;br /&gt;दूर तक पसरे गेहूँ के खिले हुए खेतों पर नज़र दौड़ाती हनीफा कहीं गुम हो गयी। कहीं गहरे नीचे उतरती चली गयी वह। उसका चेहरा संजीदगी के लबादे में लपेटा गया। बोली, ''तुझे कल भी बताया था शायद कि मनुष्य अपने अतीत से टूट नहीं सकता। उसके संस्कार साथ-साथ चलते हैं। मेरे साथ भी...।''&lt;br /&gt;''कैसे हुआ था?'' मैंने पूछा।&lt;br /&gt;''उस समय दार जी लायलपुर पोस्टिड थे। वह क़हर मुझे आज भी याद है, ज्यों का त्यों। आग की लपटें, खून, लाशें... या अल्लाह... हे वाहेगुरु...।'' उसने दोनों हाथों से कानों को छुआ। मेरा पैर अचानक रेस पर से उठकर ब्रेक पर आ टिका। रफ्तार धीमी करके मैंने उसके चेहरे की ओर देखा। 'इन्तहा' की कहानी मेरी स्मृति में खुलने लगी।&lt;br /&gt;वह बोली, ''सरगम मैं ही हूँ। असल में सरगम नहीं, सुरजीत हूँ मैं।'' धीमी रफ्तार देखकर वह बोली, ''चलता चल, बड़ा लम्बा रास्ता है, फिर वापस भी तो लौटना है।''&lt;br /&gt;मैंने रफ्तार तेज की। वह कहने लगी, ''अच्छा आदमी था वह। मुझे सुरजीत से हनीफा बनाने में उसने बिलकुल जल्दबाजी नहीं की। मुझे कई दिन घर में रखा। मेरी रजामंदी पर ही उसने अपनी बेगम बनाया मुझे।''&lt;br /&gt;''अब कभी मन नहीं करता वापस लौटने का?'' मैंने पूछा।&lt;br /&gt;''यह भी ज़िंदगी की हकीकत बन गयी है एक। मेरे मन ने परवान कर लिया है इसको। अब तेरे जितना मेरा जवान बेटा है। खूबसूरत बहू, दो छोटे बच्चे। औरत तो दरख्त होती है, जहाँ जा बैठी, वहीं जड़ें पकड़ लीं।''&lt;br /&gt;अपने परिवार के छोटे-छोटे विवरण, शाखाओं-पत्तियों के बारे में बताती रही वह। उसकी कहानी से एकमेक हुआ मैं अनदेखी राहों पर चलता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरबार साहिब की परिक्रमा करके हनीफा आँखें मूंदकर और हाथ जोड़कर शान्त मुद्रा में काफी देर खड़ी रही। मैं चुपचाप उसके करीब खड़ा रहा। चेतन हुई तो हम आगे बढ़े। उसे अपने अन्दर उतरने का अवसर देने के विचार से मैंने कोई बात नहीं छेड़ी। ‘दुख-भंजनी बेरी’ के पास उसने चरनामृत लिया। फिर बोली, ''कहाँ से गोले चलाये थे भारतीय फौज ने?''&lt;br /&gt;इस प्रश्न की तो मैंने कतई कल्पना नहीं की थी। फिर भी, मैंने इशारा किया, ''इस रास्ते से टैंक अन्दर आये, उस कोने से फायरिंग की गयी।''&lt;br /&gt;''सन्त कहाँ थे उस समय?''&lt;br /&gt;''वो सामने देखो। वो अकाल तख्त है, वहाँ। यह अब दुबारा बनाया गया है।'' मैंने बताया।&lt;br /&gt;हनीफा कुछ देर चुप रही। फिर बोली, ''कौन जालिम है और कौन निर्दोष, कौन कह सकता है।'' मैंने उसके चेहरे की ओर देखा, होंठों में कुछ बोल रही थी वह। फिर, उसने इक्यावन रुपये का परशाद लिया, अन्दर जाकर चढ़ाया और कुछ देर कीर्तन सुनने के लिए बैठी रही। आसपास को गौर से निहारती रही।&lt;br /&gt;वक्त की बंदिश को महसूस करते हुए हम बाहर आये। आसपास के भीड़-भड़क्के को वह बड़ी दिलचस्पी से देख रही थी।&lt;br /&gt;''यह वो अमृतसर नहीं, जो अब तक मेरे जेहन था। तब तो साधारण-सा शहर था यह।'' वह बोली।&lt;br /&gt;''अब तो लाहौर भी वो लाहौर नहीं होगा, वह भी बदल गया होगा।'' मैंने पूछा।&lt;br /&gt;''हाँ।'' उसने कहा, ''पर बंदे की जेहनीयत सदियों तक नहीं बदलती। बहुत कुछ बासा, सड़ा-गला उठाये घूमता है आदमी अपने साथ।''&lt;br /&gt;''यह भी दुरुस्त है।'' मैंने कहा।&lt;br /&gt;ऊँचे पुल से मैं नीचे की ओर उतरा तो उसने पूछा, ''हम छेहराटे की ओर नहीं मुड़े?''&lt;br /&gt;''नहीं, अटारी की तरफ मुड़े हैं।'' मैंने हँसते हुए बताया।&lt;br /&gt;''एक ही बात है, या कोई दूसरा रास्ता है यह?'' उसने गौर से इधर-उधर देखा।&lt;br /&gt;''नहीं, वही है, जी.टी. रोड। पेशावर से कलकत्ता, लाहौर से अमृतसर, वाहगे से अटारी जाने वाली। सड़क तो सीधी है, सिर्फ फाटक है बीच में।'' मैं भावुकता में बोल उठा।&lt;br /&gt;पुतलीघर चौक, खालसा कालेज, युनिवर्सिटी के पास से गुजरे हम। छेहरटा चौक से गुजरते हुए उसने पूछा, ''यहीं कहीं नरायण गढ़ होगा। मेरी एक बुआ रहती थी वहाँ- बचन कौर।''&lt;br /&gt;''यह आगे नरायण गढ़ ही है। फूफा जी का नाम याद है?''&lt;br /&gt;''शायद सरदूल सिंह या सुलक्खन सिंह... याद नहीं ठीक से। और पता नहीं, उनके बाद कौन होगा? कोई होगा भी या नहीं?''&lt;br /&gt;नरायण गढ़ पीछे रह गया। अब उसकी नज़र आगे टिक गयी थी। ''इस रोड से आगे थाना आएगा, घरिंडा। उस थाने में सरगम अपने बाप के साथ आती है एक दिन। किसी मुज़रिम को उसका बाप पीटता है तो चीखें मारती हुई बाहर दौड़ती है वह।''&lt;br /&gt;मैं मुस्कराया, ''तब सुरजीत के दार जी यहाँ पोस्टिड थे।''&lt;br /&gt;''हाँ, हम अटारी रहते थे। किराये पर। मेरा जन्म अटारी ही हुआ। दो घरों में हम रहे। वे घर अभी भी मेरे सपनों में आते हैं।&lt;br /&gt;अटारी की सीमा में पहुँचते ही हनीफा का चेहरा खिलने लगा था। भीड़े बाजार में मैंने कार घुसा ली। एक जगह वह बोली, ''रोक तो कार यहाँ। शायद यही जगह है वह।'' एक साइड पर कार रोकी तो वह बाहर निकलकर इधर-उधर देखने लगी, ''बाहर आ, तुझे दिखाऊँ अपना पहला घर।''&lt;br /&gt;मैं बाहर आया और उसके साथ ही ऊपर की ओर देखने लगा। दुकानदार हमें विशेष नज़रों से देखने लगे। सोचते होंगे, ग्राहक तो लगते नहीं, कुछ खोजने आए हैं शायद।&lt;br /&gt;''बिलकुल यही है।'' बेहद उत्साहित होकर वह कह रही थी। ''वो खिड़की है जहाँ खड़ी होकर मैं नीचे देखा करती थी। एक फकीर गुजरा करता था यहाँ से, उसकी प्रतीक्षा किया करती थी रोज। कोई गीत गाया करता था वह...पता नहीं क्या था वह। इधर एक गली हुआ करती थी। शायद, यही है, अन्दर मंदिर है कोई ?''&lt;br /&gt;''पता नहीं।'' मैंने कहा। पर समीप ही आ खड़े हुए एक बुजुर्ग ने हामी भरी, ''हाँ, है मंदिर।''&lt;br /&gt;''है न बाबा जी?'' हनीफा खुश हो गयी, ''वहाँ रामलीला हुआ करती थी।''&lt;br /&gt;''अभी भी हुआ करती है।'' बुजुर्ग ने बताया।&lt;br /&gt;''कमाल हो गया।'' हनीफा हैरान थी, ''आओ तो देखें ज़रा।''&lt;br /&gt;सामने वाली हलवाई की दुकान वाला मेरे करीब आया, ''कैसे सरदार जी...?''&lt;br /&gt;''इन बीबी जी के बचपन का गाँव है यह। यहीं जन्मे-पले। कम से कम सत्तावन साल के बाद आये हैं।'' मैंने बताया। मेरी बात सुनकर बुजुर्ग ने आँखें चौड़ी कीं, ''कौन था बीबी तुम्हारा बाप?''&lt;br /&gt;''थानेदार भजन सिंह को जानते हो?'' वह बोली।&lt;br /&gt;एक क्षण के लिए बुजुर्ग ने गोता लगाया और अगले क्षण बाहर निकल आया, ''उसकी तो बीबी जी बड़ी धाक थी। चोर-उचक्के उसका नाम सुनकर काँप जाते थे...। तो तुम उनकी बेटी हो...तेरा नाम जीता तो नहीं?''&lt;br /&gt;''हाँ बाबा जी।'' हनीफा को लगा मानो इस गाँव में उसकी जड़ अभी भी हरी थी। उसके घर को देखने के लिए हम सीढ़ियाँ चढ़े। घर के कमरों को देखती वह आनन्द-विभोर हो गयी, ''यह अल्मारी वही है, जहाँ मेरी सहेली ने मुझे बन्द कर दिया था और खुद बाहर दौड़ गयी थी। मैं चीखती-चिल्लाती रही थी, पर मेरी कौन सुनता? मर ही जाती अगर माँ आ कर अल्मारी न खोलती।''&lt;br /&gt;घर का मालिक हैरान हो रहा था। उसकी हैरानगी को भांपते हुए हनीफा बोली, ''यह मेरा घर है, पर आप अब रहो यहाँ।''&lt;br /&gt;छतों, दीवारों को निहारती हनीफा बाहर निकली। सीढ़ियाँ उतरे और आगे बढ़े। बुजुर्ग को हमने संग ले लिया। कदम-कदम पर वह रुक जाती और दरवाजों-झरोखों को देखती बीती यादों में उतर जाती।&lt;br /&gt;''इस ऊँची इमारत के बिलकुल ऊपर से एक लड़की ने छलांग लगाकर खुदकुशी की थी। इस जगह लाश पड़ी थी उसकी।'' एक जगह रुककर उसने बताया।&lt;br /&gt;मैंने बुजुर्ग की ओर देखा जो दिमाग पर जोर डाल रहा था, ''हाँ, हुआ था यह वाकया, सच है।''&lt;br /&gt;''क्यों हुआ था?'' मैंने पूछा।&lt;br /&gt;''ऐसी घटनाओं के पीछे एक-से ही कारण होते हैं।'' वह बोली, ''पंडितों की बेटी थी वह। किसी मुसलमान लड़के से ब्याह करना चाहती थी। जब मज़हबी तवाज़न न बना तो ऐसा होना ही था।''&lt;br /&gt;''बिलकुल यही बात थी।'' बुजुर्ग ने कहा, ''बीबी तेरी तो बड़ी याददाश्त है।''&lt;br /&gt;इस बार बुजुर्ग रुका, ''यह है अपना गरीबखाना। आओ, कुछ खा-पीकर चलो।''&lt;br /&gt;उसे 'हाँ-ना' में जवाब देने से पहले हनीफा फिर स्मृतियों में उतर गयी, ''यहाँ विवाह हुआ था एक। इस चबूतरे पर दुल्हन को बिठाया गया था। बड़ी सुन्दर थी वह दुल्हन।'' एक पुरानी कुइंया के चबूतरे की ओर देखकर वह बोली।&lt;br /&gt;बुजुर्ग की आँखें चमकीं, ''मेरा ही हुआ था।''&lt;br /&gt;''वह दुल्हन कहाँ है, सुर्ख लिबास वाली, गोरी-चिट्टी?'' हनीफा खुश हो गयी।&lt;br /&gt;''घर में ही है। आओ मिलवाऊँ।''&lt;br /&gt;हम अन्दर गये। बुजुर्ग ने अपनी पत्नी को बुलाया और हमसे मिलवाया। हनीफा ने उसे कसकर गले से लगा लिया। फिर बोली, ''तुम तो बूढ़े हो गये इतनी जल्दी।''&lt;br /&gt;''समय का रंग है। तुम भी तो हो ही गये हो।'' वह बोली।&lt;br /&gt;पर हनीफा नहीं मानी, ''मैं तो अभी जवान हूँ। बुढ़ापे को करीब नहीं फटकने देती। फिर आज तो बिलकुल ही नहीं, आज तो मेरी उम्र तेरह साल से अधिक है ही नहीं।'' उसकी बात ने सभी को हँसा दिया।&lt;br /&gt;वहाँ हमने ठंडा शर्बत पिया। फिर घाटी की ओर मुड़े। अंधी ड्योढ़ी देखकर तो मैं भी हैरान रह गया। कमाल की कारीगिरी थी। कमाल की ओट थी।&lt;br /&gt;हनीफा ने बताया, ''इस जगह की यह ओट आशिकों के लिए जन्नत जैसी है। लड़कियाँ-लड़के यहाँ मिला करते थे।''&lt;br /&gt;बुजुर्ग ने कहा, ''अभी भी कौन-सा कम मिलते हैं।''&lt;br /&gt;मैंने वहाँ के कोनों, ओटों और अँधेरों को देखा। आगे खुली जगह थी। हनीफा बता रही थी, ''यहाँ हम खेला करते थे। वो सामने वाली डाट पर कबूतरों के झुंड बैठते। सरदारों की बहुएँ घघरे पहने यहाँ से गुजरतीं। पीछे-पीछे नौकरानियाँ उनके घघरों को उठाकर चलतीं।''&lt;br /&gt;नानक शाही ईंट की बिल्डिंगों के खंडहरों को देखते हम हनीफा की अगवाई में उसके दूसरे घर की ओर जा रहे थे। इस घर का मालिक एक स्कूल अध्यापक था, जो संयोग से मेरा परिचित निकल आया। मैंने उसे हनीफा से मिलवाया। अन्दर घर में घुसे तो वह एक बार फिर यादों की पिटारी खोल बैठी। पुराने कमरों को खुलवाकर देखा। दरवाजों, शीशों के रंग तक याद थे उसे। स्कूल अध्यापक अमरजीत पुरी दिलचस्पी से हमारे बीच शामिल हो गया। ऊपर छत पर जाकर वह सामने चौबारे की ओर देखने लगी। फिर, मेरे करीब होकर हल्के से फुसफुसाई, ''नावल का एक चैप्टर यहाँ भी खुलता है, याद है?''&lt;br /&gt;''कौन-सा भला?'' मैंने अपनी स्मृति पर जोर मारा।&lt;br /&gt;''जब सरगम को जमींदारों का लड़का चौबारे पर खड़ा होकर देखता है। यहाँ खड़ी हुआ करती थी मैं और वह, उस सामने वाली छत पर, मेरी ओर देखता। शिखर दोपहरी, कभी बरसते पानी में। एक दिन मेरे लिए अपनी बहन के हाथ उसने एक मुंदरी भेजी। मैंने गुस्से में आकर मुंदरी लौटा दी।''&lt;br /&gt;''ज़रा बताओ तो कौन था वह?'' अमरजीत भी हमारे रंग में रंग गया।&lt;br /&gt;''सरूप सिंह नाम था उसका। रूपा-रूपा कहते थे।'' हनीफा ने बताया।&lt;br /&gt;''तो आप सरूप सिंह नंबरदार की बात कर रहे हो।'' अमरजीत बोला।&lt;br /&gt;''हाँ, वही होगा। यह चौबारा पहले उनके पास ही था।'' बुजुर्ग ने तसदीक की।&lt;br /&gt;वातावरण में बढ़ती रोमांचकता देखकर अमरजीत स्कूटर उठाकर घर से निकल गया।&lt;br /&gt;''उसकी बहनें मेरी सहेलियाँ थीं। कभी-कभार उधर जाती थी मैं। वह घर में होता तो मेरे माथे पर बल पड़ जाते, ना होता तो घर खाली लगता। एक दिन मुझे गली में घेर कर खड़ा हो गया और 'आई लव यू... आई लव यू' कहता रहा। मैंने डराया-धमकाया कि दार जी को बताऊँगी। मेरे दार जी का बड़ा दबदबा था। वह डर गया और मेरे पैर छूता रहा। माफियाँ मांगता रहा।'' चौबारे की ओर देखती हनीफा हँस रही थी।&lt;br /&gt;''फिर कब तक चला यह सिलसिला?'' मैंने पूछा।&lt;br /&gt;''बस, एक-डेढ़ साल। छियालीस में दार जी की बदली लायलपुर हो गयी। वहाँ रहे सालभर। जब हल्ले शुरू हुए, तब दार जी दंगाइयों से निपटते हुए मारे गये। घर बार छोड़कर मैं और माँ एक काफिले के साथ आ रही थीं कि हमला हो गया। मुझे बचाते हुए माँ मारी गयी और मैं...।''&lt;br /&gt;हनीफा शून्य को घूरने लगी। अमरजीत की पत्नी चाय ले आयी। चाय खत्म होने से पहले अमरजीत एक सियाने से व्यक्ति को लेकर आ गया। ऊपर आकर उसने हनीफा को हाथ जोड़कर ‘सतिश्री अकाल’ कहा। हनीफा बोली, ''पहचानो तो?''&lt;br /&gt;''तुम जीता, पहचान लिया मैंने।'' सरूप सिंह बोला।&lt;br /&gt;''याद है, तुमने मेरे लिए एक मुंदरी भेजी थी और मैंने लौटा दी थी। लाओ, दे दो अब। मैं वो मुंदरी लेने आई हूँ।'' उसने हाथ आगे बढ़ाया।&lt;br /&gt;चेहरे पर शर्मिन्दगी का भाव लाकर सरूप सिंह बोला, ''वह तो बचपन की बातें थीं बहन जी।'' हनीफा ठहाका लगाकर हँसी। फिज़ा तो पहले ही सुंगधित हुई पड़ी थी। कुछ समय घर-परिवार की बातें होती रहीं। सरूप सिंह हमें अपने घर ले जाने के लिए जिद्द कर रहा था। लेकिन, हमें वापस लौटने की जल्दी थी।&lt;br /&gt;अमरजीत के घर से निकल हम उस तरफ बढ़े, जिधर हमारी कार खड़ी थी। सरूप सिंह ने याचना-सी की, ''अगर घर नहीं चलना तो मेरी ओर से कोई चीज ही ले जाओ। बताओ क्या लेकर दूँ?''&lt;br /&gt;हनीफा सामने वाली दुकान पर ठक-ठक कर रहे ठठियार की ओर देख रही थी। बोली, ''चलो, तवा लेकर दो एक।''&lt;br /&gt;''तवा?'' मेरे और अमरजीत के मुँह से एक साथ निकला।&lt;br /&gt;''तुमने मुझसे पूछा, मैंने बता दिया। आगे तुम्हारी इच्छा।'' हनीफा ने कहा।&lt;br /&gt;सरूप सिंह ने दुकान से तवा लिया, अखबार में लपेटा और हनीफा को दे दिया। उसने उसे माथे से लगाकर स्वीकार कर लिया।&lt;br /&gt;''दोबारा कभी आना।'' सरूप सिंह भी भावातिरेक में बोला। पर इसका जवाब किसके पास था? कार आगे खिसकी और अटारी पीछे रह गया। सुनहरी फ्रेम वाली ऐनक के नीचे से हनीफा ने दुपट्टे से आँसू पोंछे। मैंने ऐसा प्रदर्शन किया जैसे मैंने कुछ देखा ही न हो।&lt;br /&gt;00&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZjR85hEFI/AAAAAAAAAZQ/0zNNXh1avvo/s1600/Talvinder%2BSingh1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5541225551582269522" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 137px; CURSOR: hand; HEIGHT: 132px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZjR85hEFI/AAAAAAAAAZQ/0zNNXh1avvo/s200/Talvinder%2BSingh1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;जन्म : 14 फरवरी 1955&lt;br /&gt;शिक्षा : एम.ए.&lt;br /&gt;पुस्तकें : दो उपन्यास -'लौ होण तक' तथा 'यौद्धे'&lt;br /&gt;तीन कहानी संग्रह-'रात चानणी'(1992), 'विचली औरत'(2001), 'नायक दी मौत'(2006) और 'इस वार'( 2007)।&lt;br /&gt;संप्रति : सरकारी नौकरी ।&lt;br /&gt;सम्पर्क : 61, फ्रेण्ड्स कालोनी, मजीठा रोड, अमृतसर, पंजाब।&lt;br /&gt;फोन : 09872178035&lt;br /&gt;ई मेल : talwinder_kahanikar@yahoo.co.in&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-459369583734309734?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/459369583734309734/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=459369583734309734&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/459369583734309734'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/459369583734309734'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2010/11/blog-post_19.html' title='पंजाबी कहानी : नए हस्ताक्षर'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZjClih4iI/AAAAAAAAAZI/2_hwbzbMj7A/s72-c/imagesCAFY9L5F.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-5231925075954886112</id><published>2010-11-19T16:59:00.004+05:30</published><updated>2010-11-19T17:09:25.810+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पंजाबी लघुकथा : आज तक'/><title type='text'>पंजाबी लघुकथा : आज तक</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZgvhuAVVI/AAAAAAAAAZA/DYMLzXKBhl8/s1600/imagesCAON2ATD.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5541222761147422034" style="WIDTH: 148px; CURSOR: hand; HEIGHT: 104px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZgvhuAVVI/AAAAAAAAAZA/DYMLzXKBhl8/s200/imagesCAON2ATD.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;पंजाबी लघुकथा : आज तक(7)&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;'पंजाबी लघुकथा : आज तक' के अन्तर्गत पंजाबी लघुकथा की अग्रज पीढ़ी के कथाकार भूपिंदर सिंह, हमदर्दवीर नौशहरवी, दर्शन मितवा, शरन मक्कड, सुलक्खन मीत और श्याम सुन्दर अग्रवाल की चुनिंदा लघुकथाएं आप पढ़ चुके हैं। इसी कड़ी में प्रस्तुत हैं- पंजाबी लघुकथा के अग्रणी एवं बहुचर्चित लेखक डॉ. श्याम सुंदर दीप्ति (जन्म : 30 अप्रैल 1954) की पाँच चुनिंदा लघुकथाएं...। डॉ. दीप्ति पेशे से डॉक्टर हैं और सरकारी मेडिकल कॉलेज, अमृतसर में अध्यापन कार्य से संबंद्ध हैं तथा साहित्य और मनोविज्ञान से इनका बेहद लगाव है। पंजाबी और हिंदी दोनों भाषाओं में लिखते हैं। लघुकथाओं के अतिरिक्त कविताएँ, कहानियाँ और सामाजिक मुद्दों पर आलेख भी लिखते रहे हैं। ''मैं और तुम'', ''सिर्फ़ एक दिन'', ''पाँचवे पहर की ओर'' सभी कविता संग्रह हिंदी में। पंजाबी में   मौलिक लघुकथा संग्रह ''बेड़ियाँ'' और ''इक्को ही सवाल'' प्रकाशित हो चुके हैं। ‘अष्ठधारा’,   ‘आईना’, ‘शतकथाएँ’, ‘पंजाबी लघुकथाएं’(हिंदी में संपादित पुस्तकें)। ‘दायरे’, ‘सिलसिला’,  ‘अक्श-पंजाब’, ‘अँधेरे के खिलाफ़’(पंजाबी में श्यामसुंदर अग्रवाल के साथ मिलकर संपादन)। इसके अतिरिक्त मेडिकल, बाल मनोविज्ञान, सेहत आदि विषयों पर अनेक पुस्तकें।  पुस्तकों का  गत 20 वर्षों से पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका ''मिन्नी'' का संपादन कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;संपादक : कथा पंजाब&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति की पाँच लघुकथाएं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000099;"&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;(1) हद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।&lt;br /&gt;      ''साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।''&lt;br /&gt;      ''तू इस बारे में कुछ कहना चाहता है।'' मजिस्ट्रेट ने पूछा।&lt;br /&gt;      ''मैंने क्या कहना है, सरकार ! मैं खेतों में पानी लगाकर बैठा था। 'हीर' के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नज़र नहीं आई।''&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;(2) पाड़&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''तुझे दिखाई नहीं देता ? यूँ ही पीं-पीं लगा रखी है।'' कार स्कूटर को डांट रही थी।&lt;br /&gt;      ''एक ओर होकर भी तो बातें हो सकती हैं। सड़क कोई अकेले तेरे लिए ही तो नहीं है।'' स्कूटर कुछ गुस्से में आकर बोला।&lt;br /&gt;      ''तो क्या तू मुझसे आगे हो जाएगा ? चूहे-सा मुँह लेकर...।'' कार तैश में आ गई थी, ''स्कूटरों ने ही सारा आसमान सिर पर उठा रखा है। ऐरे-गैरे न हों तो...।''&lt;br /&gt;      स्कूटर के पीछे साइकिल की घंटी बजी।&lt;br /&gt;      स्कूटर ने पीछे मुड़कर साइकिल को घूरा।&lt;br /&gt;      ''आगे तेरी ताई चलेगी, तभी तो तू जाएगी।''&lt;br /&gt;      स्कूटर और साइकिल को झगड़ते देख कार मुस्कराती हुई आगे बढ़ गई।&lt;br /&gt;      स्कूटर स्टार्ट होने लगा तो साइकिल आगे बढ़कर पहले निकल गई। स्कूटर स्टार्ट होते हुए खीझकर बोला, ''निकल जा, तू भी निकल जा...''&lt;br /&gt;      जब स्कूटर स्टार्ट हुआ तो साइकिल कोई सौ गज़ आगे जा चुकी थी। स्कूटर ने रफ्तार पकड़ी और साइकिल के पास पहुँचकर बोला, ''कैसी जल्दी मची थी, पीपनी-सी ! अब आ जा... आ जा...।''&lt;br /&gt;      ''मैंने तो आपको कुछ नहीं कहा, सा'ब जी!'' साइकिल हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;(3) संबंध&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किशोर के घर से लौटते-लौटते अँधेरा हो गया। कभी-कभार मिलना होता था। वर्तमान हालात को लेकर ही बात चल पड़े तो वक्त बीतते पता नहीं चलता।&lt;br /&gt;      सी.आर.पी के जवानों की चौकी के पास पहुँचते ही व्हिसिल सुनाई दी। स्कूटरों-कारों को रोक कर वाहन के काग़ज़ों की जाँच हो रही थी। मैं भी रुक गया।&lt;br /&gt;      ''पापा, रुक क्यों गए ?'' बेटी ने पूछा। मैं डिक्की में से स्कूटर के काग़ज़ निकालने लग गया और सिपाही मेरे करीब आ गया।&lt;br /&gt;      ''पापा, यह अंकल अपने को जानते हैं ?'' मैं बेटी के सवाल पर मुस्कराया।&lt;br /&gt;      ''हम इनके घर तो कभी नहीं गए पापा !'' फिर उस सिपाही को संबोधित करके बोली, ''आपका घर कहाँ है, अंकल ?''&lt;br /&gt;      मुझे डिक्की में काग़ज़-पत्र नहीं मिले। मैं सोचने लगा, कहाँ गए ? फिर ख़याल आया कि स्कूटर धोया था तो बाहर निकालकर रखे थे। फिर स्कूटर में रखना भूल गया। लेकिन अब इसे क्या कहें ? कोई परेशानी ही न खड़ी कर दे। पुलिसवालों का क्या भरोसा?&lt;br /&gt;      ''पापा, चलो न, देखो तो कितना अँधेरा हो गया है। मम्मी को डर लग रहा होगा।''&lt;br /&gt;      मैंने बेटी की तरफ़ देखा तो सिपाही ने कहा, ''जाओ, साहब।''&lt;br /&gt;      फिर बेटी ने कहा, ''पापा, मुझे अंकल के घर लेकर चलोगे न ? अंकल के घर भी एक गुड़िया है, मेरे जैसी !''&lt;br /&gt;      ''ज़रूर चलेंगे, बेटा।'' कहकर मैंने सिपाही से हाथ मिलाया और स्कूटर स्टार्ट कर आगे बढ़ गया।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;(4) गुब्बारा&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गली में से गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चे को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चा माँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे जाता या उसके माँ-बाप। इसी तरह एक दिन मेरी बेटी के साथ हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे आया। दूसरे दिन फिर बेटी ने वैसा ही किया। मैंने कहा, ''बेटे, क्या करना है गुब्बारा। रहने दे न।'' पर वह कहाँ मानती थी, रुपया ले ही गई। तीसरे दिन रुपया दिया तो लगा कि रोज़-रोज़ तो यह काम ठीक नहीं। एक रुपया रोज़ महज दस मिनट के लिए। अभी फट जाएगा।&lt;br /&gt;      मैंने आराम से बैठकर बेटी को समझाया, ''बेटे ! गुब्बारा कोई खाने की चीज़ है ? नहीं न ! एक मिनट में ही फट जाता है। गुब्बारा अच्छा नहीं होता। अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते। हम बाज़ार से कोई अच्छी चीज़ लेकर आएँगे।'' वह सिर हिलाती रही।&lt;br /&gt;      अगले दिन जब गुब्बारेवाले की आवाज़ गली से आई तो बेटी बाहर न निकली और मेरी तरफ़ देखकर कहने लगी, ''गुब्बारा अच्छा नहीं होता न ! भैया रोज ही आ जाता है। मैं उसे कह आऊँ कि वह चला जाए।''&lt;br /&gt;      ''वह आप ही चला जाएगा।'' मैंने कहा। वह बैठ गई।&lt;br /&gt;      उससे अगले दिन गुब्बारेवाले की आवाज़ सुनकर वह बाहर जाने लगी तो मुझे देखकर बोली, ''मैं गुब्बारा नहीं लूँगी।'' और जब वह वापस आई तो फिर कहा, ''अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते न ? राजू तो अच्छा बच्चा नहीं है। गुब्बारा तो मिनट में फट जाता है।'' वह कहती हुई मम्मी के पास रसोई में चली गई और मम्मी से कहने लगी, ''मम्मी जी, मुझे गुब्बारा ले दो न !''&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;(5) रिश्ता&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''मोगा से पहले रास्ते की सवारी कोई न हो, एक बार फिर देख लो।'' कहकर रामसिंह ने सीटी बजाई और बस अपने रास्ते पड़ गई।&lt;br /&gt;      बस में बैठे निहाल सिंह ने अपना गाँव नज़दीक आते देख, सीट छोड़ी और ड्राइवर के पास जाकर धीमे से बोला, ''डरैवर साब जी, जरा नहर के पुल पर थोड़ा-सा ब्रेक पर पाँव रखना।''&lt;br /&gt;      ''क्या बात है ? कंडेक्टर की बात नहीं सुनी थी।'' ड्राइवर ने खीझ कर कहा।&lt;br /&gt;      ''अरे भाई, ज़रा जल्दी थी। भाई बनकर ही सही। देख, तू भी जट और मैं भी जट। ज़रा-सा रोकना।'' निहाल सिंह ने गुजारिश की।&lt;br /&gt;      ड्राइवर ने निहाल सिंह को देखा और फिर उसने भी धीमे से कहा, ''मैं कोई जट-जुट नहीं, मैं तो मज्हबी हूँ।''&lt;br /&gt;      निहाल सिंह ने ज़रा रुककर फिर कहा, '' तो क्या हुआ ? सिक्ख भाई हैं हम, वीर (भाई) बनकर ही रोक दे।''&lt;br /&gt;      ड्राइवर इस बार ज़रा-सा मुस्कराया और बोला, ''मैं सिक्ख भी नहीं हूँ, सच पूछे तो।''&lt;br /&gt;      ''तुम तो यूँ ही मीन-मेख में पड़ गए। आदमी ही आदमी की दवा होता है। इससे बड़ा भी कुछ है।''&lt;br /&gt;      जब निहाले ने इतना कहा तो ड्राइवर ने खूब गौर से उसको देखा और ब्रेक लगा दी।&lt;br /&gt;      ''क्या हुआ ?'' कंडेक्टर चिल्लाया, ''मैंने पहले नहीं कहा था ? किसलिए रोक दी?''&lt;br /&gt;      ''कोई नहीं, कोई नहीं। एक नया रिश्ता निकल आया था।'' ड्राइवर ने कहा और निहाल सिंह तब तक नीचे उतर गया था।&lt;br /&gt;000&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZgQ1vF9AI/AAAAAAAAAY4/OjAR42ZquJA/s1600/S%2BS%2BDEEPTI%255B1%255D.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5541222233944749058" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 110px; CURSOR: hand; HEIGHT: 134px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOZgQ1vF9AI/AAAAAAAAAY4/OjAR42ZquJA/s200/S%2BS%2BDEEPTI%255B1%255D.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;सम्पर्क : 97-ए, गुरू नानक एवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर (पंजाब)&lt;br /&gt;दूरभाष : 0183-2421006 मोबाइल : 09815808506&lt;br /&gt;ई मेल : drdeeptiss@yahoo.co.in&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-5231925075954886112?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/5231925075954886112/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=5231925075954886112&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/5231925075954886112'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/5231925075954886112'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='पंजाबी लघुकथा : आज तक'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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हस्ताक्षर(1)&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#3333ff;"&gt;मुहम्मद इकबाल उर्फ़ ईशर सिंह रल्ला&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;देशराज काली&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;वह सिर इन्सान का नहीं था।&lt;br /&gt;उसे बदबू आ रही थी, पता नहीं, जैसे उसके तन-मन में बदबू भर गई हो। उसे उल्टी आने को हो रही थी। अजीब हालत थी। साँस अंदर खींचते हुए भी बदबू आती, बाहर निकालते हुए भी। उसके दिल में एक बेचैनी और घबराहट थी। वह फटाफट गुरुद्वारे के अंदर जा घुसा। पानी पिया। वह हर घूंट के साथ उस बदबू को अंदर निगल जाना चाहता था, पर बदबू थी कि मर नहीं रही थी।&lt;br /&gt;शायद, गधे का सिर था वह।&lt;br /&gt;क्यों चला गया वह इसके साथ गुरधाम से बाहर ? अच्छे भले यहाँ बढ़िया लंगर छक रहे थे। अपने लोगों के हाथों का बनाया हुआ। बड़ा आनन्द आ रहा था। यूँ ही बाहर निकल गया। अब यह बदबू पता नहीं पीछा छोड़ेगी कि नहीं। इसे कहा भी था कि हम इनके हाथों का बनाया कुछ भी नहीं खा सकते। ये हर चीज़ गोश्त में बनाते हैं। पर नहीं, नहीं माना। यह भी नहीं कि कोई फल-फ्रूट ही खा ले बंदा ! नहीं, नहीं माना। अब यह मुँह बदबू से भरा पड़ा है। और, इसे यह भी मालूम था कि अब जब हमारे बहन-भाई हमें मिलने आए तो वे भी... पंडित से खाना बनवा कर लाए थे। नये बर्तनों में। अगर वे जानते थे, तो क्या इसे नहीं मालूम था। नहीं खा सकते भाई, हम लोग नहीं खा सकते !&lt;br /&gt;सिर रो रहा था। नहीं, शायद गर्व से ऊँचा हो रहा था। हाँ-हाँ, गर्व से ऊँचा ही हो रहा था।&lt;br /&gt;''सरदार जी, आप पंजाब से आए हो ?''&lt;br /&gt;''हाँ जी।''&lt;br /&gt;''आपने लाहौर देखा ?''&lt;br /&gt;''नहीं जी, वक्त बहुत कम है। कल हमने वापस चले जाना है।''&lt;br /&gt;''चलो, हम आपको लाहौर दिखाते हैं ?''&lt;br /&gt;''नहीं, नहीं, कोई बात नहीं। फिर कभी देख लेंगे।''&lt;br /&gt;''नहीं-नहीं क्या हुआ ? आप हमारे भाई हो। चलो, लाहौर देखें।''&lt;br /&gt;''पर आप यह परोपकार क्यों कर रहे हो हम पर ?''&lt;br /&gt;''दरअसल, कुछ बरस पहले हम मोहाली क्रिकेट का मैच देखने गए थे। वहाँ हमारी जो सेवा पंजाबी भाइयों ने की, वह भूलने वाली नहीं। वे दिखने में भी आपके जैसे ही लगते थे। इधर लाहौर से ही उजड़ कर गए थे। अब मेरा मन करता है कि मैं भी आपकी सेवा करूँ। मेरे दिल की हसरत है...।''&lt;br /&gt;फिर, वही सिर सफारी गाड़ी में बैठकर लाहौर देखता रहा। फूड मार्किट में जा कर वैष्णों भोजन किया। महाराजा रणजीत सिंह के शाही किले के सामने छाती चौड़ी करके फोटो खिंचवाई। फिर वापस गुरद्वारा साहिब आकर जत्थे में आ मिला। फिर, वही सिर मेरे साथ बातें करता रहा, ''वो कहते हैं कि जो सेवा हमारी पंजाब में हुई, वो कहीं ओर नहीं हुई। काफ़ी अमीर घराने के लोग थे। सफारी गाड़ी थी उनके पास। वे कहते थे- तुमने जब भी इधर आना हो, आओ। हमारा कार्ड ले जाओ। कोई दिक्कत नहीं होगी... बस, वे जैसे कर्ज़ उतार रहे थे।''&lt;br /&gt;मैं सिर की शिनाख्त में खोया हुआ था। उसकी कोई-कोई बात मुझे समझ में आ रही थी। सिर लगातार बोले जा रहा था- ''हाँ, पहले शेख़ इजाज़ दिल्ली आया था। वह कट्टर मुसलमान है। पाँच वक्त का नमाजी। उसने पठानी सूट पहन रखा था। बुआ जी के पास पहुँच गया था। बुआ जी बहुत वृद्ध थीं। जो आदमी उसे बुआ के पास लेकर गया था, उसने बुआ के सामने इजाज़ को करते हुए पूछा था कि पहचान कौन है ? मुसलिम भेष के बावजूद बुआ ने पहचान लिया था। बोली- रे तू, ईशर का बेटा तो नहीं ? फिर, इजाज़ बुआ के पैरों में गिर कर खूब रोया था। अपने संग लाईं गाँव की निशानियों उसने दूर फेंक दी थीं, खून से बड़ी निशानी और कौन सी है?&lt;br /&gt;मैं सिर की शिनाख्त नहीं कर पाया। यह ज़रूर किसी इन्सान का ही सिर है। हाँ, ज़रूर किसी इन्सान का सिर है। फिर उनमें कोई बहस होने लगी थी।&lt;br /&gt;''ताया जी, बुरा न मानना। मैं पूछना चाहती हूँ कि आप हमारे साथ छुआछात क्यों करते हो ? हम एक खून हैं। क्या हुआ आप लोग झटका खाते हो और हम हलाल। फिर, अगर दूध उबल कर आग में गिरे तो माँस के जलने जैसी बदबू नहीं आती...? फिर दूध और माँस में क्या फ़र्क है ?''&lt;br /&gt;''भाई साहब, लगती तो हमारी भतीजी ही थी। पर मैंने उसे कह दिया कि हम तुम्हारे हाथ का नहीं खा सकते। भाई, हम झटका खाते हैं तो इसका मतलब है कि जिंदा माँस खाते हैं। हलाल तो बिलकुल सफेद पड़ जाता है। उसमें से खून निचुड़ जाता है। बिलकुल मुरदार का माँस लगता है। झटका तो शेर खाता है। शेर मुरदार कभी नहीं खाता। भाई साहब, मैंने कहा कि हम मुर्दार कभी नहीं खा सकते। क्या किया जाए ?... और जब वे हमारी बुआ को अपने संग ले गए थे तो वह बुजुर्ग भी तीन-चार दिन वहाँ भूखी ही रही। दूध या फलों से आख़िर क्या बनता है। अन्न तो अन्न ही होता है। फिर उन्हें समझ में आ गया। उन्होंने बुआ से कहा कि बुआ जी, आप पकाओ, हम सब आपके हाथों का बनाया खाएंगे। फिर जी, चौथे दिन बुआ जी ने खुद रोटी पकाकर खाई थी। पर वह अधिक दिन वहाँ नहीं रह सकी थी।''&lt;br /&gt;सिर बेताल का लग रहा था। बदबू मेरे नाक में चढ़ी। मैंने नाक दबा ली। बदबू बहुत ज्यादा आ रही थी। मैं चाहता था कि राहत का साँस आए। वह बोले जा रहा था- ''भाई साहब, वहाँ मैंने अपने बड़े भाई की कब्र की तस्वीर भी देखी थी। उस पर लिखा हुआ था- मुहम्मद इकबाल उर्फ ईशर सिंह रल्ला वल्द मक्खन सिंह रल्ला... यह मक्खन सिंह वही हमारा दादा था जिसकी निशानियाँ इजाज़ अपने संग लेकर आया था। कंगणी वाला गिलास, जिस पर मक्खन सिंह का नाम खुदा था। पुरानी किरपाण और एक सुखमणी साहिब का गुटका ! पर खून को पहचान की क्या ज़रूरत ?''&lt;br /&gt;पर मैं इस सिर को क्यों पहचानना चाहता हूँ ? फिर इसकी शिनाख्त भी तो नहीं हो पा रही। अजीब हालत है। यह कुछ पूछने भी नहीं दे रहा। बोले ही जा रहा है। जो मुँह में आता है, बोले जा रहा है, ''भाई साहब, लाहौर स्टेशन पर एक बुजुर्ग मिल गया। वह लोगों से पूछ रहा था कि किधर से आए हो ? मुझसे पूछा तो मैंने कहा कि मैं जालंधर से आया हूँ। उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने पूछा- वहाँ इमाम नासर मस्जिद है अभी भी ? हाँ है। वैसी ही है। वह बोला- मेरी वहाँ दुकान हुआ करती थी। मैं बस्ती दानिशमंदाँ में रहता था। हम गूजर हैं। मैंने कहा कि मैं भी बस्ती दानिशमंदाँ ही रहता हूँ। उस बस्ती का नाम अभी भी दानिशमंदाँ ही है। उस बुजुर्ग ने मेरा माथा चूम लिया- सरदार जी, आप उस मुक्कदस जगह से आए हो... फिर वह सिसकने लगा।''&lt;br /&gt;मैं बात को दूसरी ओर मोड़ना चाहता था। उसने पूछा- ''आपने बंटवारा झेला था। कितना नुकसान हुआ था। परिवार का क्या हुआ ?''&lt;br /&gt;''क्यों नहीं भाई। बंटवारे ने तो ऐसे जख्म दिए हैं कि पूछो मत। पिताजी और चाचा जी का कत्ल हो गया था। माँ हम दो भाइयों और दो बहनों को किसी न किसी तरह बचा कर ननिहाल ले आई थी, बनारस के करीब। हम वहीं रहे। फिर चार-पाँच सालों बाद दादा जी बचते-बचाते आ गए। दरअसल वह सहजधारी थे। इसलिए पठानी भेष में बचते रहे थे। पर उनका भाई जो पूरा गुरसिक्ख था, वह वहीं रह गया। धर्म परिवर्तन कर लिया था। यह जो परिवार इतने बरसों बाद मिला था, वह दादा का ही परिवार था। इनका सुनारी का काम था। मेरा भाई मुझे बता रहा था कि दादा जी ने एक चांदी की खुंडी(छड़ी) बनाई थी, साथ में जूती का जोड़ा। वह अपने भाई को खोजना चाहता था। उसे तोहफ़ा देना चाहता था। इसीलिए अपने पत्नी और बहू को गुरद्वारों के दर्शन करने के लिए भेजता रहता था कि कहीं कोई सुराग मिले...। फिर जब मृत्यु के किनारे पहुँचा तो अपने बेटे से बोला- अगर मैं मर गया तो पीछे से यह खुंडी और जूती का जोड़ा सरहद से पार फेंक आना, कंटीली तारों के ऊपर से। मैं समझ लूंगा कि मेरे भाई के पास चली गई ये चीजें...।''&lt;br /&gt;पत्थर का सिर भला कैसे हो सकता है ?&lt;br /&gt;नहीं-नहीं, हो सकता है, मुझे भ्रम हुआ हो। वह सिर नहीं रोया था। कोई और रोया होगा। पर मेरे करीब तो कोई दूसरा था भी नहीं। फिर रोया कौन था ? कुछ समझ में नहीं आ रहा। यह बड़ा अजीब दौर है। सब कुछ गड्ड-मड्ड हुआ पड़ा है। दूध से पानी अलग करने वाला कोई नहीं। वैसे भी, यूँ ही कहते हैं कि हंस दूध और पानी अलग कर देता है। असल में बात तो यह है कि जब वह अपनी चोंच दूध में डुबोता है तो उसकी तेजाबी राल से दूध फट जाता है। चलो जी, दूध अलग और पानी अलग !&lt;br /&gt;मैं भी कौन-सी बातों में जा लगा। बात तो उस सिर की कर रहा था जो मुझे इन्सान का नहीं लग रहा था। लेकिन बातचीत इन्सानों की तरह ही कर रहा था। इन्सान ही तो कभी हैवान, कभी शैतान बन सकता है। पर वह तो अंदर से बदल सकता है, सिर बदलने की क्या तुक ? सिर क्यों बदल गया ? यह क्या करिश्मा हो गया ? अंदर से शैतान हो गया, यह तो समझ में आता है। पर बाहर से सिर ही बदल गया ! यह सिर का मामला बहुत टेढ़ा है।&lt;br /&gt;''भाई साहब, आप गुस्सा न करना। मैं एक बात पूछना चाहता हूँ।''&lt;br /&gt;''पूछो।''&lt;br /&gt;''आपने कहा था कि हम पाकिस्तान नहीं जा सकते या वहाँ रह नहीं सकते। क्यों ?''&lt;br /&gt;''बिलकुल जी। एक तो वे मुसलमान हैं। उनका खाना-पीना बहुत गंदा है। बदबू आती है। बदबू तुम्हारे अंदर-बाहर बस जाती है। वे हर चीज़ गोश्त में बनाते हैं। सुबह का नाश्ता भी गोश्त से शुरू होता है। गरीबी भी बहुत है। मँहगाई इससे भी ज्यादा। मैंने अब वहाँ कुल्फ़ी खाई थी। वह भी अभी एक ही चम्मच मुँह में डाला था, पर मुझे स्वाद बहुत खराब लगा। मैंने वहीं सब कुछ छोड़ दिया। मेरा मुँह बदबू से भर गया था। मुझे उल्टी आने को हो रही थी। मैंने गुरद्वारा साहिब आकर पानी पिया। पानी के एक-एक घूंट से मैं बदबू को अंदर निगलने की कोशिश कर रहा था, पर बदबू मर नहीं रही थी। नहीं रह सकते हम वहाँ। बिलकुल नहीं। और फिर मेरी वहाँ झड़प हो गई, खूफिया पुलिस के एक आदमी से। उसने मुझसे बहुत टेढ़े सवाल किए। मुझसे बोला- कहाँ से आए हो ? मैंने कहा- भारत से। पूछने लगा- कहाँ जन्मे थे ? मैंने जवाब दिया-अनडिवाडिड इंडिया के गाँव में। वह बोला- पाकिस्तान के गाँव में क्यों नहीं कह रहे ? मैंने कहा- कह ही नहीं सकता। पाकिस्तान होगा, नई जनरेशन के लिए। मेरे लिए तो अनडिवाडिड इंडिया का गाँव ही है। उसने कहा- इसका मतलब तुम्हारे मन में अभी कई तरह का फिरकूपन है। मैंने कहा कि यह बात नहीं, अब इकबाल साहिब ने कविता लिखी है- सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्ताँ हमारा...अब तुम उस तुक को बदल सकते हो ? तुम इस कविता की एक भी लाइन काट सकते हो ? तुम इस कविता की एक भी लाइन काट तो मैं कह दूँगा कि मेरा जन्म पाकिस्तान के गाँव में हुआ था। भाई साहब, हमारा भारत बहुत बढ़िया मुल्क है। अब तुम अटारी स्टेशन से हमारी तरफ आओ, तो देखो कितनी तरक्की की है हमने। मल्टी स्टोरी इमारतें हैं। उधर जाओ तो लाहौर तक वही पुराने घर। अब मैं तुम्हें बता रहा हूं कि मैं बनारस यूनिवर्सिटी में ही पढ़ा हूँ। फिर रेलवे में नौकरी लग गया। सन् 86 में मेरी बदली पंजाब में हो गई। उस वक्त हालात बहुत खराब थे। पंजाब तो आग की नाल बना हुआ था। तुम्हें तो पता ही है पंजाब ने जो संताप झेला डेढ़-दशक तक। कहाँ किसी से छिपा है। केंद्र भी कौन सा कम कर रहा था पंजाब के साथ। ये तो यहाँ के होकर भी बेगाने ही रहे हैं। भाई साहब, हम पता नहीं उधर कैसे बचते रहे हैं। चौरासी में तो बहुत ही डर गए थे। अब तुम खुद सोचो...।''&lt;br /&gt;पता नहीं, किसका सिर है। बोले जाता है, बोले जाता है।&lt;br /&gt;''... भाई साहब, ये कट्टर भी बहुत हैं। अब थे तो हमारे भाई ही। जब मैंने उनकी बच्चियों को आलिंगन में लेकर प्यार किया तो छोटे भाई ने बहुत बुरा मनाया। कहने लगा- हमारे धर्म में ऐसा नहीं है। मुझे उस वक्त ईशर की बहुत याद आई। ईशर होता तो उसने कह देना था- नहीं, हमारे धर्म में ऐसा ही होता है। हम बच्चियों को ऐसे ही प्यार देते हैं। मैं ईशर की कब्र देखना चाहता था। मेरा और ईशर का जन्म एक ही कमरे में हुआ था। हम तो जैसे जुड़वां भाई थे। पर वीज़ा ही नहीं था गाँव का। वह मेरी ओर टेढ़ी नज़रों से झांकता रहा था। अब आप खुद देख लो। वे लड़कियाँ कहती हैं कि जब हम टी.वी. पर सिक्ख परिवारों की लड़कियों को अपने भाइयों की शादी में गिद्धा-भांगड़ा डालते देखती हैं तो हमारा मन बहुत खुश होता है। इधर तो हम पर्दे में ही ज्यादा रहती हैं। पहले भी जब मेरा भाई बुआ जी को मिलकर वापस लौटते समय वाहगे में मुझसे मिला था, तो बातें करते-करते इसका नमाज का वक्त हो गया था। यह मुझसे बोला कि भाई मुझे तो नमाज अदा करनी है। तुम बैठो। फिर भाई इसने इतनी जोर-जोर से नमाज पढ़ी कि पूरे स्टेशन पर सुनाई दी थी। लोग कहते कि यह तो बहुत कट्टर है। यह तुम्हारा भाई कैसे हो सकता है! तुम सिक्ख हो और यह कट्टर मुसलमान ! भाई, मैं तो उस वक्त डर ही गया था।''&lt;br /&gt;''और क्या अब भी उनके साथ कोई राब्ता...?''&lt;br /&gt;''हाँ जी, हम फोन करते रहते हैं। उन्होंने अपने बेटे के ब्याह पर हमें बुलाया था। पर मेरे बड़े भाई ने कहा कि ऐसे अवसर पर हमें नहीं जाना चाहिए। उनके सारे रिश्तेदार मुसलमान होंगे। हमसे वे नफ़रत करेंगे। हम वहाँ सिर्फ़ दो ही सिक्ख होंगे, बाकी सभी वहीं होंगे। हमारे भाई तो हमें प्यार करेंगे, पर दूसरे लोग नफ़रत करेंगे। और फिर, वे हमारी स्पेशल सेवा कैसे करेंगे ? उनका वाला खाना तो हमसे खाया नहीं जाएगा। फिर भाई ने कहा- और फिर धर्म का मामला है। हमने सोचा, फिर कभी फुरसत के समय जाएंगे, जब सिर्फ़ उन्हीं का परिवार होगा। तब भी दो-एक रोज़ रुक कर लौट आएंगे। वे भी फोन करते रहते हैं। मैंने अपनी बहू से उनकी बहू की भी बातचीत करवाई थी। वे दोनों काफी देर तक बातें करती रही थीं। पर एक दिन भाई बोला- हम तो सो गए थे। पर जब से तुम मिलकर गए हो, ईद मौके उदास हो जाते हैं।''&lt;br /&gt;बोले जा रहा है, बोले जा रहा है। पता नहीं, किसका सिर लगा हुआ है।&lt;br /&gt;000&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TJYoDC8fYoI/AAAAAAAAAYg/-P0ZNtVMf50/s1600/Desraj_Kali+1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5518642426184426114" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; 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गई लम्बी बातचीत के महत्वपूर्ण अंश -&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;em&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर - आपके साहित्यिक सफ़र का आरंभ कैसे हुआ ? किन लेखकों ने शुरू में प्रभावित किया और बाद में आपने किनका प्रभाव स्वीकार किया ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - मुझे लगता है, कहीं न कहीं अदबी बीज मेरे अन्दर था। मेरे भापा जी को भी पढ़ने का थोड़ा शौक था ही। उन्होंने कुछ चुनिंदा कवियों की कविताएं एक कापी में उर्दू अक्षरों में उतार रखी थीं। वे उस कापी में से हमें कविताएं, गीत पढ़ पढ़कर सुनाया करते। मेरा मन भी होता कि मैं भी ऐसी कविताएं लिखूं। इसीलिए मैंने प्राइमरी करते समय ही उनसे उर्दू सीखी। दूसरी बात जो मुझे याद आती है, वह गुरदयाल सिंह फुल्ल से जुड़ी है। मेरी एक किताब पर चढ़े कवर पर एक रचना गुरदयाल सिंह फुल्ल के नाम तहत छपी हुई थी। चूंकि हमारा गोत्र भी फुल्ल था इसलिए मेरे मन में इच्छा जाग्रत हुई कि इसी तरह मेरा नाम भी अख़बार में छपे। तीसरा कारण, मुझे चिट्ठियों की शक्ल में याद आता है। मेरी बड़ी बहन विवाह के बाद आसाम चली गई थी। उसे चिट्ठी लिखने की जिम्मेदारी मेरी हुआ करती थी। माँ अपने ढंग से चिट्ठी लिखवाती जैसे सब राजी खुशी है, आगे समाचार यह है, खत का जवाब जल्दी देना वगैरह-वगैरह। माँ जब लिखवा चुकी होतीं तो मैं अपना ढंग इस्तेमाल करता। इधर उधर की घटनाएं लिखता, कई काल्पनिक जुमले जोड़ता। बहन जवाब में लिखती कि वीर(भाई) की चिट्ठी पढ़कर मजा आ जाता है। चिट्ठियाँ लिखना भी मेरी हॉबी बन गया। एक लम्बे समय तक मैंने चिट्ठियों में कहानियाँ भरीं। इससे अगला कारण जो मुझे नज़र आता है, वह है- मेरा साहित्यिक किताबें पढ़ने का शौक। मैं जो भी किताब पढ़ता, पढ़कर यही सोचा करता कि ऐसी बातें तो मैं भी लिख सकता हूँ। पढ़ने का शौक आठवीं-नौवीं में लगा था। जहाँ तक मुझे स्मरण है, पहली रचना मैंने कहानी के रूप में उस समय लिखी थी जब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ता था। उन दिनों ही सन् 1971 में जंग लगी थी और वह कहानी जंग में शहीद होने वाले सिपाही के बारे में थी। तब तक मैंने पाठ्यक्रम में लगे लेखकों का ही पढ़ा था। सोहण सिंह शीतल, नानक सिंह, जसवंत सिंह कंवल, अमृता प्रीतम, संतसिंह सेखों, सुजान सिंह आदि। इनकी भी एक-एक कहानी ही। इन लेखकों को मैंने जमकर कॉलेज में ही पढ़ा। बेरिंग कॉलेज की लायब्रेरी बहुत बड़ी थी। पंजाबी की पुस्तकों का बड़ा भंडार था। मैं एक समय में तीन किताबें इशु करवाता और एक हफ्ते में पढ़ लेता। तीन तीन सौ पृष्ठों के उपन्यास मैं दो तीन बैठकों में खत्म कर देता। कहानियों की बनिस्बत उपन्यास मैं अधिक पढ़ता। नानक सिंह का कहानी जोड़ने का ढंग और कंवल का वार्तालाप मन पर गहरा असर छोड़ते। मैं अपने अन्दर एक नावल खड़ा करता। मन कहता कि तू लिख सकता है। बी.ए. प्रथम वर्ष में कॉलेज की मैगज़ीन 'दीपशिखा' में मेरी एक कविता छपी। जिस दिन मैगज़ीन मिला, वह दिन मेरी ज़िन्दगी का एक बेहद हसीन दिन था। मैंने वह कविता हर किसी को दिखाई। फिर, द्वितीय वर्ष में उसी पत्रिका में मेरी एक कहानी छपी जिसका नाम था- 'दीपा'। कुछ समय पश्चात् घर में मैंने एक उपन्यास शुरू किया। हमारे नज़दीक एक पेंटर रहता था। उसे गुरुद्वारे में बाणी की तुकें लिखने के लिए बुलाया गया था। वे तुकें मैं लिखवा रहा था। वह पाकिस्तान में कई साल कैद काट कर लौटा था। वह जासूसी के जुर्म में पकड़ा गया था। उसकी कहानी जबर्दस्त थी। उसने अनेक यातनाएं झेली थीं, पीछे से उसका घर उजड़ गया था, और तो और, सरकार ने उसकी कोई बात नहीं पूछी। मैंने उसे पास बिठा कर ब्यौरे लिखे और उन्हें उपन्यास का रूप देने लगा। जहाँ अटक जाता, पेंटर को बुला लेता। इस तरह मैंने सौ से अधिक पेज लिख मारे। नाम रखा - 'कलंक'। इसके बाद एक और उपन्यास लिखा- 'आधी रात का सूरज' नाम से। पर ये पुलिंदे ऐसे ही पड़े रहे, कई साल। एक बार मैं एक पांडुलिपि लेकर सुरिंदर काहलों के पास छपवाने के इरादे से गया भी। काहलों ने बटाला में प्रैस लगा रखी थी। उसने पांडुलिपि को उलट-पलट कर देखा। उसने मुझसे पढ़े हुए लेखकों के बारे में पूछा। मेरा जवाब उसे संतोषजनक नहीं लगा। उसने मुझे सलाह दी कि अभी मैं और पढ़ूं। मैं निराश होकर लौट आया पर लिखने की ललक बरकरार रही। पढ़ाई समाप्त करने के बाद कुछ समय बेकारी से जूझने के कारण, नौकरी के प्रारंभिक वर्ष और विवाह के आरंभिक दौर में मैं कुछ खास न लिख सका। कभी कभी कहानी लिखने की कोशिश करता। जालंधर मैं पंजाब बुक सेंटर और भाषा विभाग के दफ्तर जाता और वहाँ से किताबें ले आता। मिली जुली किताबें- उपन्यास, कहानी और फिलासफी से जुड़ी। यहीं मैंने मोहन राकेश, यशपाल, राजिंदर सिंह बेदी, सुदर्शन आदि की पंजाबी में अनूदित कहानियाँ पढ़ीं। अजीत कौर और गार्गी की शैली भाने लगी। तीखे और करारे संवाद अच्छे लगते। कुंलवंत सिंह विरक का कहानी बुनने का ढंग पसंद आता। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आदान-प्रदान श्रृंखला में प्रकाशित किए गए भारतीय भाषाओं के अनुवाद पढ़े। मेरी आँखें खुलती गईं। पहले लिखे उपन्यास खुद ब खुद कोने में लगते गए। सन् 1987 में मैंने एक और उपन्यास लिखा - 'लौ होण तक' जिसे रवि साहित्य प्रकाशन ने छापा। इस उपन्यास को भाषा विभाग, पंजाब ने वर्ष 1989 में नानक सिंह पुरस्कार से नवाजा। लेकिन इस उपन्यास की साहित्य में अधिक चर्चा न हो सकी। इस समय तक मैं पंजाबी कथाकार प्रेम प्रकाश, रघुबीर ढंड, वरियामसिंह संधु की लेखन विधि को बड़े गौर से देख रहा था। मेरी कहानी 'वारिस' डा. रविंदर की पत्रिका 'विकल्प' में छपी तो तुरन्त प्रतिक्रिया हुई। भाजी गुरशरन सिंह(नाटककार) और सरदार पंछी आदि के खत आए कि इस कहानी पर फिल्म बनाने की अनुमति भेजो। वर्ष 1992 में मेरा पहला कहानी संग्रह 'रात चानणी' प्रकाशित हुआ। इसी वर्ष जालंधर में होने वाले कहानी उत्सव में बलदेव धालीवाल ने 'पंजाबी कहानी, नए नक्श' शीर्षक के तहत लिखे गए अपने परचे में इस कहानी के साथ साथ दो-तीन अन्य कहानियों का उल्लेख किया। मेरी पहचान बनी और मुझे लगा कि मैं अदब के अखाड़े में आ गया हूँ। रही प्रभाव स्वीकार करने की बात। अगर आप कोई एक नाम पूछो, तो उत्तर देना कठिन होगा। मैंने हर लेखक से कुछ न कुछ लिया है। हर लेखक का कुछ न कुछ योगदान है। सीखने और सबक लेने की प्रक्रिया अन्तहीन है। मैं समझता हूँ कि जब लेखक लिखता है तो उसके पीछे पूरी परंपरा गतिशील होती है। स्वयं वह सूत्रधार होता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5518634476524065234" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 245px; CURSOR: hand; HEIGHT: 171px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TJYg0UJw0dI/AAAAAAAAAYA/4l09JYCNtDI/s200/Talvinder+Singh3.jpg" border="0" /&gt; &lt;div align="center"&gt;तलविंदर से बातचीत करते जिंदर&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर - आपकी दिलचस्पी संगठनों में भी रही है। आप पिछले काफी समय से 'केन्द्रीय पंजाबी लेखक सभा' में भी काम करते रहे हो। क्या इससे आपका लेखन प्रभावित नहीं होता ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - मुझे याद है, मई 1984 में मैं, हांस और जगीर सिंह नूर अपनी पत्नियों सहित अलीवाल पिकनिक पर गए थे। वहीं हम तीनों ने यह निश्चय किया कि क्यों न बटाला में एक साहित्य सभा बनाई जाए। वहीं हमने इसका नामकरण कर लिया और पद भी बांट लिए। साथ ही प्रैस को भी ख़बर दे दी। शीघ्र ही, सुभाष कलाकार, गुरमीत सरां, सुरिंदर शांत, अमरदीप संधावालिया आदि इससे आ जुड़े। हम नियमित हर माह बैठकें करते। जब इसका घेरा व्यापक हुआ तो मैंने इसे केन्द्रीय सभा से जोड़ने के लिए केन्द्रीय सभा के तत्कालीन महा सचिव तेरा सिंह चन्न से सम्पर्क किया। उस समय केन्द्रीय सभा के विधान के अनुसार एक शहर में से एक ही सभा केन्द्रीय सभा से जुड़ सकती थी। मैंने लिखकर दिया कि हमारी सभा का दफ्तर गांव शुकरपुरा में है। लेकिन प्रस्ताव केन्द्रीय सभा की मीटिंग में रद्द हो गया। बटाला में हरभजन बाजवा की रहनुमाई में 'साहित्य कला संसार' पहले ही कार्यशील था और बाजवा के कारण ही ऐसा हुआ था। हमने बैठक में प्रस्ताव पारित किया कि हम केन्द्रीय सभा से कभी भी संबंध नहीं रखेंगे। ख़बर पढ़कर मक्खन कुहाड़ मेरे पास आया और उसने इस प्रस्ताव को वापस लेन के लिए कहा। उसने लम्बा चौड़ा व्याख्यान संगठनों की आवश्यकता के हक में दिया जिससे मैं असहमत नहीं हो सकता था। उन्होंने अगली बैठक में केन्द्रीय सभा के विधान की इस धारा में कि एक शहर में से एक सभा ही केन्द्रीय सभा से जुड़ सकती है' में संशोधन करवाया और हमारी सुविधा के लिए रास्ता खोला। केन्द्रीय सभा पंजाबी भाषा के हक में सरगरम थी और निरंतर धरनो, प्रदर्शनों के माध्यम से सरकार पर दबाव डाल रही थी कि वह पंजाबी को हर स्तर पर लागू करे। इस मुद्दे पर हमारे अन्दर भी कोई मतभेद नहीं था। सो, मैं भी इन जुलूसों, धरनों में जाने लगा। फिर जब अमृतसर से डा. श्यामसुंदर दीप्ति को मीतप्रधान के लिए चुनाव लड़वाया तो मैं कार्यकारणी में आ गया। मैं लगातार दो बार कार्यकारणी में रहा। तीसरी टर्म में मुझे सचिव के पद के लिए चुनाव लड़वाने का फैसला हुआ। मैं जीत गया और फिर और अधिक सक्रिय हो गया। अमृतसर में मैंने और डा. दीप्ति ने जनवादी लेखक संघ की स्थापना डा. प्रदीप सक्सेना की सलाह पर की और कुछ बड़े समारोह किए। इस तरह संगठनात्मक कामों में मेरी भागीदारी बढ़ती गई। यह ठीक है कि इसके साथ अपने लेखन पर असर पड़ता है। छुट्टियों के दिन संगठन के कामों में लग जाते हैं पर मुझे इसमें कोई नुकसान प्रतीत नहीं होता। मैं समझता हूँ कि हर मसले के हल के लिए साझे प्रयत्न ज़रूरी हैं। लिखना बहुत ज़रूरी है पर बड़े मसलों के प्रति संजीदा होना भी बहुत ज़रूरी है। अगर सरकार पंजाब में अभी तक पंजाबी भाषा के हक में कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर सकी तो नि:संदेह इसमें लेखकों के अतिशक्तिशाली प्रैशर का अभाव है। हमारे पास केन्द्रीय सभा या साहित्य अकादमी के अलावा और कौन सा दल है जो भाषा के मसले पर चिंता करता हो ?&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- कहानी लिखते समय आपका प्रेरणास्रोत क्या होता है ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; -मेरा प्रेरणास्रोत वह सब होता है जो पहले देखा, पढ़ा या सुना होता है। फिर अपने अनुभव होते हैं जिनमें से गुजरकर कोई सोची या देखी-सुनी घटना साहित्यिक आकार ग्रहण करती है। कई बार लिखते समय बिलकुल नए या भूले बिसरे वाक़यात स्मरण हो आते हैं और सहज ही रचना का हिस्सा बन जाते हैं। मैंने अनुभव किया है कि कई बार बचपन की वे बातें कहानी का हिस्सा बन जाती हैं जिनके बारे में सोचा भी नहीं होता। मुझे लगता है यदि मैं स्थूल रूप में यह कहना चाहूँ कि अमुक बात लिखते समय प्रेरित करती है या कोई और बात, तो शायद बात न बनें। ये प्रेरणाओं का समूह-सा होता है जो स्वत: ही लिखवा ले जाता है। यह सूक्ष्म-सा व्यवहार है जिसमें से गजर कर काई ख़याल रचनात्मक माडल में ढल जाता है। इसमें काफी दख़ल हमारी हुनरी तबीअत का भी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर - आप पहले प्रगतिशील स्वर की कहानी लिखते थे, फिर अचानक करवट बदल ली। क्या कारण रहा?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - मुझे याद है, जब मैं कॉलेज में पढ़ा करता था, उस समय प्रगतिवादी लहर का ज़ोर था। एस.एफ.आई, पी.एस.यू., ए.आई.एस.एफ.आई., जैसे संगठनों का ज़ोर था। विद्यार्थी जुझारू लहरों के साथ खुद को कहलवा कर खुश हुआ करते थे। मैं किसी भी पार्टी या ग्रुप से नहीं जुड़ा था, पर माहौल का असर लाज़मी ही था। पहले प्रो. नरिंजन सिंह ढेसी और फिर प्रो. रतन सिंह चाहल हमारे पंजाबी के अध्यापक रहे। प्रो. ढेसी का तो मालूम था कि वह नक्सली लहर से जुड़े थे। शायद, प्रो. चाहल भी जुड़े थे। वे पढ़ाते समय प्रगतिशील विचारों का खुलासा करते। मुझे याद है, बी.ए. के दूसरे वर्ष में पढ़ते समय जो कहानी मैंने लिखकर प्रो. चाहल को दी थी, वह अधूरे प्रेम के कारण बर्बाद हुए एक व्यक्ति की कहानी थी। कहानी तो उन्होंने छपने के लिए रख ली लेकिन छापने से पहले उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि दु:ख तो और भी हैं ज़िन्दगी में, ज़रा गहरी दृष्टि डाल। मुहब्बत ही कोई अकेला मसला नहीं है। अगर लिखना है तो समाज की नब्ज़ पर हाथ रख। कुछ माहौल का असर और कुछ ऐसे सबक, इससे मेरे मन-मस्तिष्क पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा ही होगा। अगली बार जब मैं उस मैगज़ीन का विद्यार्थी संपादक था तो खुद छात्र-छात्राओं से उनकी रचनाएँ पकड़ते समय इस बात का ख़याल रख रहा था कि ये कविताएँ या कहानियाँ अकेले इश्क का उबाल तो नहीं, ये कुछ सार्थक कह भी रही हैं या नहीं ? फिर अपने मोहल्ले में अपने दोस्त-मित्रों के साथ मिलकर एक ‘समाज सुधार सभा’ बना ली। मैं इश्तहारों का मैटर लिखता, दूसरों को बोलने के लिए नुक्ते लिख-लिख कर देता, स्वयं सभाओं, बैठकों में आगे बढ़ कर बोलता। सयाने&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TJYhHyI5C_I/AAAAAAAAAYI/Vg4XtNYj-rI/s1600/Talvinder+Singh5.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5518634810990988274" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 133px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TJYhHyI5C_I/AAAAAAAAAYI/Vg4XtNYj-rI/s200/Talvinder+Singh5.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; लोग मेरी प्रशंसा करते हुए कहते -''भई मिस्त्री करतार सिंह का लड़का सयाना है, सयानी और सुथरी बातें करता है।'' मैं अपने ऊपर सयानेपन का लबादा औढ़ने लग पड़ा, आदर्शवादी बन गया। बटाला में मेरे उपन्यास ''लौ होण तक'' पर एक गोष्ठी के दौरान प्रो. उधम सिंह शाही ने कहा था कि हैरानी की बात है, प्रेम करने की उम्र में तलविंदर के पात्र इतने बेहिस क्यों हैं। मुझे इस बात की बारीकी का पता नहीं था, लेकिन बाद में जाकर महसूस किया कि उस उम्र में मैंने प्रेम के कई अवसर गवां लिए। अन्दरूनी तड़प हवस बनकर पलती रही। आदर्श मुखौटे के पीछे कुदरती जज्बे उठते-गिरते रहे और मैं एक द्वंद को भोगता रहा। फिर साहित्यिक सफ़र तय करते समय कुछ नया पढ़ा, मानवीय स्वभाव के विषय में, मनोवैज्ञानिक मसलों के बारे में, कुछ लेख फ्रायड के लिखे भी पढ़े। नये विषयों पर लिखी कहानियाँ पढ़ीं तो मुझे लगा कि जैसे मेरे अन्दर भी ऐसा बहुत कुछ पड़ा हुआ है। मुझे भी वे गांठें खोलनी चाहिएं। इस कोशिश को अंजाम देने में ही मैंने इस ओर करवट ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- आपकी कहानी 'ताड़ी' (ताली) पिछले समय में काफी चर्चित रही है। इस कहानी के मुख्य पात्र की मनोस्थिति को समझते हुए मुझे लगा कि वह खुद तलविंदर है। आपकी बताई गई बातों के अनुसार ही वह मानसिक तौर पर टूटा हुआ और कमज़ोर नज़र आता है। क्या यह सही है ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - यह कहानी उस व्यक्ति की मानसिकता को प्रतिबिम्बित करती है जिसने जवानी में आदर्श लिबास पहने और मुहब्बत के कई असवर गवां लिये। उसने आदर्शवादी होने का ढोंग रचा और प्रौढ़ उम्र में आकर मानसिक त्रासदी का शिकार हो गया। वे अवसर जो कभी उसके लिए गौरव थे, पश्चाताप में बदल जाते हैं। अगली बात यह कि वह पात्र स्वयं तलविंदर है या नहीं, इस बारे में मैं यही कहूँगा कि कहानियों के मसले हम बहुत ही नज़दीक से पकड़ा करते हैं। शायद बहुत कुछ अपने भीतर से ही मिल जाता है। यह ज़रूरी नहीं, सोची-समझी विधि हो, सहज स्वभाव भी घटित होता है। तुम्हें लगता है तो हो सकता है कि ये घटनाएँ मेरे आसपास से भी गुजरी हों। लेकिन यह बहुत सारे लोगों की कहानी है। इस कहानी को पढ़कर एक दिन कहानीकार मुख्तार गिल मुझे दारू पीकर गालियाँ बकता फोन पर कह रहा था कि मैंने लोगों से यह क्यों बताया कि हम भीतर से ऐसे हैं। ऐसे ही एक बार डा. रजनीश बहादर अमृतसर आया और मैंने उसे डा. राही के पास ले जाने के लिए बस स्टैंड से लिया। राह में मैं उसे अपने दफ्तर ले गया। वह इसी कहानी में आई एक लड़की पात्र ऐना का नाम लेकर पूछने लगा कि वह तेरी पी.ए. कहाँ बैठती है। फिर रास्ते में उसने 'ताड़ी' के मुख्य पात्र की समस्या को मेरे साथ जोड़कर प्रश्न किया कि क्या सचमुच औरतों के प्रति मेरा तटस्थ व्यवहार है। मैंने उसे बताया कि यह मेरी समस्या नहीं। वैसे मेरा ख़याल है कि पात्र न जिंदर होता है, न मुख्तार गिल और न ही तलविंदर। वह समस्या का साधारणीकरण होता है। जो मुखौटेधारी लोग हैं, उन्हें छोड़कर सभी लोग कहेंगे कि यह हमारा मसला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- मेरा अगला सवाल थोड़ा निजी और टेढ़ा है। आपने जवानी और प्रौढ़ आयु के मनोवैज्ञानिक तथा जिन्सी मसलों को स्पर्श किया है। इस बात का अहसास होने के बाद कि कई मुहब्बत के अवसर चाहे-अनचाहे गुम हो गए, क्या किसी गुम हुए मौके को फिर से दस्तक दी ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - यह वाकई टेढ़ा और घर से बाहर निकलवा देने वाला सवाल है। फिर भी मैं कोशिश करूँगा कि ईमानदारी से जवाब दे सकूं। मैंने जवानी में एक लड़की से बेपनाह मुहब्बत की। मेरा अपनी पत्नी के संग भी इश्क रहा। फिर लम्बे समय तक ऐसी कोई घटना नहीं घटी। बहुत ही रंगीन और सुखद विवाहित जीवन के बीच बहुत बाद में एक मुहब्बत ने बड़ी सहजता से मेरे जीवन में प्रवेश किया। मैंने बेसब्रा होकर उसे एक ही साँस में पी लेना चाहा। सारी अक्ल-समझदारी को छीके पर टांग मानो पिछली कमियों को पूरा करने की कोशिश की। पर उमंगित मन देर तक ऐसे अमलों में पड़ने के लिए भी राजी नहीं हुआ। उस मुहब्बत ने मेरी सोच को नये आयाम दिए। यह अनुभव कथा-कहानी में ढलकर अपना रंग दिखाते रहे। मैं सोचता हूँ, अगर यह बाद वाली मुहब्बत मेरे जीवन मे न आती तो बहुत सारे अहसास लिखे ही नहीं जा सकते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- क्या आपकी कहानियाँ आपकी पत्नी की नज़र में पड़ती हैं ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - यह कैसे हो सकता है कि छपी रचना किसी निजी कैद में छिपा ली जाए। यह तो संभव है कि अनछपी रचना आप किसी कोने में संभाल कर सुरक्षित रख लो, पर छपी हुई रचना को तो किसी भी प्रकार से छिपाया नहीं जा सकता। दूसरी बात, मेरी शायद ही कोई कहानी हो जिसे मेरी पत्नी ने न पढ़ा हो। पहले तो वह अनछपी कहानी पढ़ लिया करती थी पर अब जिस पत्रिका में कहानी आती है, उसे वह तब तक संभाल कर रखती है जब तक पढ़ने के लिए समय न निकाल ले। कई बार पूछती भी है, 'यह लड़की पात्र कौन है, यह बात मन में कैसे आई कि इसे इस तरह लिखना है ?' वेसे वह कहानी के 'मैं' पात्र को मेरे से पृथक कर लेती है। अगली बात जो अधिक अहम है, वह यह है कि वह मेरी ही नहीं, तुम सब की कहानियाँ पढ़ती है और बहुत बार मेरे से चर्चा भी करती है। कई बार हँसते हुए यह कहकर कि लेखक सभी रंगीन तबीअत के होते हैं, मुझे बाइज्ज़त बरी कर देती है। मेरा तो इतने में ही निपट जाता है। बाकी भाई मेरे, हो सकता है कि तू अपनी कहानियाँ अपनी बीवी की नज़रों से छिपाने में कामयाब हो जाता हो, पर मेरे यहाँ ऐसा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- आपकी कहानी 'माया जाल' भी कई जगह अनुवाद होकर छपी है। इसका मुद्दा आपके हाथ में कैसे आया ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - हमारे अमृतसर में एक बार एक घटना घटित हुई। एक पाँच-छह वर्ष के बच्चे का क़त्ल हो गया। कारण यह था कि उसने अपनी माँ को किसी गैर मर्द के साथ देख लिया था, अपने ही घर में। उसने कहा कि मैं पिता को बताऊँगा। उस औरत और उस व्यक्ति ने बच्चे को बहुत फुसलाया, पर वह नहीं माना। आख़िर उस औरत ने उस व्यक्ति की मदद से बच्चे को नहर में ले जाकर मार दिया। यह घटना बहुत समय तक मेरे अन्दर पड़ी रही। यही सोचता रहा कि यदि ऐसे ही बच्चा अपने पिता को किसी अन्य औरत के संग देखता और कहता कि वह माँ को बताएगा, तो क्या पिता भी ऐसा ही करता, जैसा उस औरत ने किया था। मुझे लगा कि औरत अपनी सामाजिक स्थिति को सुरक्षित रखने के लिए ही यह कारा करती है। इस कहानी के बाकी के विवरण मैंने अपने दोस्त देव दर्द से जुड़ी एक घटना से ले लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- मेरा मानना है कि आप विशुद्ध ग्रामीण जीवन से नहीं जुडे रहे। फिर भी आपकी कई कहानियों में ग्रामीण दृश्य बड़े सजीव हैं। यह कैसे ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;- मैंने अपना गाँव घोड़ेवाह तो बिलकुल ही नहीं देखा। आज भी मुझे उस गाँव का रास्ता नहीं पता। ननिहाली गाँव से गहरा रिश्ता रहा है। वहाँ मैं हफ्ते-दस दिन में ज़रूर जाता। यह 'कोटली ढोले शाह' जैंती पुर से कोई दो किलोमीटर की दूरी पर है। मेरा नाना गाँव का सीरी था। घर में ज़मींदार दरांती-हल आदि का काम करवाने आते रहते। वह बहुत ही सज्जन व्यक्ति था। गाँव में बड़ी मान और इज्ज़त का मालिक। नानी भी बहुत बढ़िया स्वभाव की थी। वहाँ बड़े मामा के बच्चे थे। मेरी बड़ी बहन का हमउम्र छोटा मामा था। वह मेरा पक्का साथी था। ननिहाल में मेरा बहुत दिल लगता। हम खुले खेतों में डंगर चराने जाते। कुएं पर नहाते। नाना के साथ कोल्हू पर जाकर रस पीता, गरम गरम गुड़ खाता। घर में खुला खाना पीना था। गर्मियों की छुट्टियाँ मैं अक्सर यहीं बिताया करता। यहाँ फ़सलें भी काटीं और खेतों में सोकर भी देखा। यहाँ मुझे सभी ‘शहर वाली बीबी का काका’ कहा करते थे। सभी मर्द मेरे मामा थे और औरतें मामियाँ। मुझे इन रिश्तों में से बहुत महक आती। इस गाँव के हमउम्र लड़के मेरे मित्र थे। यह सब कुछ मेरे बड़े होने तक जारी रहा। छोटा मामा अपने इश्क की झूठी-सच्ची कहानियाँ मुझे मसाले लगा-लगा कर सुनाता था। वह बेपरवाह आदमी था। फिल्में देखने का शौकीन। ग्रामीण जीवन के अनेक विवरण मैंने इसी गाँव में से लिए। कुछ अनुभव बुआ के गाँव दीपेवाल का भी था। वहाँ भी मैं कभी-कभी जाकर रहता था। बाकी लिखते समय किसी शब्द, नाम, स्थान पर अटक जाऊँ तो अपनी माता से जाकर पूछ लेता हूँ। इस तरह मेरा काम चल जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- आपके विषय में एक बात चर्चा में है कि तलविंदर लाहौरिया हो गया। आपके ताल्लुकात पाकिस्तानी लेखकों से बढ़ गए। आप वहाँ की कहानी से भी जुड़े। इस अमल में से कोई साहित्यिक फ़ायदा हुआ ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - पिछले कुछ वर्षों में मैं कई बार पाकिस्तान गया हूँ। जैसा कि होना था, मेरी निकटता वहाँ के अदीबों से बनी। फिर राब्ता कहानीकारों से बढ़ा। मैंने महसूस किया कि पचास-पचपन सालों के वक्फ़े ने एक साहित्यिक फ़ासला बना दिया है। मैं वहाँ मंशा याद, अफज़ल, अहिसन रंधावा, अफज़ल तौसीफ़, फरखंदा लोधी, इलियास घुम्मण, जुबैर अहिमद, मकसूद साकिब, तौकीर चुगताई आदि कहानीकारों से मिला। फिर मैं और घुम्मण ने मिलकर एक किताब संपादित की -'उजड़े घरों के वासी'। इसमें पाकिस्तानी पंजाब की बारह कहानियाँ शामिल की गईं। पर मैंने सोचा कि यह काफी नहीं है। फिर मैंने खुद 40 कहानियों का चयन किया और अपने मित्र पाल सिंह वल्ला से उन्हें लिप्यिंतर करवाकर 'साझी पीर' शीर्षक के तहत पंजाबी में प्रकाशित करवाई। फिर मुझे लगा कि कुछ अच्छे समर्थवान कहानीकार छूट गए हैं। इस तरह और चालीस कहानीकारों की कहानियों पर आधारित अगली किताब 'कच्चे कोठों का गीत' आई। अभी एक और ऐसी किताब के संपादन की गुंजाइश है जिस पर मैं काम कर रहा हूँ। इसके अलावा, अनवर अली की 'गुड़ की भेली', अफ़ज़ल तौसीफ़ की 'बुलबलीना', मकसूद साकिब की 'धुले पन्नों की इबारत', जुबैर अहिमद की 'कबूतर, बनेरे और गलियाँ' मंशा याद की 'अंधा कुआं' और 'बहता पानी' भी छपी हैं। पश्तों कहानियों की किताब 'किस्सा मेरे पिंड दा' भी छापी। ज़ाहिद हसन का नावल 'इश्क लताड़े आदमी' छापा। उस तरफ पाकिस्तान में अमृता, दुग्गल, विरक, धीर छपे हैं। तेरी किताब 'नहीं, मैं नहीं' छपी है। प्रेम प्रकाश छपा है। बलदेव सिंह का उपन्यास 'लाल बत्ती' छपा है। अब मेरा कहानी संग्रह 'विचली औरत' छपा है। पाठक एक दूसरे का जानने लगे हैं। रही साहित्यिक फ़ायदे की बात, वह तो मेरी समझ में बहुत है। आख़िरकार, हम दोनों धड़े पंजाबी अदब के सृजक हैं। क्यों नहीं सारे लेखन को एक मुख्यधारा में रखकर देखा जाता। अलग बात है कि अभी दोनों देशों के सम्बन्ध उस स्तर तक नहीं सुलझे कि सारा साहित्यिक माहौल सहज हो जाए। ये प्रारंभिक यत्न अधूरे भी हैं और कम भी। जिस मुख्यधारा की स्थापना की मैं बात करता हूँ, वह अभी बहुत दूर है। पर क्या इतना कम है कि जो हमारे पाठक/लेखक पाकिस्तानी लेखकों के बारे में कतई नहीं जानते थे, वे अब जानने लगे हैं। फिर भी एक आधार तो हमने बनाया है। 28 अगस्त 2007 को अलहमरा हाल में एक समारोह में सईदा दीप, नसरीन अंजुम भट्टी और परवीन मलिक ने मुझे राखी बांध कर भाई बनाया। इकबाल कैसर मेरा भाई बना है। ननकाणा में रहने वाला कल्याण सिंह कल्याण मुझे बड़े भाइयों का सत्कार देता है। करामत अली मुगल मेरा बेटों जैसा भाई है। पिछले दौरे में ख़ालिद फ़रहाद ने धालीवाल के सिर अपनी पगड़ी बांध कर उसे अपना अज़ीज़ बनाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- मैंने पिछले दिनों छपी आपकी कहानियों में देखा कि कुछ मुसलमान पात्रों की आमद हुई है। हमारी इधर की पंजाबी कहानी में ऐसे पात्र लगभग गायब ही रहे। इसके पीछे कोई कारण ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - मेरा जन्म पाकिस्तान बनने के सात साल बाद का है। बचपन में जो बातें मैंने बड़े-बुजुर्गों से सुनीं, उनमें मुसलमानों की तस्वीर बड़ी बिगड़ी हुई थी। उस समय ताज़ा ताज़ा विभाजन हुआ था और दुश्मनी की भावना भी प्रबल थी। मैं सोचा करता, शायद सच में ही मुसलमान इतने बुरे होते हैं। मेरी माँ भी जब कभी दीवार-मुंडेर पर से कौए को उड़ाती तो कहती, ''उड़ रे मुसल्ले।'' एक कहानी जोड़ रखी थी कि गुरू गोविन्द सिंह ने कहा है कि मुसलमान तेल में बांह भिगो कर तिलों में लबेड़ कर ले आए तो जितने तिल बांह पर लगें, वह उतनी ही कसमें सच्चे होने की खाए, तब भी उस पर यकीन न करो। इन बातों का असर तो होना ही था। पर अब जब आपसी मेल-मिलाप का उत्साह मिला, मैं पाकिस्तान गया तो देखा कि यह तो वो बन्दे नहीं जो बचपन में हमारे मनों में बड़े-बुजुर्गों ने बिछा छोड़े थे। ये तो बड़े मुहब्बती और मिलनसार हैं। खुले और पंजाबी स्वभाव के ऐन अनुकूल। मैंने अफ़ज़ल अहिसन रंधावा और सलीम खान गिम्मी को पढ़ा तो उसमें सिख पात्र देखकर अच्छा लगा। मुझे लगा कि इस मामले में हम महदूद हो रहे हैं। मैंने मुसलमान घरों का माहौल और लोगों के आम आचार-व्यवहार को समझने में रुचि पैदा की। मैंने अपने पाकिस्तानी लेखक मित्रों से ऐसे मुद्दों पर बातें कीं। मेरे घर अफ़ज़ल तौसीफ आई तो मैंने उसे मुल्तान एरिये की एक सामूहिक बलात्कार पीड़ित औरत मुख्तारां माई के जीवन पर आधारित लिखी कहानी 'निक्की इट्ट वाली हवेली' सुनाई और उससे तकनीकी मशवरे लिए। वह कहानी अच्छी बन गई। इस तरह कुछ अन्य में भी साझी रहितल को चित्रित किया। मुझे लगता है कि पंजाबी साहित्य को भरा-पूरा बनाने के लिए यह लाज़मी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- आपने कहानी विधा के अलावा उपन्यास पर भी काम किया है। इसके विषय में कुछ बताओ।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - अपना उपन्यास 'लौ होण तक' मैंने बटाले की इंडस्ट्री में काम करते मज़दूरों के आसपास घुमाया। इसमें कहानी तत्व कम और भाषण तत्व अधिक था। मेरा मज़दूर संगठनों के बारे में कोई खास अनुभव नहीं था इसलिए इस उपन्यास पर मेरी कल्पना भारी थी। सन् 1968 में मैंने पंजाब में आए आतंकवाद को केन्द्र में रख कर 'योद्धे' शीर्षक से उपन्यास लिखा। जालंधर देश भगत हाल में कोई समारोह चल रहा था। वहाँ हरनाम दास सहिराई मिले। उन्होंने कहा- एक काम कर। गले में झोला डाल और उसमें कुछ कागज रख। आतंकवाद से पीड़ित गाँवों में जा कर लोगों के दर्द सुन और लिख। मैंने उनसे वायदा कर लिया और पूरे दो साल फील्ड वर्क किया। पहले चार सौ पृष्ठ लिखे। फिर एडिट करके सवा दो सौ किए। यह उपन्यास उनकी हल्ला-शेरी से लिखा गया। आगे और उपन्यास लिखने की भी मेरी योजना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- अपनी नई कहानियों में से किसी एक का जिक्र करना चाहो तो ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - मेरी नई किताब 'इस वार' की आखिरी कहानी 'रूहां-बदरूहां' को मैंने इस विचार के साथ जोड़कर लिखा कि आदमी अपने से तगड़ी औरत से डरता है। मुझे इस बात की समझ आई कि विवाहों के जोड़े बनाते समय हमारा समाज लड़की का चयन करते हुए उसकी पढ़ाई, उसका कद, उसकी उम्र और शारीरिक ताकत लड़के से कम क्यों खोजता है। कारण, लड़के को लड़की के सामने महफ़ूज रखने के लिए। मुझे याद है कि गाँव में लोग कहा करते थे कि सेंट-इतर लगाकर बाहर जाओगे, तो चुड़ैलें चिपट जाएँगीं। असल में ये चुड़ैलें कोई पराभौतिक शै नहीं थीं अपितु कामुक औरतें ही थीं। हमें चुड़ैलों के बारे में हमारे बड़े बताते थे कि वे रात बारह बजे से दो बजे तक जब गहरी रात होती है, निर्वस्त्र बाहर निकलती हैं। उन्होंने अपनी छातियों को कंधों से पीछे फेंक रखा होता है। वे अकेले आदमी को देखकर चिपट जाती हैं। मुझे लगता है कि यह आदमी के बलात्कार जैसी कोई बात है। कमज़ोर और दब्बू आदमी बलात्कार नहीं करवा सकता। वह हीनता में गर्क हो जाता है। यही कारण है कि आदमी तगड़ी औरत से घबराता है। 'रूहां-बदरूहां' कहानी मैंने ऐसे कमज़ोर और नपुंसक आदमी की होनी को लेकर लिखी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- आप साहित्य, समाज और लेखक के पारस्परिक रिश्ते के बारे में कैसे सोचते हो ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - पहली बात, मैं साहित्य को जीवन और समाज के लिए मानता हूँ। साहित्य का मनोरथ जीवन में सहजता भरना, अनकहे को जुबान देना और रहस्यों को खोलना है। समाज और जीवन के प्रति समझ को विशाल करना है। साहित्य उपदेश नहीं देता, यह समाज और मन के साथ एक सुर होकर आदमी की सोच को झकझोरता है। साहित्य के मंथन में से गुजरते हुए व्यक्ति खुद चाहे और अनचाहे मूल्यों का निपटारा करता है। साहित्य पाठक को समय के सच के साथ जोड़ता है। यह अपने समय का लोक-इतिहास है। मैं लेखक को अपने समय का सूत्रधार कहता हूँ जो व्यक्ति, स्थिति और समाज के बीच कड़ी पैदा करता है। या फिर वह एक ऐसा डाक्टर है जिसके हाथ आपरेशन करने वाला औजार है। कलम लेखक के हाथ औजार की तरह ही है। यह लेखक की प्रतिभा और उसकी सूझबूझ पर निर्भर करता है कि वह किस साफ़गोई से चाहे-अनचाहे का निपटारा करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- आप साहित्य में अश्लीलता किसे कहते हैं ? आप जानते ही हो कि इस प्रश्न पर कुछ कहानियों को आधार बनाकर पंजाबी में चर्चा भी चली है। खासकर कहानीकार सुखजीत के मामले में।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - तुमने 'आस्था' फिल्म देखी है ? 'बवंडर' देखी है ? फिल्म का सन्दर्भ इसलिए दे रहा हूँ कि यह बहुत सारी कलाओं का सम्मिश्रण होता है और इसकी पहुँच भी व्यापक है। किताब से अधिक। इनमें निर्वस्त्र दृश्य हैं। क्या वे अश्लील हैं ? हम बच्चा पैदा होने पर उसकी बांह देखते हैं या सिर ? बिलकुल नहीं। उसका गुप्त अंग देखते हैं। हमारे घरों में बेटियाँ-बहनें होती हैं। घर में भैंसे ब्याती है। सभी के सामने वे नया दूध देती हैं। क्या यह अश्लील कर्म है? मैं खुजराहो गया, कोर्णाक का सन-टेंपिल देखा। शिवलिंग की पूजा होती है मंदिरों में। मेरे यार, यह सब बात का बतंगड़ है। सुखजीत ने एक सच पर से परदा उतारकर दिखाया है। तुमने गार्गी की 'नेक्ड ट्राईएंगल' पढ़ी है न ? ऐसे तो बहुत कुछ उस किताब का अश्लीलता के घेरे में आ जाएगा। एक जगह ऐसे सवाल के जवाब में गार्गी का लिखा मैंने पढ़ा है। उस पर इल्ज़ाम लगाया जाता है कि वह गालियों का प्रयोग करता है। वह शरीर के गुप्त अंगों के नाम ज्यों के त्यों लिख देता है। वह कहता है - मैं एक ऐसे कल्चर की पैदावार हूँ जहाँ मेरा बाप रात में दारू पीकर आता था और बाहरवाला दरवाजा पीटते हुए जोर जोर से कहा करता था- ओए भैण चोदे... ओए माँ चोदे...बूहा खोल। फिर वह आगे लिखता है, जो नाम अंगों के समाज ने रखे हैं, वही इस्तेमाल करता हूँ। अब मैं उन्हें न सेब कह सकता हूँ, न चाकू। दूसरी बात, ज़रूरी नहीं कि कथित अश्लीलता निर्वस्त्र होने में हो। वह पूरे कपड़ों में भी हो सकती है। मधुर और सभ्य भाषा भी अश्लीलता प्रवाहित कर सकती है। तीसरी बात, चर्चा होना और सवाल उठना अच्छी बात है। बहस-मुबाहसा होता रहना चाहिए। यह जिन्दा होने की निशानी है। हर एक को अपनी राय रखने का हक है। वह कहते हैं न, सौ फूल खिलने दो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;जिंदर- एक आखिरी प्रश्न। पंजाबी आलोचना पर यह इल्ज़ाम लगता है कि यह अपनों का पक्ष लेती है। एक दूसरे को उठाने-गिराने के प्रपंच रचे जाते हैं। आपको क्या लगता है ?&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;तलविंदर सिंह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; - सच बताऊँ, मैं इस बात के बारे में अधिक नहीं सोचता, यह मेरा स्वभाव है। दलबंदियाँ, गुटबंदियाँ भी अधिक परेशान नहीं करतीं। हमारी पीढ़ी के लगभग सभी लेखक पन्द्रह-बीस सालों से लिख रहे हैं। अगर उनकी कोई किताब, कहानी या उपन्यास पाठ्यक्रम में नहीं लगा तो यार ख़ैर है। जो प्रोफेसर किताबें सैट करते हैं, वे पढ़ते ही नहीं। एक स्थान पर उनकी ब्रेक लगी हुई है। ज़रा, पिक एंड चूज विधि से पाँच-सात प्रोफेसरों को पकड़ कर पड़ताल करके देखो। वे भलेमानस नौकरियाँ करते हैं। एक दो पीरियड लगाये और महीने बाद तनख्वाह जेब में डाल ली। बाकी अल्ला-अल्ला और ख़ैर-सल्ला। यूँ ही खामख्वाह दिमाग पर बोझ क्यों डालें। मैं तो जिंदर भाई यह समझता हूँ कि कहकर आलोचना करवाई तो क्या करवाई। कहकर किताब लगवाई तो क्या लगवाई। मुझे पता है कि मैं कितने पानी में हूँ। मैं साधना किए जाने पर ही बल देता हूँ। मेरी कहानियों पर चार विद्यार्थी एम.फिल कर बैठे हैं और आगे चार और कर रहे हैं। दो ने पी.एच.डी. के लिए इन्हें आधार बनाया है। मैंने कभी किसी प्रोफेसर से नहीं कहा, किसी मित्र प्रोफेसर से भी नहीं। आलोचना में मुझे डा. जोगिंदर सिंह राही के ढंग-तरीके पर तसल्ली है। वह रचना की रूह देखता है, लेखक का मुख नहीं। डा. रवि रविंदर और प्रो. तरलोक बंधू की बात को समझने और कहने की विधियाँ अनबायस्ड हैं। वे आलोचना करते समय पगड़ियाँ नहीं, दिमागों को पकड़ने का यत्न करते हैं। मैं नहीं चाहता कि लेखक रिआयती पास हो। अगर रचना में दम होगा तो उसे इग्नोर नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-8809989945749274896?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/8809989945749274896/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=8809989945749274896&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/8809989945749274896'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/8809989945749274896'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='लेखक से बातचीत'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TJYhsi_6Q4I/AAAAAAAAAYQ/tcyDojXMERE/s72-c/thumbnailCANWITKT.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-2449443489452867429</id><published>2010-07-06T18:37:00.002+05:30</published><updated>2010-07-08T22:53:54.601+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पंजाबी लघुकथा : आज तक'/><title type='text'>पंजाबी लघुकथा : आज तक</title><content type='html'>&lt;a 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में दो मौलिक लघुकथा संग्रह ''नंगे लोकां दा फिक्र'' और ''मारूथल दे वासी'' प्रकाशित हो चुके हैं। मौलिक लेखन के साथ-साथ यह अनुवाद कर्म से भी जुड़े हुए हैं। हिंदी कथाकार सुकेश साहनी के लघुकथा संग्रह - ''डरे हुए लोग'' और ''ठंडी रंजाई'', डा. सतीश दुबे के लघुकथा संग्रह ''आखिरी सच'' तथा कमल चोपड़ा के लघुकथा संग्रह ''सिर्फ़ इंसान'' का हिंदी से पंजाबी में अनुवाद कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त पंजाबी में 23 एवं हिंदी में 2 लघुकथा संकलनों का संपादन भी किया है। गत 20 वर्षों से पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका ''मिन्नी'' का संपादन कर रहे हैं। मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों पर अनूठी लघुकथाएं लिखने वाले इस लेखक ने अपने समय और समाज से जुड़े लगभग हर विषय को अपनी लघुकथा का विषय बनाया है।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;संपादक : कथा पंजाब&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;श्याम सुन्दर अग्रवाल की पाँच लघुकथाएं&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#336666;"&gt;हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000099;"&gt;(1) वापसी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्नी के तिरिया हठ के आगे मेरी एक न चली। अपने खोये हुए सोने के झुमके के बारे में जानकारी लेने मुझे डेरे वाले बाबाजी के पास जाने को उसने बाध्य कर दिया।&lt;br /&gt;पत्नी का झुमका जो पिछले सप्ताह छोटे भाई की शादी में कहीं खो गया था, बहुत तलाश करने पर भी नहीं मिला। रास्ते भर पत्नी बाबाजी की दिव्य-दृष्टि का बखान करती रही, ''पड़ोसवाली पाशो का कंगन अपने मायके में खो गया था। बाबाजी ने झट बता दिया कि कंगन पाशो की भाभी के संदूक में पड़ा है। पाशो ने मायके जाकर भाभी का संदूक खोला तो कंगन वहीं से मिला। जानते हो, पाशो का मायका यहाँ से दस-बारह मील पर है।''&lt;br /&gt;मैं पत्नी को बताना चाह रहा था कि ऐसी बातें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कही गई होती हैं, लेकिन मेरे कहने का पत्नी पर कोई प्रभाव नहीं पड़नेवाला था, अत: मैं चुप ही रहा। पत्नी फिर बोली, ''और अपने गब्दू की लड़की रेशमा ससुराल जाते समय रास्ते में अपनी सोने की अंगूठी खो बैठी। बाबाजी ने आँखें मूंदकर देखा और बोल दिया, नहर के परली ओर नीम के पेड़ के नीचे घास में पड़ी है अंगूठी। और अंगूठी वहीं घास में पड़ी मिली।''&lt;br /&gt;पत्नी ने ऐसे कितने उदाहरण दिए, यह तो मुझे याद नहीं। हाँ, ये किस्से सुनते-सुनते कब बाबाजी के डेरे पहुँच गए, पता ही नहीं चला।&lt;br /&gt;बाबाजी अपने कमरे में ही थे। हमने कमरे में प्रवेश किया तो सारा सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा पाया। बाबाजी और उनका शिष्य कुछ ढूँढ़ने में व्यस्त थे। मैंने पूछा, ''क्या बात हो गई ?''&lt;br /&gt;''बाबा जी की सोने की चेन वाली घड़ी नहीं मिल रही। सुबह से उसे ही ढूँढ़ रहे हैं।'' शिष्य ने सहजभाव से उत्तर दिया।&lt;br /&gt;डेरे से हमारी वापसी बहुत सुखद रही। पत्नी सारे रास्ते एक शब्द भी नहीं बोली।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;(2) अपना अपना दर्द&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पचपन वर्षीय मिस्टर खन्ना अपनी पत्नी के साथ बैठे जनवरी की गुनगुनी धूप का आनंद ले रहे थे। छत पर पति-पत्नी दोनों अकेले थे, इसलिए मिसेज खन्ना ने अपनी टांगों को धूप लगाने के लिए साड़ी को घुटनों तक ऊपर उठा लिया।&lt;br /&gt;मिस्टर खन्ना की निगाह पत्नी की गोरी-गोरी पिंडलियों पर पड़ी तो वह बोले, ''तुम्हारी पिंडलियों का मांस काफी नरम हो गया है। कितनी सुंदर हुआ करती थीं ये !''&lt;br /&gt;''अब तो घुटनों में भी दर्द रहने लगा है, कुछ इलाज करवाओ न।'' मिसेज खन्ना ने अपने घुटनों को हाथ से दबाते हुए कहा।&lt;br /&gt;''धूप में बैठकर तेल की मालिश किया करो, इससे तुम्हारी टांगें और सुंदर हो जाएँगी।'' पति ने निगाह कुछ और ऊपर उठाते हुए कहा, ''तुम्हारे पेट की चमड़ी कितनी ढिलक गई है।''&lt;br /&gt;''अब तो पेट में गैस बनने लगी है। कई बार तो सीने में बहुत जलन होती है।'' पत्नी ने डकार लेते हुए कहा।&lt;br /&gt;''खाने-पीने में कुछ परहेज़ रखा करो और थोड़ी बहुत कसरत किया करो। देखो न, तुम्हारा सीना कितना लटक गया है।''&lt;br /&gt;पति की निगाह ऊपर उठती हुई पत्नी के चेहरे पर पहुँची, ''तुम्हारे चेहरे पर कितनी झुर्रियाँ पड़ गई हैं। आँखों के नीचे काले धब्बे बन गए हैं।''&lt;br /&gt;''हाँ जी, अब तो मेरी नज़र भी बहुत कमजोर हो गई है, पर तुम्हें कोई फिक्र ही नहीं।'' पत्नी ने शिकायत भरे लहजे में कहा।&lt;br /&gt;''अजी फिक्र क्यों नहीं। मेरी जान, मैं जल्दी ही किसी बड़े अस्पताल में ले जाकर तुम्हारी प्लास्टिक सर्जरी करवाऊँगा। फिर देखना, तुम कितनी सुंदर और जवान लगोगी।'' कहकर मिस्टर खन्ना ने पत्नी को बांहों में भर लिया।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff6600;"&gt;(3) मरूस्थल के वासी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरीबों की एक बस्ती में लोगों को संबोधित करते हुए मंत्री जी ने कहा, ''इस साल देश में भयानक सूखा पड़ा है। देशवासियों को भूख से बचाने के लिए ज़रूरी है कि हम सप्ताह में कम से कम एक दिन उपवास रखें।''&lt;br /&gt;मंत्री जी के सुझाव का लोगों ने तालियों से स्वागत किया।&lt;br /&gt;''हम सब तो हफ्ते में दो दिन भी भूखे रहने के लिए तैयार हैं।'' भीड़ में सबसे आगे खड़े व्यक्ति ने कहा।&lt;br /&gt;मंत्री जी उसकी बात सुनकर बहुत प्रभावित हुए और बोले, ''जिस देश में आप जैसे भक्त लोग हों, वह देश कभी भी भूखा नहीं मर सकता।''&lt;br /&gt;मंत्री जी चलने लगे तो उन्हें लगा जैसे बस्ती के लोगों के चेहरे प्रश्नचिह्न बन गए हों।&lt;br /&gt;उन्होंने बड़ी उत्सुकता के साथ पूछा, ''अगर आपको कोई शंका हो तो दूर कर लो।''&lt;br /&gt;थोड़ी झिझक के पश्चात एक बुजुर्ग़ बोला, ''साब ! हमें बाकी पाँच दिन का राशन कहाँ से मिलेगा ?''&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;(4) नंगे लोगों की फिक्र&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक देश में दो आतंकवादियों ने पहला क़त्ल मोटरसाइकिल पर सवार होकर किया। देश की सरकार ने मोटरसाइकिल पर दो आदमियों के एक साथ बैठने पर पाबंदी लगा दी।&lt;br /&gt;दूसरी बार क़ातिल साइकिल पर चढ़कर ही भाग निकले। सरकार ने साइकिल चलाने पर भी पाबंदी लगा दी। लोगों ने अपनी साइकिल अँधेरे बन्द कमरों में छिपाकर रख दी।&lt;br /&gt;जब तीसरा क़त्ल हुआ, क़ातिल हरी कमीज में थे। पुलिस ने शहर के चौक में खड़े होकर हरी कमीज़ वाले आदमी पकड़ने शुरू कर दिए।&lt;br /&gt;चौथे क़त्ल के समय क़ातिलों ने सिर्फ़ निकर-बनियान ही पहने हुए थे। सरकार ने निकर-बनियार पहनने की गुंजाइश रखनेवालों पर पाबंदी लाग दी। अब पुलिस से बचने के लिए बनियान पहनने वाले लोगों ने बनियान पहनना ही छोड़ दिया।&lt;br /&gt;क़ातिल अभी तक पकड़े नहीं जा सके थे। अब नंगे लोगों को चिंता सताने लगी है कि अगर आतंकवादियों ने अगली वारदात नंगे होकर कर दिखाई तो वे पुलिस की भयंकर मार से बचने के लिए वस्त्र कहाँ से लाएँगे !&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc0000;"&gt;(5) संतू&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रौढ़ उम्र का सीधा-सा संतू बेनाप बूट डाले पानी की बाल्टी उठा जब सीढ़ियाँ चढ़ने लगा तो मैंने उसे सचेत किया, ''ध्यान से चढ़ना ! सीढ़ियों में कई जगह से ईंटें निकली हुई हैं। गिर न पड़ना।''&lt;br /&gt;''चिंता न करो जी ! मैं तो पचास किलो आटे की बोरी उठाकर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भी नहीं गिरता।''&lt;br /&gt;और सचमुच बड़ी-बड़ी दस बाल्टियाँ पानी ढोते हुए संतू का पैर एक बार भी नहीं फिसला।&lt;br /&gt;दो रुपये का नोट और चाय का कप संतू को थमाते हुए पत्नी ने कहा, ''तू रोज़ आकर पानी भर दिया कर।''&lt;br /&gt;चाय की चुस्कियाँ लेते हुए संतू ने खुश होकर सोचा, ''रोज़ बीस रुपये बन जाते हैं पानी के। कहते हैं अभी नहर में महीना भर और पानी नहीं आने वाला। मौज हो गई अपनी तो।''&lt;br /&gt;उसी दिन नहर में पानी आ गया और नल में भी।&lt;br /&gt;अगले दिन सीढ़ियाँ चढ़कर जब संतू ने पानी के लिए बाल्टी मांगी तो पत्नी ने कहा, ''अब तो ज़रूरत नहीं। रात को ऊपर टूटी में पानी आ गया था।''&lt;br /&gt;''नहर में पानी आ गया !'' संतू ने आह भरी और लौटने के लिए सीढ़ियों पर कदम घसीटने लगा। कुछ क्षण बाद ही किसी के सीढ़ियों में गिर पड़ने की आवाज़ हुई। मैंने दौड़कर देखा, संतू आँगन में औंधे मुँह पड़ा था। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;000&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDMq0-pyeMI/AAAAAAAAAXY/Ejp4IHpuV04/s1600/SS+Agarwal1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5490779460354603202" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 96px; CURSOR: hand; HEIGHT: 96px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDMq0-pyeMI/AAAAAAAAAXY/Ejp4IHpuV04/s200/SS+Agarwal1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;सम्पर्क : बी-1/575, गली नं. 5, प्रताप सिंह नगर, कोटकपूरा (पंजाब)-151 204&lt;br /&gt;दूरभाष : 01635-222517/320615 मोबाइल : 09888536437&lt;br /&gt;ई मेल : sundershyam60@gmail.com&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7759211952732136350-2449443489452867429?l=kathapunjab.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathapunjab.blogspot.com/feeds/2449443489452867429/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7759211952732136350&amp;postID=2449443489452867429&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/2449443489452867429'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7759211952732136350/posts/default/2449443489452867429'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathapunjab.blogspot.com/2010/07/blog-post_06.html' title='पंजाबी लघुकथा : आज तक'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDMrB-A_tII/AAAAAAAAAXg/MoR8PJZNeUk/s72-c/018.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7759211952732136350.post-2853495207293807321</id><published>2010-07-06T18:19:00.000+05:30</published><updated>2010-07-06T18:32:58.892+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रेखाचित्र/संस्मरण'/><title type='text'>रेखाचित्र/संस्मरण</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDMm5IxUr5I/AAAAAAAAAW4/EQ2i9zEyL4o/s1600/043.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5490775133743525778" style="WIDTH: 163px; CURSOR: hand; HEIGHT: 123px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDMm5IxUr5I/AAAAAAAAAW4/EQ2i9zEyL4o/s200/043.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;पंजाबी के प्रख्यात कहानीकार - कवि संतोख सिंह धीर का जन्म पटियाला ज़िला के बस्सी पठाना में 2 दिसम्बर 1920 में हुआ था और निधन 8 फरवरी 2010 को चंडीगढ़ में। वर्ष 1996 में कहानी संग्रह ''पाखी'' के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड, और वर्ष 2004 में शिरोमणि साहित्यकार अवार्ड, पंजाबी से भी&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDMn5mhy8oI/AAAAAAAAAXQ/ADEHcZaV6xU/s1600/santokh-Singh-Dheer.jpg"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5490776241243091586" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 163px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDMn5mhy8oI/AAAAAAAAAXQ/ADEHcZaV6xU/s200/santokh-Singh-Dheer.jpg" border="0" /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt; सम्मानित संतोख सिंह धीर ने अपनी माँ-बोली पंजाबी भाषा की झोली में 50 से अधिक पुस्तकें डाली हैं। कोई एक सवार, सांझी कंध, सवेरे होण तक और मंगो उनकी मास्टरपीस कहानियाँ हैं। छह कहानी संग्रह, चार उपन्यास, एक यात्रा संस्मरण के साथ-साथ उन्होंने 'कबीर वचनावली' का वर्ष 1967 में पंजाबी में अनुवाद भी किया। पंजाबी के इस महान लेखक पर उनके ही समकालीन पंजाबी कथाकार प्रेम प्रकाश ने एक रेखा-चित्र लिखा है जो पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका 'कहाणी धारा' के अप्रेल-जून 2010 के अंक में प्रकाशित हुआ है। 'कथा पंजाब' में हम उसी का हिंदी अनुवाद अपने पाठकों के सम्मुख रख रहे हैं...&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;संपादक&lt;br /&gt;कथा पंजाब&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;कलम का सिपाही : संतोख सिंह धीर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;-प्रेम प्रकाश&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन् 1956 या 57 के आसपास मैंने जालंधर में संतोख सिंह धीर से पूछा था, ''बड़े भाई, अगर कहे तो मैं तेरा रेखा-चित्र भापा प्रीतम सिंह की पत्रिका 'आरसी' के लिए लिख दूँ ?''&lt;br /&gt;      ''लिख ले, यदि तेरा दिल करता है।''&lt;br /&gt;      ''पर तेरे सिगरेट पीने का जिक्र मैं ज़रूर करूँगा।''&lt;br /&gt;      ''तो भाई, तू न ही लिख। इसके बिना मेरे किरदार में क्या और कुछ नहीं?''&lt;br /&gt;      मैंने नहीं लिखा। उन दिनों मुझे बहुत ही यथार्थवादी होकर लिखने का जुनून सवार था। फिर अपनी आत्मकथा 'आत्म माया' लिखने के समय पता चला कि व्यक्ति को बहुत सारे बुरे सच छिपाने भी पड़ते हैं और कुछ बुरे सच बताकर भी पवित्र ही रहा जा सकता है।&lt;br /&gt;      'आरसी' में उन दिनों 'समकालीन' कॉलम के अधीन साहित्यकारों के व्यक्ति-चित्र छपा करते थे। मैं जालंधर के मुहल्ला गोबिंद गढ़ के एक कमरे में अकेला किराये पर रहा करता था। धीर, प्रो. मोहन सिंह के 'पंज दरिया' का काम करने और नौकरी के लिए जालंधर आया हुआ था। वह भी मेरे कमरे में ही रहने लग पड़ा था। मैं कमरे में ताला नहीं लगाया करता था। मेरे पीछे जसवंत सिंह विरदी और गुरदर्शन सिंह उर्फ़ महिरम यार को जब भी ज़रूरत होती, वे मेरे कमरे में आ बैठते थे। मैंने स्टोव रखा हुआ था। जिसका दिल करता, आकर चाय बनाकर पीता और बातें कर जाता। उस समय कम्युनिस्ट कामरेडों और हमदर्दों को धर्म का विरोध करने का भूत सवार रहता था। वे केश कटवाये जा रहे थे और साथ ही, बग़ैर तलब और स्वाद के सिगरेटें पिया करते थे। पीते क्या, फूंका करते थे। मेरा कमरा ऐसे कामों के लिए ठीक था क्योंकि वह गली के सिरे पर था। एकमात्र था। किसी आदमी का उधर आना-जाना नहीं होता था। पीछे की ओर बहुत खुला आँगन और एक कोने में रसोई थी। कमरे में मेरी बाण की खाट, उस पर बिछा बिस्तरा। कुछ कपड़ों वाली सन्दूकची एक कोने में पड़ी होती और एक छोटा मेज गुरदर्शन ने लाकर रखा हुआ था। वह और विरदी नज़दीक ही रहते थे। विरदी टब्बरदार था और गुरदर्शन छड़ा। उस कमरे ने हमारी बहुत सारी करतूतें देखी थीं।&lt;br /&gt;      जब मैंने धीर से पूछा था तो उस वक्त मेरे कमरे में सिगरेट-शराब पीने के अलावा औरतों को लेकर लुकी- छिपी बातें भी हुआ करती थीं। हम दो-दो रुपये मिलाकर सस्ती शराब की बोतल खरीद लाते और मिलकर पीते थे। यह वो ज़माना था जब मैं, महिरम यार और विरदी स्कूल में टीचर हुआ करते थे। जब मैं स्कूल से लौटता तो वह और जसवंत सिंह विरदी किसी दोस्त को लेकर मेरे कमरे में बैठे साहित्य पर बहस कर रहे होते या दूसरों की निंदा कर रहे होते। कभी 'नवां जमाना' के न्यूज डेस्क से उठकर सुरजन ज़ीरवी भी शामिल हो जाता था। हम स्टोव पर चाय बनाते, पीते और सिगरेटें फूंकते हुए कहानियों के विषय में बहस करते रहते। प्राय: झगड़ भी पड़ते। मैं फौजियों वाली बड़ी सख्त सिगरेट चार-मीनार पिया करता था। जब संतोख सिंह धीर प्रोफेसर मोहन सिंह के घर से शाम को आता तो लगता कि बहुत थका हुआ है और दुखी है। वह आते ही अपने सिर पर से पगड़ी उतार कर एक तरफ रख देता और अपने गाँव डडहेड़ी के खास लहजे में 'हाय' पर ज़ोर डालते हुए कहता, ''ये उतर गया मोहन सिंह और उसका दफ्तर, मेरे सिर पर से। आह, मार लिया। धीर जी, तुम ऐसा कर लो। नहीं ऐसा नहीं, ऐसा करो। बस, यही गुलामी...। '' कहकर वह मेरी पीली डिब्बी में से नई सिगरेट निकालकर सुलगा लेता और धुआँ इस तरह फेंकता जैसे मोहन सिंह को परे धकेल रहा हो।&lt;br /&gt;      धीर वैसे मोहन सिंह की इज्ज़त शायर के तौर पर, खास तौर पर प्रोग्रेसिव शायर के तौर पर बहुत करता था। खीझ तो उसके दफ्तर में बंध कर बैठने और प्रो. साहिब की हर बात में 'हाँ जी, हाँ जी' करने के कारण थी। इसके बाद वह और हम वे सारे लक्षण करते जिन्हें छड़े आदमी बातचीत में किया करते हैं। हमारे ऊपर किसी बुजुर्ग़ की पहरेदारी नहीं थी। धीर मेरे से उम्र में बारह साल बड़ा था। वह हमारी बातें सुनता और अपने समय की बातें करते हुए बागोबहार हो जाता। उस कमरे में अन्य लेखक भी आ जाया करते थे। जिसे भी हममें से किसी को ढूँढ़ना होता था, वह 'नवां ज़माना' में सुरजन ज़ीरवी को मिलता और फिर हमारा कमरा खोज लेता। कभी कभी हम पैसे मिलाकर ठेके की अच्छी दारू भी पी लिया करते थे। उन दिनों में पार्टी वर्करों को दारू पीने और फिल्में देखने की मनाही थी। पर मेरे ऊपर कोई पाबंदी नहीं थी। मैं सभी वर्जित काम कर लेता था। मेरे साथ महिरम यार, विरदी, ज़ीरवी और कामरेड हरदयाल सिंह उर्फ़ 'नेता जी' भी शामिल हो जाते थे। हम दारू पीते और फिल्म देखने चले जाते।&lt;br /&gt;      एक दिन धीर थका हुआ आया। उस वक्त मैं गुरदर्शन को मोहन सिंह के दफ्तर में काम करते एक अन्य वर्कर की ओर से कोई लड़का लाकर कुकर्म करने की बात बता रहा था। तभी धीर आ गया और पूछने लगा, ''क्या बातें कर रहे थे? मेरे आने पर चुप क्यों हो गए ?''&lt;br /&gt;      असल में, मैं जब कमरे में आया तो वो वर्कर कमरे में ही था। वह मुझे अपनी बहादुरी वाले काम की बात बताता हुआ सुबूत भी पेश कर रहा था। मुझे उस पर गुस्सा आ गया। मैंने उसे झिड़क कर भगा दिया। तभी गुरदर्शन आ गया। मैं उसे वही बात बता रहा था। धीर मेरी दोहराई गई बात ध्यान से सुनता रहा। फिर उसने भी उस कुकर्म की ख्वाहिश का इज़हार कर दिया। हमें बहुत शर्म आई। ख्वाहिश तो हमारी भी थी। पर हम संकोच कर जाते क्योंकि धीर से हम उम्र में छोटे थे।&lt;br /&gt;      मैंने धीर का स्कैच लिखा। आधी सदी से अधिक का समय बीत चुका है। अब मेरा बुजुर्ग़ दोस्त और मुझसे उम्र का एक बड़ा हिस्सा नाराज़ रहने वाला इस दुनिया को छोड़कर जा चुका है। अब उससे पूछने की ज़रूरत नहीं। मैं लिख रहा हूँ। मुझे अहसास है कि मेरे सहित हर व्यक्ति की ज़िन्दगी का कोई न कोई हिस्सा गुप्त और छिपाने वाला भी होता है। जिसके उधड़ने से हर कोई डरता है। पर जिसे आम लोगों का बड़ा हिस्सा अपना समझने लग पड़ता है, उसका सबकुछ अपना नहीं रहता, लोगों का हो जाता है। उसका कुछ भी कहा और किया माफ़ भी किया जा सकता है और लिखा भी जा सकता है। जैसे महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू के विषय में कोई किसी भी किस्म की यादें लिख रहा है।&lt;br /&gt;      धीर जीवित होता तो उसके बारे में लिखना फिर भी संकोच का काम होता। क्योंकि जीवित बुजुर्ग़ व्यक्ति को अपनी अच्छी-बुरी बातों का जवाब सारे समाज और विशेष तौर पर अपने घरवालों, संबंधी-रिश्तेदारों को देना होता है। मुझे उसकी इस भावना का अदब रहा है।&lt;br /&gt;      धीर ने मोहन सिंह के यहाँ अधिक समय काम नहीं किया। जल्दी ही छोड़कर गाँव चला गया। जहाँ तक मुझे ख़बर लगती रही, उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। मैं एक बार अपने गाँव बडगुजरां से साइकिल पर उसके गाँव डडहेड़ी गया, उसकी खैर-ख़बर लेने। वह ठीक था। लेकिन उसकी माली हालत ठीक नहीं थी। कई बच्चे हो गए थे। उसके पास साइकिल भी नहीं था। मेरे साइकिल को देखकर बोला, ''हम अजनेर के कोटले चलें ?'' वहाँ उसकी मौसी या बुआ अस्वस्थ थी। हम साइकिल पर चले गए। लौट कर आए तो पानी बरसने लगा। मैं अँधेरा होने के समय बारिश में अपने गाँव पहुँचा।&lt;br /&gt;      असल में, संतोख सिंह धीर मुझे तब अधिक अच्छा लगा करता था, जब मैं आठवीं या नौंवी कक्षा में पढ़ता था। खन्ने में अंग्रेज सरकार के खिलाफ कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टी के जलसे हुआ करते थे। जिनमें बड़े लीडर के आने से पहले लोगों को इकट्ठा करने के लिए धीर स्टेज पर बिना माइक के ऊँची और मीठी आवाज़ में गाया करता था- ''कालिया हरना, बागी चरना...'' या ''निक्की निक्की कणी दा मींह बरसेंदा, भिज्ज गया लाल पंघूड़ा।'' अगर धीर न होता तो उससे भी सुरीली आवाज़ में गाने वाला शायर देवकी नंदन ख़ार होता। वह नेहरू जाकेट और गांधी टोपी पहनकर आजादी के गीत गाता। उसकी टोपी से नीचे लम्बे बाल दिखाई देते।&lt;br /&gt;      फिर मैंने स्कूल की पढ़ाई के दौरान उर्दू साहित्य की बहुत सारी किताबें पढ़ ली थीं। मुझे गीत, ग़ज़ल, आज़ाद नज्म के फर्क का पता लग गया था। अच्छे अफ़साने के गुणों को तकनीकी नज़र से देखने की थोड़ी-बहुत अक्ल आ गई थी। फिर मैं तीन-चार साल खन्ना, बड़गुजरां और खरड़ से होता हुआ जालंधर आ गया। यहाँ अच्छी संगत के कारण संतोख सिंह धीर की शायरी और कहानियाँ पढ़ीं। उनमें मुझे अपने इलाके के गाँवों के लोगों का अक्स दिखाई देता। पर जब मुझे कहानी की अधिक समझ आई तो कहता, ''धीर की कहानी ठीक है, पर यह सब कुछ नहीं। कहानी तो विरक(कुलवंत सिंह विरक) लिखता है।''&lt;br /&gt;      उन दिनों में धीर की कविता 'निक्की सलेटी, सड़क दा टोटा' और कहानी 'कोई इक सवार' बहुत मशहूर हो गई थीं। उन्हें पढ़ते हुए मुझे खन्ने और मंडी के गोबिंद गढ़ के बीच वाली सड़क का वह टुकड़ा बहुत याद आता जिस पर मैं लाखों बार साइकिल पर घूमता रहा था।&lt;br /&gt;      जब धीर जालंधर में मेरे कमरे पर आया तो उसकी किताब 'सांझी कंध'(साझी दीवार) छपी थी। उसने मुझे फरमे इकट्ठे करके प्रूफ वाली कॉपी दी और बोला, ''ले, इसकी जिल्द बंधवा लेना।'' मैंने रस्मी तौर पर वह कॉपी ले ली, पर उसके जाने के बाद किसी अन्य को दे दी। धीर रोटी ढाबे पर खाता था। मैं भी ज़रा साफ़-सुथरे ढाबे पर रोटी खाया करता था। धीर कभी बताता कि फलाने ढाबे पर दो आने में भरपेट रोटी मिलती है। दाल चाहे दुबारा मांग लो। मैं भी वहाँ जाकर रोटी खाकर देखता। उस भाई ने नया ढाबा खोला था और खुद ही मालिक था, खुद ही वर्कर।&lt;br /&gt;लेकिन प्रो. मोहन सिंह से धीर एक महीने में ही ऊब कर नौकरी छोड़ गया। फिर गाँव से आकर कुछ दिन वह पार्टी के अख़बार 'नवां ज़माना' में भी काम करने जाता रहा। क्योंकि वह पार्टी का होल टाइमर कारकुन था। जब मैं जालंधर आया तो होल टाइमर वर्कर को 30 रुपये महीने के मिला करते थे। लेकिन धीर का अख़बार में भी दिल नहीं लगा। वह चला गया। फिर वह गहरी निराशा डूब गया।&lt;br /&gt;      फिर धीर डिप्रेसन का इलाज करवाने के लिए डा. नेकी के पास भी हो आया था। पर वह पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। एक बार फिर वह जालंधर आ गया। मुझे बहुत ही प्यार से मिला। उसे अपने इलाके के गाँवों के स्थानों और आदमियों से मोह अधिक था। उसने 'नवां ज़माना' में सब-एडिटर का काम करना शुरू कर दिया। मैं शाम के वक्त नित्य नियम की तरह 'नवां ज़माना' के दफ्तर जाया करता था। जहाँ ज़ीरवी और अन्य कामरेड दोस्तों के साथ बैठकर चाय पिया करता था। वहीं गुरदर्शन भी आ जाता था। उस दफ्तर की चाय और ज़ीरवी की लतीफ़ेबाजी का अपना ही आनन्द था। अख़बार में काम की मारामारी नहीं थी। सब आराम से काम करते थे। क्योंकि किसी अन्य अख़बार से इस अख़बार का कोई मुकाबला ही नहीं था।&lt;br /&gt;      धीर का काम सिर्फ़ इतना था कि वह डाक में आई उर्दू ख़बरों का पंजाबी में अनुवाद कर देता था। ख़बर छांटने का काम कोई दूसरा कर देता था। एक दिन मैं छुट्टी वाले दिन तीसरे पहर 'नवां ज़माना' के दफ्तर में चला गया। देखा तो धीर उर्दू ख़बर का अनुवाद कर रहा था। मैं उसके पास जाकर हालचाल पूछने लगा। मेरे प्यार भरे बोल सुनकर धीर ने ऐनक उतार ली। फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। हिचकियाँ लेकर रोता हुआ बोला, ''मेरा यह काम है कोई करने वाला...मैं यह क्या कर रहा हूँ ?''&lt;br /&gt;      उसकी बात सुनकर मैं सुन्न हो गया। मैंने उसे समझाया कि देख भाई, दूसरे लोग भी तो करते ही हैं। मैं छह घंटे लगातार ख़बरें बनाता हूँ। जहाँ सिर उठाने की भी फुरसत नहीं। हम भी दूसरे लोगों जैसे मज़दूर हैं। पर मानसिक तौर पर बीमार धीर मेरी बात समझ नहीं सका था। वह जल्द से जल्द यह काम छोड़कर अपने गाँव डडहेड़ी जाकर कवि और कहानीकार बनकर खाली बैठना चाहता था। उसे जालंधर के अख़बार की हवा रास नहीं आ रही थी। ख़ैर, मैं उसे दिलासा देकर अपने घर लौट आया। मेरे सिर में दर्द रहने लग पड़ा था। यह दर्द सूरज ढलने के साथ उठा करता था। मैंने आमलेट के साथ तेज पत्ती वाली चाय पी और लेट गया। फिर भी मैं धीर के बारे में सोचता रहा। मुझे उस पर खीझ-सी आई। नहाते समय का उसका नंगा बदन याद आ गया। फिर अपने बाप की कम्युनिस्टों को निकाली गालियाँ याद हो आईं। वे कहा करते थे कि ये कम्युनिस्ट तो चाहते हैं कि काम कोई करना न पड़े और ये लोगों की जायदादों पर कब्ज़ा कर लें। मुझे धीर की भी यही जेहनीयत दिखाई दी।&lt;br /&gt;      एक बार हम 'नवां ज़माना' के दफ्तर में चाय पीते हुए इंकलाब के सपने देख रहे थे तो धीर उठकर दो अल्मारियों के आगे खड़ा हो गया और बांहें फैलाकर बोला, ''मैं तो किसी लाइब्रेरी की अल्मारियों पर कब्ज़ा करके घर ले जाऊँगा।''&lt;br /&gt;      यह बात एक तरह से तो अच्छी थी कि इससे उसकी किताबों की भूख जाहिर होती थी। पर भारतीय व्यक्ति की मानसिकता में 'धर्मी डाकू' की भांति लूटने, मारने और कब्ज़ा करने का रोमांस भी था। वह काम करने के बदले मुफ्त में प्राप्त करना चाहता था। मुझे उसका शरीर देखकर भी गुस्सा आया करता था कि देख, दूधधारी साधू की तरह बदन इसका। इसने ज़िन्दगी भर वो काम नहीं किया होगा जिसके कारण बदन से पसीना बहा हो। उसने कहीं चढ़ती जवानी के समय सिलाई की मशीन चलाई थी। अब वह कोई काम करना ही नहीं चाहता था। काला हिरन जो था। मुझे कभी खीझ उठती कि यह होल टाइमर कामरेड मज़दूरों और मेहनतकशों की बात करता है, पर स्वयं काई काम करने के लायक नहीं। कम्युनिस्ट विरोधी इसीलिए इनकी निंदा किया करते हैं। मेरा बाप अगर मुझे भी यही ताना मारा करता था तो वह ठीक ही था। मैं खेती का काम करता रहा था, पर ज्यादा सख्त काम नहीं कर सकता था। मेरे भाई मुझे डेरे का अफीम-खाणा साधू कहा करते थे।&lt;br /&gt;      मुझे धीर द्वारा यह सवाल 'यह काम मेरा है भला ?'' पूछने पर, दिल्ली के मेरे शराबी यार वेद प्रकाश शर्मा जो खन्ने के करीब के गाँव का रहने वाला था, की वह बात याद हो आती जो उसने शराब पीते हुए कही थी। वह जालंधर के ब्लिस होटल में ठहरा हुआ था। कई दोस्त शराब पी रहे थे कि शराब की बोतल और मंगवाने की ज़रूरत पड़ गई। किसी ने कहा कि प्रेम ले आएगा। तब वेद प्रकाश शर्मा ने कहा, ''नहीं, तू लेकर आ। साले, हिरनों पर घास की गठरी लादता है।'' मुझे लगा कि धीर तो काला हिरन है। वह सब-एडिटरी के काम की गठरी कैसे उठा सकता है।&lt;br /&gt;      कई वर्ष बाद एक बार समराला में एक साहित्यिक बैठक में हम एकत्र हुए। बहस के दौरान हमारे विचार भिड़ गए। धीर उंगली उठा उठाकर बार बार अपनी बात कहता गया। मुझे वह आयु में बड़ा होने के कारण दबाता। उन दिनों मेरी कहानी का भी सिक्का चल पड़ा था। फिर भी मुझे बुजुर्ग़ से भिड़ना अच्छा न लगा। यह उन दिनों की बात है जब कम्युनिस्ट पार्टी दोफाड़ हो चुकी थी और रूसी क्रांति को लेकर नये सवाल पैदा हो रहे थे। जालंधर जो कि कम्युनिस्टों का गढ़ था, में विचारों की टक्कर तीखी थी।  मैं तो पार्टी के दोफाड़ होने से भी पहले साहित्य में वामपंथियों के दख़ल का विरोध किया करता था। वे मेरी कहानियों पर लामबंद होकर हमले भी करते थे। मैं खीझकर लड़ता रहता था।&lt;br /&gt;      जब मीटिंग खत्म हुई तो चाय-पानी पीकर मैं और धीर दोनों एकसाथ ही खन्ने वाली बस में बैठ गए। वहाँ बातें करते हुए फिर हमारे सींग आपस में भिड़ गए। आधे घंटे के सफ़र में हम बहुत गरमी खा गए। शब्दों के गरम और तल्ख़ होने के साथ ही आँखें भी निकालने लग पडे। खन्ना से पहले अड्डे पर बस रुकने को हुई तो धीर बड़े गुस्से में बोला, ''अब तू मुझे मारेगा ?''&lt;br /&gt;      मेरे मुँह से निकल गया, ''हाँ, तू बस से बाहर निकलकर तो देख।''&lt;br /&gt;      मैं उतरा और बस चल पड़ी। मैं शांत हुआ और सोचता रहा कि यह हमें क्या हो गया था। मुझे लगा कि कई बार विचारधारा भी धर्म-सी कट्टर और अंधविश्वास वाली हो जाती है। उन दिनों पश्चिम बंगाल में नक्सली सी.पी.आई. और सी.पी.आई.(एम) के वर्कर एक दूसरे पर भी हमले करने से गुरेज नहीं करते थे। यह हमारे देश के लिए नई बात हुई थी।&lt;br /&gt;      कुछ वर्षों बाद पता चला कि धीर डिप्रेसन में है। फिर पता चला, नहीं अब ठीक हो गया है। उधर मैं भी सरकारी नौकरी छोड़कर गाँव में जाकर फिर से खेती करने की बातें किया करता था। मेरे पर भी जुनून का असर दिखाई देने लग पड़ा था। फिर जालंधरियों ने यह लतीफ़ा घुमा दिया कि धीर और प्रेम ने खन्ना में साइकिल मरम्मत की दुकान खोल ली है। प्रेम आए हुए साइकिलों के पंक्चर किए जाता है और धीर लगाये जाता है। वे एक ही पहिये में तीन-तीन पंक्चर लगा कर हटते हैं।&lt;br /&gt;      डिप्रेसन में आए धीर को भी मैंने उस वक्त ठीक ही मान लिया था, जब मुझे भी इसकी कसर बढ़ गई थी। मैंने कुलवंत सिंह विरक से अपनी बिगड़ी मानसिक हालत की बात की तो वह बोला, ''चल, हम भी डा. नेकी को मिल आते हैं।'' हमने अमृतसर के अस्पताल में डा. नेकी के चपरासी के हाथ चिट भेजी तो उसने तभी बुला लिए। मरीजों की बाहर बैठी कतार को रोक दिया गया। जो लोग अब्नार्मल हरकतें करते, उन्हें देखकर मुझे बड़ा तरस आता। पर विरक को खीझ उठती। एक जवान लड़का बार बार फर्श पर पटक कर अपना पैर मारता था। उसकी माँ उसे बमुश्किल रोक रही थी। अन्दर डा. नेकी ने अपने चपरासी को कॉफी बनाने का हुक्म दे दिया था। वह स्वयं ही हमसे बातें करने लग पड़ा। इससे पहले कि विरक मेरी मानसिकता के बिगड़ने की बात करता, मैं डा. नेकी को बताने लगा कि मैं विरक को लेकर आया हूँ। इन्हें एक बीमारी बढ़ती जा रही है। ये जब बस में सफ़र करते हैं तो अपने पास खड़ी औरत के कहीं न कीं उंगली लगाने को उतावले हो जाते हैं। कई बार उंगली लग भी जाती है।&lt;br /&gt;      विरक बहुत हँसा। बोला, ''असल में, मैं प्रेम को लाया हूँ। यह मालिकों के साथ लड़ता रहता है। गालियाँ बकता रहता है। इसका अपने काम में दिल नहीं लगता। नौकरी छोड़ने को फिरता है।''&lt;br /&gt;      फिर मैं हँसता रहा। डा.नेकी ने पता नहीं किसे मरीज समझा। वह भी हँसता रहा। कॉफी पीकर विरक बोला, ''अच्छा, हम चलते हैं।'' जब हम डा. नेकी के कमरे में से बाहर निकले तो विरक उसे गालियाँ बकने लगा, ''ले, ये डॉक्टर बना फिरता है मन का। साला, हमारी मेहमाननवाज़ी करता रहा। बाहर इसके बाप कतार में बैठे इसको रो रहे हैं।''&lt;br /&gt;      मुझे लगा कि डा. नेकी ठीक ही होगा। उसका रोज़ का मानसिक रोगियों से वास्ता पड़ता था। हमने पहली बार देखे थे, इसलिए घबरा गए थे। हमें महसूस हुआ था कि ये रोगी बहुत तकलीफ़ में हैं। पर वे होते नहीं। उन्हें दुख-तकलीफ़ का कोई अहसास नहीं होता। मुझे इस बात का अच्छी तरह पता था। क्योंकि मैं खन्ना के अपने एक दोस्त प्रेम सागर को मेंटल अस्पताल में इलाज करवाने के लिए लाया करता था। उसे बिजली लगती थी तो वह बहुत तड़फता था। पर होश में आने पर वह मुझे बताया करता था कि उसे नहीं पता कि क्या हुआ था उसके साथ।&lt;br /&gt;      धीर मानसिक तौर पर रोगी बनकर डा. नेकी की दी गई दवाइयाँ खाता रहा था। फिर ठीक भी हो गया था। पर वह पुन: जालंधर नहीं आया। कभी आता तो गुरुद्वारा कलगीधर के कवि सम्मेलन के निमंत्रण पर आता। संग में उसके गुरचरन रामपुरी और सुरजीत रामपुरी हुआ करते। वे गुरुद्वारे में कविताएँ पढ़ते। पैसे लेते और गुरुद्वारे का लंगर छकते। और रात में विश्राम करने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करते, जो उन्हें रात भर के लिए आसरा दे सके। वह ठिकाना खोजकर बड़े खुश होकर, एक दूजे को आँखें मार कर कहते, ''अपना तो टुल्ल लग गया... नया भेडू (बकरा) फंस गया।'' फिर वे लिफाफे खोलकर रुपये गिनते कि गाँव जाकर कितने पैसे बच जाएँगे। इस व्यवहार ने इन प्रगतिवादियों को मंगता बना दिया था।&lt;br /&gt;      धीर कबीलदार था। बच्चे छोटे थे, और कोई आमदनी नहीं थी। उसके अन्दर अधिक भूख बोलती थी। तभी उसे पाश ने अपनी डायरी में 'मंगता' लिखा है। एक बार मेरे मित्र प्रेम सिंह चट्ठे ने कहानी गोष्ठी करवाई। मैंने कइयों को पैसे देने का वायदा भी किया था। गोष्ठी दो दिन और एक रात चली। जब दूसरे दिन लेखक विदा होने लगे तो मैंने कइयों को बन्द लिफाफे पकड़ाए। इन लिफाफों में दो दो सौ रुपये थे। धीर को लिफाफा दिया तो उसने क
